You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
केरल में क्यों हुई लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट की हार?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, बेंगलुरु से
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
केरल विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी), यानी सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट की हार ने कई लोगों को शायद चौंकाया हो. लेकिन हैरानी की बात यह है कि पार्टी कार्यकर्ता और उसके समर्थक इस नतीजे से ज़्यादा विचलित नहीं दिख रहे हैं.
केरल भारत का इकलौता राज्य था, जहां कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में थीं.
अपना नाम न बताने की शर्त पर कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात की. उनका कहना था कि पार्टी के कई समर्थक और सहानुभूति रखने वाले लोग इसके ख़िलाफ़ हो गए, क्योंकि "हम पार्टी और उसकी सरकार के काम करने के तरीक़े से ख़ुश नहीं थे."
एक पार्टी नेता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "यह हमारी सरकार की कल्याण या विकास योजनाओं की आलोचना नहीं थी, बल्कि अब हमें समझ आ रहा है कि लोगों को हमारे काम करने का तरीक़ा ठीक नहीं लगा."
लेकिन वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार और विश्लेषक इस मुद्दे पर अधिक खुलकर बोल रहे हैं.
राजनीतिक टिप्पणीकार और पूर्व शिक्षाविद जे. प्रभाष ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "यह सरकार के विरुद्ध एंटी-इनकंबेंसी नहीं थी, बल्कि खुद मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का विरोध था. सारी सत्ता उन्हीं के हाथ में केंद्रित थी. वही सरकार थे, वही पार्टी और वही एलडीएफ़ थे."
वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार एमजी राधाकृष्णन ने कुछ महीने पहले केरल साहित्य अकादमी के प्रमुख के. सच्चिदानंद की टिप्पणी का हवाला दिया.
वामपंथी फ़्रंट के समर्थक रहे सच्चिदानंद ने कुछ समय पहले यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि वह एलडीएफ़ को वोट नहीं देंगे.
सीपीएम कैसे 26 सीटों पर सिमट गई?
सच्चिदानंद का कहना था कि तीसरी बार एलडीएफ़ को वोट न देना बेहतर होगा, क्योंकि इससे केरल में वामपंथी मोर्चा ख़त्म हो जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सीपीएम के साथ हुआ था.
राधाकृष्णन कहते हैं, "सरकार के अच्छे कामों का श्रेय विजयन को मिलना चाहिए. लेकिन ज़्यादातर नकारात्मक चीज़ों की ज़िम्मेदारी भी उन्हें लेनी चाहिए. विपक्ष, मीडिया और आम लोगों के प्रति गैर-लोकतांत्रिक रवैया, आलोचकों के साथ उनका अहंकारी व्यवहार, और पार्टी के भीतर लोकतंत्र की पूरी कमी, यही मुख्य मुद्दे थे."
सीपीएम के सचिव एमवी गोविंदन ने पत्रकारों से कहा कि पार्टी को हार से बड़ा झटका लगा है. लेकिन उन्होंने कहा, "एलडीएफ़ हार का मूल्यांकन और अध्ययन करेगा, जिसके बाद ज़रूरी सुधार किए जाएंगे. हमें इसके लिए जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद है."
सीपीएम को 2021 के विधानसभा चुनाव में जीती गई 99 सीटों के मुक़ाबले इस बार केवल 25 प्रतिशत, यानी 26 सीटों पर सिमटना पड़ा है. 21 में से 13 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. पहली बार पार्टी के आठ महत्वपूर्ण नेताओं ने इस्तीफ़ा देकर अपने पूर्व साथियों के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा. इनमें से कम से कम तीन ने चुनाव जीता.
इनमें सबसे प्रमुख नाम पूर्व मंत्री जी. सुधाकरन का है, जिन्होंने कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और 25,000 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. इनके अलावा वी. कुन्हीकृष्णन और टीके गोविंदन ने कांग्रेस टिकट पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की. कुछ लोग बीजेपी में भी गए, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके.
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट को 102 सीटें मिलना अभूतपूर्व है. राजनीतिक टिप्पणीकार एन.पी. चेक्कुट्टी ने कहा, "यह इसलिए हुआ, क्योंकि सीपीएम के भीतर आंतरिक लोकतंत्र नहीं था. सामान्य तौर पर सीपीएम आंतरिक बहस की अनुमति देती है. लेकिन पिनाराई विजयन आंतरिक बहस को बढ़ावा नहीं दे रहे थे. पिछले पांच वर्षों में पार्टी पर सरकार का नियंत्रण दिखा, जबकि आमतौर पर सरकार पार्टी के मार्गदर्शन में काम करती है."
