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चुनावी नतीजों का बीजेपी और देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
देश में इस साल के सबसे बड़े क्षेत्रीय चुनावों के नतीजों पर कयास का दौर ख़त्म हो चुका है.
अपने सहयोगियों के साथ बीजेपी ने आख़िरकार पश्चिम बंगाल में ममता के क़िले को ढहा दिया है जबकि असम और पुडुचेरी में सत्ता बरक़रार रखी.
केरल में पार्टी ने अपने प्रदर्शन में सुधार किया, हालांकि तमिलनाडु में पार्टी के प्रदर्शन में कुछ सुधार नहीं आ पाया.
लेकिन इन चुनावों के नतीजे, भविष्य में बीजेपी और विपक्ष दोनों के लिए क्या मायने रखेंगे, इस पर नज़र रहेगी.
बीजेपी का बढ़ता प्रभाव
पश्चिम बंगाल में जीत के साथ ही बीजेपी और एनडीए अब 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में है. झारखंड को छोड़ दिया जाए तो पार्टी पूरे मध्य भारत पर राज कर रही है.
पूर्वोत्तर भारत में मिज़ोरम को छोड़कर बीजेपी, अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन में सरकार चला रही है.
लोकसभा में पार्टी, अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ पहले ही साधारण बहुमत में है, वहीं नए राज्यों में जीत के साथ राज्यसभा में इसकी मौजूदा संख्या 113 से और बढ़ने की संभावना है.
उसने उन प्रदेशों में अच्छा प्रदर्शन किया है, जहां उसे सत्ता में आने का फिर से मौका मिला है.
विश्लेषकों को लगता है कि ये नतीजे, इलाक़ाई क्षत्रपों पर बीजेपी के दबदबे को और अधिक बढ़ाएंगे.
'यह बीजेपी का समय है'
इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ओपिनियन एडिटर वंदिता मिश्रा लिखती हैं, "बीजेपी का उदय ऐसे समय में हो रहा है जब क्षेत्रीय ताक़तें कमज़ोर पड़ रही हैं, जो इसकी मुख़ालफ़त करती रही हैं."
"इन चुनावों में ममता बनर्जी और एमके स्टालिन सत्ता से बेदख़ल हो गए, वहीं इससे पहले हमने आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल, ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को हारते देखा है."
अधिकांश लोगों के लिए ये नतीजे इस धारणा को और मज़बूत बनाते हैं कि मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य में बीजेपी का कोई टिकाऊ विकल्प नहीं है.
यूपीए सरकार के दौरान क़ानून एवं न्याय मंत्री रहे अश्वनी कुमार कहते हैं, "राष्ट्रीय स्तर पर यह बीजेपी का समय है और जब तक कोई स्पष्ट और व्यावहारिक विकल्प सामने नहीं आता, तब तक यही हालत बनी रहने की संभावना है."
उन्होंने कहा, "मैं ये ज़रूर कहना चाहूंगा कि फ़िलहाल मुझे आने वाले समय में ऐसा कोई विकल्प नज़र नहीं आ रहा."
बीजेपी के कई आलोचकों को चिंता है कि एक पार्टी की इस तरह के दबदबे वाली मौजूदगी, क्या लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है?
योगेंद्र यादव कहते हैं, "प्रशासन का उनका (बीजेपी का) मॉडल, 'टोटल पॉवर' यानी 'पूर्ण सत्ता' वाला है और ख़ास तौर पर पश्चिम बंगाल में जो कुछ हुआ वह इस दिशा में ही एक और बढ़ा क़दम है. लेकिन पूर्ण सत्ता के समर्थक लोगों को कभी-कभी आत्मचिंतन करना चाहिए और सोचना चाहिए कि क्या पूर्ण सत्ता का तर्क लोकतंत्र के तर्क के साथ फ़िट बैठता है."
