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'अच्छा मदरसा यहीं मिल जाए तो वहां क्यों जाएंगे': उन परिवारों की कहानी जिनके बच्चों को मदरसा जाने से रोका गया
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
पिछले महीने की 11 तारीख को मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर पटना-पुणे एक्सप्रेस से बिहार के 163 नाबालिग़ बच्चों को रेलवे पुलिस ने 'जबरन' उतार लिया.
पुलिन ने इन 163 बच्चों और 8 शिक्षकों को मानव तस्करी की आशंका में उतारा था.
जीआरपी और आरपीएफ की इस कार्रवाई का आधार बाल कल्याण समिति के सदस्य दुर्गेश मारिया की लिखित शिकायत बनी थी, जिसमें बिहार से बच्चों को महाराष्ट्र के लातूर मज़दूरी के लिए ले जाने का आरोप लगाया गया था.
इन बच्चों को पुलिस जांच पड़ताल का सामना करना पड़ा, कई दिनों के इंतज़ार के बाद अब ये बच्चे अपने अपने घर लौट चुके हैं.
इन बच्चों को उतारने की वजह जानने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की टीम ने बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में मामले को समझने की कोशिश की.
जिन 163 बच्चों को कटनी रेलवे स्टेशन पर उतारा गया, उनमें 144 बच्चे बिहार के अररिया ज़िले से थे.
अररिया में मुझे 55 साल की किसमती मिलीं, जो इस घटना से पहले कभी अररिया से बाहर नहीं गई थीं, लेकिन अपने दो बेटों और एक पोते के लिए उन्हें 900 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के कटनी की यात्रा 'मजबूरन' करनी पड़ी.
किसमती बीबीसी से कहती हैं, "मेरे बच्चे इल्म हासिल करने जा रहे थे. हाफ़िज़ बनने के लिए बच्चे दो साल से जा रहे हैं. यह तीसरा साल था. लेकिन मोबाइल पर पता चला कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया है. जब दस दिन तक बच्चों से कोई बातचीत नहीं हुई. तब 6 हज़ार रुपये कर्ज़ लेकर मैं कटनी चली गई. वहां पुलिस के पास जाकर रोती थे लेकिन वह बच्चों को देखने नहीं देते थे. मैंने भी कह दिया कि जब तक बच्चों को नहीं देखेंगे, यहां से नहीं जाएंगे. तब जाकर मुझे बच्चों को दिखाया गया."
मदरसों में पढ़ाई
बिहार से हर साल मुस्लिम बच्चे महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी, पश्चिम बंगाल, ओडिशा सहित कई राज्यों के मदरसों में पढ़ने जाते हैं. ये बच्चे ज्यादातर सीमांचल इलाक़े के होते हैं.
सीमांचल यानी पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया ज़िला. माइनॉरिटी कमिशन ऑफ़ बिहार के मुताबिक़, सीमांचल के किशनगंज में 67%, कटिहार में 42%, अररिया में 41% और पूर्णिया में 37% मुस्लिम आबादी है.
दूसरे राज्यों में पढ़ने वाले ये बच्चे साल में एक बार ईद की छुट्टी में अपने घर आते हैं. छुट्टी बीत जाने के बाद वे मदरसों में वापस लौट जाते हैं.
इस बार भी बिहार के अररिया, सुपौल और यूपी के बांदा ज़िले के कुल 163 बच्चे अपने मदरसों में दाखिला लेने जा रहे थे. इन बच्चों के साथ 8 टीचर थे जो मदरसों में पढ़ाते हैं. ये बच्चे पटना जंक्शन से पटना-पुणे एक्सप्रेस में 11 अप्रैल की सुबह तकरीबन 7 बजे सवार हुए थे.
किसमती के बेटे मोहम्मद चुन्नी बीबीसी को बताते हैं, "हम लोगों को दोपहर एक बजे पहले मुगलसराय में रोका गया था. हमारे टीचर ने सारे कागज़ दिखाए जिसमें आधार कार्ड और मुखिया का लिखा हुआ पत्र था. उसके बाद हम लोगों को मुगलसराय से आगे बढ़ने दिया गया. लेकिन फिर हम लोगों को कटनी में रोक दिया गया. वहां भी सारे कागज़ात दिखाए लेकिन उन लोगों ने नहीं छोड़ा. हम लोगों को वहां से दो कमरों की जागृति नाम की जगह (बाल सुधार गृह) ले गए. वहां ठीक से खाना भी नहीं देते थे."