विजयन के ख़िलाफ़ क्या बात गई?
मतगणना के दौरान ख़ुद विजयन को भी कुछ मौकों पर तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा. आख़िरकार उन्होंने 19,247 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जो 2021 में मिले 50,000 से अधिक वोटों के अंतर से काफ़ी कम है.
चेक्कुट्टी ने कहा, "जब कोई राजनीतिक संगठन ख़ुद को सुधारने की क्षमता खो देता है, तो मतदाता चुनाव के ज़रिए प्रतिक्रिया देते हैं. आज केरल में जो दिख रहा है, वह वामपंथी विचारधारा का पूरी तरह ख़ारिज होना नहीं है, बल्कि केंद्रीकृत नेतृत्व, खासकर पिनाराई विजयन के विरुद्ध वोट है. यह एंटी-लेफ़्ट बदलाव से ज़्यादा एंटी-लीडरशिप भावना है."
हालांकि राधाकृष्णन इस मुद्दे को अलग नज़रिए से देखते हैं. उन्होंने कहा, "आज के समय में, जब टेलीविज़न और सोशल मीडिया एजेंडा तय कर रहे हैं, तो विकास और बुनियादी ढांचे के कामों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. लोग इसे सरकार की ज़िम्मेदारी मानते हैं. ज़्यादा अहम यह है कि आप कैमरे पर कैसे व्यवहार करते हैं और दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं."
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि 10 साल लंबा समय होता है. इन 10 सालों में लोगों ने इस ख़ास शैली को देखकर उन्हें नापसंद करना शुरू कर दिया. इन सभी कारणों ने मिलकर एक तरह की लहर पैदा की."
छिटकते अल्पसंख्यक भी थे वजह
प्रोफ़ेसर प्रभाष ने एक और कारण बताया, जिसने कांग्रेस को अल्पसंख्यक समुदायों में अपनी पकड़ मज़बूत करने में मदद की.
उनका कहना है कि राज्य की आबादी में मुसलमान और ईसाई लगभग 46 प्रतिशत हैं और 2021 के चुनाव में इन समुदायों के एक हिस्से ने सीपीएम का समर्थन किया था, क्योंकि उन्हें लगा था कि वह उनके हितों की बेहतर रक्षा करेगी.
उनका तर्क है, "इझावा समुदाय के संगठन एसएनडीपी के प्रमुख वेल्लापल्ली नाटेसन हैं. उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ बार-बार सख़्त बयान दिए. इन बयानों का मक़सद सीपीएम के लिए हिंदू वोटों को मज़बूत करना था. सीपीएम नरम हिंदुत्व की राजनीति कर रही थी. इससे एलडीएफ़ के प्रति मुस्लिम समर्थन कम हुआ. वहीं, बीजेपी शासित राज्यों में ईसाई मिशनरियों पर हमलों ने ईसाई वोटों को कांग्रेस की ओर धकेला. नतीजा यह हुआ कि दोनों अल्पसंख्यक समुदाय एकजुट होकर कांग्रेस के साथ खड़े रहे."
प्रोफ़ेसर प्रभाष ने कहा, "गौर करने वाली बात यह है कि सीपीएम में किसी ने भी नाटेसन के बयानों का विरोध नहीं किया. इसकी वजह यह थी कि हर कार्यकर्ता जानता था कि वेल्लापल्ली नाटेसन, पिनाराई विजयन के क़रीबी हैं."
तस्वीर का दूसरा पहलू भी साफ़ था. विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने जाति संगठनों की मांगों को ख़ारिज किया और साफ़ किया कि वह सीधे जनता से बात करेंगे. सतीशन और वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश चेन्नितला के बीच तालमेल से पार्टी ने ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया.
संक्षेप में, राज्य ने एक धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के पक्ष में मतदान किया.
प्रोफेसर प्रभाष ने कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए एकजुट प्रयास किया, क्योंकि "यह पार्टी के लिए जीवन-मरण का सवाल था, क्योंकि लगातार तीसरी बार विपक्ष में बैठने पर पार्टी शायद ख़ुद को टूटने से नहीं बचा पाती."
सीपीएम नेताओं से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फ़िलहाल किसी से बात नहीं हो पाई है. जैसे ही वे हमारे सवालों के जवाब देते हैं, तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित