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राहुल गांधी के 'आर्थिक सुनामी' और मोदी सरकार के भविष्य वाले बयान पर मचा सियासी घमासान
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बयानों के बाद सियासी घमासान मचा हुआ है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) लगातार उन पर हमलावर है.
राहुल गांधी ने बुधवार को केंद्र की मोदी सरकार को लेकर कुछ ऐसे दावे किए, जिसकी वजह से बीजेपी के नेता उन्हें निशाना बना रहे हैं.
राहुल गांधी ने दावा किया कि देश में एक तरफ़ 'भयंकर आर्थिक सुनामी' आ रही है, वहीं दूसरी तरफ़ 'संस्थागत विद्रोह' हो रहा है. उनका कहना है कि मोदी सरकार ने जो 'कंट्रोल्ड सिस्टम' बनाया था, वह अब 'ढह रहा है'.
कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि अगले 'एक साल के भीतर' मोदी सरकार गिर जाएगी और नरेंद्र मोदी 'प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे'.
राहुल गांधी के इस दावे पर कई बीजेपी नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.
बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल गांधी को 'अराजक' बताते हुए उन पर आरोप लगाया कि वह देश में 'लोकतांत्रिक संकट लाना चाहते' हैं.
वहीं, महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष चन्द्रशेखर बावनकुले ने कहा कि जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, राहुल गांधी को देश की चिंता नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी पार्टी की चिंता करनी चाहिए.
बीजेपी नेताओं के तीख़े हमलों के बीच कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी के बयान का बचाव किया.
कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने सही आंकलन किया है कि 'आर्थिक सुनामी आएगी.' प्रमोद तिवारी का कहना है कि राहुल गांधी ने आर्थिक मोर्चे को लेकर जो कुछ कहा है वह स्थिति देश में दिखाई दे रही है.
राहुल गांधी ने आख़िर कहा क्या?
कांग्रेस ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर बुधवार को एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें राहुल गांधी मोदी सरकार को लेकर कई तरह के दावे करते सुने जा रहे हैं.
राहुल गांधी ने कहा कि एक तरफ़ देश में 'भयंकर आर्थिक सुनामी' आ रही है, वहीं दूसरी तरफ़ देश में 'संस्थागत विद्रोह' हो रहा है. उन्होंने इसके पीछे पीएम मोदी और भारतीय जनता पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराया.
राहुल गांधी ने कहा, "एक तरफ़ से भयंकर आर्थिक सुनामी आ रही है. क़ीमतें बढ़ रही हैं. ऐसा आर्थिक संकट आएगा हिन्दुस्तान में, जो आपने कभी नहीं देखा होगा. इसको अब कोई नहीं रोक सकता. दूसरी तरफ़, हिन्दुस्तान के सिस्टम के अंदर इंस्टिट्यूशनल रिवोल्ट (संस्थागत विद्रोह) हो रहा है."
उन्होंने दावा किया, "आप सोचते हैं कि चुनाव आयोग पूरी तरह से कंट्रोल्ड है. लेकिन वो तीन साल पहले पूरी तरह कंट्रोल में था. मुख्य चुनाव आयुक्त के मैसेज मेरे पास आ रहे हैं. इंटेलिजेंस सिस्टम के हेड, सीनियर ज्यूडिशियरी, सारे के सारे विद्रोह कर रहे हैं. जानकारी दे रहे हैं हमें."
"तो जो कंट्रोल का सिस्टम था वो अंदर से ढह रहा है. क्योंकि इन लोगों को दिख रहा है कि जनता का प्रेशर ऐसा भयंकर आएगा और अगर हम इस रास्ते पर चलते गए तो, हमारे लिए ख़तरा हो जाएगा."
राहुल गांधी ने दावा किया कि उन्हें अंदर की सारी जानकारियां मिल रही हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे पास जानकारियां आ रही हैं. सिस्टम मुझे जानकारी दे रहा है. मोदी जी के बारे में, शाह जी के बारे में, उनके बेटों के बारे में, मंत्रियों के बारे में, अजित डोभाल के बारे में, पूरी जानकारियां आ रही हैं."
