शुभेंदु अधिकारी: पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के आगे होंगी ये बड़ी चुनौतियाँ

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. इसके साथ ही राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार बन गई है.

अन्य राज्यों के मुक़ाबले पश्चिम बंगाल में एक ख़ास बात यह रही है कि यहाँ जिस पार्टी या गठबंधन की सरकार रही है, उसने लंबे समय तक शासन किया है.

बीजेपी को अब राज्य में अपने पुराने वादों को पूरा करने के लिए काम करना होगा.

राज्य के लिए बीजेपी के वादों की फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है और इस कहानी में हम जानने की कोशिश करेंगे कि बीजेपी और नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए ये वादे कितनी बड़ी चुनौती बन सकते हैं.

पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को दो-तिहाई से ज़्यादा बहुमत मिला है. यानी राजनीतिक स्तर पर सरकार के लिए कोई भी काम करना मुश्किल नहीं होगा.

हालाँकि इस विशाल बहुमत और जनता की उम्मीदों का दबाव उस पर बना रहेगा.

बांग्ला संस्कृति को साथ लेकर चलना

बीजेपी के सामने अन्य राज्यों के मुक़ाबले पश्चिम बंगाल की चुनौती काफ़ी अलग भी हो सकती है. बीजेपी को आमतौर पर हिंदी भाषी इलाक़े की पार्टी के तौर पर जाना जाता है, ऐसे में उसे बांग्ला संस्कृति के साथ तालमेल बैठाकर अपने चुनावी वादों को पूरा करना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार महुआ चटर्जी कहती हैं, "बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विचारधारा को लेकर होगी. उसके साथ हिन्दी पट्टी की एक पहचान जुड़ी है, जिसे बांग्ला पहचान के साथ तालमेल बैठाना होगा."

वो इसे समझाते हुए कहती हैं, "शुभेंदु अधिकारी ने जिस दिन शपथ ली है वह गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती का दिन है. पीएम ने रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर पर माल्यार्पण की और श्रद्धांजलि दी. लेकिन मेरे अनुभव में ऐसा पहली बार हुआ कि रवींद्र जयंती के दिन पश्चिम बंगाल सरकार का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हुआ."

उनका मानना है कि भले ही राज्य में नई सरकार का गठन नहीं हुआ था, लेकिन गवर्नर के नेतृत्व में यह काम हो सकता था.

"मैं नहीं कहती कि ऐसा जानबूझकर किया गया होगा. लेकिन बंगाल की संस्कृति की समझ के इसी अभाव में यह कार्यक्रम नहीं हुआ. इसी वजह से पश्चिम बंगाल में अन्य दल बीजेपी पर बाहरी होने का आरोप लगाते रहे हैं."

रवींद्र जयंती के मौक़े पर पश्चिम बंगाल के अलग-अलग इलाक़ों में कार्यक्रम होते हैं, साथ ही सरकार भी गीत-संगीत, नृत्य और नाटक जैसे कई कार्यक्रम कराती रही है.

वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "रवींद्रनाथ टैगोर से बड़ी बांग्ला संस्कृति की कोई पहचान नहीं है, वो बंगाल के लिए एक फ़िलोस्फ़ी हैं. बीजेपी को अपने सिंबोलिज़्म को वास्तविकता में बदलना होगा."

बीजेपी के साथ एक और ख़ास बात यह भी है कि उसकी पहचान राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए इस आंदोलन से जुड़ा धार्मिक नारा लगाना भी आम बात है.

महुआ चटर्जी कहती हैं, "जब शपथ ग्रहण कार्यक्रम चल रहा था तो मंच पर भले ही रवींद्र संगीत बज रहा था, लेकिन मुझे समझ में आया कि नीचे जो लोग मौजूद थे, वो धार्मिक नारे लगा रहे थे, यह बंगाली नारा नहीं है. इस भावना को दिल्ली में बैठकर नहीं समझा जा सकता है."

जनकल्याण की योजनाएं आगे बढ़ाना

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने महिला सुरक्षा को चुनावों में बहुत बड़ा मुद्दा बनाया था. ख़ासकर साल 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुई घटना के बाद यह एक बड़ा मुद्दा बन गया.

इस मुद्दे को शांत करने के लिए ख़ुद ममता बनर्जी को सड़कों पर उतरना पड़ा था. ममता बनर्जी ने कथित तौर पर यह भी कहा था कि महिलाओं को रात आठ बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, उनके इस बयान को बीजेपी के नेताओं ने काफ़ी तूल दिया और इससे महिलाओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की.

लेकिन इन सबके बावजूद भी ममता बनर्जी की बंगाल की जनता के बीच ज़मीनी पकड़ बहुत कमज़ोर कभी नहीं हुई.

चुनावों में ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को भले ही 80 सीटें मिली हों लेकिन उनके साथ अब भी 40% से ज़्यादा वोटबैंक बना हुआ है. इसके पीछे राज्य में चल रही जनकल्याण की योजनाओं का बड़ा योगदान माना जाता है.

समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए अच्छा शासन चलाना और राज्य में वेलफ़ेयर स्कीम को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी. राज्य में ममता बनर्जी की सरकार लोगों के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक की कोई न कोई योजना चला रही थी. अगर बीजेपी जनहित की योजनाओं को आगे बढ़ाने में नाकाम होती है तो वोटरों की निष्ठा बदलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा."

समीर पुरकायस्थ मानते हैं कि बीजेपी का शासन कभी भी वेलफ़ेयर मॉडल का शासन नहीं होता है.

वो कहते हैं, "बीजेपी राजनीतिक ज़रूरत के लिए जनकल्याण की योजनाएं भले चलाती हो, लेकिन ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी इसे 'रेवड़ी कल्चर' कह चुके हैं."

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के चुनाव अभियान की बात करें तो उसने महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, रोज़गार और जनकल्याण की योजनाओं पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया.

ऐसे में उसके सामने पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जहां आर्थिक तौर पर बड़ी संख्या में पिछड़ी आबादी रहती है, उसे हर किसी को साथ लेकर चलना होगा.

भ्रष्टाचार का मुद्दा

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार और अपराध को बड़ा मुद्दा बनाया. राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके शुभेंदु अधिकारी अक्सर टीएमसी के नेताओं पर संगठित अपराध में शामिल होने का आरोप लगाते रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में नौकरियों में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी बीजेपी ने उठाया था. राज्य में साल 2016 में स्कूल सेवा आयोग की ओर से आयोजित भर्ती परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली और घोटाले के आरोप लगे थे.

क़रीब एक साल पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने क़रीब 25 शिक्षकों की भर्ती रद्द कर दी थी.

ऐसे में अब बीजेपी की सरकार आने के बाद एक स्वच्छ सरकार देना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.

हालांकि ख़ुद शुभेंदु अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते रहे हैं. वो नारदा स्टिंग वीडियो में काम कराने के एवज़ में कथित तौर पर पैसे लेते देखे गए थे. इसके अलावा सारदा चिटफ़ंड घोटाले में भी उनका नाम सामने आया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान इस कथित घोटाले का ज़िक्र करते हुए तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर भ्रष्टाचार में डूबे रहने के आरोप लगाए थे.

दरअसल साल 1998 से साल 2020 तक शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी की टीएमसी में थे. उस समय बीजेपी ने इस स्टिंग वीडियो का इस्तेमाल टीएमसी को घेरने के लिए किया था.

बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत और मुख्यमंत्री के तौर पर शुभेंदु का नाम सबसे ऊपर रहने के बाद सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के उस भाषण का वीडियो वायरल हो रहा था. उसके साथ जो वीडियो वायरल है उसमें शुभेंदु कथित तौर पर अख़बार में लिपटी नोटों की गड्डियां लेते देखे जा रहे हैं.

इसी के साथ ही राज्य में युवाओं के लिए नौकरी और रोज़गार के नए अवसर पैदा करने का दबाव भी सरकार पर होगा.

कई लोग आरोप लगाते हैं कि किसी ज़माने में भारत की राजधानी रही कोलकाता में रोज़गार के अवसर भी सीमित हो गए हैं और पश्चिम बंगाल के युवाओं को नौकरी और रोज़गार की तलाश में अन्य राज्यों तक जाना होता है.

सांप्रदायिकता और 'घुसपैठियों' का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में बीजेपी और ख़ासकर गृह मंत्री अमित शाह कई बार 'घुसपैठ' का मुद्दा उठा चुके हैं. यह मूल रूप से बांग्लादेश से बिना दस्तावेज़ के भारत आने वाले लोगों से जुड़ा मामला है.

अमित शाह इस कथित घुसपैठ को न रोक पाने के पीछे राज्य की ममता सरकार को दोषी ठहराते थे.

ममता बनर्जी साल 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं, जबकि केंद्र में मोदी सरकार का शासन साल 2014 में शुरू हुआ था.

महुआ चटर्जी कहती हैं, "इस मामले में एक ख़ास बात यह भी है कि जो लोग सन 1946-47 से अब तक बांग्लादेश छोड़कर पश्चिम बंगाल आए हैं, उनमें ज़्यादातर हिंदू हैं. फिर हमें एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि बांग्लादेशी घुसपैठिए के नाम पर भारत में जो कुछ भी होगा उसकी प्रतिक्रिया पड़ोस के बांग्लादेश में देखने को मिल सकती है."

यही नहीं राज्य की ममता सरकार पर बीजेपी अक्सर मुसलमानों के हित में काम करने का आरोप लगाती रही है. हालांकि सांप्रदायिक स्तर पर पश्चिम बंगाल में हिंसा की बड़ी घटनाओं का इतिहास नहीं रहा है.

महुआ चटर्जी कहती हैं, "आप ध्यान दें तो बाबरी मस्जिद की घटना (राम मंदिर आंदोलन) के दौरान भी पश्चिम बंगाल में कोई बड़ी सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई है. मुर्शिदाबाद में कुछ एक घटनाएं ज़रूर हुई हैं, जिनमें गाड़ियों को जला देना वगैरह हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर दंगे कभी नहीं हुए."

साल 2011 के बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी का शासन रहा था. इससे पहले 1977 से 2000 तक ज्योति बसु और उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य साल 2011 तक पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री रहे.

इस दौरान राज्य में कभी बड़ा सांप्रदायिक तनाव देखने को नहीं मिला है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ राज्य में 27% मुस्लिम आबादी है. ऐसे में इस विशाल आबादी को साथ लेकर चलना बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती होगी. ख़ासकर पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं को देखते हुए यह आसान नहीं होगा.

पिछले साल पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद के धुलियान और आस-पास के इलाक़े में वक़्फ़ (संशोधन) क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन के दौरान यहाँ हिंसा भड़क गई थी. इस हिंसा में कम से कम तीन लोग मारे गए थे.

वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "बीजेपी ने 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा दिया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उसे इसके लिए अपने समर्थकों में नई सोच डालनी होगी. पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा दुर्भाग्य से राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गई है. चुनाव के बाद जो भी हिंसा हुई है उसमें कम पैमाने पर ही सही लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय निशाने पर रहा है."

चुनाव में जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कहा था कि ये सभी बीजेपी कार्यकर्ताओं की जीत है.

उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी को हराना बहुत ज़रूरी था. (उनका) राजनीतिक संन्यास अब हो गया है. 2021 में नंदीग्राम में हारीं और इस बार भी हार गईं. 15 हज़ार से अधिक वोटों से उनको खुलकर मुसलमानों ने वोट दिया और मुझे हिंदू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध लोगों ने आशीर्वाद देकर जिताया. ये हिंदुत्व की जीत है ये बंगाल की जीत है, ये नरेंद्र मोदी की जीत है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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