ईरान युद्ध क्या खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के गठबंधन का अंत कर देगा?

    • Author, सुमैया नस्र
    • पदनाम, बीबीसी अरबी
  • पढ़ने का समय: 15 मिनट

दशकों से फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा भरोसे को स्वाभाविक और गारंटीशुदा माना जाता था, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल की जंग इस समीकरण को बदलते दिख रहे हैं.

जंग के दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने अपने महत्वपूर्ण ठिकानों को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से निशाना बनाए जाने से पैदा हुई रक्षा चुनौतियों को न केवल मिसाइलों के रास्ते की निगरानी की बल्कि अमेरिकी मदद पर भी सावधानीपूर्वक नज़र रखी.

उन्होंने ख़ुद को एक ऐसी जंग में खिंचा पाया जिसके बारे में उनके अधिकारियों का भी मानना था कि इस जंग से पहले उनसे सलाह तक नहीं ली गई.

क्या इस संकट ने अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के बीच सुरक्षा समझौतों की सीमा को सामने ला दिया है?

क्या यह युद्ध अमेरिकी सैन्य शक्ति पर उनकी निर्भरता को कम करेगा या इसके उलट इसे और मज़बूत करेगा?

ब्रिटेन का विकल्प और सोवियत संघ का डर

गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के सभी देशों का अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग है. अमेरिका सऊदी अरब, क़तर, बहरीन और कुवैत को 'नेटो के बाहर के प्रमुख सहयोगी' देश मानता है और संयुक्त अरब अमीरात को 'प्रमुख रक्षा साझेदार' समझता है.

फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई, जब उसने इस क्षेत्र में एक प्रमुख विदेशी शक्ति के रूप में धीरे-धीरे ब्रिटेन की जगह ले ली.

फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली दो फ़ैक्टर पर आधारित थी- इलाक़े की भौगोलिक अहमियत और इसका विशाल तेल भंडार, साथ ही सोवियत प्रभाव का मुक़ाबला करने का रणनीतिक लक्ष्य.

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से दो साल पहले ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने देश के लिए तेल और फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र के भविष्य की अहमियत को भांप लिया था.

साल 1943 में उन्होंने एलान किया था, "अमेरिका की रक्षा के लिए सऊदी अरब की रक्षा बहुत अहम है." रूज़वेल्ट ने ये टिप्पणी सऊदी अरब को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करने और देश के साथ संबंधों को मज़बूत करने की ज़रूरत को सही ठहराने के लिए की थी.

साल 1945 में फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने मिस्र की स्वेज़ नहर में स्थित 'ग्रेट बिटर लेक' के जलक्षेत्र में युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर किंग अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से मुलाक़ात की. हालांकि उनकी चर्चाओं के आधिकारिक रिकॉर्ड में तेल का कोई ज़िक्र नहीं है, फिर भी इस मुलाक़ात को आम तौर पर दोनों देशों के बीच 'ख़ास रिश्तों' की शुरुआत माना जाता है.

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अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर और लेखक जेफ़री एफ़. गर्श ने बीबीसी अरबी को बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका के पास 'दुनिया में सैन्य अड्डों और रसद सहायता का सबसे व्यापक और विस्तृत नेटवर्क था.'

उन्होंने आगे कहा कि उस समय अमेरिकी सेना ने 'अपने विमर्श और नीतियों को विशेष रूप से फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर केंद्रित किया था. 1949 तक, जर्मनी में हवाई अड्डे के बाद, दहरान सबसे सक्रिय अमेरिकी विदेशी हवाई अड्डा बन गया था और युद्ध के बाद के समय में अमेरिकी वैश्विक अभियानों और तालमेल के लिए महत्वपूर्ण था.'

