सोशल मीडिया से लेकर बच्चों से भावुक अपील तक, विजय ने ऐसे तैयार की राजनीतिक ज़मीन

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

तमिल फ़िल्म स्टार जोसेफ़ विजय की पार्टी टीवीके तमिलनाडु विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.

उन्हें राज्यपाल की ओर से सरकार बनाने का न्योता मिलेगा या नहीं, यह फ़िलहाल कई वजहों से अटकलों के दायरे में है.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने और उनकी टीम ने तमिलनाडु के दो सियासी दलों के बीच झूलने वाली सियासत में एक प्रभावशाली अभियान चलाकर अपनी पार्टी के लिए जगह बनाई है.

वोटरों के रिझाने के लिए आम तौर पर नेता और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जनसभाएं करते हैं या घर-घर जाकर प्रचार करते हैं.

लेकिन टीवीके ने ऐसा अभियान चलाया जिसमें तकनीक का इस्तेमाल ठीक उसी तरह से किया गया जैसे किसी उपभोक्ता उत्पाद की मार्केटिंग में किया जाता है.

संक्षेप में कहें तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बनी कम्युनिटीज़ के मेंबर्स का इस्तेमाल पार्टी के प्रचार के लिए किया गया.

'200 करोड़ की कमाई छोड़कर, आपके लिए आ रहा हूँ...'

इस अभियान ने युवाओं, 18 साल से कम उम्र के बच्चों और महिलाओं को भी जोड़ लिया. इन सभी ने एक शांत लेकिन प्रभावशाली प्रचार तंत्र तैयार किया.

जब नतीजे आए तो कई लोग यह सोचने लगे कि आख़िर टीवीके ने ऐसा क्या अलग किया कि 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा में उसने 108 सीटें हासिल कर लीं.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस नई राजनीतिक पार्टी के असामान्य चुनाव अभियान पर दो राजनीतिक विश्लेषकों डी. सुरेश कुमार और सिद्धार्थ प्रभाकर से बातचीत की.

सुरेश कुमार बताते हैं कि राजनीति में आने का फ़ैसला करने के तुरंत बाद विजय ने जो बातें कहीं, उन्होंने सीधे "लोगों के दिलों को छू लिया."

सुरेश कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "आज विजय तमिलनाडु के सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय फ़िल्म स्टार हैं. वह एक फ़िल्म के लिए 200 करोड़ रुपये तक लेते हैं. इसलिए जब उन्होंने राजनीति में आने का फ़ैसला किया तो लोगों से कहा, 'देखिए, मैं 200 करोड़ रुपये की कमाई छोड़कर आप लोगों के लिए आ रहा हूं.' इस संदेश ने सीधे आम लोगों के दिलों को छू लिया. यह उनकी पहली बड़ी सफलता थी."

इसके बाद उन्होंने लोगों के साथ एक और भावनात्मक जुड़ाव बनाया.

'मैं आपका बच्चा हूँ, मेरा ख़्याल रखें'

उन्होंने कहा कि दूसरे नेता "राजनीति में आने के बाद लोगों के घरों तक पहुंचे", जबकि वह पिछले 30 सालों से अपनी फ़िल्मों के ज़रिए लोगों के घरों में "बेटे, भाई और छोटे भाई" के रूप में मौजूद रहे हैं.

विजय ने कहा, "मैं आपका बच्चा हूं, कृपया मेरा ख़्याल रखिए."

नेताओं का मतदाताओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाना कोई नई बात नहीं है. लेकिन विजय ने एक नया रास्ता चुना.

उन्होंने सीधे बच्चों को संबोधित करते हुए कहा, "अपने माता-पिता, चाचा-चाची, दादा-दादी, जीजा-भाभी से कहो कि इस विजय मामा को एक मौका दें. बाकी दो पार्टियों को पहले ही मौके दिए जा चुके हैं."

सिद्धार्थ प्रभाकर बताते हैं कि विजय की राजनीति में एंट्री की नींव बहुत पहले उनके पिता और फ़िल्म निर्देशक चंद्रशेखरन ने रख दी थी. चंद्रशेखरन कोई छोटे-मोटे निर्देशक नहीं थे. उन्होंने सुपरस्टार रजनीकांत को भी निर्देशित किया था.

प्रभाकर बताते हैं कि पिछले 10-15 सालों में विजय की फ़िल्मों का फ़ोकस, उनकी ऐसी छवि बनाने पर रहा, जो महिलाओं और बच्चों को खूब भाए.

विजय का चुनाव चिन्ह 'व्हिसल' उनकी तमिल फ़िल्म 'बिगिल' से लिया गया है. यह फ़िल्म 'चक दे इंडिया' की रीमेक है, जिसमें शाहरुख़ ख़ान हॉकी टीम के कोच हैं. 'बिगिल' में विजय एक फ़ुटबॉल टीम के कोच हैं.

प्रभाकर कहते हैं, "अगर आप बिगिल देखें तो आपको उनके सभी मतदाता यानी युवा, बुज़ुर्ग और महिलाएं दिखेंगी. 2021 में उनकी एक फ़िल्म बच्चों और सुधार गृहों पर केंद्रित थी. उन्होंने ख़ुद को एक रक्षक के रूप में पेश किया है. यह बेहद सोच-समझकर बनाई गई छवि है. लोगों को लगता है कि अगर वह सत्ता में आए तो उनकी मदद करेंगे. मैंने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से बात की है और लोग उनमें उम्मीद देखते हैं."

राजनेताओं से उलट विजय लंबे भाषण नहीं देते. सुरेश कुमार कहते हैं, "उनकी शैली सीधी रही है, जिसमें फ़िल्मों जैसे पंच डायलॉग होते हैं. यही उनकी पहचान बन गई है."

'सीटी बजाओ और अपने माता-पिता से वोट दिलवाओ'

सुरेश कुमार को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि विजय ने पूरे राज्य का दौरा कर भाषण नहीं दिए.

उन्होंने केवल 10 या 15 जनसभाएं और रोड शो किए. रजनीकांत और कमल हासन की तरह विजय की भी दो पीढ़ियों में अपील है, लेकिन उन्होंने सीधे बच्चों को संबोधित किया.

सुरेश कुमार ने कहा, "व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह सही नहीं लगा. डीएमके के एमके स्टालिन बच्चों से कहते थे कि अच्छी पढ़ाई करो, तुम्हारे माता-पिता तुम पर भरोसा करते हैं. एआईएडीएमके के ई पलानीस्वामी शिक्षा संस्थानों के लिए बनाए गए बुनियादी ढांचे की बात करते थे."

"लेकिन विजय का संदेश था - 'सीटी बजाओ और अपने माता-पिता से वोट दिलवाओ.' जब लोग आप पर इतना भरोसा करते हैं और आपको इतना पसंद करते हैं, तब आपको बच्चों से शिक्षा और ज़िम्मेदारी की भी बात करनी चाहिए."

प्रभाकर भी सुरेश कुमार से सहमत थे कि विजय ने "एक तरह की अवसरवादी राजनीति" की.

लेकिन उन्होंने कहा, "विजय अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि मुझे सत्ता दीजिए और फिर देखिए मैं क्या करता हूं."

प्रभाकर ने यह भी बताया कि विजय की पार्टी के उम्मीदवार आम लोग हैं, "इनमें माल ढोने वाली वैन के ड्राइवर, दसवीं पास मीट की दुकान का मालिक तक शामिल हैं. और अब ऐसे लोग चुनाव जीत गए हैं. उनकी सरकार आम लोगों की सरकार होगी."

इसके अलावा पार्टी ने अनुसूचित जाति परिवारों से आने वाले आठ उम्मीदवारों को टिकट दिया और उनमें से चार सामान्य सीटों से जीतकर आए, यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि द्रविड़ पार्टियों पर अक्सर दलित मुद्दों को लेकर कमज़ोर होने के आरोप लगते रहे हैं.

विजय की बनाई गई सार्वजनिक छवि के पीछे काफ़ी योजना रही है. उदाहरण के तौर पर प्रभाकर 'स्कार्सिटी इफेक्ट' का ज़िक्र करते हैं, जिसे माइकल जैक्सन अपनाते थे.

स्कार्सिटी इफेक्ट का मतलब है कि कोई व्यक्ति इतना दुर्लभ और कम दिखाई देने वाला हो जाए कि वह खुद एक ब्रांड बन जाए.

प्रभाकर कहते हैं, "इस वजह से लोग उन्हें देखने के लिए तरसते थे. इससे उनके आसपास एक अलग आभा बन गई."

टीवीके ने एक मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया. पार्टी ने उन इलाकों का डेटा जुटाया जहां ऐप सबसे ज़्यादा डाउनलोड हुआ और उससे यह पहचाना कि किन इलाक़ों में उनकी लोकप्रियता सबसे मज़बूत है.

बूथ प्रबंधन

दूसरा अहम पहलू बूथ प्रबंधन था.

