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पश्चिम बंगाल में ममता की हार पर बांग्लादेश की ये टिप्पणी
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद तीस्ता जल बँटवारा समझौते पर तत्काल विचार करने की अपील की है.
मंगलवार को ममता बनर्जी के सत्ता से बाहर होने पर उनकी राय पूछी गई तो रहमान ने कहा, "देखिए, पश्चिम बंगाल में अभी तक नई सरकार का गठन नहीं हुआ है, और वे क्या सोचते हैं या क्या करेंगे, यह वही बता सकते हैं. उनका मन पढ़ना मेरा काम नहीं है. बिल्कुल, तीस्ता पर चर्चा होगी, निश्चित रूप से होगी. उस क्षेत्र के लोगों के लिए यह जीवन और मृत्यु का सवाल है."
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बांग्लादेश से जुड़े कई मुद्दों को उछाला था. इनमें कथित घुसपैठ और बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ कथित नाइंसाफ़ी बीजेपी के लिए अहम मुद्दे थे.
शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद बीजेपी ने बांग्लादेश में हिन्दुओं की सुरक्षा का मुद्दा ज़ोर शोर से उठाया था. बीजेपी ने बांग्लादेश से कथित घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा था.
गृह मंत्री अमित शाह भी घुसपैठ का मुद्दा कई बार उठा चुके हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जो घोषणापत्र जारी किया था, उसमें बिना दस्तावेज़ वाले प्रवासियों से निपटने के लिए 'डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट' की नीति अपनाने की बात कही है. इसके अलावा सीमा पर कड़ी निगरानी और अवैध घुसपैठ को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करने की बात कही गई है.
अमित शाह ने यह भी कहा था कि सीमा पार से अवैध प्रवासियों के कारण पश्चिम बंगाल की डेमोग्राफ़ी बदल रही है. बीजेपी ने घुसपैठ को अपने चुनावी एजेंडे का केंद्रीय मुद्दा बना दिया था.
भारत और बांग्लादेश के बीच जितना लैंड बॉर्डर है, उसमें से आधा से ज़्यादा पश्चिम बंगाल से लगता है. ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच पश्चिम बंगाल अहम संपर्क क्षेत्र बन जाता है.
भारत और बांग्लादेश के बीच 4,367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और यह उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 फ़ीसदी है.
भारत की विदेश नीति कोलकाता से तय नहीं होती है लेकिन बांग्लादेश के मामले में इसकी भी भूमिका होती है. क़ानून-व्यवस्था, राजनीतिक बयानबाज़ी, सीमा प्रबंधन और यहाँ तक कि जल समझौते भी पश्चिम बंगाल के राजनीतिक माहौल से प्रभावित होते हैं. यही वजह है कि इस बार के पश्चिम बंगाल चुनाव में बांग्लादेश एक अहम मुद्दा रहा.
इसी साल फ़रवरी में बांग्लादेश में चुनाव हुआ था और 20 साल बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सत्ता में वापसी हुई थी. बीएनपी के अलावा इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी का भी उभार हुआ. जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश के गठन का विरोध किया था और उसके उभार को भारत के हक़ में नहीं देखा गया.
तीस्ता जल बँटवारा संधि का क्या होगा?
ऐसे में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत का असर बांग्लादेश के साथ संबंधों पर कैसा पड़ेगा? इस सवाल पर बांग्लादेश के मीडिया में काफ़ी बात हो रही है.
बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द बिज़नेस स्टैंडर्ड से ढाका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध की प्रोफ़ेसर अमीना मोहसीन ने कहा, ''हमें जिस बुनियादी सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए, वह यह है कि बांग्लादेश कोलकाता से नहीं बल्कि दिल्ली से बातचीत करता है.''
अमीना मोहसीन ने कहा, ''अब बीजेपी केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता में है और फ़िलहाल वह बांग्लादेश के साथ एक स्थिर और रचनात्मक संबंध चाहती है. मेरा मानना है कि नई सरकार बनाते समय वह इस रणनीतिक हित को ध्यान में रखेगी. कई सालों से भारत सरकार यह दावा करती रही है कि तीस्ता जल-बँटवारा संधि केवल ममता बनर्जी के विरोध के कारण अटकी हुई थी. अब जब यह राजनीतिक बाधा औपचारिक रूप से हट चुकी है, बांग्लादेश के लिए यह एक बड़ा मुद्दा होगा कि क्या वे वास्तव में इस समझौते को आगे बढ़ाते हैं या नहीं.''