गर्श बताते हैं कि उस दौरान सैन्य अड्डे के समझौतों पर हस्ताक्षर करवाने में अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहायता के वादों ने अहम भूमिका निभाई. उनका कहना है कि अमेरिका सऊदी अरब के गोला-बारूद और सैन्य हथियारों की मांग को मानने के लिए तैयार था क्योंकि उसे डर था कि अगर वह इनकार करता है, तो सऊदी अरब सोवियत संघ से हथियार खरीदने लगेगा.

उनके मुताबिक़, बाहरी और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ 'जंग के बाद के दशक में सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी समझौतों को बढ़ाने का मुख्य कारण' बनी रहीं. हालाँकि अमेरिका के साथ गठबंधन का सऊदी अरब के भीतर विरोध था, यह विरोध 'इसराइल के लिए अमेरिकी समर्थन और फ़लस्तीन के विभाजन' की वजह से पैदा हुआ था.

80 में दशक में अमेरिकी दबदबे का एलान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से लेकर 1980 के दशक तक, अन्य खाड़ी देशों के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग सीमित पैमाने पर ही सही जारी रहा. इस सहयोग में सुरक्षा समझौतों और सैन्य प्रशिक्षण से लेकर घरेलू ठिकानों पर अमेरिकी सेनाओं की मेज़बानी तक शामिल थे.

उदाहरण के लिए 1971 में बहरीन के साथ हुए समझौते ने अमेरिका को जुफ़ैर में बंदरगाह बनाने के लिए पूर्व ब्रिटिश नौसैनिक ठिकाने के इस्तेमाल करने की अनुमति दी.

1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने फ़ारस की खाड़ी के प्रति ऐसी नीति अपनाई जिसमें ईरान और सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के 'दो स्तंभ' और अमेरिकी तेल हितों के रक्षक के रूप में देखा गया. क्योंकि अमेरिका शीत युद्ध में सोवियत संघ पर अपने दबदबे के लिए इसे ज़रूरी मानता था.

इस नीति के चलते अमेरिका ने इन दोनों देशों को हथियार मुहैया कराए और उनकी सेनाओं को व्यापक सैन्य प्रशिक्षण दिया.

साल 1973 के खाड़ी जंग के दौरान अमेरिका-खाड़ी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे क्योंकि अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने इसराइल का समर्थन करने वाले देशों, विशेष रूप से अमेरिका को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था.

साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने ईरान के शाह और अमेरिका के क़रीबी सहयोगी मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर 'दो-स्तंभ' नीति का अंत कर दिया.

उसी साल सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया. इन दो घटनाओं ने फ़ारस की खाड़ी में सोवियत प्रभाव की संभावना को लेकर अमेरिकी चिंताओं को बढ़ा दिया और अमेरिका को इस क्षेत्र में अपने तेल हितों की रक्षा के लिए एक पुख़्ता सैन्य ढांचा तैयार करने के लिए प्रेरित किया.

साल 1980 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने घोषणा की, "किसी भी विदेशी ताक़त द्वारा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के किसी भी कोशिश का सैन्य बल समेत सभी ज़रूरी साधनों से मुकाबला किया जाएगा."

कई अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के शासनकाल में भी यही नज़रिया जारी रहा.

ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान 1981 में गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की स्थापना ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और ओमान के बीच सामूहिक सुरक्षा के लिए एक ढांचा दिया.

जीसीसी का मक़सद रक्षा तालमेल था, लेकिन इसका असर सीमित रहा और आख़िरकार अमेरिकी गारंटी क्षेत्रीय ख़तरों के ख़िलाफ़ मुख्य प्रतिरोध रणनीति बन गई.

साल 1980 के दशक में इराक़ और फ़ारस की खाड़ी के देशों के बीच तनाव बढ़ गया और 1990 में इराक़ ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया.

1990 और 1991 के साल, अमेरिकी नीति में 'कार्टर डॉक्ट्रिन' के लागू होने का चरम काल था. खाड़ी युद्ध के दौरान, अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सऊदी अरब की रक्षा और कुवैत को मुक्त कराने के घोषित लक्ष्य के साथ 'डेज़र्ट शील्ड' और 'डेज़र्ट स्टॉर्म' अभियान शुरू किए.

इस जंग ने जीसीसी देशों में बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की शुरुआत को पुख़्ता किया. यह एक ऐसी मौजूदगी थी जो इराक़ पर नो-फ्लाई ज़ोन को लागू करने के लिए 1990 के दशक में भी जारी रही और इसे खाड़ी देशों की रक्षा करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करने की अमेरिका की क्षमता के प्रदर्शन के रूप में देखा गया.

वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के वरिष्ठ फ़ेलो सुल्तान अलामेर ने बीबीसी अरबी को बताया, "1980 के दशक में फ़ारस की खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था इराक़ के कुवैत पर किए गए आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थी. इसलिए अमेरिकी सहयोग ने यह सुनिश्चित किया कि इन देशों को किसी भी ज़मीनी आक्रमण या अन्य सैन्य ख़तरे से बचाया जाएगा."

2003 में अमेरिका के इराक़ पर आक्रमण और सद्दाम हुसैन का तख्तापलट फ़ारस की खाड़ी में अमेरिका की भूमिका में एक और महत्वपूर्ण मोड़ था.

फ़ारस की खाड़ी के अरब देशों ने अपनी सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखा और अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया. इस दौरान अमेरिका ने बहरीन, क़तर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अपने ठिकानों को मज़बूत किया.

साथ ही, सद्दाम हुसैन के पतन ने ईरान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को ख़त्म कर दिया और तेहरान को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर दिया.

इसने जीसीसी देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया.

उसी साल अमेरिका ने घोषणा की कि वह सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान हवाई अड्डे से अपने विमान और अधिकांश सैन्य बलों को वापस बुला रहा है और फ़ारस की खाड़ी में स्थित अपने हवाई संचालन केंद्र को क़तर के उदैद हवाई अड्डे पर ट्रांसफ़र कर रहा है.

इस बदलाव का दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ा.

इसके बाद के वर्षों में अमेरिका ने जीसीसी देशों के साथ कई सैन्य, रक्षा और आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें उन्नत हथियार प्रणालियों की बिक्री और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं.

उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने पिछले साल अमेरिका में निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई थी.

पहले कहा गया कि सऊदी अरब 600 अरब डॉलर का निवेश करेगा और फिर व्हाइट हाउस ने पिछले नवंबर में घोषणा की कि ये निवेश एक ट्रिलियन डॉलर होगा. इसमें 142 अरब डॉलर का हथियार बिक्री कॉन्ट्रेक्ट भी शामिल है. इसे इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा बताया गया है.

हालांकि, हाल के वर्षों में, खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई ने चीन और यूरोप जैसी अन्य शक्तियों के साथ अपने संबंधों और साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश की है.

कुछ घटनाओं के एक साथ होने से खाड़ी देशों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया. ये सवाल है कि क्या अमेरिका पर निर्भरता अभी भी एक टिकाऊ विकल्प है?

उदाहरण के लिए, 2019 में सऊदी अरब के तेल भंडारों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों पर अमेरिका की सीमित प्रतिक्रिया ने निराशा का माहौल पैदा कर दिया.

सुल्तान अलामेर कहते हैं, "ईरान पर हमला करने के बजाय, अमेरिका ने सऊदी अरब को कुछ एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजने का फ़ैसला किया. इस घटना से सऊदी अरब को यह स्पष्ट हो गया कि तेल भंडारों की रक्षा करने या फ़ारस की खाड़ी को ईरानी हमलों से बचाने के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता मज़बूत नहीं है."

उनके मुताबिक़, इस मुद्दे के कारण सऊदी अरब ने एक नई क्षेत्रीय नीति की ओर क़दम बढ़ाया.

2022 में अबू धाबी हवाई अड्डे पर हुए हूती हमलों की निंदा करने तक ही अमेरिका की सीमित भूमिका के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने भी इसी तरह की निराशा व्यक्त की थी.