दरअसल जीआरपी और आरपीएफ की इस कार्रवाई का आधार बाल कल्याण समिति के सदस्य दुर्गेश मारिया की लिखित शिकायत बनी थी, जिसमें बिहार से बच्चों को महाराष्ट्र के लातूर मज़दूरी के लिए ले जाने का आरोप लगाया गया था.
दुर्गेश मारिया ने बताया, "मुझे जीआरपी से ही पता चला था कि बच्चों को ले जाया जा रहा है. हालांकि बाद में यह मामला मानव तस्करी का नहीं निकला लेकिन फिर भी इन बच्चों को उतना दूर ले जाना सही नहीं कह जा सकता है. उनके पास किसी भी किस्म के कोई काग़ज़ात नहीं थे और उनके परिवार ने उन्हें मौखिक रूप से भेजा था इसलिए यह पता लगाना संभव नही था कि वो किसलिए जा रहे है."
कटनी जीआरपी के ऑफ़िसर एलपी कश्यप ने मीडिया को बताया कि पूरी कार्रवाई इस बात पर की गई थी कि बच्चों को काम के लिए महाराष्ट्र ले जाया जा रहा है.
उन्होंने बताया, "परिजनों से पुष्टि हो जाने के बाद सभी बच्चों को वापस बिहार भिजवा दिया गया है."
सद्दाम जरजीस, लातूर स्थित मदरसे में टीचर हैं और इन बच्चों के साथ यात्रा कर रहे थे.
वह बताते हैं, "मेरे पास बच्चों के आधार कार्ड थे. 100 बच्चे जो मेरे साथ थे उनके लिए बगडहरा पंचायत के मुखिया कुलसुम के लेटर पैड पर लिखी हुई चिठ्ठी थी. जिसमें लिखा है 'सद्दाम गरीबों की भलाई हेतु बच्चों को पढ़ाने ले जाते' हैं. लेकिन फिर भी मुझे रोका गया. मेरा छह साल का बच्चा और बीवी भी मेरे साथ थी."
बच्चों की 'एसआईआर' कराई गई
अररिया में जन जागरण शक्ति संगठन लंबे समय से किसान और मज़दूरों के मुद्दे पर काम कर रहा है. इस मामले में संगठन ने पहल करते हुए अररिया प्रशासन और कटनी के स्थानीय संगठनों के साथ समन्वय बनाया.
इसके बाद इन 163 बच्चों की सोशल इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट (एसआईआर) तैयार की गई.
इस मामले में क़ानूनी तौर पर सक्रिय और जन जागरण शक्ति संगठन से जुड़े रमीज़ रेज़ा पेशे से वकील हैं.
उन्होंने बताया, "कटनी में मानव तस्करी की एफ़आईआर की गई है. लेकिन एसआईआर में अभिभावक ने बताया कि वे बच्चों को अपनी मर्ज़ी से भेज रहे थे. उनके साथ वार्ड या पंचायत स्तर का वैरिफ़िकेशन लेटर था और ये ट्रेन का टिकट कटाकर यात्रा कर रहे थे. जिस मदरसे में बच्चे जा रहे थे उसका एप्रूवल लेटर भी बच्चों के साथ था."
"ये सारे डॉक्यूमेंट कटनी पुलिस के सामने रखे गए कि आप इनकी जांच करके हमें आगे का सफ़र करने दें. लेकिन हिंदुस्तान में मदरसा, मदरसा लिंक्ड मूवमेंट, दाढ़ी–टोपी या अलग रंग-रूप वाले अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा रहा है."
जन जागरण शक्ति संगठन ने लातूर स्थित मदरसा अशरफिया अंजुमन-ए-इस्लामिया का लेटर हेड पर जारी पत्र भी दिखाया जिसमें लिखा है कि पटना से आने वाले इन बच्चों को धार्मिक शिक्षण के साथ साथ अंग्रेज़ी, मराठी और गणित की शिक्षा दी जाएगी.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की टीम ने लातूर में मदरसे से भी संपर्क साधा जहां अररिया के बच्चे जा रहे थे. लातूर के मदरसा अशरफिया अंजुमन-ए-इस्लामिया के संचालक अज़ीज़ुर्रहमान ने बताया, "हमारे मदरसे में हर साल अररिया से बच्चे आते रहे हैं. हमारे एक टीचर सद्दाम साब वहीं के हैं, वे लेकर आ रहे थे बच्चों को अब उन्हें वापस भेज दिया गया है. इस साल से हमलोग बच्चों को कंप्यूटर की तालीम भी देने जा रहे थे."
