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तमिलनाडु: विजय लंबे-चौड़े वादे कर क्या ख़ुद को मुश्किल में डाल चुके हैं?
- Author, के सुभगुनम
- पदनाम, बीबीसी तमिल
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) अध्यक्ष सी जोसेफ विजय ने 10 मई को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. शपथ लेते ही उन्होंने समारोह स्थल से मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले तीन आदेश जारी किए.
पहला, दो महीने में 500 यूनिट से कम बिजली इस्तेमाल करने वाले परिवारों के लिए 200 यूनिट मुफ्त बिजली. दूसरा, हर ज़िले में ड्रग्स पर काबू पाने के लिए एक विशेष बल का गठन और तीसरा महिलाओं की सुरक्षा के लिए 'लायन वुमन टास्क फोर्स' की स्थापना.
इसके बाद मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले संबोधन में विजय ने तमिलनाडु के क़र्ज़ और वित्तीय स्थिति को लेकर पिछली सरकार की आलोचना की.
यह अब एक बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डीएमके नेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने कहा, "इस साल फ़रवरी के बजट में हमने तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति को स्पष्ट रूप से बताया था. जिन्होंने आपको वोट दिया है, उन्हें गुमराह और भ्रमित मत कीजिए."
इसी तरह विदुथलाई चिरुथैगल काची के नेता थिरुमावलवन ने भी कहा, "सिर्फ़ यह कहना कि तमिलनाडु पर 10 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज है, लोगों के बीच ग़लतफ़हमी पैदा करेगा."
क्या वास्तव में मुख्यमंत्री विजय यह कह सकते हैं कि सरकारी ख़ज़ाना ख़ाली है? पिछली डीएमके सरकार तमिलनाडु की कैसी वित्तीय स्थिति छोड़कर गई है? क्या टीवीके सरकार राज्य के क़र्ज़ को कम कर पाएगी और उसे और बढ़ने से रोक सकेगी?
मुख्यमंत्री विजय का भाषण और स्टालिन की आलोचना
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने पहले भाषण में विजय ने कहा, "पिछली सरकार ख़ज़ाना ख़ाली करके चली गई. वे ऐसा बोझ छोड़ गए हैं, जिसे संभालना मुश्किल है. ऐसी स्थिति में हमने यह ज़िम्मेदारी संभाली है. स्थिति को ठीक से समझने पर ही पता चलेगा कि क्या है और क्या नहीं है. मेरा मानना है कि इसे एक श्वेत पत्र के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए."
उन्होंने यह भी कहा, "अगर लोग मुझे थोड़ा समय दें, तो यह मददगार और सहयोगपूर्ण होगा."
इसके बाद डीएमके नेता एम. के. स्टालिन ने राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर विजय की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "सत्ता में आते ही यह कहना शुरू मत कर दीजिए कि सरकार के पास पैसा नहीं है. सब कुछ मौजूद है. ज़रूरत सिर्फ़ लोगों को देने की इच्छा और शासन चलाने की क्षमता की है."
अपने एक्स पेज पर जारी बयान में स्टालिन ने कहा, "पांच वर्षों तक हमने कोविड, बाढ़ और केंद्र की बीजेपी सरकार की बेईमानी जैसी कई समस्याओं से उबरते हुए अनगिनत कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं. लेकिन आपने अपने पहले ही भाषण में आरोप लगा दिया कि 'पिछली सरकार 10 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ छोड़कर गई और ख़ज़ाना ख़ाली कर गई."
उन्होंने कहा, "तमिलनाडु का क़र्ज़ सीमा के भीतर है. पिछले फ़रवरी के बजट में हमने तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति स्पष्ट रूप से बताई थी. क्या आपको यह नहीं पता था? इसके बावजूद आपने इतने सारे वादे किए? जिन्होंने आपको वोट दिया है, उन्हें गुमराह और भ्रमित मत कीजिए."
वाक़ई तमिलनाडु का ख़ज़ाना ख़ाली है?