2025 में ईरान और फिर इसराइल के क़तर पर किए गए हमलों ने अमेरिका के साथ संबंधों की उपयोगिता के बारे में बहस को और भी हवा दी.

फ़ारस की खाड़ी में ग़ुस्सा और निराशा

28 फ़रवरी को ईरान के साथ इसराइल-अमेरिकी युद्ध शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले, ओमान के विदेश मंत्री बदर बुसैदी ने घोषणा की कि ईरान-अमेरिका वार्ता में 'महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रगति' हुई है और एक समझौता होने ही वाला है.

जीसीसी के देशों ने ख़ुद को एक ऐसे युद्ध में उलझा हुआ पाया जिसने ईरान के साथ उनके संबंधों को वर्षों के प्रयासों के बाद टूटने के कगार पर ला दिया.

इन रिश्तों को बनाने के लिए इन देशों ने कड़ी मेहनत की थी. अतीत को भुलाते हुए ईरान और अधिकांश जीसीसी देशों के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली हुई थी.

ईरान के हमलों के बाद अरब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी गंभीर नुक़सान पहुंचा. पर्यटन, विमानन, निवेश और डेटा सेंटर्स को निशाना बनाने की वजह से सऊदी अरब, यूएई और क़तर जैसे देश ख़ासे प्रभावित हुए.

18 मार्च को ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित एक लेख में बदर बौसेदी ने अमेरिका पर "अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खोने" का आरोप लगाया और युद्ध को "आपदा" बताया.

कई अरब और पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने 9 मार्च को अमीराती अरबपति ख़लफ़ हबतूर के एक्स पर किए गए (बाद में हटाए गए) पोस्ट को खाड़ी देशों के अभिजात वर्ग के बीच अमेरिका के प्रति आक्रोश और युद्ध के परिणामों को लेकर उनकी चिंताओं का प्रतिबिंब माना.

ये पोस्ट रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणियों के जवाब में थे. लिंडसे ग्राहम ने खाड़ी देशों से अमेरिका और इसराइल का साथ देने का आग्रह किया था और इनकार करने पर उनके साथ रक्षा समझौतों पर पुनर्विचार करने की धमकी दी थी.

ख़लफ़ हबतूर के पोस्ट के एक हिस्से में लिखा था: "हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है और हम यह भी जानते हैं कि किसने अपने तथाकथित सहयोगियों से सलाह लिए बिना पूरे क्षेत्र को इस ख़तरनाक टकराव में घसीटा है... हमें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत नहीं है जो मध्य पूर्व में हमें बचाने का दावा करे... हम इस बात से इनकार नहीं करते कि ईरान इस क्षेत्र के लिए कितना बड़ा ख़तरा है... लेकिन यह एक गंदा खेल है जिसमें कई शक्तियां हमारे क्षेत्र की क़ीमत पर आपस में लड़ रही हैं... हम दूसरों के हितों की रक्षा के लिए इस युद्ध में शामिल नहीं होंगे."

क़तर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता नायेफ़ बिन नाहर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवाद से निपटने के तरीक़े की आलोचना की.

उन्होंने 23 मार्च को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "आज ट्रंप ने अमेरिकी बाज़ार में क़ीमतों पर इसके प्रभाव के डर से ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमले को स्थगित कर दिया, लेकिन 20 दिनों से अधिक समय से खाड़ी देश ईरानी मिसाइलों के निशाने पर हैं और खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का नुक़सान हुआ है, लेकिन इससे उनका मन नहीं बदला है."

सऊदी ख़ुफ़िया विभाग के पूर्व प्रमुख तुर्की फ़ैसल ने युद्ध के शुरुआती दिनों में सीएनएन को बताया, "यह नेतन्याहू का युद्ध है... और यह स्पष्ट है कि वह किसी तरह राष्ट्रपति ट्रंप को अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने के लिए मनाने में कामयाब रहे हैं."

