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तुर्की और इसराइल के बीच क्या सीधी जंग का ख़तरा है?
- Author, हिलकेन दोवाच बुरान
- पदनाम, बीबीसी तुर्की, इस्तांबुल
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
पिछले तीन सालों में तुर्की-इसराइल के संबंध राजनयिक स्तर पर सामान्य होने की कगार पर पहुंचने के बाद अब सीधे सैन्य संघर्ष के ख़तरे तक पहुंच चुके हैं.
दोनों देशों के नेताओं के बीच जुबानी जंग जारी रहने के साथ ही, उनके बीच सैन्य टकराव की संभावना भी चर्चा का विषय बन गई है.
इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने 11 अप्रैल को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन पर ईरान में "आतंकवादी शासन" की सहायता करने और "अपने ही कुर्द नागरिकों का नरसंहार करने" का आरोप लगाया.
अर्दोआन ने 15 अप्रैल को तुर्की की संसद में अपने भाषण में कहा था, "ग़ज़ा में 73,000 फ़लस्तीनियों के ख़ून से सने हाथों और चेहरों को देखे बिना, वो बेशर्मी से हमारे कुर्द भाइयों के ज़रिए हमारे देश पर आरोप लगाते हैं."
ताज़ा घटनाक्रमों के बारे में बीबीसी की तुर्की सेवा से बात करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की और इसराइल के बीच टकराव का ख़तरा "पहले से कहीं अधिक" बढ़ गया है, लेकिन साथ ही दोनों पक्ष संभावित संघर्ष को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.
"शांति के बजाय, हम प्रतिस्पर्धा देख रहे हैं"
सात अक्तूबर, 2023 को हमास के इसराइल पर किए गए हमलों और ग़ज़ा में इसराइल के सैन्य अभियान के बाद तुर्की और इसराइल के बीच बयानबाज़ी बढ़ी है जिससे तनाव पैदा हुआ है.
पिछले तीन सालों के कड़े बयानों और आरोपों के साथ-साथ, राजनयिक रिश्तों को सामान्य करने की प्रक्रिया भी रुक गई, और तुर्की ने घोषणा की कि उसने इसराइल के साथ अपना व्यापार बंद कर दिया है.
इज़मिर के कटेब चलाबी विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. तोग़चे एरसोय का मानना है कि दोनों देशों के बीच मौजूदा स्थिति राजनयिक सिद्धांतों पर घरेलू हितों की प्रधानता का परिणाम है. साथ ही उनका कहना है कि "विदेश नीति घरेलू राजनीति की बंधक बन गई है."
उन्होंने कहा, "तनाव में यह बढ़ोतरी, टकराव का लहजा और ज़ुबानी जंग वास्तव में दोनों पक्षों की घरेलू राजनीति को हवा दे रही है. नेतन्याहू एक सख़्त और टकरावपूर्ण छवि पेश करके घरेलू राजनीति में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं. तुर्की के मोर्चे पर, यह स्थिति क्षेत्रीय नेतृत्व के दावों से भी जुड़ी हुई है."
एरसोय का कहना है कि तुर्की और इसराइल एक-दूसरे को "इस क्षेत्र के हालात को अस्थिर करने वाले" के रूप में देखते हैं. हालिया संबंधों के बारे में वो आगे कहती हैं, "हम हमेशा तुर्की-इसराइली संबंधों को 'शीतकालीन शांति' के रूप में वर्णित करते थे. लेकिन अब हम 'शीतकालीन प्रतिद्वंद्विता' देख रहे हैं."
पूर्व इसराइली राजनयिक एलोन पिंकास का कहना है कि बिन्यामिन नेतन्याहू की तुर्की को प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करने वाली टिप्पणियां "खतरनाक" हैं.
"इस तरह की बयानबाज़ी बहुत ख़तरनाक है, ख़ासकर तब जब अर्दोआन भड़काऊ टिप्पणियों के साथ जवाब देते हैं और स्थिति को और ख़राब कर देते हैं."
"ज़ुबानी जंग से बढ़ता सैन्य संघर्ष का ख़तरा"
लंदन के सेंट जॉर्ज विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर अमनोन आरान का भी मानना है कि ये ज़ुबानी विवाद ज़्यादातर घरेलू भरपाई के लिए हैं.
वो कहते हैं, "तुर्की और अर्दोआन के दृष्टिकोण से, इस कठोर भाषा का मक़सद उनकी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के समर्थकों को ख़ुश रखना है. यह ठीक उसी तरह है जैसे नेतन्याहू इसी तरह के लहजे का इस्तेमाल करके धुर दक्षिणपंथी समर्थकों के बीच समर्थन हासिल करने और अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश करते हैं."
आरान कहते हैं कि दोनों देशों के बीच रिश्ते 2010 से 2016 के बीच हुए मावी मरमारा संकट के बाद से अब तक के सबसे ख़राब दौर में हैं.
उन्होंने कहा, "मेरी राय में, नेतन्याहू और अर्दोआन दोनों ही इस तरह की बयानबाज़ी से बेहद ग़ैरज़िम्मेदाराना व्यवहार कर रहे हैं. इस तरह की बयानबाज़ी से दोनों देशों के बीच संघर्ष की संभावना ही बढ़ती है और उसे बढ़ावा मिलता है."
सीरिया, साइप्रस और पूर्वी भूमध्यसागर
बीबीसी की तुर्की सेवा से बात करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की और इसराइल के बीच कोई भी संभावित संघर्ष उन बिंदुओं पर हो सकता है जहां दोनों देशों द्वारा ख़ुद के लिए तय किए गए प्रभाव क्षेत्र एक दूसरे को काटते हों.
तोग़चे एरसोय का कहना है, "तुर्की और इसराइल के बीच टकराव का ख़तरा पहले से कहीं अधिक है."
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पूर्ण पैमाने पर युद्ध की संभावना कम है. उन्होंने सीरिया, साइप्रस और पूर्वी भूमध्यसागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की ओर इशारा करते हुए कहा, "यहां हम पारस्परिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास देख रहे हैं. हम कह सकते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के ख़िलाफ एक प्रकार की भू-राजनीतिक ढाल बनाने की कोशिश कर रहे हैं."
एरसोय यह भी कहती हैं, "इसराइल के रणनीतिक दस्तावेज़ों में, तुर्की को अब एक दुश्मन के रूप में बताया गया है, और यह एक तथ्य है."
आरान यह भी कहते हैं, "मुझे लगता है कि अतीत की तुलना में सैन्य संघर्ष की संभावना बढ़ गई है, लेकिन इससे अभी भी बचा जा सकता है."
उन्होंने 2025 में अज़रबैजान में तुर्की और इसराइली सैन्य प्रतिनिधिमंडलों के बीच तनाव को रोकने के तंत्र पर हुई बैठकों का ज़िक्र करते हुए कहा, "जहां तक मुझे पता है, कम से कम सैन्य स्तर पर, ऐसी किसी भी घटना या ग़लतफ़हमी को रोकने के प्रयास जारी हैं जो संघर्ष का कारण बन सकती है."
आरान ने तुर्की के बारे में इसराइल के दृष्टिकोण के बारे में यह भी कहा, "इसराइली सरकार और सेना में राजनीतिक और सैन्य एलीट वर्ग के एक बड़े हिस्से में तुर्की को धीरे-धीरे एक शत्रुतापूर्ण और ख़तरनाक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है."
एलोन पिंकास इस जोखिम को समझाने के लिए एक उदाहरण देते हैं, "मान लीजिए कि तुर्की ग़ज़ा या लेबनान जा रहे सहायता जहाज़ों को सुरक्षा प्रदान कर रहा है. अगर इसराइली नौसेना के जहाज़ इस बेड़े से भिड़ने की कोशिश करते हैं और तुर्की के जहाज़ उन पर गोलीबारी करते हैं, तो इसराइल जवाबी कार्रवाई कर सकता है और एक सीमित युद्ध छिड़ सकता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा."
एलोन पिंकास का मानना है कि तुर्की और इसराइल की सेनाएं दोनों देशों के राजनेताओं की तुलना में "अधिक तर्कसंगत" तरीक़े से काम करती हैं.
हालांकि, वह चेतावनी देते हैं कि सीरिया में इसी तरह की स्थिति, जहां दोनों देशों के लड़ाकू विमान एक-दूसरे का सामना कर सकते हैं, एक "भयानक परिदृश्य" को जन्म दे सकती है.
उन्होंने कहा, "मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, लेकिन अगर वे मुझे बताएं कि मोसाद और तुर्की की सैन्य और विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियां लगातार संपर्क में हैं, तो मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होगा."
'नए ईरान' पर चर्चा
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने से पहले, 17 फ़रवरी को इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट ने दावा किया था कि तुर्की "नया ईरान" है.
इसके बाद, इसी तरह के लेख इसराइली और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हुए.
बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपनी एक पोस्ट में तुर्की पर ईरान का समर्थन करने का आरोप भी लगाया.
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने 13 अप्रैल को अनादोलू एजेंसी को बताया, "ईरान के बाद इसराइल बिना दुश्मन के नहीं रह सकता, इसलिए उसे एक नया राजनीतिक मुद्दा गढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है. हम देख रहे हैं कि न केवल नेतन्याहू सरकार, बल्कि उनके कुछ विरोधी भी तुर्की को एक नए दुश्मन के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं."
पूर्व राजनयिक एलोन पिंकास का कहना है कि ईरान के उलट, तुर्की ने "इसराइल को नष्ट करने की कसम नहीं खाई है" और इसराइल के ख़िलाफ़ इस्तेमाल के लिए सैन्य परमाणु हथियार विकसित करने जैसा उसका कोई लक्ष्य नहीं है.
"जो लोग इसराइल के बारे में अर्दोआन की हर बात से असहमत हैं, वे भी जानते हैं कि तुर्की एक दुश्मन देश नहीं है. जो कोई भी ख़तरे के मामले में तुर्की को ईरान के बराबर मानता है, वह लापरवाही और ख़तरनाक तरीक़े से काम कर रहा है."
आरान का यह भी कहना है कि तुर्की "नया ईरान" नहीं है.
"मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे तो यह कल्पना भी नहीं होती कि इसराइली सरकारी अधिकारी सचमुच ऐसा मानते हैं या उनका यही मतलब है. क्योंकि तुर्की नेटो का सदस्य है, अमेरिका के साथ उसके मज़बूत संबंध हैं और वह अपना अधिकांश व्यापार यूरोपीय संघ के साथ करता है."
आरान का मानना है कि कुछ इसराइली अधिकारियों और विश्लेषकों के बीच इस दृष्टिकोण की जड़ें राष्ट्रपति अर्दोआन और तुर्की के इसराइल के ख़िलाफ़ अपनाए गए कठोर रुख़ के अंदर शामिल हैं.
उनके मुताबिक़, अर्दोआन का नेतन्याहू की तुलना हिटलर से करना और तुर्की के राष्ट्रपति का अतीत में इसराइल की आलोचना करना इस दृष्टिकोण के कारणों में से एक हैं.
तोग़चे एरसोय का कहना है, "यह स्पष्ट है कि तुर्की नया ईरान नहीं है."
वो कहते हैं, "यह तुलना संभवतः तुर्की को पश्चिमी व्यवस्था से अलग करने और उसे एकाकी बनाने के उद्देश्य से की गई है. मेरा विशेष रूप से मानना है कि पश्चिमी प्रेस में प्रकाशित इसराइल समर्थक लेख पक्षपातपूर्ण और मनगढ़ंत हैं. हम इन्हें एक प्रकार का जानबूझकर दिया गया बयान और इरादा मान सकते हैं."
"भविष्य में सुधार की उम्मीद नहीं करते हैं"
ऐसी स्थिति में जहां संघर्ष का ख़तरा एक गंभीर मुद्दा बन गया है, क्या वास्तव में दोनों देशों के बीच विश्वास का बहाल करना संभव है?
एलोन पिंकास कहते हैं, "मैं कहूंगा कि नेतन्याहू के सत्ता छोड़ने के बाद हालात बेहतर हो जाएंगे, लेकिन जैसा कि आपने उल्लेख किया है, नफ़्ताली बेनेट ने तुर्की के प्रति नेतन्याहू से भी अधिक कठोर रुख़ अपनाया है."
इसराइल में आम चुनाव 27 अक्तूबर तक हो सकते हैं, और पूर्व इसराइली प्रधानमंत्रियों नफ़्ताली बेनेट और याएर लैपिड के नेतृत्व वाले गठबंधन का मुक़ाबला बिन्यामिन नेतन्याहू के गठबंधन से होने की उम्मीद है.
आरान का मानना है कि तुर्की-इसराइली संबंधों में बदलाव मौजूदा सरकारों के माध्यम से नहीं आएगा, बल्कि उनके उत्तराधिकारियों के सत्ता में आने के बाद आएगा.
तोग़चे एरसोय का यह भी कहना है, "हमें निकट भविष्य में बेहतर माहौल की उम्मीद नहीं करनी चाहिए."
इतिहास में दोनों देशों के बीच संबंध "कभी भी आदर्श नहीं रहे" इस बात का हवाला देते हुए उन्होंने वर्तमान स्थिति को एक "दरार" बताया.
उन्होंने कहा, "तुर्की-इसराइली संबंधों को दोबारा बनाने के रास्ते पर लाने के लिए एक नई सुरक्षा संरचना की ज़रूरत है. दूसरे शब्दों में कहें तो आपसी विश्वास को फिर से स्थापित करना होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.