अर्थशास्त्री कृष्णमूर्ति प्रभाकरण का कहना है कि राज्य की वित्तीय स्थिति उतनी ख़राब नहीं है, जैसा मुख्यमंत्री विजय दावा कर रहे हैं. उनके अनुसार, "ख़ज़ाना ख़ाली है" कहना निराधार है और वास्तविकता के उलट है.
हालांकि, यह भी नहीं कहा जा सकता कि तमिलनाडु का क़र्ज़ प्रबंधन पूरी तरह से चुनौती मुक्त है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लगातार बढ़ता ब्याज भुगतान, बिजली बोर्ड का घाटा, कल्याणकारी योजनाओं पर ख़र्च, वेतन और पेंशन ख़र्च राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर दबाव बना रहे हैं.
लेकिन कृष्णमूर्ति प्रभाकरण ने कहा कि मूल रूप से "राज्य के ख़र्चों पर बजट में चर्चा होती है और धन का उचित नियोजन के साथ आवंटन किया जाता है. इतना ही नहीं, तमिलनाडु सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 28.5 प्रतिशत तक क़र्ज़ ले सकता है. अब तक कुल क़र्ज़ उसी सीमा के भीतर रहा है."
मद्रास विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त प्रमुख ज्योति शिवज्ञानम का कहना है कि अगर किसी को सरकार की वित्तीय व्यवस्था की बुनियादी समझ हो, तो वह समझ जाएगा कि विजय का बयान तर्कसंगत नहीं है.
उन्होंने कहा, "वित्त व्यवस्था आय और व्यय की निरंतरता पर आधारित होती है. राज्य के हर ख़र्च के लिए विधानसभा में बजट पारित किया जाता है. उसमें से एक रुपया भी खर्च करना हो, तो विधानसभा की मंज़ूरी ज़रूरी होती है. अगर केंद्र सरकार की बात हो तो संसद की मंज़ूरी लेनी पड़ती है."
उन्होंने कहा, "इन सबका पूरा विवरण बजट दस्तावेज़ों में होता है. उसमें पिछले वर्ष की वित्तीय स्थिति, मौजूदा और अगले वर्ष के अनुमान, योजनाएं और उनके लिए वित्तीय आवंटन का उल्लेख रहता है. इन सबकी मंज़ूरी के बाद ही राज्य ख़र्च कर सकता है."
ज्योति शिवज्ञानम ने कहा, "भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) बाद में इन खातों का ऑडिट भी करते हैं ताकि यह जांचा जा सके कि सब कुछ सही है या नहीं. ऐसे में मुख्यमंत्री का यह बयान वित्तीय प्रक्रियाओं के पूरे संदर्भ को नज़रअंदाज करता हुआ लगता है."
तमिलनाडु की वर्तमान वित्तीय स्थिति क्या है?
पिछले 15 वर्षों में विभिन्न सरकारों के दौरान तमिलनाडु का क़र्ज़ लगातार बढ़ा है. 2011 से 2021 के बीच इसमें विशेष रूप से तेज़ वृद्धि हुई.
बाद में कोविड संकट के दौरान कल्याणकारी ख़र्च बढ़ने, लॉकडाउन में राजस्व घटने और बुनियादी ढांचा में निवेश बढ़ने के कारण इसका आकार और बढ़ गया. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसी अवधि में राज्य की अर्थव्यवस्था में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
इसके अलावा, किसी राज्य की वित्तीय स्थिति का आकलन करते समय केवल कुल क़र्ज़ नहीं देखा जाता, बल्कि ब्याज़ भुगतान और क़र्ज़ चुकाने की क्षमता को भी ध्यान में रखा जाता है.
तमिलनाडु के 2026-27 के अंतरिम बजट के अनुसार, राज्य का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 40 लाख करोड़ रुपए से 40.6 लाख करोड़ रुपये के बीच आंका गया है.