अमीना मोहसीन ने कहा, ''भारत को हमारे घरेलू मामलों के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखानी होगी. यह देखते हुए कि बांग्लादेश एक मुस्लिम-बहुल देश है. बीजेपी के नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी भड़काऊ बयान न दिया जाए जो हमारे लोगों की भावनाओं को आहत करता हो. उन्हें समझना होगा कि उकसाने वाली बयानबाज़ी द्विपक्षीय स्थिरता पर वास्तविक असर डालती है.''
अमीना मोहसीन ने कहा, ''मेरा मानना है कि भारत ने पिछले अनुभवों से एक महत्वपूर्ण सबक सीखा है. बांग्लादेश की जनता ही तय करेगी कि यहाँ सत्ता में कौन रहेगा और कौन नहीं. मुझे नहीं लगता कि वे अतीत की वही ग़लतियां दोहराएंगे, जहां बांग्लादेशी जनता की भूमिका को नज़रअंदाज किया गया था.''
भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे जटिल मुद्दा जल-बँटवारे का है. तीस्ता नदी को लेकर विवाद अब भी अनसुलझा है. इसका बड़ा कारण टीएमसी का विरोध रहा है. साल 2011 में ममता बनर्जी ने भारत की पिछली सरकार के दौरान हुए तीस्ता जल-बँटवारा समझौते के प्रस्ताव को रोक दिया था. गंगा नदी जल-बँटवारा संधि की अवधि भी दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है.
ममता बनर्जी का रुख़ था कि बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल बँटवारा संधि पश्चिम बंगाल की सरकार को शामिल किए बिना नहीं होनी चाहिए. 2011 में जब तीस्ता नदी के जल-बँटवारे का प्रस्ताव तैयार किया गया था, तब कहा गया था कि दिसंबर से मार्च के बीच भारत को 42.5% और बांग्लादेश को 37.5% पानी मिलेगा.
बीजेपी पर भी होगा दबाव
ब्रह्मपुत्र नदी की एक सहायक तीस्ता नदी का उद्गम उत्तर सिक्किम में लगभग 5,280 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सो लहामो लेक से होता है.
यह नदी सिक्किम में लगभग 150 किमी और पश्चिम बंगाल में 123 किलोमीटर बहने के बाद कूचबिहार ज़िले के मेखलीगंज से बांग्लादेश में प्रवेश करती है. इसके बाद यह वहाँ क़रीब 140 किमी बहती है और आख़िर में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है.
तीस्ता नदी बांग्लादेश की चौथी सबसे बड़ी अंतर-सीमाई नदी है और इसका बाढ़ क्षेत्र वहाँ 2,750 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. लेकिन नदी के जलग्रहण क्षेत्र का 83% हिस्सा भारत में और बाकी 17% बांग्लादेश में स्थित है.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में म्यांमार और बांग्लादेश मामलों के सीनियर कंसलटेंट थॉमस कीन ने इसी साल अप्रैल में द डिप्लोमैट से कहा था, ''दोनों पक्ष गतिरोध तोड़ पाएंगे, इसकी संभावना कम है लेकिन यह असंभव नहीं है. अगर बीजेपी पश्चिम बंगाल जीतती है, तो तीस्ता पर समझौते तक पहुँचने में एक बाधा दूर हो जाएगी. ममता बनर्जी ने 2011 में तैयार मसौदा समझौते पर हस्ताक्षर से रोक दिया था और सूखे के मौसम में पश्चिम बंगाल में पानी की कमी का हवाला देते हुए जल-बँटवारे के समझौते का लगातार विरोध किया है."
उन्होंने कहा था, "इसलिए बीजेपी की जीत से प्रगति की संभावना बढ़ती है, लेकिन मैं फिर भी काफ़ी सावधान रहूंगा. हमें नहीं पता कि भारत वास्तव में 2011 में इस समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहता था या नहीं. पश्चिम बंगाल में जल-बँटवारे के ख़िलाफ़ जो वास्तविक स्थानीय दबाव हैं, वो ख़त्म नहीं होने वाले हैं."
दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. धनंजय त्रिपाठी कहते हैं, ''बीजेपी के आने भर से बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल समझौता हो जाएगा, मुझे ऐसा नहीं लगता है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार पर भी स्थानीय दबाव रहेगा कि वह ऐसा कोई समझौता न करे, जिससे बांग्लादेश को ज़्यादा फ़ायदा हो और यहाँ के लोगों को नुक़सान उठाना पड़े. बीजेपी लोकल सेंटीमेंट की उपेक्षा नहीं कर सकती है. यह बहुत जटिल सवाल है कि क्या 2011 में तीस्ता जल बँटवारे को लेकर जो समझौता होना था, उससे बीजेपी सहमत है?''
अब राज्य और केंद्र में बांग्लादेश पर टकराव नहीं
डॉ त्रिपाठी कहते हैं, ''भारत सरकार ने बांग्लादेश में दिनेश त्रिवेदी को उच्चायुक्त नियुक्त किया है. यह एक राजनीतिक नियुक्ति है. यह नियुक्ति बताती है कि बीजेपी बांग्लादेश से संबंधों को लेकर गंभीर है. भारत सरकार अब बहुत जोखिम नहीं ले सकती है. जहाँ तक घुसपैठ की बात है तो भारत सरकार को पहले साबित करना होगा कि घुसपैठ हो रही है. देखिए फैक्ट और फिक्शन में फ़र्क़ होता है. गृह मंत्री यह भी कहते रहे हैं कि सीमा पर बाउंड्री इसलिए नहीं बन पा रही है कि राज्य सरकार ज़मीन नहीं दे रही है. अब तो केंद्र को अपनी ही सरकार से ज़मीन लेनी होगी.''
बांग्लादेश के पूर्व डिप्लोमैट हुमायूं कबीर ने द बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ''अब केंद्र और पश्चिम बंगाल में एक ही पार्टी की सरकार है, इसलिए राज्य सरकार को केंद्र के निर्देशों और रणनीतिक फ़ैसलों का पालन करना होगा. अगर भारत हमारे साथ सामान्य और स्थिर संबंधों को प्राथमिकता देता है, तो इस चुनाव के स्थानीय प्रभाव उतने चिंताजनक नहीं हो सकते, जितनी आशंका जताई जा रही है.''
निरुपमा सुब्रमण्यम दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखती हैं और वह भी मानती हैं कि बीजेपी सरकार ने दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में उच्चायुक्त नियुक्त कर एक संदेश दिया है कि वह ढाका से संबंधों को मज़बूत करना चाहती है.
निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ''बांग्लादेश में ऐसा पहली बार हुआ है कि उच्चायुक्त किसी डिप्लोमैट को नहीं बल्कि नेता को बनाया गया है. दिनेश त्रिवेदी मूलतः गुजरात के हैं लेकिन वह बांग्ला भी बोलते हैं. राजनीतिक नियुक्ति डिप्लोमैट की तुलना में ज़्यादा सशक्त होती है. ज़ाहिर है कि फ़ैसला विदेश मंत्रालय ही लेता है लेकिन एक डिप्लोमैट की तुलना में राजनीतिक नियुक्ति ज़्यादा निर्णायक होती है. शेख़ हसीना के जाने के बाद भारत ने बांग्लादेश के साथ संबंधों को जिस तरह से हैंडल किया था, उससे रिश्ते और ख़राब हुए थे. मेरा मानना है कि भारत ने अब सबक लिया होगा. अब तो बीजेपी के कंधों पर ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी होगी. लेकिन कई बार आप ध्रुवीकरण की राजनीति में इस कदर आगे बढ़ जाते हैं कि फिर पीछे लौटना मुश्किल हो जाता है.''
निरुपमा सुब्रमण्यम, ''बांग्लादेश में यह सवाल अक्सर उठता था कि शेख़ हसीना भारत को लेकर बेहद उदार रहती हैं लेकिन बदले में बांग्लादेश को मिलता क्या है. हसीना के लिए भी इसका जवाब देना आसान नहीं होता था. मुझे लगता है कि गुडविल को ध्यान में रखते ही भारत को तीस्ता जल समझौता कर लेना चाहिए. ये बात सही है कि ममता ने मनमोहन सिंह को हस्ताक्षर करने से रोक दिया था लेकिन अब ममता इस सरकार के लिए बाधा नहीं हैं.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.