युद्ध की शुरुआत से ही खाड़ी देशों में यह भावना है कि अमेरिकी समर्थन उनके सामने मौजूद ख़तरे के अनुपात में नहीं है.

सुल्तान अलामेर का कहना है कि खाड़ी देशों के लोगों में हाल में दो चिंताओं के बीच दुविधा बनी हुई है. पहली, यह डर कि अमेरिका ईरान के साथ ऐसे समझौते में उन्हें छोड़ देगा जिसमें उनके हितों को ध्यान में नहीं रखा गया है, और दूसरी, यह डर कि अमेरिका के लिए गए आगे के फैसलों से वे ऐसे युद्ध में और हमलों के शिकार हो सकते हैं जिसमें शामिल होने का निर्णय लेते समय उनके हितों को ध्यान में नहीं रखा गया था.

खाड़ी के देशों की हताशा को संभवतः ईरान द्वारा उनके महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, जिनमें डिसेलिनेशन प्लांट, तेल सुविधाएं और बंदरगाह शामिल हैं, पर किए गए कम ख़र्चीले ड्रोन और मिसाइल हमलों ने और बढ़ा दिया.

ये हमले पारंपरिक और बेहद महंगी सुरक्षा प्रणालियों को भेदने में सक्षम थे और भारी नुक़सान पहुंचाने में कामयाब रहे. इससे इन देशों में असुरक्षा की भावना और बढ़ गई और उनकी सुरक्षा व्यवस्था की ख़ामियां उजागर हो गईं.

साझेदारियों में विविधता और जोखिम कम करने की रणनीति

हालिया सालों में अरब खाड़ी देशों ने अपने आर्थिक और तकनीकी साझेदारियों में विविधता लाना शुरू कर दिया है, जिनमें चीन, भारत, रूस, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश शामिल हैं. यह रुझान हालांकि कुछ हद तक सुरक्षा और रक्षा क्षेत्रों तक फैले हैं.

हाल ही में ईरान के साथ हुए अमेरिका-इसराइल युद्ध के दौरान, मार्च के अंत में यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की खाड़ी यात्रा के दौरान सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर ने यूक्रेन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत कीव इन देशों को लड़ाकू ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीक और ड्रोन रोधी प्रणालियाँ देगा.

ज़ेलेंस्की ने पहले ही घोषणा की थी कि यूक्रेन पांच देशों- संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत और जॉर्डन को ईरानी ड्रोन का मुक़ाबला करने में मदद करेगा.

एक्सियोस समाचार वेबसाइट ने दो इसराइली और एक अमेरिकी अधिकारी का हवाला देते हुए यह भी बताया कि इसराइल ने ईरान के साथ युद्ध के शुरुआती दौर में यूएई को आयरन डोम हवाई रक्षा प्रणाली के साथ-साथ इसे संचालित करने के लिए बल भी प्रदान किए थे.

क्या इस संघर्ष के कारण खाड़ी देश अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर दोबारा सोचेंगे या अमेरिका पर अपनी निर्भरता को और मज़बूत करेंगे?

किंग्स कॉलेज लंदन के स्कूल ऑफ सिक्योरिटी स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर एंड्रियास क्रीग कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह संघर्ष अमेरिका से पूरी तरह से दूरी बनाने के बजाय उस पर अधिक निर्भरता की ओर ले जा सकता है."

वो आगे कहते हैं, "युद्ध अल्पावधि में खाड़ी देशों की अमेरिका पर निर्भरता को मज़बूत करेगा, लेकिन साथ ही साथ उस पर विश्वास को कमज़ोर करेगा."

सुल्तान अलामेर का यह भी मानना है कि खाड़ी के देश अपनी सैन्य साझेदारियों में विविधता लाना जारी रखेंगे.

वो कहते हैं, "मेरी राय में, खाड़ी देश अमेरिका को छोड़कर किसी अन्य देश के साथ साझेदारी नहीं करेंगे, बल्कि वे इस साझेदारी को बनाए रखना चाहते हैं और अन्य संसाधनों और साझेदारों पर भरोसा करके अपनी सुरक्षा प्रणाली को मज़बूत और विविध बनाना चाहते हैं."