अंतरिम बजट अनुमान के अनुसार, तमिलनाडु सरकार का कुल बकाया क़र्ज़ 10.71 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है. वहीं, वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान के मुताबिक़ राज्य का कुल क़र्ज़ 9.52 लाख करोड़ रुपये आंका गया है.
राज्य सरकार ने 2026-27 में 1.79 लाख करोड़ रुपये उधार लेने और 60,413 करोड़ रुपये चुकाने की योजना बनाई थी.
अंतरिम बजट अनुमान के अनुसार, 2026-27 के लिए राजस्व घाटा 48,696.32 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. 2025-26 के अनुमान में यह घाटा 41,635 करोड़ रुपये था, लेकिन उसी वर्ष के संशोधित अनुमान में यह बढ़कर 69,219 करोड़ रुपये हो गया.
पूर्व वित्त मंत्री थंगम थेन्नारासु ने कहा था कि इस बढ़ोतरी के पीछे जीएसटी दरों में कटौती, केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता योजनाओं के तहत मिलने वाले धन को रोके जाने और तमिलनाडु बिजली वितरण निगम के घाटे को पूरा करने के लिए बढ़े ख़र्च जैसे कारण हैं.
पिछले फरवरी में अंतरिम बजट भाषण के दौरान उन्होंने कहा था, "अगर केंद्र सरकार की वजह से पैदा हुई वित्तीय चुनौतियां नहीं होतीं, तो चालू वर्ष का राजस्व घाटा बजट अनुमान के भीतर रखा जा सकता था."
अंतरिम बजट अनुमान में राज्य का राजकोषीय घाटा 1.21 लाख करोड़ रुपये आंका गया है. वहीं 2025-26 के संशोधित अनुमान के अनुसार, यह घाटा 1.24 लाख करोड़ रुपये था.
दरअसल, "क़र्ज़ राज्य की अर्थव्यवस्था से जुड़ा होता है. यानी कोई राज्य अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक निश्चित प्रतिशत तक ही क़र्ज़ ले सकता है. तमिलनाडु के मामले में यह सीमा 28.5 प्रतिशत है. लेकिन 2025-26 तक राज्य का क़र्ज़ इससे कम यानी 26.43 प्रतिशत है."
ज्योति शिवज्ञानम कहते हैं, "राज्य का क़र्ज़ बढ़ा है. लेकिन जब क़र्ज़ पांच लाख करोड़ रुपये था, तब राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का आकार क़रीब 20 लाख करोड़ रुपये था. अब यह बढ़कर लगभग 40 लाख करोड़ रुपये हो गया है, यानी दोगुना. अगर क़र्ज़ की तुलना अर्थव्यवस्था के आकार से की जाए, तो ज़्यादा अंतर नजर नहीं आता."
उनके अनुसार, जब अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना होता है, तो क़र्ज़ की राशि भी बढ़ती है. लेकिन "क़र्ज़ और सकल घरेलू उत्पाद के बीच का अनुपात लगभग समान बना रहता है."
क्या केवल क़र्ज़ के स्तर से वित्तीय स्थिति तय की जा सकती है?
ऐतिहासिक रूप से तमिलनाडु ने शिक्षा के विस्तार और हर ज़िले में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने वाली कल्याणकारी योजनाओं में निवेश किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसी वजह से राज्य की विकास दर लगातार बढ़ती रही है.
उदाहरण के लिए, 2005-06 से 2011-12 के बीच तमिलनाडु ने 10.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. इसके बाद 2012-13 से 2021-22 के दौरान यह वृद्धि दर 6.2 प्रतिशत रही. वहीं 2024-25 वित्तीय वर्ष में तमिलनाडु की विकास दर 11.2 प्रतिशत दर्ज की गई.
ज्योति शिवज्ञानम कहते हैं, "दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले कई देशों पर भी भारी क़र्ज़ है. इसमें अमेरिका और चीन जैसे देश शामिल हैं. लगभग हर देश का जीडीपी हर साल बढ़ता है और उसी के साथ कुल क़र्ज़ का स्तर भी बढ़ता है."
इसलिए किसी देश या राज्य के क़र्ज़ का आकलन केवल उसके कुल क़र्ज़ से नहीं, बल्कि जीडीपी, राजस्व, आर्थिक विकास दर और भविष्य की विकास क्षमता के आधार पर किया जाता है.
डीएमके के राष्ट्रीय प्रवक्ता सलेम धरनीधरन कहते हैं, "तमिलनाडु का क़र्ज़-जीडीपी अनुपात 2011 में 16.5 प्रतिशत था. यह 2021-22 के बजट में बढ़कर 28.3 प्रतिशत हुआ. इसके बाद से यह लगभग 26 प्रतिशत के आसपास स्थिर बना हुआ है."
उन्होंने कहा, "नॉर्वे जैसे छोटे जनसंख्या वाले और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देशों को छोड़ दें, तो दुनिया की लगभग हर सरकार को प्रशासन चलाने के लिए क़र्ज़ लेना पड़ता है."
क्या तमिलनाडु का कुल क़र्ज़ बोझ बन चुका है?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसी राज्य के कुल क़र्ज़ और उसके सकल घरेलू उत्पाद के बीच गहरा संबंध होता है.
इसी के साथ, राज्यों के ज़्यादा कर्ज लेने पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से संसद ने 2004 में वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफ़आरबीएम) लागू किया था.
इस क़ानून के अनुसार, जिन राज्यों पर पहले से केंद्र सरकार का क़र्ज़ बकाया है, उन्हें बाज़ार से नया क़र्ज़ लेने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व मंज़ूरी लेनी होती है.
ज्योति शिवज्ञानम ने कहा, "तमिलनाडु सरकार कितना क़र्ज़ ले सकती है, इसकी मंज़ूरी केंद्रीय वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक देते हैं. इसका मतलब यह है कि कोई भी राज्य तय सीमा से अधिक क़र्ज़ नहीं ले सकता. केंद्र सरकार ने एफ़आरबीएम क़ानून इस उद्देश्य से लागू किया था कि राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत से अधिक न हो."
उन्होंने कहा, "यह सीमा हर राज्य की आर्थिक क्षमता के अनुसार, अलग-अलग होती है. तमिलनाडु भारत के बड़े आर्थिक राज्यों में से एक है, ऐसे में उसके लिए क़र्ज़ लेने की सीमा भी उसी आधार पर तय की जाती है."
इसीलिए अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह कहना तर्कसंगत नहीं है कि राज्य का ख़ज़ाना पूरी तरह ख़ाली हो गया है या क़र्ज़ बहुत बड़ा बोझ बन चुका है.
इस पर बात करते हुए कृष्णमूर्ति प्रभाकरण ने कहा, "निवेश लगातार जारी रखने के लिए क़र्ज़ का निरंतर प्रवाह ज़रूरी होता है. इसे एक तरह की चक्रीय प्रक्रिया कहा जा सकता है. उदाहरण के तौर पर, छोटे व्यवसाय को भी निवेश बनाए रखने के लिए ऋण की ज़रूरत होती है."
उन्होंने कहा कि इसी तरह राज्य प्रशासन में भी बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और औद्योगिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए क़र्ज़ की आवश्यकता होती है. "राज्य प्रशासन में विभिन्न प्रकार के निवेश ज़रूरी होते हैं, इसलिए वित्तीय घाटा भी रहता है. लेकिन यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह घाटा एक निश्चित सीमा से अधिक न हो. इन पहलुओं को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि तमिलनाडु भारी क़र्ज़ के बोझ तले दबा हुआ है या गंभीर वित्तीय संकट में है."
जब बीबीसी तमिल ने पूर्व वित्त मंत्री थंगम थेन्नारासु से मुख्यमंत्री विजय की वित्तीय स्थिति संबंधी आलोचना पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कहा, "एम. के. स्टालिन ने वित्तीय संकटों और आपदाओं का प्रभावी ढंग से सामना किया और राज्य की अर्थव्यवस्था को दोहरे अंक की विकास दर तक पहुंचाया."
