होर्मुज़ : सीरिया के इस प्लान में कितना दम, क्या भारत का मुक़ाबला कर पाएगा

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मध्य पूर्व जहां ईरान जंग के असर और होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने से जूझ रहा है, वहीं सीरिया ने एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव दिया है.

सीरिया का कहना है कि वह वैश्विक ऊर्जा और व्यापारिक परिवहन के लिए एक केंद्रीय गलियारे के रूप में काम कर सकता है.

17 अप्रैल को तुर्की में आयोजित अंटाल्या डिप्लोमेसी फ़ोरम में और इसके कुछ दिन बाद साइप्रस में यूरोपीय संघ के नेताओं की एक बैठक में, सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने इसका प्रस्ताव दिया.

उन्होंने कहा, उनका देश अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर ऊर्जा और माल ढुलाई के लिए एक वैकल्पिक मार्ग बनना चाहता है, जो खाड़ी देशों को तुर्की से जोड़ेगा और भूमध्य सागर तक सुरक्षित पहुंच प्रदान करेगा.

सीरिया के इस प्लान को कई और योजनाओं से टक्कर मिल सकती है. इनमें भारत का भारत-मध्य पूर्वी यूरोप आर्थिक गलियारा प्रोजेक्ट (आईएमईसी) भी शामिल है.

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इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए, सीरियाई सरकार दो बड़ी पहलों (इनीशिएटिव) को बढ़ावा दे रही है- फ़ोर सीज़ (चार समुद्र) परियोजना और 4+1 योजना.

इन दोनों पहलों को लेकर आशावाद तो है लेकिन इनके सामने बड़ी चुनौतियां भी हैं.

फ़ोर सीज़ पहल क्या है?

'फ़ोर सीज़' परियोजना- जिसे 'नाइन कॉरिडोर इनिशिएटिव' के नाम से भी जाना जाता है- एक ऐसे एकीकृत परिवहन और ऊर्जा नेटवर्क की परिकल्पना है, जो खाड़ी, भूमध्य सागर, कैस्पियन सागर और काला सागर को आपस में जोड़े.

इसका व्यापक उद्देश्य सीरिया और तुर्की को क्षेत्रीय व्यापार और ऊर्जा परिवहन के लिए मुख्य केंद्र के रूप में स्थापित करना है.

शरा ने 24 अप्रैल को साइप्रस में हुई बैठक में इस योजना की वकालत की, जबकि सीरियाई विदेश मंत्री असाद अल-शिबानी ने तुर्की की यात्रा के दौरान इसे द्विपक्षीय रणनीतिक सहयोग के एक नए चरण की शुरुआत बताया.

पूरे अरब जगत में पहुंच वाले सऊदी समाचार माध्यम अल‑मजल्ला द्वारा हासिल एक दस्तावेज़ में सीरिया को वैश्विक ऊर्जा परिवहन का प्रमुख ट्रांज़िट केंद्र बनाने के अमेरिकी प्रस्ताव का ख़ाका है. इस ख़ाके का श्रेय सीरिया में अमेरिकी दूत टॉम बराक को दिया गया है.

अल-मजल्ला के अनुसार, यह योजना खाड़ी और इराक़ के तेल क्षेत्रों को भूमध्य सागर के बंदरगाहों से और आगे यूरोप से जोड़ने के लिए मौजूदा और प्रस्तावित पाइपलाइनों के एक विशाल नेटवर्क को पुनर्जीवित और विस्तार करने पर केंद्रित है.

अल-मजल्ला ने कहा कि किरकुक-बनियास तेल पाइपलाइन को पुनर्जीवित करने में 36 महीनों में लगभग 4.5 अरब डॉलर की लागत आएगी, और इससे सीरिया को ट्रांज़िट शुल्क के रूप में हर साल लगभग 200 मिलियन डॉलर कमाने की उम्मीद है.

अल-मजल्ला ने यह भी कहा कि अरब गैस पाइपलाइन को मिस्र से होते हुए सीरिया के रास्ते तुर्की तक बढ़ाने की योजना है.

इसके अलावा प्रस्तावित क़तर-तुर्की गैस रूट की भी योजना है, जिससे क़तर की गैस जॉर्डन और सीरिया से होकर तुर्की और आगे यूरोप तक भेजी जाएगी.

4+1 इनिशिएटिव क्या है?

क्षेत्रीय ऊर्जा ट्रांज़िट केंद्र के रूप में खुद को फिर से स्थापित करने के सीरिया के प्रयास के तहत, सरकार ने मार्च 2026 में 4+1 पहल का प्रस्ताव रखा.

इस योजना का उद्देश्य ऐसे एकीकृत और सुरक्षित स्थलीय एनर्जी कॉरिडोर बनाना है, जो पारंपरिक समुद्री मार्गों पर निर्भरता को कम करे.

सीरिया के आर्थिक मामलों के मंत्रालय में सलाहकार ओसामा अल क़ादी ने पूरे अरब जगत में पहुंच वाली वेबसाइट 'अल अरबी अल जदीद' से कहा कि जहां फ़ोर सीज़ परियोजना क्षेत्रीय जलमार्गों को जोड़ेगी, वहीं 4+1 पहल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ेगी.