हालांकि मौजूदा समय में बीजेपी का दबदबा अभी तक दक्षिण की ओर नहीं फैला है. ये भी साफ़ नहीं है कि नई चुनी गई सरकारों के साथ पार्टी के क्या रिश्ते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडणीस का कहना है, "हमें नहीं पता कि डीएमके के शासनकाल में काफ़ी टकरावपूर्ण हो चुके राज्य के रिश्ते को टीवीके केंद्र के साथ कैसे निभाएगी."
"केरल में बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कांग्रेस किस मुख्यमंत्री का चयन करती है और उस मुख्यमंत्री के केंद्र के साथ संबंध कैसे विकसित होंगे."
वो जोड़ती हैं, "लेकिन मैं यह कहने में सावधानी बरतूंगी कि इन नतीजों को अपने आप राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के फ़ायदे के तौर पर देखा जाए."
"हमने 2024 के लोकसभा चुनावों में देखा था कि राज्यों में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद पार्टी का प्रदर्शन कमज़ोर हुआ था."
पॉलिसी और प्रशासन के लिए इसके क्या मायने हैं?
ये भी देखना बाकी है कि ये जीत बीजेपी के कल्याणकारी नीतियों और 'पुशबैक' नीति जैसे विवादित मुद्दों के साथ-साथ असम और पश्चिम बंगाल में सीमा पार घुसपैठ के सवाल को किस तरह प्रभावित करेगी.
चार मई की शाम दिल्ली में बीजेपी हेडक्वार्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' से जुड़े संवैधानिक संशोधन को पारित कराने की असफल कोशिश का ज़िक्र किया.
उन्होंने दावा किया कि महिला मतदाताओं ने डीएमके, टीएमसी और कांग्रेस को सज़ा दी है.
उन्होंने कहा, "लोग विवाद नहीं चाहते, वे विकास चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को महिलाओं के ग़ुस्से का सामना करना पड़ेगा. वे अपने पाप नहीं धो पाएंगे."
प्रधानमंत्री ने वादा करते हुए कहा, "पश्चिम बंगाल में महिलाओं को बेहतर सुरक्षा मिलेगी, युवाओं को रोज़गार मिलेगा और हम माइग्रेशन को ख़त्म करेंगे. पहली कैबिनेट बैठक में ही हम आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना लागू करेंगे."
रिपोर्ट्स के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और मुस्लिम बहुल ज़िले जैसे मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और मालदा इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.
ऐसे में यह साफ़ नहीं है कि नई बीजेपी सरकार इस स्थिति से कैसे निपटेगी.
वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडणीस ने इसे "जटिल और अभूतपूर्व" बताया.
उन्होंने कहा, "पश्चिम बंगाल में हमें बिल्कुल नहीं पता कि उन बड़ी संख्या में लोगों का भविष्य क्या होगा, जिन्हें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वजह से वोट देने से वंचित कर दिया गया है."
"क्या बीजेपी इसे अगले चरण तक ले जाएगी और उनकी नागरिकता पर भी सवाल उठाएगी?"
"बहुत से लोग क़ानूनी लड़ाई हार चुके हैं. उनका क्या होगा? ममता एक विपक्षी नेता के रूप में जानी जाती हैं और मुझे नहीं लगता कि वह पश्चिम बंगाल में इस तरह के ध्रुवीकरण को बिना चुनौती दिए होने देंगी."
अदिति फडणीस कहती हैं, "पश्चिम बंगाल में आंदोलन की राजनीति लौटेगी और आने वाले दिनों में ज़्यादा टकराव देखने को मिल सकता है."
चुनाव आयोग ने अपने क़दमों का बचाव करते हुए कहा है कि उसका मक़सद ये सुनिश्चित करना है कि सभी पात्र मतदाताओं को शामिल किया जाए और अपात्र मतदाताओं को बाहर किया जाए.
पड़ोसी राज्य असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कई बार कह चुके हैं कि 'ग़ैरक़ानूनी बांग्लादेशियों' को बांग्लादेश वापस भेजने की 'पुशबैक' कार्रवाई जारी रहेगी.
मार्च में उन्होंने यह भी पोस्ट किया था कि बुलडोज़र 'आने वाले दिनों में घुसपैठियों और अतिक्रमणकारियों पर कहर बरपाएंगे.'