उन्होंने कहा, "इसे सबूत के तौर पर देखते हुए यह समझना चाहिए कि राज्य का क़र्ज़ स्तर सीमा के भीतर है. 'पैसा नहीं है' जैसे कारण ढूंढने के बजाय रचनात्मक प्रशासन और तमिलनाडु के विकास पर ध्यान देना चाहिए."
लंबे चौड़े वादों की मुश्किलें
विजय ने अपने चुनावी वादों में कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की थी. इनमें से एक वादा, "योग्य परिवारों को हर महीने 200 यूनिट मुफ़्त बिजली", उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने पहले हस्ताक्षर से पूरा किया.
इसके तहत सरकार ने आदेश जारी किया कि दो महीने में 500 यूनिट से कम बिजली खपत करने वाले परिवारों को 200 यूनिट मुफ्त बिजली दी जाएगी.
इसके अलावा, चुनावी घोषणापत्र में "सम्मानित महिला योजना" के तहत हर परिवार की महिला मुखिया के बैंक खाते में 60 वर्ष की आयु तक हर महीने 2,500 रुपये जमा करने का वादा किया गया था.
इसी तरह हर परिवार को छह रसोई गैस सिलिंडर ख़रीदने के लिए सीधे बैंक खाते में राशि देने, "वेत्री पयान" योजना के तहत महिलाओं के लिए राज्यभर की सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा, "अन्नन सीर योजना" के तहत विवाह में दुल्हन को 8 ग्राम सोना और रेशम की साड़ी देने के अलावा "थाई मामन गोल्ड रिंग योजना" के तहत सरकारी अस्पताल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को सोने की अंगूठी और आवश्यक वस्तुओं का बॉक्स देने जैसे वादे भी किए गए थे.
इसके अलावा विजय ने बेरोज़गार स्नातकों को हर महीने 4,000 रुपये भत्ता देने और पाँच एकड़ से कम ज़मीन वाले किसानों के कृषि ऋण माफ़ करने का भी वादा किया था.
वरिष्ठ पत्रकार शिवप्रियन का कहना है कि इन वादों को पूरा करने के लिए "कम से कम लगभग एक लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत पड़ सकती है. विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इतना पैसा कहां से लाएंगे."
लेकिन अर्थशास्त्री कृष्णमूर्ति प्रभाकरण का कहना है, "अगर उनकी हर घोषणा लागू की जाती है, तो इससे वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम के तहत तय सीमाओं पर दबाव पड़ सकता है. केवल केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि भारतीय रिज़र्व बैंक भी इसकी अनुमति नहीं देगा. अगर इस मामले में कोई अदालत जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट भी इसकी अनुमति नहीं देगा."
उन्होंने आगे कहा, "विजय पिछले छह महीनों से राज्य के क़र्ज़ स्तर की बात कर रहे थे. यह सब जानते हुए भी उन्होंने इतने सारे वादे किए. अगर वास्तव में वैसा वित्तीय संकट है, जैसा वह बता रहे हैं, तो उन्हें पहले सोचना चाहिए था कि उस स्थिति में इन वादों को पूरा करना संभव होगा या नहीं."
वरिष्ठ पत्रकार एलंगोवन राजशेखरन कहते हैं कि किसी भी सरकार के लिए पूरी तरह क़र्ज़-मुक्त होकर शासन चलाना व्यावहारिक नहीं है. उन्होंने कहा, "विजय को अपने वादे पूरे करने के लिए भारी मात्रा में धन जुटाना पड़ेगा."
उन्होंने यह भी कहा, "अगर इसके लिए वह केंद्र की बीजेपी सरकार के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहते हैं, तो राज्यों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर डीएमके सरकार जैसा आक्रामक रुख़ बनाए रखना उनके लिए मुश्किल हो सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.