यह सीरिया को समुद्री, ज़मीनी और रेल मार्गों वाले एक बहु आयामी नेटवर्क के केंद्र में रखेगी.

उन्होंने इन दोनों परियोजनाओं को एक दूसरे का पूरक बताया, जो क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के साझा लक्ष्यों को मजबूत करती हैं.

यह पहल अलग अलग माध्यमों के ज़रिए एक एकीकृत प्रणाली पेश करेगी.

अल क़ादी समेत कई अनुमानों में, 4+1 परियोजनाओं की संयुक्त लागत को 50 अरब डॉलर तक बताया गया है.

मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

इनकी अपील और इन्हें लेकर मौजूद आशावाद के बावजूद, इन परियोजनाओं के सामने जटिल चुनौती भी है.

इनकी व्यावहारिकता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या सीरिया अपनी राजनीतिक और संस्थागत कमज़ोरियों पर काबू पा सकता है, सालों के संघर्ष से तबाह हुए बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण कर सकता है, और बड़े वित्तीय, सुरक्षा और भू राजनीतिक प्रतिबंधों के बीच रास्ता निकाल सकता है?

तुर्की और मध्य पूर्व मामलों के जानकार पत्रकार सार्किस कास्सारजियान ने 'यूरोन्यूज़' से कहा कि ऐसे प्रस्ताव नए नहीं हैं, और सऊदी अरब, इसराइल और तुर्की जैसे देशों के पास जो बुनियादी ढांचा, स्थिरता और भौगोलिक फ़ायदे हैं, वे सीरिया के पास नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि सुरक्षा और शासन से जुड़ी कमियां अब भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं और सीरिया की राजनीतिक व संस्थागत कमज़ोरियां पुनर्निर्माण और विकास के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं.

सीरियाई पेट्रोलियम इंजीनियर घस्सान अल-राई ने भी यूरोन्यूज़ से कहा कि 2011 में गृहयुद्ध शुरू होने से पहले पाइपलाइन नेटवर्क के जो हिस्से काम कर रहे थे, उनकी मरम्मत की जा सकती है या उन्हें विस्तार दिया जा सकता है.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी तरह का पुनर्निर्माण वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा हालात पर निर्भर करेगा.

उन्होंने यह भी बताया कि सालों के संघर्ष की वजह से कुशल वर्करों की कमी हो गई है.

सीरिया की घरेलू सीमाओं से इतर, बड़े पैमाने पर सीमा पार रेल, सड़क और पाइपलाइन नेटवर्क के निर्माण को वित्तीय और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसे बदलते क्षेत्रीय समीकरण और जटिल बना देते हैं.

सीरियाई आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ सलमान अल हकीम ने लेबनानी अख़बार 'अन्नाहर' से कहा कि सबसे बड़ी चुनौती फ़ंडिंग की है, क्योंकि कोई एक देश अकेले इस लागत को सहन नहीं कर सकता.

सीरियाई अर्थशास्त्री ज़ियाद अरबाश ने अनुमान लगाया कि मार्गों के निर्माण और अपग्रेड करने की लागत 10 से 15 अरब डॉलर से अधिक होगी.

इसके लिए उच्च स्तर के क्षेत्रीय समन्वय और पूरे गलियारे में सुरक्षा की ज़रूरत होगी, ख़ासकर सीरिया के संघर्ष प्रभावित इलाकों में.

गैस पाइपलाइन प्रस्ताव पर बोलते हुए, अरबाश ने इसकी ऊंची लागत, मार्ग की लंबाई और अरब तुर्की सहयोग की ज़रूरत का ज़िक्र किया.

उन्होंने यह भी बताया कि इसे रूस, अज़रबैजान और अल्जीरिया की गैस से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी, जो पहले से यूरोप को सप्लाई हो रही है.

भारत के आईएमईसी प्रोजेक्ट से मुक़ाबला

सीरिया के इस विचार को उन पहलों से भी कड़ी टक्कर मिल रही है, जो वैकल्पिक इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाने की योजना पेश कर रही हैं.

इनकी योजना में सीरिया को नज़रअंदाज़ किया गया है.

इनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्वी यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईईसी) है.

सितंबर 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान इसकी चर्चा शुरू हुई थी. इसमें उन्नत परिवहन, डिज़िटल और ऊर्जा बुनियादी ढांचे के ज़रिये भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने की योजना है.

भारत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और प्रमुख यूरोपीय सहयोगियों के समर्थन से, इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के एक विकल्प के रूप में पेश किया गया था.

प्रस्तावित गलियारा भारत से यूएई तक एक समुद्री मार्ग को सऊदी अरब और जॉर्डन से होते हुए इसराइल के हाइफ़ा बंदरगाह तक जाने वाली रेल लाइन से जोड़ता है, जहां से माल आगे यूरोप भेजा जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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