ह्यूमन राइट्स वॉच ने हाल ही में, "बीजेपी शासन के दौरान भारत में 'तानाशाही की तरफ़ झुकाव' और 'मुसलमानों व आलोचकों के बढ़ते दमन'" का ज़िक्र किया था.
मानवाधिकार संगठन ने कहा, "अधिकारियों ने सैकड़ों बंगाली भाषी मुसलमानों और रोहिंग्या शरणार्थियों को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से बांग्लादेश भेज दिया. इनमें कुछ भारतीय नागरिक भी शामिल थे. उन पर 'ग़ैरक़ानूनी प्रवासी' होने का आरोप लगाया गया."
ख़ासकर असम के बारे में ह्यूमन राइट्स वॉच ने ज़िक्र किया, "बांग्लादेश भेजे गए कम से कम 300 लोगों को असम से निकाला गया था."
"बीजेपी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने जुलाई और अगस्त में कम से कम सात बुलडोज़र अभियान चलाए, जिनसे 5,000 से ज़्यादा परिवार प्रभावित हुए. इनमें ज़्यादातर बांग्ला भाषी मुसलमान थे."
दक्षिण की सीमाएं
मौजूदा चुनावी दौर का शायद सबसे बड़ा उलटफेर तमिलनाडु में देखने को मिला, जहां सत्तारूढ़ दल और उसका धुर प्रतिद्वंद्वी दोनों ही एक नए खिलाड़ी के सामने धाराशायी हो गए.
फडणीस के मुताबिक़ टीवीके का उभार सिर्फ डीएमके के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के लिए भी चुनौती है.
वो कहती हैं, "मैं कह सकती हूं कि दक्षिणी राज्यों में यह भावना मज़बूत हो रही है कि बेहतर जनसंख्या नियंत्रण उपाय अपनाने की वजह से उन्हें सज़ा दी जा रही है और विजय के प्रदर्शन को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए."
योगेंद्र यादव के मुताबिक़, "द्रविड़ राजनीति के ढांचे के भीतर तमिल राजनीति में एक खालीपन पैदा हो गया है. पहले राजनीति डीएमके और एआईएडीएमके के बीच सीमित थी, लेकिन अब एआईएडीएमके कई बार टूट चुकी है और यह साफ़ नहीं कि उसका क्या मक़सद है."
योगेंद्र यादव कहते हैं, "साथ ही यह धारणा भी है कि उसे बीजेपी पर्दे के पीछे से चला रही है. ऐसे समय में विजय सामने आते हैं. वो ईसाई हैं और कहते हैं कि डीएमके उनका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है, जबकि बीजेपी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी है और वह दोनों से दूरी बनाए रखेंगे."
उनके अनुसार, विजय के उभार में "युवा मतदाताओं, छात्रों, महिलाओं और शहरी मतदाताओं के बड़े समर्थन" का बड़ा हाथ है.
उन्होंने कहा कि यह एक क्लासिक प्रोटेस्ट मूवमेंट जैसा है, जो अचानक उभरकर सामने आया. इसकी तुलना उस दौर से की जा सकती है जब आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली में सत्ता हासिल की थी.
क्या विजय का उभार यह रास्ता दिखा सकता है कि स्थापित राजनीतिक व्यवस्था को कैसे चुनौती दी जा सकती है? क्या भारत का 'हतोत्साहित' विपक्ष टीवीके की सफलता से कुछ सीख ले सकता है?
जवाब में योगेंद्र यादव कहते हैं, "तमिलनाडु के बाहर लोग शायद कहेंगे कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसा संभव नहीं है. इसलिए मेरी असली चिंता यह है कि क्या इस तरह का मॉडल देश के दूसरे हिस्सों में दोहराया जा सकता है?"
"चुनाव आयोग के कामकाज और पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार की ताक़त के इस्तेमाल को देखते हुए क्या विपक्ष टीवीके की सफलता से हौसला ले सकता है? मुझे नहीं लगता कि वे ऐसा कर पाएंगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित