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ममता बनर्जी के इस्तीफ़ा न देने वाले बयान को कैसे देख रही हैं राजनीतिक पार्टियां
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अपने पद से इस्तीफ़ा न देने का उनका बयान चर्चाओं में है. उनके इस बयान पर बीजेपी से लेकर विपक्षी दलों के नेताओं ने अपनी राय ज़ाहिर की है.
विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद मंगलवार को ममता बनर्जी ने पहली बार प्रेस कॉन्फ़्रेंस की थी. इस दौरान उन्होंने बीजेपी के साथ चुनाव आयोग पर पश्चिम बंगाल में चुनाव को जबरन अपने पक्ष में करने का आरोप लगाया.
ममता ने हार स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि बीजेपी ने चुनाव चुरा लिया है.
यहाँ तक कि ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया और सवाल किया कि जब उन्हें अनुचित तरीके़ से हराया गया है, तो वह इस्तीफ़ा क्यों दें.
उन्होंने कहा, "मेरे इस्तीफ़े का सवाल ही नहीं उठता. हमें जनादेश से नहीं बल्कि साज़िश के ज़रिए हराया गया है.''
बीजेपी क्या कह रही है?
ममता बनर्जी के बयान पर पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक में बीजेपी नेता अपनी राय ज़ाहिर कर रहे हैं.
बीजेपी सांसद और पश्चिम बंगाल में पार्टी की महसचिव लॉकेट चटर्जी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा पश्चिम बंगाल ने जनादेश दे दिया है और अब ममता बनर्जी को हक़ीक़त समझ लेनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी अब भूतपूर्व हो चुकी हैं और उन्हें अब जाना चाहिए. संविधान के बारे में उन्हें अधिक पता होना चाहिए. ख़ुद से फ़ैसला कैसे लिया जा सकता है."
पश्चिम बंगाल में बीजेपी के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने कहा कि ममता बनर्जी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि सीएम पद उनकी पैतृक संपत्ति है.
उन्होंने कहा, "जनता ने उन्हें (ममता बनर्जी को) 15 साल का समय दिया और सिर्फ़ भ्रष्टाचार और हिंसा के अलावा उन्होंने कुछ नहीं किया."
केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद धर्मेंद्र प्रधान ने भी ममता बनर्जी के बयान पर एक्स पर पोस्ट किया है.
उन्होंने लिखा है कि "बंगाल में लोकतंत्र को बंदूक़ की नोक पर रखा गया है और चुनावी नतीजों को स्वीकार करने से इनकार इस सच्चाई को साफ़ दिखाता है."
"जनादेश को जनता की आवाज़ की तरह नहीं, बल्कि ऐसे सुझाव की तरह लिया जा रहा है जिसे ठुकराया जा सकता है. ममता बनर्जी का जनादेश की भावना को स्वीकार न करना एक गंभीर सवाल उठाता है कि क्या सत्ता को ज़िम्मेदारी की तरह लिया जा रहा है या सिर्फ़ एक हक़ की तरह?"
"बंगाल के लोग जनादेश के बाद विनम्रता की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन इसके बजाय हम तृणमूल कांग्रेस की ओर से जवाबदेही से बचने की कोशिश देख रहे हैं."
"सत्ता से चिपके रहने की कोशिश में ममता बनर्जी न सिर्फ़ जनता के जनादेश को नकार रही हैं, बल्कि चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों जैसे संस्थानों की विश्वसनीयता को भी कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं, जो स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुरक्षित चुनावों की बुनियाद हैं."
वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने ममता बनर्जी से हार को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने को कहा है.
उन्होंने पत्रकारों से कहा, "ममता बनर्जी चुनाव हारने के साथ-साथ ख़ुद की सीट भी हार गई है. आप देश के लोकतंत्र को कितना कमज़ोर करना चाहती हैं. देश आपको कभी माफ़ी नहीं करेगा."
"संविधान के मुताबिक़ 8 मई को बंगाल की विधानसभा का कार्यकाल ही ख़त्म हो जाएगा. विधानसभा ख़त्म हो गई तो आप भी ख़त्म हो गईं क्योंकि आप तो हार चुकी हैं. जनता ने जवाब दे दिया है और जनता के जवाब का सम्मान करिए."
विपक्षी नेता क्या कह रहे हैं?
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा है कि बीते तीन महीनों से राज्य में आदर्श आचार संहिता है और सरकार मुख्य सचिव चला रहे हैं तो इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं है.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी मुख्य सचिव को सलाह दे रहा था तो वो सरकार चला रहे थे और बीते तीन महीनों से ममता बनर्जी सीएम के तौर पर काम नहीं कर रही थीं.
वहीं आरजेडी सांसद मनोज झा ने ममता बनर्जी के बयान को लेकर कहा है कि उनके बयान को अलग संदर्भ में लिया गया है.
मनोज झा ने कहा, "वो (ममता बनर्जी) ऐसे इलेक्शन से प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने आई थीं जिसमें उनका मुक़ाबला सिर्फ़ बीजेपी से नहीं बल्कि केंद्रीय संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग और सुरक्षाबलों से था. उनका बयान उस संदर्भ में था कि मैं हारी नहीं हूं, हराई गई हूं. उस बयान को उसी संदर्भ में देखना चाहिए."
"वो लोकतांत्रिक हैं, उन्हें पता है कि उन्हें क्या करना चाहिए. लेकिन केंद्रीय बलों और चुनाव आयोग की बाक़ी तमाम चीज़ों को किनारे कर दिया गया है. अब नैरेटिव क्या बनाया जा रहा है कि ममता बनर्जी ने कहा है कि वो इस्तीफ़ा नहीं देंगी."
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कहा है कि ममता बनर्जी का बयान उनका विरोध जताने का एक तरीक़ा है.
उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी ने कहा है कि चुनाव आयोग विलेन है और विलेन ने चुनाव जिताया है. ममता दीदी जो कह रही हैं वो सच है. ममता दीदी चाहे सत्ता में हों या न हों लेकिन वो एक आंदोलनकारी रही हैं. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन किया है."
"अगर ममता दीदी ने कहा है कि मैं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा नहीं दूंगी क्योंकि मैं हारी नहीं हूं. मैं मानता हूं कि ये उनके आंदोलन का एक भाग है और ये आंदोलन होना चाहिए."
सीपीआई नेता डी राजा ने कहा है कि ममता बनर्जी ने बहुत साफ़ कर दिया है कि वह चुनाव नहीं हारी हैं, यह उनका राजनीतिक विश्वास है जिसे वो एक राजनीतिक लड़ाई के रूप में लड़ रही हैं.
"हमें क़ानूनी प्रक्रिया को समझना होगा और यह भी देखना होगा कि सरकार क्या क़दम उठाती है, क्योंकि चुनाव संपन्न हो चुके हैं और नतीजे घोषित किए जा चुके हैं. अब सवाल यह है कि चुनाव को चुनौती कैसे दी जाएगी?"
विश्लेषकों का क्या है कहना?
संविधान का अनुच्छेद 164 राज्य के मंत्रिपरिषद के गठन और इसमें राज्यपाल की शक्तियों से जुड़ा हुआ है. हर चुनाव के बाद राज्यपाल विधानसभा में दलों की संख्या का आकलन करते हैं और बहुमत वाली पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं. इसके बाद शपथ ग्रहण होता है.
अगर कोई मंत्री उस सदन का सदस्य नहीं है तो उसे छह महीने के अंदर सदन की सदस्यता लेनी होती है. अगर छह महीने तक सदन की सदस्यता हासिल नहीं की जाती है तो मंत्री या मुख्यमंत्री अपने पद पर नहीं रहेगा.
संविधान का अनुच्छेद 164 (1) कहता है कि मुख्यमंत्री 'राज्यपाल की इच्छा तक' पद पर बने रह सकते हैं.
राज्यपाल की इच्छा क्या होती है? इस सवाल का जवाब सेंटर फ़ॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ जेएनयू के डॉक्टर सुधीर के. सुतार देते हैं.
वो कहते हैं, "राज्यपाल की 'इच्छा' दरअसल निर्वाचित प्रतिनिधियों (विधायकों) के बहुमत द्वारा किसी एक नेता पर जताए गए भरोसे से तय होती है. हर चुनाव के बाद राज्यपाल विधानसभा में दलों की संख्या का आकलन करते हैं और बहुमत वाली पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं."
"अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा नहीं देते, तो राज्यपाल अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए मंत्रिपरिषद को बर्ख़ास्त कर सकते हैं, जिसका हिस्सा मुख्यमंत्री भी होते हैं."
इसके अलावा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 172 राज्य विधानमंडलों (विधानसभा और विधान परिषद) के कार्यकाल से जुड़ा हुआ है.
इसके मुताबिक़, उस विधानसभा का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख़ से पांच वर्ष का होता है. पांच साल का वक़्त पूरा होते ही यह ख़ुद ब ख़ुद भंग हो जाएगी.
अनुच्छेद 172 कहता है, "हर राज्य की विधानसभा यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है तो, अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख़ से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं. और पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम विधानसभा का विघटन होगा."
लीगल स्कॉलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''ममता बनर्जी ने जो कहा, उससे कोई संवैधानिक संकट खड़ा नहीं होगा. यह ऑपटिक्स के लिए है. यानी वह अपने दावे को मज़बूत करना चाहती हैं कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुआ है.''
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील विकास सिंह कहते हैं कि संविधान के अनुसार, पद पर बने रहने के मामले में मुख्यमंत्री 'डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेज़र' (राज्यपाल की इच्छा के सिद्धांत) के तहत कार्य करते हैं.
वो कहते हैं, "पहले भी ऐसी स्थितियां रही हैं जब मुख्यमंत्री ने सदन में बहुमत खो दिया था, और ऐसे मामलों में राज्यपाल ने किसी अन्य नेता को नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के लिए आमंत्रित किया है, भले ही तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस्तीफ़ा देने से इनकार किया हो."
"इसलिए ऐसी स्थिति में राज्यपाल निश्चित रूप से अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सबसे बड़ी निर्वाचित पार्टी के नेता को नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. मुझे नहीं लगता कि ममता बनर्जी के पास नई सरकार के गठन का विरोध करने का कोई अधिकार होगा."
ममता बनर्जी के बयान पर विकास सिंह कहते हैं कि यह एक राजनीतिक बयान ज़्यादा लगता है, जिसका उद्देश्य सहानुभूति हासिल करना है, न कि यह कोई संवैधानिक कदम है. हालांकि सामान्य परिस्थितियों में, जब मुख्यमंत्री के पास विधानसभा में बहुमत होता है, तब राज्यपाल इस 'डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेज़र' का इस्तेमाल नहीं कर सकते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.