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सोमनाथ मंदिर: विध्वंस, स्मृति और राजनीति के हज़ार साल
- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 मई को गुजरात के प्रभास पाटन स्थित सोमनाथ मंदिर में सोमनाथ अमृत महोत्सव में हिस्सा लिया.
गुजरात के पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर में महापूजा और कुंभाभिषेक किया. मोदी ने अपने संबोधन में सोमनाथ को भारत की "अटूट आस्था" और "सभ्यतागत निरंतरता" का प्रतीक बताया.
उन्होंने कहा कि सोमनाथ का इतिहास केवल विध्वंस का इतिहास नहीं है, हर विध्वंस के बाद पुनर्निर्माण और पुनरुत्थान की भारतीय चेतना का इतिहास है.
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल से जुड़ा रहा है और 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन किया था.
सोमनाथ मंदिर को भारतीय इतिहासकार ही नहीं बल्कि अरब के इतिहासकार भी " असाधारण रूप से समृद्ध", "अकल्पनीय" और "अतुलनीय" बताते रहे हैं.
मशहूर इतिहासकार अल-बिरूनी "तहकीक-ए-हिन्द" में लिखते हैं, "सोमनाथ के इतना प्रसिद्ध होने का कारण यह है कि यह ऐसा बंदरगाह था, जहाँ पूर्वी अफ़्रीका, चीन सहित दुनिया के विभिन्न देशों से व्यापारियों के जहाज लंगर लगाए रहते थे."
प्रसिद्ध उपन्यासकार चतुरसेन शास्त्री "सोमनाथ महालय" में लिखते हैं, "सोमनाथ के कीर्तिमान महालय का अलौकिक वैभव बदरिकाश्रम से सेतुबन्ध रामेश्वर तक और कन्याकुमारी से बंगाल के छोर तक विख्यात था.
प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर "सोमनाथ : द मैनी वॉयसेस ऑफ़ अ हिस्ट्री" में लिखती हैं, छह सौ स्तम्भों पर महालय का रंग-मण्डप खड़ा था. इस मण्डप में दस हजार से भी अधिक दर्शक एक साथ सोमनाथ के दर्शन कर सकते थे.
मंडप में ही विराजमान ज्योतिर्लिंग था, जो गहरे अंधेरे में था; लेकिन मशहूर फ़ारसी इतिहासकार फ़िरिश्ता (1560-1620) "तारीख़े फ़िरिश्ता" में लिखते हैं, "कहते हैं कि इसमें बेशुमार शुद्ध और बेशकीमती हीरे-जवाहरात थे, जिनकी वजह से वहाँ आँखें चौंधिया जाती थीं."
सोमनाथ का यह ज्योतिर्लिंग पांच गज ऊंचा था. इसका स्नान, अभिषेक-शृंगार आदि छोटी-सी सोने की सीढ़ी पर चढ़ कर किया जाता था.
थापर के अनुसार, यहाँ सोने की एक सांकल लगी रहती थी, जिसका वजन 200 मण (एक मण में 40 किलो) था और इसमें घंटियां बंधी रहती थीं, जो पुजारियों के आने-जाने के समय बजती थीं.
यहां लगा करता था बड़ा मेला
इतिहासकार चतुरसेन के अनुसार प्रतिवर्ष श्रावण की पूर्णिमा और शिवरात्रि के दिन तथा सूर्य और चन्द्रग्रहण के दिन महालय में भारी मेला लगता था, जिसमें हिमालय के उस पार से लेकर लंका तक के यात्री आते थे और इन मेलों में पाँच से सात लाख तक यात्री एकत्र हो जाते थे.
वहीं, फ़िरिश्ता लिखते हैं कि सोमनाथ के वैभव को सुनकर आक्रमण के लिए मोहम्मद गजनवी निकला तो उसके पास 30,000 सैनिक थे. बीस हज़ार ऊंटों से महीनों के लिए अनाज और पानी लाया गया था.
थापर अपनी चर्चित पुस्तक "सोमनाथ : दॅ मैनी वॉयसेज ऑफ़ अ हिस्ट्री" में लिखती हैं कि सोमनाथ का इतिहास "एक-रेखीय" नहीं है. यह मंदिर कई बार टूटा, कई बार बना और हर बार उसका अर्थ बदला. उनके अनुसार, मध्यकालीन भारत में मंदिरों का विध्वंस केवल धार्मिक द्वेष से नहीं, सत्ता-प्रदर्शन, लूट और प्रतीकात्मक प्रभुत्व से भी जुड़ा था.
उनका और कुछ अन्य इतिहासकारों का मानना है कि सोमनाथ न तो केवल "हिंदू अस्मिता का घाव" है और न ही केवल "इस्लामी आक्रमण का प्रतीक". वह दोनों से कहीं अधिक जटिल ऐतिहासिक स्थल है.
जटिल ऐतिहासिक स्थल रहा है सोमनाथ
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अहमदनगर जेल में 1942 से 1945 के बीच लिपिबद्ध प्रसिद्ध पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" में लिखते हैं, "महमूद आस्था का व्यक्ति कम और योद्धा अधिक था और अन्य अनेक विजेताओं की तरह उसने अपने आक्रमणों के लिए धर्म के नाम का उपयोग और दुरुपयोग किया."
"भारत उसके लिए केवल वह स्थान था, जहाँ से वह अपने देश के लिए धन और सामग्री लूट सकता था. उसने भारत में एक सेना संगठित की और उसे अपने एक प्रसिद्ध सेनापति तिलक के अधीन रखा, जो भारतीय और हिंदू था."
सोमनाथ दरअसल "एक कहानी" नहीं है बल्कि "कई आवाज़ें" है-संस्कृत शिलालेख, फारसी क्रॉनिकल, जैन ग्रंथ, औपनिवेशिक दस्तावेज़ और आधुनिक राष्ट्रवादी आख्यान. इनके माध्यम से हर युग ने सोमनाथ को अपने तरीके से पढ़ा.
इतिहास की अकादमिक बहसों के समानांतर हिंदी साहित्य ने भी सोमनाथ को एक भावनात्मक और राष्ट्रवादी प्रतीक में ढाला.
आचार्य चतुरसेन का सोमनाथ महालय और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का जय सोमनाथ दोनों उपन्यासों ने स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-बाद भारत में लोकप्रियता हासिल की.
'जय सोमनाथ' में मुंशी सोमनाथ को "राष्ट्रीय आत्मसम्मान" के पुनरुत्थान के रूप में देखते हैं. यह वही दृष्टि है, जिसने आज़ादी के बाद मंदिर-निर्माण के प्रश्न को सांस्कृतिक पुनरुद्धार से जोड़ दिया.
दूसरी ओर, सोमनाथ महालय इतिहास और कल्पना के बीच एक सेतु बनाता है; जहां विध्वंस केवल पत्थरों का नहीं, सभ्यता की चेतना का भी है.
इन उपन्यासों ने जनमानस में सोमनाथ को एक भावनात्मक कथा में बदल दिया; ऐसी कथा, जो बाद में राजनीतिक भाषा का हिस्सा बनी.
लेकिन इस मामले में स्वामी दयानंद सरस्वती ने "सत्यार्थप्रकाश" के ग्यारहवें अध्याय में लिखा है, "पुजारीवाद और मूर्तिपूजा ने सब तबाह कर दिया. महमूद गजनी का विरोध करने को तत्पर राजा और उनकी सेना तैयार थी तो पुजारियों ने कहा कि इस समय आठवां चंद्रमा है और यह आक्रमण के लिए अभी मुहूर्त नहीं है."
दयानंद सरस्वती सोमनाथ लूट के लिए महमूद से अधिक अंधविश्वासों को जिम्मेदार मानते हैं. वे हमलावरों का मुक़ाबला करने के लिए उस समय के सैन्य कौशल पर ध्यान देने के बजाय इस तरह के मंदिरों में पूजा करने को देश के पतन का कारण बताते हैं.
जब हुआ था सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण
सोमनाथ के पुनर्निर्माण का सबसे निर्णायक अध्याय भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद लिखा गया. यहाँ इतिहास राजनीति से सीधे टकराता है.
गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और गुजरात के स्थानीय नेताओं का मानना था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण सांस्कृतिक आत्मविश्वास की बहाली का प्रतीक होगा.
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की राय के अनुसार इसे एक ट्रस्ट के माध्यम से पूरा करने का समर्थन किया. तब तक कोई विवाद न था.
लेकिन नेहरू के पत्रों और आधिकारिक नोट्स में बार-बार यह चिंता दिखती है कि राज्य को धार्मिक प्रतीकों से दूरी रखनी चाहिए; खासकर तब, जब देश विभाजन की हिंसा से अभी-अभी उबर रहा हो.
इतिहासकारों और अभिलेखों के अनुसार, नेहरू ने सार्वजनिक धन और सरकारी प्रतीकों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी. उनका तर्क था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में अपनी पहचान बना रहा है और ऐसे में राज्य-प्रायोजित मंदिर-निर्माण एक ख़तरनाक मिसाल बन सकता है. फिर आता है राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का प्रसंग.
1951 में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति ने इस टकराव को सार्वजनिक कर दिया. नेहरू ने स्पष्ट रूप से बतौर राष्ट्रपति उनकी उपस्थिति पर आपत्ति जताई थी, लेकिन राष्ट्रपति ने इसे व्यक्तिगत आस्था और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का प्रश्न माना.
यह टकराव नेहरू की धर्मनिरपेक्ष चिंता बनाम पटेल और राजेंद्र प्रसाद की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना यानी भारत के संवैधानिक इतिहास का एक मौन अध्याय बन गया.
आज ये प्रसंग जब फिर से उभरा है तो अक्सर एक पक्ष को "राष्ट्रवादी" और दूसरे को "विरोधी" के रूप में सरलीकृत कर दिया जाता है. इतिहास, हालांकि, इस तरह के सीधे विभाजन की अनुमति नहीं देता.
ब्रिटिश इतिहासकारों ने क्या लिखा?
ब्रिटिश सत्ता ने भी सोमनाथ को लेकर एक ख़ास भाषा गढ़ी थी. अमेरिकी इतिहासकार रिचर्ड एम ईटन का तर्क है कि सोमनाथ और महमूद की "दुष्ट" छवि को जिस तीव्रता से गढ़ा गया, वह औपनिवेशिक राजनीति की देन है.
ईटन के अनुसार, 1842 में ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो ने "गेट्स ऑफ़ सोमनाथ" की कहानी पेश की, जिसमें ग़ज़नी से कथित तौर पर सोमनाथ मंदिर के द्वार भारत लाकर "800 साल के अपमान"का बदला लेने की बात कही गई.
यह वह क्षण था, जब सोमनाथ को भारत के "राष्ट्रीय अपमान" और महमूद को "सभ्यताओं के शत्रु" के रूप में दर्शाया गया.
ईटन के अनुसार, "यह कोडिंग इतनी शक्तिशाली थी कि बाद की भारतीय और पाकिस्तानी राष्ट्र-राजनीति-दोनों ने इसे अपने-अपने हिसाब से अपनाया."
यह दृष्टि सोमनाथ को केवल 1026 की घटना नहीं 19वीं–20वीं सदी की स्मृति-राजनीति का भी केस बनाती है. सोमनाथ का द्वार भारतीय राजनीति में एक भटके हुए प्रेत की तरह लौटता है.
1026 ईस्वी में महमूद ग़ज़नवी इसे अपने साथ ले गया था, न सिर्फ़ पत्थर और लकड़ी के रूप में, बल्कि एक सभ्यता की अपमानित प्रतिध्वनि की तरह. आठ शताब्दियों बाद 1842 में अफ़ग़ान युद्ध में विजय के बाद ब्रिटिश सेना उस द्वार को भारत वापस ले आई.
गवर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो ने इस वापसी को लगभग नाटकीय भावुकता के साथ प्रस्तुत किया और ठीक इसी कारण उन्हें लंदन में फटकार भी मिली.
थॉमस मैकाले का 9 मार्च, 1843 का वह भाषण ("स्पीचेज बाई लॉर्ड मैकॉले : जीएम यंग"), जिसमें हिंदू परंपरा एक असुविधाजनक लोककथा थी और इस्लाम एक दूर का, किंतु परिचित रिश्तेदार.
"सोमनाथ गेट की वापसी" इस तरह केवल एक द्वार की नहीं, उस औपनिवेशिक मानसिकता की कथा बन जाती है, जो तय करना चाहती थी कि स्मृति को कहाँ रखा जाए-संग्रहालय में या विस्मृति में.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित