राहुल गांधी को क्यों लगता है कि ममता की हार पर कांग्रेस को ख़ुश नहीं होना चाहिए?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

14 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि तृणमूल कांग्रेस ने यहाँ बीजेपी का पाँव पसारने का मौक़ा दिया.

अब बीजेपी जब जीत गई तो राहुल गांधी कह रहे हैं कि ममता की हार पर कांग्रेस के लोगों को ख़ुश नहीं होना चाहिए.

राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत लोकप्रिय जनादेश की 'चोरी' से हुई है.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह भारतीय लोकतंत्र को 'नष्ट' करने की बीजेपी की कथित कोशिश में एक अहम क़दम है.

एक्स पर एक पोस्ट में राहुल गांधी ने तृणमूल कांग्रेस के प्रति समर्थन जताया और पार्टी की हार पर ख़ुशी जताने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी.

कांग्रेस नेता ने कहा, "कांग्रेस के कुछ लोग तृणमूल की हार पर ख़ुश हो रहे हैं. उन्हें यह साफ़ तौर पर समझने की ज़रूरत है कि असम और बंगाल के जनादेश की चोरी, भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने के बीजेपी के मिशन में एक बड़ा क़दम है."

राजनीतिक दलों से दलगत हितों से ऊपर उठने की अपील करते हुए राहुल ने कहा, "ओछी राजनीति को अलग रखिए. यह किसी एक पार्टी या दूसरी पार्टी के बारे में नहीं है. यह भारत के बारे में है."

राहुल गांधी ने कहा, "हम ममता जी से सहमत हैं. बंगाल में 100 से अधिक सीटें चोरी की गईं. हमने यह तरीक़ा पहले भी देखा है. मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पिछले लोकसभा चुनाव में."

हार के बाद ममता का रुख़

राहुल गांधी ने सोमवार को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से फोन पर बात भी की थी.

दूसरी तरफ़ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की क़रारी हार के एक दिन बाद मंगलवार को कहा कि इंडिया गठबंधन के कई नेताओं, जिनमें सोनिया गांधी भी शामिल हैं, ने उनसे संपर्क किया है. उन्होंने यह भी कहा कि वह विपक्षी गठबंधन को मज़बूत करने के लिए काम करेंगी.

उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं की आभारी हूँ. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव समेत कई नेताओं ने मुझे फोन किया. अखिलेश बुधवार को मुझसे मिलने आएंगे. अब मेरा मक़सद साफ़ है. मैं एक स्वतंत्र पक्षी हूं. मैंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि मैं इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ क्या करूंगी. मैं इंडिया गठबंधन को मज़बूत करूंगी."

इंडिया गठबंधन को मज़बूत करने को लेकर ममता बनर्जी की टिप्पणी चुनावी हार के बाद आई है. हार से पहले ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन के लिए ऐसी प्रतिबद्धता नहीं दिखाती थीं.

राहुल गांधी को ऐसा क्यों लग रहा है कि ममता की हार से कांग्रेस के कुछ लोग ख़ुश हैं? पश्चिम बंगाल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभांकर सरकार ने मुझसे कहा था कि टीएमसी ने कांग्रेस को कमज़ोर किया है.

उन्होंने कहा था, ''ममता बनर्जी ने कांग्रेस तोड़ी और पार्टी ने फिर उन्हीं से गठबंधन कर लिया. यह कांग्रेस की बड़ी ग़लती थी. टीएमसी से गठबंधन के कारण कांग्रेस 2011 में पश्चिम बंगाल की 294 में से केवल 57 सीटों पर चुनाव लड़ी. ये भी हमारी बड़ी ग़लती थी.''

चुनावी नतीजे आने के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति के हिस्सा रहे एक नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि अगर देश में द्विदलीय राजनीति होती है तो यह कांग्रेस के लिए अच्छा है क्योंकि देश भर में क्षेत्रीय पार्टियों के कारण ही कांग्रेस कमज़ोर हुई है.