दोनों पक्षों के बीच संबंध टूटने की संभावना कम होने का एक कारण यह है कि ईरान के हमलों ने कुछ खाड़ी देशों में अमेरिकी समर्थन की आवश्यकता के प्रति विश्वास को बढ़ा दिया है.

जेफ़री गर्श कहते हैं, "अधिकांश खाड़ी देश अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को ईरान के ख़िलाफ़ एक महत्वपूर्ण तरीक़े के रूप में देखते हैं. इसी कारण बहरीन और क़तर जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मौजूदगी है."

संयुक्त अरब अमीरात के पूर्व मंत्री और देश के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गरगाश ने 17 मार्च को ब्लूमबर्ग न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि फ़ारस की खाड़ी के देशों पर ईरान के हमले ने उन्हें "इसराइल और अमेरिका के क़रीब ला दिया है."

इसका एक और कारण अमेरिका के व्यावहारिक विकल्पों की कमी है.

एंड्रियास क्रीग का मानना है कि चीन और रूस "महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं लेकिन जब खाड़ी देशों की राजधानियों को तत्काल हवाई रक्षा, ख़ुफ़िया समन्वय और विश्वसनीय एवं निरंतर प्रतिरोध की आवश्यकता होती है, तो वे अमेरिका की जगह नहीं ले सकते. साझेदारी में विविधता लाने के प्रयास पहले ही शुरू हो चुके हैं, लेकिन ये प्रयास क्षमताओं, भूगोल और समय की सीमाओं के कारण बाधित होते रहते हैं."

सुल्तान अलामेर का कहना है कि "ईरान से दागी गई मिसाइलों से ख़ुद को बचाने के लिए खाड़ी देशों द्वारा अमेरिका से ख़रीदी गई वायु रक्षा प्रणाली ने "90 प्रतिशत से अधिक मिसाइल इंटरसेप्ट की हैं, और मुझे लगता है कि यह रुझान जारी रहेगा."

उनका कहना है कि ये देश "इस तरह के ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए यूक्रेनी हथियारों और अन्य विकल्पों जैसे कम ख़र्चीले और अधिक कुशल प्रणाली" को शामिल कर सकते हैं.

लेकिन संयुक्त सैन्य सहयोग और सैन्य ठिकानों के नेटवर्क के मामले में, उन्हें बदलने या उनमें परिवर्तन करने में बहुत लंबा समय लगेगा, क्योंकि यह एक ऐसी संरचना है जो 30 से 40 सालों में बनी है और इस पर भारी संसाधन ख़र्च किए गए हैं, जबकि अमेरिकी सैन्य प्रौद्योगिकी का अभी भी कोई वास्तविक प्रतिस्पर्धी नहीं है.

यह बात भी ध्यान देने वाली है कि खाड़ी देश अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंधों के भविष्य को लेकर एकमत नहीं हैं. सुल्तान अलामेर के अनुसार, "उनमें से कुछ के पास अमेरिका के अलावा अन्य विकल्प हैं, जबकि कुछ के पास नहीं हैं."

वो आगे कहते हैं, "यह संभव है कि हम संयुक्त अरब अमीरात के इसराइल के साथ सुरक्षा संबंधों को मज़बूत होते हुए देखें, और सऊदी अरब भी तुर्की और पाकिस्तान के साथ अपने क्षेत्रीय संबंधों को पहले से कहीं अधिक विस्तारित करेगा."

हालिया संकट ने उम्मीदों और वास्तविकता के बीच बढ़ती खाई के साथ-साथ अमेरिका-खाड़ी सुरक्षा गठबंधन की कमज़ोरियों को उजागर किया है. खाड़ी देशों के सामने अब मुख्य चुनौती यह है कि वे अमेरिकी सुरक्षा कवच पर अपनी निर्भरता को कैसे मैनेज करें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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