इसके बाद राहुल गांधी ने दावा किया कि सरकार जनता के प्रेशर से निपटने के लिए 'इमरजेंसी' लगा सकती है.
उन्होंने कहा, "हो सकता है कि जनता के प्रेशर को ये दबाने की कोशिश करें और इमरजेंसी जैसी चीज़ कर दें. ये हो सकता है. लेकिन अब हम दूसरे स्टेज़ में जा रहे हैं. पहले हम पूरी तरह से कंट्रोल्ड स्टेज़ में थे, अब ये कंट्रोल से बाहर जा रहा है."
उन्होंने कहा, "मोदी जी जानते हैं कि जिस सिस्टम को उन्होंने कंट्रोल किया था, वो अब ढह रहा है और पूरी इन्फ़ॉर्मेशन दे रहा है. आप देखना, ये मेरा आंकलन है कि एक साल के अंदर मोदी प्रधानमंत्री नहीं होंगे."
बीजेपी का पलटवार
बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें 'अराजक' बताया और कहा कि वह देश में 'लोकतांत्रिक संकट पैदा करना चाहते' हैं.
प्रदीप भंडारी ने कहा, "राहुल गांधी एक अराजक व्यक्ति हैं. जॉर्ज सोरोस और राहुल गांधी मिलकर देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं. राहुल गांधी देश में लोकतांत्रिक संकट पैदा करना चाहते हैं."
उन्होंने कहा, "मैंने राजनीति में कभी भी ऐसा व्यक्ति नहीं देखा, जो भारत से इतनी नफ़रत करता है, जितनी राहुल गांधी करते हैं. राहुल गांधी ये जान चुके हैं कि लोकतांत्रिक रूप से वो देश की जनता का भरोसा नहीं जीत सकते, तो अब वो लोकतंत्र, भारत की स्थिरता और सुरक्षा से ही विरोध करने लग गए हैं."
वहीं, महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष चन्द्रशेखर बावनकुले ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा और उन्हें देश की बजाय अपनी 'पार्टी की चिंता' करने की हिदायत दी.
बावनकुले ने कहा, "राहुल गांधी दिन में भी बुरे सपने देखते हैं. सपना देखना चाहिए, लेकिन सपने में जान होनी चाहिए. राहुल गांधी अमीरी में बड़े हुए, उन्हें ग़रीबी समझ नहीं आती है. ग़रीबी समझ आती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को."
उन्होंने कहा, "मोदी जी ने ग़रीब कल्याण की योजना लाकर ग़रीबी की चिंता की है और देश को कैसा बनाना है ये मोदी जी जानते हैं. जब तक मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं, राहुल गांधी को देश की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. वो अपने परिवार और पार्टी की चिंता करें. "
देश की आर्थिक नीति को लेकर मोदी सरकार के समर्थक भी बन रहे आलोचक
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर कई अर्थशास्त्री ख़ुलकर मोदी सरकार की आलोचना करते रहे हैं. लेकिन इन आलोचकों की सूची में बीते कुछ सालों से उन अर्थशास्त्रियों के नाम भी शामिल हो गए हैं, जो कभी मोदी सरकार की नीतियों के समर्थक थे.
सितंबर 2017 से दिसंबर 2018 तक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे सुरजीत भल्ला की पहचान मोदी समर्थक अर्थशास्त्री की थी. लेकिन अब उनका रुख़ बदल रहा है और वह खुलकर मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं.
सुरजीत भल्ला ने 21 मई को प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखा था, जिसका शीर्षक था- बीजेपी चुनाव जीत रही है लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है. इस लेख में भल्ला ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की तीखी आलोचना की है.
भल्ला ने लिखा है, ''इस समय अर्थव्यवस्था को संभालने के मामले में बीजेपी का प्रदर्शन निचले स्तर पर पहुँचता दिख रहा है और इसकी कोई गारंटी नहीं कि स्थिति और ख़राब नहीं होगी."
मोदी सरकार में 2014 से 2018 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी 26 मई को इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखकर सरकार की नीतियों की आलोचना की.
अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है, ''आज जब रुपया लगातार गिर रहा है और भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है.... आख़िर ज़िम्मेदारी किसके हाथ में है?''
उन्होंने लिखा, ''आज का रुपया संकट केवल ईरान युद्ध और ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत पर पड़े उसके प्रभाव का परिणाम नहीं है. यह उतना ही या उससे भी ज़्यादा भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाओं को लेकर बढ़ते संदेह को दर्शाता है. युद्ध शुरू होने से पहले ही रुपया उभरते बाज़ारों वाले देशों की मुद्रा की तुलना में कमज़ोर हो चुका था.''
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू भी शुरुआत में नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते थे लेकिन उनके भी स्वर बदल गए हैं.
बारू ने 24 मई को न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा कि आज फिर से भारत उसी स्थिति में हैं, जहाँ निवेशकों को भरोसा नहीं है.
उन्होंने लिखा, ''1991 और 2004 में कारोबारी जगत और मीडिया ने खुलकर अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं और राजनीतिक नेतृत्व पर ऐसा माहौल बनाने का दबाव डाला था, जिससे निवेशकों का भरोसा लौट सके. लेकिन आज का मीडिया काफ़ी हद तक भयभीत और संकोची हो चुका है, जबकि कारोबारी समुदाय ज़्यादा जोखिम से बचने वाला और डरा हुआ दिखाई देता है.''
बारू ने लिखा है, ''अब हर अच्छी ख़बर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और हर बुरी ख़बर को दबा दिया जाता है. जब भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर बताया जा रहा था, तब ख़ूब उत्सव मनाया गया. लेकिन आज जब भारत छठे स्थान पर पहुंच गया है, तो बहुत कम लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ.''
भारत की आर्थिक स्थिति
ईरान युद्ध की वजह से दुनियाभर में ऊर्जा संकट देखने को मिला है. इसकी वजह से कच्चे तेल और ईंधन की क़ीमतें बढ़ी हैं.
भारत में मई महीने में सरकार ने दो हफ़्तों के भीतर चार बार पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ाई थीं. 25 मई को क़ीमतों में आख़िरी बढ़ोतरी हुई.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, 25 मई को क़ीमतों में बढ़ोतरी के बाद देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की क़ीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर, जबकि डीज़ल की क़ीमत 95.20 रुपये प्रति लीटर थी.
इसके अलावा सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर और सीएनजी के दामों में भी बढ़ोतरी की है.
देश में एक चिंता डॉलर के मुक़ाबले रुपये के गिरते स्तर को लेकर भी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले रुपया 7 पैसे गिरा. इसके बाद एक डॉलर 95.83 रुपये के बराबर हो गया है.
बीते महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक अपील की कि वे पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम से कम करें और पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाएं.
उन्होंने अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, एक साल तक सोना न ख़रीदने, घर से काम करने और किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल 50 फ़ीसदी तक कम करने की भी अपील की.
हालांकि प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद बीबीसी हिन्दी के कार्यक्रम 'द लेंस' में पूर्व वित्त सचिव अशोक झा ने कहा कि अभी हालात उतने चिंताजनक नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री ने जो कहा है वह एक अपील है लोगों से कि फ़ॉरेन एक्सचेंज का मामला गंभीर हो सकता है. अगर पश्चिम एशिया का युद्ध चलता रहा और उससे फ़ॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व पर असर पड़ता रहा तो कुछ दिनों बाद या एक महीने बाद मामला गंभीर हो सकता है."
"इसलिए उन्होंने जो कहा है उसका एक ही महत्व है- फ़ॉरेन एक्सचेंज को बचाकर रखिए, उसे मत गंवाइए. इसीलिए उन्होंने कहा कि सोना मत खरीदिए, वर्क फ्रॉर्म होम कीजिए ताकि ईंधन कम ख़र्च हो जाता है."
इस बीच भारतीय शेयर बाज़ार कैपिटलाइजेशन के मामले में ताइवान और दक्षिण कोरिया ने भी पीछे हो गया है.
भारत स्टॉक मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी शेयर बाज़ार की वैल्युएशन रैंकिंग में फिसलकर सातवें स्थान पर पहुंच गया है. दक्षिण कोरिया छठी रैंकिंग पर है.
इससे पहले ताइवान ने भारत को इस मामले में पीछे छोड़ा था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.