इस मदरसे में अभी सन्नाटा है. क्या यहां दूसरे राज्यों से भी बच्चे आते हैं, ये पूछे जाने पर अज़ीज़ुर्रहमान ने कहा, "दूसरे राज्यों से भी आते हैं, कर्नाटक से भी आते हैं. लेकिन सद्दाम जी की वजह से अररिया के बच्चे ज़्यादा होते हैं."
उनका दावा है कि यह मदरसा 1916 से चल रहा है और यहां बच्चों को तालीम दी जाती रही है.
क्या ख़ास समुदाय के बच्चों को टारगेट किया जा रहा है?
इस सवाल पर बाल कल्याण समिति, अररिया के अध्यक्ष दीपक कुमार वर्मा बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "बच्चों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी स्टेट की है. बच्चों के साथ जो मौलवी गए थे उन्होंने ठीक से जवाब नहीं दिए. हम लोगों को जब इसकी जानकारी मिली तब हम लोगों ने एसआईआर कराके बच्चों को 25 अप्रैल को उनके माता-पिता को सौंप दिया."
"बच्चों को सुरक्षित सफ़र कराना चाहिए था और अगर इतने सारे बच्चे गए थे तो उनके साथ कुछ अभिभावक ज़रूर होने चाहिए थे. सीडब्लूसी कटनी की रिपोर्ट के मुताबिक ये 6 से 14 साल के बच्चे थे. अगर 14 साल का बच्चा है तो उसने कहीं पढ़ाई की होगी, उसका डॉक्यूमेंट उसके पास होना चाहिए."
इस मामले में बीएनएस की धारा 143(4) के तहत मामला दर्ज किया गया था. यह धारा बच्चों की मानव तस्करी से जुड़ी हुई है. प्रशासन के 'बच्चों की सुरक्षा' के तर्क को बच्चों के अभिभावक ख़ारिज करते हैं.
वही समाजवादी पार्टी के कटनी ज़िला अध्यक्ष डॉ. एके ख़ान ने आरोप लगाया है कि बच्चों को बिना सोचे समझे कटनी स्टेशन पर उतार लिया गया था.
उन्होंने आरोप लगाया, "बच्चे मुसलमान थे इसलिए उन्हें परेशान करने के लिए उतार लिया गया जबकि कहीं से यह बात साबित नहीं हो रही थी कि वो मानव तस्करी का मामला है. उन्हें लगभग 13 दिन तक रोके रखा गया और परिवार के सदस्यों के आने पर ही छोड़ा गया."
भोपाल स्थित सामाजिक संगठन, सर्वधर्म सद्भावना मंच के सचिव हाजी मोहम्मद इमरान हारून ने भी इस मामले को पूरी तरह से अनुचित और गै़रकानूनी बताया.
हाजी इमरान हारून का कहना है कि ये सभी बच्चे अभिभावकों की सहमति से भेजे गए थे और इसलिए मानव तस्करी का मामला दर्ज करना ग़लत है.
अररिया की किश्वर जहां का बेटा इरफ़ान भी महाराष्ट्र के मदरसे में पढ़ता है. इरफ़ान दूसरी बार मदरसे में पढ़ने जा रहा था. इससे पहले वह एक स्थानीय मदरसे में पढ़ता था.
छह बच्चों की मां किश्वर जहां के पति की मौत हो चुकी है.
वह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "पुलिस परेशान कर रही थी तो पुलिस की ग़लती है. हमारी ग़लती नहीं है. बच्चे को पढ़ाएंगे नहीं तो वह क्या करेगा? हम लोगों को मुआवज़ा चाहिए. हमारे पास बच्चे को स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है? स्कूल 5-10 हज़ार फीस लेता है. हम कहां से दे पाएंगे, किसी के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते हैं. हम प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़ा सकते, इसलिए मदरसा भेज रहे थे."
इस घटना से डरे हुए इरफ़ान कहते हैं, "पुलिस वाले रोक लेते हैं. इसलिए अब देखेंगे कि बाहर मदरसा जाएं या नहीं जाएं. हमें बाहर नहीं जाने दे रहे हैं तो यहीं स्कूल या मदरसा बना दें."
मोहम्मद आसिफ़ का बेटा बीते चार साल से महाराष्ट्र के मदरसे में जा रहा था.