प्रभाकर कहते हैं, "इस तरह विजय के प्रशंसकों का नेटवर्क, जिन्हें विजय 'ननबास और ननबीस' यानी दोस्त कहते हैं, बेहद मज़बूत और भावनात्मक रूप से समर्पित हो गया. उनका एकमात्र लक्ष्य विजय को मुख्यमंत्री बनाना था."

उन्होंने कहा, "यही वजह है कि यह कहना कि टीवीके के पास बूथ ढांचा या प्रचार तंत्र नहीं था, पुरानी चुनावी सोच है. टीवीके ने सोशल मीडिया और तकनीक पर आधारित नए दौर की चुनावी राजनीति पेश की. सोशल मीडिया पर विजय के क़रीब 1.69 करोड़ फ़ॉलोअर्स हैं."

प्रचार के आख़िरी दिन 20 मिनट के भाषण में विजय ने सीधे बच्चों से कहा, "जब तुम्हें किंडर जॉय या चॉकलेट चाहिए होती है तो तुम अपने माता-पिता को तब तक परेशान करते हो जब तक वे खरीदकर आपको न दे दें. उसी तरह उनसे कहो कि वे व्हिसल चुनाव चिन्ह को वोट दें."

उसी रात से इंस्टाग्राम और एक्स पर पांच-छह साल के बच्चों के वीडियो दिखने लगे, जिनमें वे रोते हुए अपने माता-पिता से 'विजय मामा' को वोट देने की मांग कर रहे थे और मज़ाकिया अंदाज़ में धमकी भी दे रहे थे.

कई माता-पिताओं ने भी ऐसे वीडियो शेयर किए.

सुरेश कुमार कहते हैं, "राजनीतिक रूप से विजय ने अपना पूरा राजनीतिक नैरेटिव 'डीएमके बनाम टीवीके' के इर्द-गिर्द तैयार किया. उन्होंने एआईएडीएमके को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया और उनका नाम तक नहीं लिया. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ डीएमके और टीवीके की लड़ाई है. और चूंकि तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी का ज़्यादा प्रभाव नहीं है, इसलिए उन्होंने साफ़ कहा कि 'हमारा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी डीएमके है, जबकि वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बीजेपी है'."

तो लोग उनकी तुलना एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और करुणानिधि जैसे नेताओं के दौर से कैसे करेंगे?

सुरेश कुमार ने कहा, "देखिए, एमजीआर की शैली पूरी तरह अलग थी, इसलिए मैं विजय की तुलना उनसे नहीं करूंगा. मैं उनकी तुलना एनटी रामाराव से करूंगा क्योंकि एमजीआर राजनीति में पूरी तरह आने से पहले ही राजनीतिक रूप से सक्रिय थे."

"अगर आप एमजीआर की फ़िल्में देखें तो उन्होंने कभी शराब नहीं पी, तंबाकू का इस्तेमाल नहीं किया और बहुत कम नकारात्मक भूमिकाएं निभाईं. उनकी छवि हमेशा मां के अच्छे बेटे, बहन के अच्छे भाई और अच्छे पति की रही. उनकी फ़िल्मों और गीतों में हमेशा सांस्कृतिक और नैतिक संदेश होते थे. आज भी अगर आप उनके गीत सुनें तो उनमें प्रेरणादायक और सकारात्मक संदेश मिलते हैं."

उन्होंने कहा, "लेकिन विजय की अपील अलग है. उनका संदेश सीधे आम दर्शकों तक पहुंचता है, जिन्हें हम बी और सी सेंटर दर्शक कहते हैं. उन्हें विजय से बेहद सीधा संवाद मिलता है. अमीर तबके के ए-क्लास दर्शक हमेशा उससे जुड़ नहीं पाते. इसके अलावा एमजीआर अपनी फ़िल्मों में खुलकर डीएमके का प्रचार करते थे और डीएमके भी उन्हें भीड़ जुटाने वाले चेहरे के रूप में इस्तेमाल करती थी."

सुरेश कुमार कहते हैं कि विजय की तरह एन.टी. रामाराव का भी कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं था. उन्होंने सीधे तेलुगु देशम पार्टी बनाई और एक साल के भीतर मुख्यमंत्री बन गए.

हालांकि वह 1982-83 का दौर था, जब प्रसार के साधन काफ़ी सीमित थे और अख़बार लोगों तक एक दिन बाद पहुंचते थे.

उनका कहना है, "सच कहूं तो मुझे भी उम्मीद नहीं थी कि विजय को लोग इतनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे. हमें भरोसा था कि अगर विजय लंबे समय तक सियासत में टिके रहेंगे तो आख़िरकार सफल होंगे. लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह 100 मीटर की स्प्रिंट दौड़ जीत जाएंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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