क्षेत्रीय पार्टियों के कमज़ोर होने से किसका फ़ायदा?

क्या भारत में क्षेत्रीय पार्टियां ख़त्म होंगी तो यह कांग्रेस के हक़ में होगा?

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं, ''जिन्हें लगता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के ख़त्म होने से कांग्रेस मज़बूत होगी मुझे उनकी समझ पर शक होता है. क्षेत्रीय पार्टियों के कारण देश में अलगाववाद थमा. क्षेत्रीय पार्टियों के कारण फेडरलिजम मज़बूत हुआ और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं पूरी हुईं. बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया तो उन्हें नागवार गुज़रा और अब क्षेत्रीय पार्टियां कमज़ोर हो रही हैं तो उन्हें अच्छा क्यों लगना चाहिए? कई लोग देश में लेफ्ट की सरकार ख़त्म होने का जश्न मना रहे हैं. लेकिन भारत बहुदलीय लोकतंत्र है और यही इसकी ताक़त है.''

विनोद शर्मा कहते हैं, ''राहुल गांधी इस मामले में परिपक्वता दिखा रहे हैं. ये बात सच है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के कारण कांग्रेस कमज़ोर हुई. लेकिन कांग्रेस कोई चुनाव किसी के कमज़ोर होने से नहीं जीत सकती है. उसे ख़ुद को मज़बूत करना होगा.''

दरअसल, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को कमज़ोर करने में ममता बनर्जी की अहम भूमिका रही है.

1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी, जो वाम दलों और कांग्रेस दोनों के ख़िलाफ़ खड़ी हुई. इसका असर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की राजनीति पर सीधा दिखा.

1998 में यूथ कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के वामदलों के प्रति कथित नरम रुख़ के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी थी. तब कांग्रेस की कमान सीताराम केसरी के पास थी.

टीएमसी का बनना

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 1996 में 82 सीटें थीं जो 2001 में घटकर सिर्फ़ 26 सीटें हो गईं. कांग्रेस छोड़ने के बाद ममता और आक्रामक हो गईं. जिस ममता बनर्जी को कांग्रेस ने पार्टी से निकाला उसी की तृणमूल कांग्रेस के साथ 2001 में गठबंधन किया और 26 सीटें जीतीं.

2011 में कांग्रेस ने जूनियर पार्टनर के रूप में ममता की लहर का सहारा लिया और 42 सीटें जीतीं. यह साझेदारी फिर टूटी, जिससे 2016 में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठबंधन किया और 44 सीटें जीतीं.

लेकिन 2021 तक उसका सफाया हो गया. जो कभी वाम-विरोधी ताक़त थी, वही कांग्रेस अब विभाजन, दलबदल और घटती प्रासंगिकता से जूझ रही है.

2021 के चुनाव में कांग्रेस, सीपीआईएम और आईएसएफ़ में गठबंधन था लेकिन सीट केवल आईएसएफ़ को एक मिली. ऐसा पहली बार हुआ कि वाम दल और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली.

1947 से लेकर 1990 के दशक तक, पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्यतः वाम और कांग्रेस के बीच संघर्ष का मैदान रही. लेकिन 2010 के दशक ने समीकरण बदल दिए.

अभी भारत में पंजाब को छोड़ किसी भी राज्य में ग़ैर-बीजेपी या ग़ैर-कांग्रेसी सरकार नहीं है. ऐसे में ऐसा लगता है कि तीसरे पक्ष के लिए स्पेस लगातार कम हो रहा है. बंगाल में पहले कांग्रेस सत्ता में रही. फिर वाम मोर्चा सत्ता में आया और कांग्रेस विपक्ष में आई.

फिर विपक्ष की जगह फिर टीएमसी ने ली और वाम मोर्चा को 2011 में बेदख़ल किया. उसके बाद से एक मज़बूत विपक्ष और अलग नैरेटिव को लेकर ख़ालीपन था, जिसे अब बीजेपी ने भर दिया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.