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भारत और पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को कैसे बदल रहे हैं ड्रोन?
- Author, जुगल पुरोहित, प्रचेता पांजा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली से
- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, इस्लामाबाद से
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
एक साल पहले भारत ने पाकिस्तान के भीतर कथित 'आतंकवादी ठिकानों' पर हमले किए थे. इस सैन्य अभियान को 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम दिया गया.
यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में चरमपंथी हमले में 26 लोगों की हत्या के बाद की गई थी.
भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूहों को ज़िम्मेदार ठहराया. हालांकि, पाकिस्तान ने इसमें किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया.
इसके बाद, 7 से 10 मई 2025 के बीच जो हुआ, वह बिल्कुल नया था. इसें उपमहाद्वीप में दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसी देशों के बीच पहला ड्रोन युद्ध माना गया.
'यीहा', 'हारोप' और 'सोंगर' जैसे नाम, जो दोनों पक्षों की ओर इस्तेमाल किए जाने वाले ड्रोन हैं, अब इस इलाके की जंग से जुड़ी आम भाषा का हिस्सा बन गए हैं.
हालांकि, ये ड्रोन कई दशकों से मौजूद हैं. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और यमन में अपने ड्रोन से कई हमले किए थे. लेकिन अब तकनीक के विस्तार की वजह से यह ताक़त सिर्फ़ एक देश तक सीमित नहीं है.
ड्रोन तकनीक सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने के कारण आज के समय में लड़ाई का तरीक़ा बदल गया है.
यूक्रेन के युद्ध से लेकर अमेरिका, इसराइल और ईरान से जुड़े हमलों तक, जंग में ड्रोन का इस्तेमाल ज़्यादा देखने को मिल रहा है.
एक साल पहले भारत ने पाकिस्तान के रडार सिस्टम को नष्ट करने के लिए क्रूज मिसाइलों के साथ हमला करने वाले ड्रोन (लोइटरिंग म्यूनिशन) इस्तेमाल किए थे. वहीं पाकिस्तान ने भी भारतीय ठिकानों पर स्वॉर्म ड्रोन (समूह में ड्रोन) से हमले किए.
एक साल बाद भी उन चार दिनों में हुई घटनाओं से मिले सबक को समझने की कोशिश हो रही है.
'आसमान में निगाहें'
भारत के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने गुरुवार को जयपुर में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ड्रोन से होने वाली चुनौतियों को स्वीकार किया.
'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल होने पर कहा गया कि सेना, अन्य मंत्रालयों के साथ मिलकर पूरे देश के लिए ड्रोन‑रोधी नीति बनाने पर काम कर रही है. हालांकि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि ड्रोन का इस्तेमाल मई 2025 से काफ़ी पहले ही शुरू हो गया था.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 नवंबर 2024 से 31 अक्तूबर 2025 के बीच भारत‑पाकिस्तान की 3323 किलोमीटर लंबी सीमा पर 1816 ड्रोन देखे गए.
बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ़) के मुताबिक, इनका इस्तेमाल पाकिस्तान से भारत में नशीले पदार्थ, हथियार और गोला‑बारूद पहुंचाने के लिए किया गया.
साल 2023 में, पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम शहबाज़ शरीफ़ के रक्षा सलाहकार ने भी सीमा इलाक़ों में तस्करों के ड्रोन से हेरोइन भेजे जाने की बात कही थी.
जून 2021 में, जम्मू में भारतीय वायुसेना के एक ठिकाने पर दो धमाके हुए थे. बाद में पुलिस ने बताया कि इस हमले में ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था.
पुलिस के मुताबिक़, निशाना वायुसेना के विमान थे. हालांकि किसी तरह के नुक़सान की ख़बर नहीं थी. इस घटना के बाद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और एयर डिफ़ेंस को और मजबूत किया गया.
इस्लामाबाद में सुरक्षा विशेषज्ञ सैयद मोहम्मद अली ने कहा कि पाकिस्तान को भी ड्रोन से चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, चाहे वे भारत की सेना इस्तेमाल कर रही हो या हाल के समय में तालिबान.
2025 तक ड्रोन ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने और हमलों में एक अहम भूमिका निभाने लगे थे.