वह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "मुस्लिम जानकर बच्चों को ग़ैरकानूनी ढंग से रोका गया है. बच्चे जाएंगे नहीं पढ़ने के लिए तो यहां घर पर रहेंगे और उनकी ज़िंदगी ख़राब होगी. उसकी भरपाई कौन करेगा?"
क्या ऐसे मामलों में किसी मुआवज़े का प्रावधान है? बीबीसी के इस सवाल पर बाल कल्याण समिति अररिया के अध्यक्ष दीपक कुमार वर्मा ने कहा, "जेजे एक्ट में किसी तरह के मुआवज़े का प्रावधान नहीं है."
अररिया के बच्चों को सिर्फ़ मध्य प्रदेश के कटनी में ही नहीं रोका गया बल्कि ओडिशा के कटक में भी 59 बच्चों को रोक लिया गया था.
ओडिशा में भी फंसे हैं बच्चे
बाल कल्याण समिति, अररिया के दीपक कुमार वर्मा ने इस बात की पुष्टि बीबीसी से की है कि कटक में 59 बच्चे फंसे हुए हैं जो बुधवार तक अपने घरों पर नहीं लौट सके हैं.
हालांकि वर्मा ने उम्मीद जताई है कि वे एकाध दिन में अपने अपने घरों तक लौट आएंगे.
इस पूरे मामले की पैरवी कर रहे रमीज़ रेज़ा कहते हैं, "एक महीने होने को है और वे बच्चे अब तक नहीं आ सके हैं."
ये बच्चे भी ओडिशा के मदरसे में पढ़ने जा रहे थे. अररिया के रजोखर बाज़ार के आसपास रहने वाले ये बच्चे बीती 14 अप्रैल से वहां फंसे हुए हैं.
संझौली गांव के वार्ड नंबर 3 की साबरीन बीए पास है. उनके शौहर परचून की छोटी सी दुकान चलाते हैं. साबरीन का बच्चा गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था.
साबरीन बताती हैं, "बच्चा स्कूल में पढ़ रहा था लेकिन हम लोगों ने उसे दीनी तालीम के लिए मदरसे में भेज दिया. बच्चे को कटक स्टेशन पर पकड़ लिया गया. बच्चे को चाइल्ड केयर कैंप में रखा गया है. अररिया के बच्चों को क्यों टॉर्चर किया जा रहा है. बच्चे के पास आधार कार्ड, सरपंच का लिखा कागज़ और स्कूल का टीसी (ट्रांस्फ़र सर्टिफ़िकेट) है. आधार से तो पूरी डिटेल मिल जाती है."
इसी वार्ड के ट्रैक्टर चलाने वाले तबरेज़ का बच्चा भी ओडिशा के मदरसे में गया था.
वह बताते हैं, "पिछली बार गया था तो खूब अच्छे से पढ़कर आया था. इस बार भी बच्चे को भेजा लेकिन वहां पर पकड़ लिया. हमने रिज़र्वेशन कराकर बच्चे को भेजा है. सरकार यहीं अच्छा मदरसा खोल दे तो बच्चा क्यों बाहर जाएगा?
हम अपने बच्चों को बिना किसी दबाव में भेजते हैं.
दूसरे राज्यों के मदरसों में क्यों जाते हैं बच्चे?
यह सवाल उठना लाज़िमी है कि बच्चे आख़िर दूसरे राज्यों के मदरसों में क्यों जाते हैं? दरअसल मुस्लिम बच्चों के स्थानीय मदरसे की बजाए दूसरे राज्य के मदरसों को चुनने की कई वजहें हैं.
गरीबी, स्थानीय मदरसों में आवासीय सुविधाओं की कमी, बच्चों को अनुशासित करने की चाहत इसकी प्रमुख वजहें हैं.
सीमांचल बिहार में सबसे पिछड़ा इलाका है. नीति आयोग ने राज्य में जिन 13 ज़िलों को 'आकांक्षी ज़िले' के तौर पर चिन्हित किया है उसमें सीमांचल के तीन ज़िले पूर्णिया, कटिहार और अररिया शामिल हैं.
इसी तरह आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 देखें तो राज्य के 38 ज़िलों में प्रति व्यक्ति आय के मामले में अररिया 37वें, किशनगंज 28वें, कटिहार 24वें और पूर्णिया 21वें स्थान पर है. शिक्षा के लिहाज़ से भी अररिया, पूर्णिया और कटिहार राज्य के पांच सबसे फिसड्डी ज़िलों में आते हैं.
पेशे से मज़दूर जलाल भी अपने बेटे को महाराष्ट्र स्थित एक मदरसे में भेजते हैं.
वह कहते हैं, "हम मज़दूर क्लास के आदमी हैं. हमारे पास पैसा नहीं है कि फ़ीस जमा करेंगे. थोड़ा बहुत पढ़ाते हैं ताकि बच्चा पढ़-लिख लेगा, अपने गांव का नाम लिख लेगा. हम बिना किसी दबाव के मौलाना के साथ भेजते हैं."
वहीं मोहम्मद आसिफ़ अनुशासन का मुद्दा उठाते हैं.
वह कहते हैं, "बच्चे मदरसे से भाग आते हैं बार-बार. दस दिन पढ़ा या महीना भर पढ़ा और भाग आए. जब ऐसा होता है तो गांव के मुफ़्ती से संपर्क करके बच्चों को मदरसे तक भिजवा देते हैं."
बिहार के मदरसों में आवासीय सुविधाएं कम हैं
सामान्य तौर पर ईद के बाद ये शिक्षक, मदरसे में दाखिला लेने की चाहत रखने वाले बच्चों को एक ग्रुप में अपने साथ लेकर जाते हैं. चूंकि इन बच्चों के माता-पिता आर्थिक तौर पर कमज़ोर होते हैं, इसलिए वे इन शिक्षकों के साथ ही अपने बच्चों को दूसरे राज्यों में भेज देते हैं.
इन मदरसों में शिक्षा फ़्री होती है और बच्चों के लिए आवासीय सुविधाएं होती हैं. अभिभावकों को सिर्फ़ अपने बच्चे के टिकट में लगने वाले पैसों का प्रबंध करना होता है.
बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक़, राज्य में तीन हज़ार से ज़्यादा मदरसे हैं जिसमें सात लाख से ज़्यादा छात्र पढ़ते हैं. इन मदरसों में भी पढ़ाई मुफ़्त है.
ऐसे में बिहार के बच्चे बाहर क्यों जाते हैं?
बिहार राज्य बाल श्रमिक आयोग के पूर्व सदस्य और मुस्लिम बच्चों की शिक्षा पर लंबे समय से काम कर रहे मुख़्तारुल हक़ कहते हैं, "बिहार में मदरसे तीन तरह से चल रहे हैं. पहले मदरसा शिक्षा बोर्ड के तहत आने वाले मदरसे हैं जो आवासीय नहीं हैं. दूसरे डे स्कूल के तौर पर चलने वाले स्वतंत्र मदरसे हैं जिन्हें मदरसा मकतब भी कहा जाता है. तीसरे स्वतंत्र रूप से चलने वाले वे मदरसे हैं जिनमें हाफिज़, आलिम, फ़ाज़िल, मौलाना, हदीस की पढ़ाई होती है. तीसरी कैटेगरी के मदरसे में ही कुछ मदरसों में आवासीय सुविधाएं उपलब्ध होती हैं."
दरअसल आर्थिक तौर पर कमज़ोर अभिभावक उन्हीं मदरसों में अपने बच्चों को भेजना चाहते हैं जहां आवासीय सुविधा हो. यही वजह है कि बिहार से कई किलोमीटर दूर स्थित मदरसों में ये अपने बच्चों को भेजने में हिचक महसूस नहीं करते.
इमारत-ए-शरिया, अररिया के प्रतिनिधि अतीकुल्लाह रहमानी भी कहते हैं, "मदरसों के पास जगह कम है. मान लीजिए किसी गांव में 300 बच्चे हैं और मदरसे में रहने के लिए 200 सीट ही हैं. ऐसे में जबरन रूम में ठूंसा नहीं जाएगा. गार्जियन दूसरे मदरसों में भी देखते हैं. जब बच्चों के लिए आवासीय सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो उनको बाहर भेजना पड़ता है. गार्जियन गरीब है, ऐसे हालात में वे क्या करेंगे?"
मदरसे जा रहे बच्चों को इस तरह रोके जाने से अररिया के समाज में नाराज़गी दिखती है. सामाजिक कार्यकर्ता आफ़ाक अनवर कहते हैं, "ये हिंदुस्तान के संविधान के ख़िलाफ़ है. दस्तूर–ए–हिंद के बिल्कुल ख़िलाफ़ है."
(मध्य प्रदेश से शुरैह नियाज़ी और महाराष्ट्र के लातूर से मुस्तान मिर्ज़ा की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.