You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा: इस बार कौन होगा मज़बूत स्थिति में?
- Author, ऑसमंड चिया
- पदनाम, बिजनेस रिपोर्टर
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस हफ्ते राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने के लिए चीन की यात्रा करेंगे.
करीब एक दशक के बाद यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा होगी. ये यात्रा 13 से 15 मई तक चलेगी.
यह यात्रा दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंधों के निर्णायक मोड़ पर हो रही है.
बोइंग, सिटीग्रुप और क्वालकॉम सहित अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के अधिकारियों के ट्रंप के साथ यात्रा करने की उम्मीद है. ऐसा चीन की कंपनियों के साथ डील करने के लिए हो सकता है.
यह अमेरिका और चीन के बीच नाजुक व्यापार समझौते की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी होगी.
बीते साल अप्रैल में राष्ट्रपति ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ़ लगाने की घोषणा की.
ट्रंप के इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वॉर छिड़ गई. इस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे पर 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगाए.
ट्रंप और शी जिनपिंग की दक्षिण कोरिया में अक्तूबर में आमने-सामने हुई आखिरी मुलाकात के बाद टैरिफ पर रोक लगा दी गई. लेकिन दोनों पक्षों की ओर से चेतावनियां जारी रहीं.
इतना कुछ दांव पर होने की बीच हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि इस स्थिति तक कैसे पहुंचे?
ट्रेड वॉर की शुरुआत कैसे हुई
राष्ट्रपति ट्रंप को 2016 के चुनाव में मिली जीत के पीछे जो अहम कारण दिनाए गए उनमें उनका व्यापार को अधिक निष्पक्ष बनाने और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़ी नौकरियां देश में वापस लाने का वादा भी शामिल था.
साल 2018 में ट्रंप ने चीन से होने वाले 250 अरब डॉलर के आयात पर टैरिफ़ की घोषणा की. कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि यही वह पल था जब ट्रेड वॉर शुरू हुआ.
उसी साल ट्रंप ने अन्य व्यापारिक साझेदारों, जिनमें मेक्सिको, कनाडा और यूरोप शामिल थे, उन पर भी शुल्क लगाए. ट्रंप ने शुल्क लगाने के पीछे तर्क दिया कि ये देश अमेरिका का फायदा उठा रहे थे.
निंग लेंग जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में पॉलिसी रिसर्चर हैं. उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ये कदम चीन के लिए झटका था.
लेंग ने कहा, "यह पहली बार था जब चीन ने ट्रंप के साथ गंभीरता से बातचीत की. शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि ट्रंप ऐसा कदम उठाएंगे."
उस समय, चीन व्यापार के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर था.
अमेरिका, चीन में बने सामान का प्रमुख इंपोर्टर था. ट्रंप के टैरिफ़ के कारण अमेरिकी खरीदारों के पीछे हटने की स्थिति में चीन में मजदूरों का भविष्य खतरे में पड़ गया था.
इस तनाव ने चीन की अर्थव्यवस्था पर सालों से चले आ रहे मौजूदा मुद्दों को और बढ़ा दिया. इनमें सुस्त घरेलू खपत, बढ़ती बेरोजगारी और लंबे समय से चल रहा संपत्ति का संकट शामिल हैं.
अमेरिका को निर्यात चीन में नौकरियों के लिए लाइफ लाइन थी. लेकिन ट्रंप की सत्ता में यह भी खतरे में पड़ गई.
लेंग ने कहा, "जिस देश के साथ दूसरे देश का व्यापार ज्यादा हो, उस देश के लिए दूसरे देश से ट्रेड वॉर का सामना करना मुश्किल होता है."
'ट्रंप से ज्यादा सख्त रहे बाइडन'
जब साल 2021 में जो बाइडन को ट्रंप की जगह सत्ता मिली, तो उन्होंने भी चीन पर दबाव बनाए रखा.
लेंग ने कहा कि बाइडन प्रशासन ने ट्रंप के चीन पर लगाए गए टैरिफ को नहीं हटाया, क्योंकि उनका मानना था कि अमेरिका को टेक्नोलॉजी सेक्टर में अपने प्रतिद्वंद्वी की तरक्की को रोकने की जरूरत है.
बाइडन ने चीन की कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए और इनमें तकनीकी दिग्गज ख़्वावे भी शामिल है. ख़्वावे को राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण अमेरिका से लगभग बाहर कर दिया गया था.
उन्होंने टिकटॉक की भी गहन जांच की. नतीजा ये हुआ कि इसके अमेरिकी में संचालन को चीन की पेरेंट कंपनी से अलग कर दिया गया.
बाइडन के लगाए गए भारी टैरिफ के बाद चीन के इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को भी अमेरिकी मार्केट में एंट्री करने से प्रभावी रूप से रोक दिया गया.
हांगकांग विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री तेंग हेइवाई ने कहा, "हम अक्सर सोचते हैं कि ट्रंप चीन के प्रति सख्त थे. लेकिन यह तर्क भी दिया जा सकता है कि बाइडन, ट्रंप से भी ज्यादा सख्त थे."
ट्रंप का दूसरी बार सत्ता में आना
2025 में राष्ट्रपति की कुर्सी दोबारा संभालने के बाद ट्रंप ने अपनी टैरिफ नीतियों को और भी सख्त कर दिया.
उन्होंने चीन पर 20 फीसदी टैरिफ लगाया. साथ ही उन्होंने चीन पर अमेरिका में फेंटानिल नामक नशीले पदार्थ की तस्करी करने आरोप लगाया.
उन्होंने चीन के सामान पर 34 फीसदी शुल्क लगा दिया. इस फैसले से चीन पर लगाया गया कुल टैरिफ किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे ज्यादा हो गया.
इस टैरिफ ने चीन के व्यवसायों को बुरी तरह प्रभावित किया और गोदामों में माल का ढेर लग गया. वहीं अमेरिकी कंपनियां वैकल्पिक आपूर्ति खोजने में जुट गईं.
चीन ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शुल्क लगाना शुरू कर दिया. इससे किसानों को भारी नुकसान हुआ. किसान, ट्रंप के प्रमुख मतदाताओं में से एक हैं.
लेकिन ट्रंप ने दुनिया भर में दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति पर चीन के लगभग एकाधिकार को नजरअंदाज़ कर दिया. ये स्मार्टफोन से लेकर लड़ाकू विमानों तक हर चीज के निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.
ट्रंप ने देशों को अमेरिका के लिए डील करने के लिए मजबूर करने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल किया था. लेकिन वे उन प्रमुख व्यवसायों को जोखिम में नहीं डाल सकते थे जो चीन के कच्चे माल पर निर्भर हैं. इसलिए अब डील का समय आ गया था.
अक्तूबर में ट्रंप और शी के बीच हुई बैठक चीन के एक्सपोर्ट कंट्रोल को निलंबित करने के साथ समाप्त हुई. ये ट्रंप के लिए एक तरह से जीत थी.
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने चीन को अमेरिकी कृषि से जुड़ा सामान और अन्य फॉर्म प्रोडक्ट्स को तुरंत खरीदना शुरू करने के लिए मना लिया गया. ये सामान अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.
इसके बदले में अमेरिका ने सिंथेटिक ओपिओइड फेंटानिल बनाने में इस्तेमाल होने वाली इंग्रीडिएंट्स पर लगाए गए टैरिफ का एक हिस्सा हटा दिया.
रेसिप्रोकल टैरिफ में होने वाली बढ़ोतरी को भी रोक दिया गया. बैठक के बाद के कुछ हफ्तों में चीन को एडवांस सेमीकंडक्टर की बिक्री पर लगे प्रतिबंध हटा दिए गए. हालांकि यह सबसे एडवांस चिप्स पर लागू नहीं हुआ.
इस बार क्या एजेंडा है
पिछले साल टैरिफ पर समझौता हो जाने के बावजूद, विवाद का स्थाई समाधान अभी तक नहीं हो पाया है.
तेंग ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चीन के भारी निवेश का मतलब है कि घरेलू खर्च में कमी के कारण उसके व्यवसायों के पास विदेशों में बिक्री करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
तेंग ने कहा, "उसे अमेरिका की जरूरत होगी. कंज्यूमर मार्केट के मामले में अमेरिका जितना बड़ा कोई दूसरा देश नहीं है."
हालांकि इस बात के बावजूद इस मीटिंग में चीन मजबूत स्थिति में है.
चीन के निर्यात आंकड़े रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं. यह अमेरिका के साथ संबंध कमजोर होने के बाद दुनिया भर में नए व्यापारिक साझेदार बनाने का नतीजा है.
बीजिंग ने रोबोटिक्स में भी भारी निवेश जारी रखा है. साथ ही चीन अपने एडवांस चिप्स बनाने और एनवीडिया जैसी पश्चिमी कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास भी कर रहा है.
ट्रंप प्रशासन की ओर से चीन पर सोयाबीन और विमान के पुर्जों सहित महत्वपूर्ण अमेरिकी उद्योगों से ज्यादा सामान खरीदने का दबाव डालने की संभावना है.
लेकिन यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उनके लिबरेशन डे टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद ट्रंप की व्यापार नीतियों को झटका लगा है.
उन्होंने इस बीच सभी देशों पर अस्थायी रूप से 10 फीसदी शुल्क लगाने के लिए एक अलग कानून का सहारा लिया. साथ ही चीन और अन्य देशों के खिलाफ अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस की जांच शुरू की.
पिछले ही हफ्ते, एक अमेरिकी ट्रेड कोर्ट ने फैसला सुनाया कि नए वैश्विक टैरिफ उचित नहीं थे, जिससे भविष्य में अदालती चुनौतियां पैदा हो सकती हैं.
ईरान के बारे में क्या?
इसमें कोई शक नहीं कि ट्रंप-शी बैठक पर ईरान युद्ध का गहरा प्रभाव रहेगा.
अपने विशाल तेल भंडार और विविध ऊर्जा स्रोतों के कारण, चीन ने अब तक अपने कई पड़ोसी देशों की तुलना में युद्ध के प्रभावों का बेहतर ढंग से सामना किया है.
चीन एक प्रमुख तेल उत्पादक देश है. वहीं चीन का अधिकतर आयातित कच्चा तेल रूस से आता है. इन वजहों ने संघर्ष के प्रभाव को कम करने में मदद की है. बावजूद इस बात के चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है.
फिर भी पॉलिसी एनालिस्ट लायल मॉरिस का कहना है कि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, यह चीन की अर्थव्यवस्था की परीक्षा ले रहा है.
वरिष्ठ अधिकारियों ने चीन की ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने का वादा किया है.
इसलिए बेशक चीन और अमेरिका दोनों ही इस संघर्ष को समाप्त करने का इरादा रखते हों, पर ईरान पर दोनों पक्षों के विचारों में काफी मतभेद हैं.साथ ही दुनिया यह देखेगी कि वे इस मतभेद को कैसे और इसमें क्या दूर कर पाते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.