पिछले कुछ सालों में बढ़े तनाव को देखते हुए, भारत के लिए चीन और पाकिस्तान के साथ अपनी सीमा और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा और ज़्यादा जटिल हो गई है. वहीं पाकिस्तान की भी साल 2024 के बाद भारत, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के साथ झड़पें हुई हैं.
इसलिए भारत और पाकिस्तान, दोनों ही अपनी सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहे हैं. इसमें हथियारबंद और बिना हथियार वाले ड्रोन, दोनों शामिल हैं.
नए ख़तरे, नए डिफ़ेंस
भारतीय वायुसेना के एयर मार्शल एके भारती, एयर ऑपरेशन के डायरेक्ट जनरल हैं.
उन्होंने हाल ही में कहा कि संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की ओर से लगातार हुए ड्रोन हमले भारत की प्रतिक्रिया का एक बड़ा कारण थे.
रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "पहले हमें दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर या मिसाइलों पर नज़र रखनी होती थी. अब हमें हर तरह के ड्रोन, छोटे‑बड़े, अलग‑अलग साइज़ के और अलग‑अलग ऊंचाई पर उड़ने वाले, भी पहचानने पड़ते हैं."
ड्रोन का असर सिर्फ युद्ध तक ही सीमित नहीं है. पाकिस्तान में सेना के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि 'आतंकवाद‑रोधी' अभियानों में अब पारंपरिक हवाई हमलों की जगह धीरे‑धीरे ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है.
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ हाल के अभियानों में शामिल एक पाकिस्तानी अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "ड्रोन के ज़रिए की जाने वाली कार्रवाई ज़्यादा असरदार होती है, क्योंकि इससे आसपास होने वाला नुकसान कम होता है."
अधिकारियों के मुताबिक़, इसकी लागत लगातार चिंता का विषय है.
भारत के रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, "हम सस्ते ड्रोन गिराने के लिए महंगी मिसाइलें नहीं चला सकते. इसलिए हमारे समाधान, लागत को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं."
लेकिन भारतीय वायुसेना के उप प्रमुख, एयर मार्शल एके भारती ने सिर्फ़ सस्ते ड्रोन के असर को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा‑चढ़ाकर देखने पर भी सावधान किया.
उन्होंने कहा, "हमें बड़ी संख्या में ड्रोन चाहिए, लेकिन कम क़ीमत वाले ड्रोन ज़्यादा से ज़्यादा दुश्मन को लगातार परेशान कर सकते हैं. कुछ ठिकानों पर हमला कर सकते हैं. अगर निर्णायक नतीजा चाहिए, तो लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करने की क्षमता होनी चाहिए."
उन्होंने कहा कि यह काम ब्रह्मोस मिसाइल जैसे उन्नत हथियार ही कर सकते हैं.
यह बात उन्होंने जयपुर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही. साथ ही उन्होंने कहा, "इसलिए हमें ड्रोन के साथ‑साथ ऐसी उन्नत तकनीकों की भी ज़रूरत है."
पाकिस्तान का भी कहना है कि संघर्ष के दौरान उसने ड्रोन से जुड़े बड़े ख़तरों को नाकाम किया.
इस्लामाबाद स्थित सुरक्षा विश्लेषक सैयद मोहम्मद अली ने कहा कि पाकिस्तान ने ड्रोन के ख़िलाफ़ "हथियारों से रोकने वाली (काइनेटिक) और तकनीक के ज़रिये रोकने वाली (नॉन‑काइनेटिक) दोनों तरह की रक्षा प्रणालियां" विकसित की हैं.
उनके मुताबिक़, इनका इस्तेमाल भारत की ओर से दागे गए इसराइल निर्मित हेरॉन ड्रोन के ख़िलाफ़ प्रभावी ढंग से किया गया.
पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों ने भी बीबीसी को बताया कि पाकिस्तान के भीतर 'आतंकवाद‑रोधी' अभियानों में अब पारंपरिक हवाई हमलों की जगह ड्रोन आधारित ऑपरेशन्स का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है.
हालांकि, ड्रोन से बचाव की यह बड़ी चुनौती सिर्फ़ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है.
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, फ़रवरी और मार्च 2026 के बीच ईरान ने अपने पड़ोसी देशों पर चार हज़ार से ज्यादा मिसाइलें और ड्रोन दागे.
हालांकि इनमें से बहुत कम अपने असल लक्ष्य तक पहुंच पाए. लेकिन इन हमलों की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और वित्तीय बाज़ारों में काफ़ी उथल‑पुथल हुई.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भले ही गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने ईरान से दागे गए हथियारों को बड़ी संख्या में रोक लिया, फिर भी ईरान का कुछ अहम ठिकानों पर हमला कर पाना यह दिखाता है कि उनके एयर और मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम की भी कुछ सीमाएं हैं.
भारत का कहना है कि उसने ऐसी कमियों से निपटने के लिए अपनी सीमाओं के अहम इलाक़ों में मल्टी लेयर एयर डिफ़ेस सिस्टम में निवेश किया है.
सैन्य ताक़त बढ़ाना
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के मुताबिक़, 2025 में भारत करीब 92.1 अरब डॉलर के सैन्य खर्च के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश था. वहीं पाकिस्तान का सैन्य खर्च लगभग 11.9 अरब डॉलर रहा.
भारत की सेनाएं इसराइल में बने कई सैन्य सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) के आंकड़ों के मुताबिक़, थल सेना, नौसेना और वायुसेना हेरॉन और सर्चर एमके‑I/II ड्रोन का इस्तेमाल करती हैं.
ये ड्रोन मीडियम हाइट और लंबे समय तक उड़ने वाले हैं. इन्हें मुख्य रूप से निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
सर्चर ड्रोन भारत का पहला ड्रोन था, जिसे साल 1999 में खरीदा गया था. भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक ने याद किया कि उन्होंने मार्च 1998 में इसराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट के पास सर्चर‑1 का डेमोस्ट्रेशन देखा था.
उन्होंने कहा, "यह अपनी तरह का पहला डेमोस्ट्रेशन था."
दावा किया जाता है कि हेरॉन ड्रोन अपने मिशन के मुताबिक़ करीब 35,000 फुट की ऊंचाई पर 45 घंटे तक उड़ान भर सकता है. सर्चर ड्रोन की क्षमता इससे कम है.
अब भारत सिर्फ़ लंबे समय तक उड़ने वाले नहीं, बल्कि ज़्यादा मारक क्षमता वाले ड्रोन भी चाहता है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत ने अमेरिका के साथ 3.5 अरब डॉलर से ज़्यादा का सौदा किया है, जिसके तहत 31 एमक्यू‑9बी हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस हथियारबंद ड्रोन खरीदे जाएंगे. इनमें से 15 ड्रोन नौसेना के लिए और 8‑8 ड्रोन थल सेना और वायुसेना के लिए होंगे.
इन ड्रोन की डिलीवरी 2029 से शुरू होने की उम्मीद है और 2030 तक पूरी हो जाएगी.
नौसेना उड्डयन के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी (रियर एडमिरल, रिटायर्ड) पीजी फिलिपोस ने एमक्यू‑9बी ड्रोन को "बेहद ताक़तवर प्लेटफ़ॉर्म" बताया.
उन्होंने कहा कि नौसेना पहले से ही इसका मैरीटाइम वर्ज़न लीज़ पर इस्तेमाल कर रही है और निगरानी, मानवीय सहायता समेत कई तरह के कामों में इसकी क्षमता इसे एक 'गेम‑चेंजर' बनाती है.
लेकिन हमले करने वाले ड्रोन, जिन्हें लोइटरिंग म्यूनिशन या कामिकाज़े ड्रोन भी कहा जाता है, जो विस्फोटक लेकर लक्ष्य से टकराकर ख़ुद फट जाते हैं, इनके लिए भारत अभी भी काफ़ी हद तक आयात पर निर्भर है.
आईआईएसएस के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत जिन प्रमुख प्रणालियों का इस्तेमाल करता है उनमें इसराइल के हारोप, मिनी‑हार्पी और स्काई स्ट्राइकर (जिसे बेंगलुरु की अल्फ़ा डिज़ाइन टेक्नोलॉजीज़ के साथ मिलकर बनाया गया है) शामिल हैं. इसके साथ ही भारत में विकसित नागास्त्र भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
एक क्षेत्र जहां भारत आत्मनिर्भर बनने पर ज़ोर दे रहा है, वह है स्मॉल टेक्टिकल ड्रोन, जैसे क्वाडकॉप्टर, जो निगरानी और स्वॉर्म ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल होते हैं.
अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि एक ऐसे सिस्टम पर काम चल रहा है जिसमें "ह्यूमन‑इन‑द‑लूप" होगा. इसका मतलब है कि एक ही ऑपरेटर एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन को नियंत्रित कर सकेगा.
सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम और चीन पर निर्भरता
लेकिन एक बड़ी समस्या अब भी बनी हुई है- सप्लाई चेन यानी ज़रूरी सामान की आपूर्ति.
रिटायर्ड मेजर जनरल मंदीप सिंह, अब एक निजी ड्रोन कंपनी के रक्षा विभाग का नेतृत्व कर रहे हैं.
उन्होंने ने बीबीसी को बताया कि ड्रोन के अहम पुर्ज़ों के आयात में चीन का दबदबा है. इनमें फ्लाइट कंट्रोलर, स्पीड कंट्रोलर और कम्युनिकेशन से जुड़ा हार्डवेयर शामिल है.
उन्होंने समझाते हुए कहा, "ड्रोन के चार मुख्य हिस्से होते हैं. पहला, फ्लाइट कंट्रोलर, जो ड्रोन का दिमाग होता है. दूसरा, स्पीड कंट्रोलर, जो फ्लाइट कंट्रोलर से मोटर तक संदेश पहुंचाता है ताकि ड्रोन उड़ान के दौरान सही तरह से काम करे."
"तीसरा, ड्रोन का रिसीवर और ट्रांसमीटर, जिससे ड्रोन और ऑपरेटर के बीच संपर्क बना रहता है. और चौथा, कैमरा. इन चारों अहम हिस्सों में हाल तक हम ज़्यादातर आयात पर निर्भर थे, हालांकि अब कुछ प्रगति हुई है."
लेकिन उन्होंने यह भी कहा, "चीन के सस्ते पुर्जों की जगह अपने देश में इसके बनने के विकल्प तैयार करने में अभी हमें और काम करना बाकी है."
"ऑपरेशन सिंदूर से सबसे बड़ा सबक यह मिला है कि भारत को चीन पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी. साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी सप्लाई चेन मजबूत और भरोसेमंद हो."
भारत की सेनाओं को उपकरण सप्लाई करने वाली कंपनी आईजी डिफ़ेंस के संस्थापक और सीईओ बोधिसत्व संघप्रिय ने कहा, "चीन से जुड़े सिस्टम में डेटा की सुरक्षा, सिस्टम पर कंट्रोल और सप्लाई चेन की विश्वसनीयता जैसी चिंताएं होती हैं."
"भारत को अपनी रक्षा तकनीक खुद बनानी और उस पर पूरा नियंत्रण रखना ज]रूरी है. हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं."
क्या हथियारबंद ड्रोन हासिल करने में पाकिस्तान आगे निकल रहा है?
परंपरागत सेना पर कम ख़र्च करने के बावजूद, पाकिस्तान हथियारबंद ड्रोन हासिल करने में भारत से तेजी से आगे बढ़ता हुआ दिखता है.
सिपरी के आर्म्स ट्रांसफ़र डेटाबेस के मुताबिक़, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान को कुल 35 हथियारबंद ड्रोन मिले.
इनमें तुर्की से तीन अकिनजी ड्रोन, चीन से 23 विंग लूंग‑2 ड्रोन और तुर्की से ही नौ बायराक्तार टीबी‑2 ड्रोन शामिल हैं.
इसके मुकाबले, भारत अभी भी अपने ऑर्डर किए गए एमक्यू‑9बी ड्रोन की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहा है. पाकिस्तान अपने यहां विकसित किए गए कई ड्रोन सिस्टम भी इस्तेमाल कर रहा है.
शाहपर सिरीज़, ख़ासकर शाहपर‑III, पाकिस्तान की सबसे उन्नत स्वदेशी ड्रोन क्षमता मानी जाती है. यह मीडियम हाइट पर लंबे समय तक उड़ान भरने वाला लड़ाकू ड्रोन है, जो क़रीब 30 घंटे तक उड़ सकता है और मिसाइलों से लैस होता है.
बर्राक पाकिस्तान का पहला लड़ाकू ड्रोन था, जिसे 2015 में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ असली अभियानों में इस्तेमाल किया गया था. उकाब ड्रोन का इस्तेमाल टैक्टिकल्स रोल्स के लिए किया जाता है, जैसे निगरानी करना और हथियारों की फ़ायरिंग को सही दिशा देने में मदद करना.
इनमें से ज़्यादातर ड्रोन पाकिस्तान में ही बनाए जाते हैं. हालांकि कुछ पुर्जे, जैसे इंजन, बाहर से मंगाए जाते हैं. इसके अलावा, पाकिस्तान ने तुर्की और चीन से भी उन्नत ड्रोन आयात किए हैं. ये निगरानी, लक्ष्यों पर हमला कर सकते हैं और लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं.
आईआईएसएस के आंकड़ों के मुताबिक़, पाकिस्तान तुर्की में बने यीहा कामिकाज़े ड्रोन और इटली के मीडियम फाल्को ड्रोन भी इस्तेमाल करता है.
आगे क्या होगा?
दोनों देशों की सेनाएं 2025 के संघर्ष को एक सीख के मौके के रूप में देख रही हैं और उसी के मुताबिक़ खुद को ढाल रही हैं.
भारतीय सेना उस दिशा में काम कर रही है, जिसे अधिकारी 'हर सैनिक के हाथ में एक ईगल' देना कह रहे हैं. यानी फ़्रंटलाइन पर तैनात सैनिकों को ड्रोन उड़ाने, उन्हें चलाने और दुश्मन के ड्रोन से बचाव करने की क्षमता.
इसके साथ ही हर बटालियन में ड्रोन युद्ध के एक्सपर्ट्स को शामिल करने की भी योजना है.
वहीं, सुरक्षा विशेषज्ञ सैयद मोहम्मद अली के मुताबिक़, पाकिस्तान ने ड्रोन युद्ध को अपनी सैन्य योजना और प्रशिक्षण का अहम हिस्सा बना लिया है. इसमें ड्रोन बनाना, खरीदना, उनका रखरखाव, इस्तेमाल और ड्रोन‑रोधी उपाय, सब शामिल हैं.
डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख डॉ रेड्डी के मुताबिक़, भारत के लिए अगला कदम होगा, एआई से संचालित स्वॉर्म (ड्रोन) और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़े बचाव उपायों में तकनीक का विकास.
इसके अलावा भारत उत्पादन की क्षमता बढ़ाने, मौजूदा सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ ड्रोन सिस्टम को बेहतर तरीक़े से जोड़ने और इन ख़ास क्षेत्रों में स्किल्ड ह्यूमन रिसोर्स तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है.
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ड्रोन को रणनीतिक ताकत का पूरा खेल बदलने वाला साधन मानकर नहीं देखना चाहिए.
सिपरी के आर्म्स ट्रांसफ़र प्रोग्राम के निदेशक और वरिष्ठ शोधकर्ता मैथ्यू जॉर्ज ने कहा, "ड्रोन इंसानों की क्षमताओं को बढ़ाने का काम करते हैं. जैसे निगरानी के काम में मदद करना. हालांकि, मुझे नहीं लगता कि ये चीज़ें शांति में बाधा बनेंगी, बशर्ते दोनों पक्षों के राजनीतिक नेतृत्व इसके लिए प्रयास करें."
सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) में इंटेलिजेंस, नेशनल सिक्योरिटी और टेक्नोलॉजी प्रोग्राम की निदेशक एमिली हार्डिंग ने सवाल को बेहद साफ़ शब्दों में उठाया.
उन्होंने कहा, "ये दोनों परमाणु हथियारों से लैस देश हैं. मेरे लिए असली सवाल यह है कि क्या ड्रोन दोनों पक्षों के लिए कम नुक़सान पहुंचाने वाला एक विकल्प देते हैं, या फिर वे लड़ाई को और ज़्यादा ख़तरनाक स्तर तक ले जाने की शुरुआत हैं?"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.