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उत्तर प्रदेश: एक इंटर कॉलेज में बच्ची का एडमिशन कराने के लिए टॉयलेट सीट लेकर क्यों पहुंचे अभिभावक?
- Author, गौरव गुलमोहर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के सहायता प्राप्त झिनकू लाल त्रिवेनी राम चौधरी इंटर कॉलेज पर छात्राओं के लिए शौचालय न होने के नाम पर प्रवेश दिए जाने से इनकार के आरोप लगे हैं.
यह मामला तब चर्चा में आया जब एक छात्रा के अभिभावक उसे एडमिशन दिलाने के लिए साइकिल पर टॉयलेट सीट लेकर कॉलेज पहुंच गए थे.
झिनकू लाल त्रिवेनी राम चौधरी इंटर कॉलेज में छठी कक्षा से 12वीं तक की पढ़ाई होती है.
कॉलेज प्रशासन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में ये स्वीकार किया है कि छात्राओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है.
बीबीसी हिन्दी की टीम जब 22 अप्रैल को कलवारी क्षेत्र के झिनकू लाल त्रिवेनी राम चौधरी इंटर कॉलेज पहुंची, तो पाया कि कॉलेज में पढ़ने वाले लगभग एक हज़ार छात्र थे लेकिन एक भी छात्रा नहीं.
झिनकू लाल त्रिवेनी इंटर कॉलेज सरकारी रिकॉर्ड में को-एजुकेशन संस्थान के रूप में दर्ज है, जहां लड़के और लड़कियों को एक साथ शिक्षा देने का प्रावधान है.
इस इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य एआर चौधरी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "विद्यालय में बच्चियों का प्रवेश होता रहा है. मैं यहीं का छात्र रहा हूँ, मेरे साथ भी लड़कियां पढ़ी हैं. साल 2017 के बाद परीक्षा केंद्र नहीं बना, सामने बाउंड्री वॉल नहीं थी और अन्य मूलभूत सुविधाएं नहीं थी, इसलिए धीरे-धीरे बच्चियों की संख्या घटती चली गयी. कोई अभिभावक अपनी लड़कियों का प्रवेश कराने यहां नहीं आता है. नतीजा हुआ कि कॉलेज में सत्र 2020-21 में बालिकाओं की संख्या शून्य हो गई."
हालांकि, स्थानीय निवासी और अभिभावक कॉलेज प्रशासन पर जानबूझकर लड़कियों को प्रवेश न देकर प्रबंधक अमित चौधरी के निजी इंटर कॉलेज को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाते हैं.
वीडियो वायरल होने के बाद इंटर कॉलेज में लड़कियों को प्रवेश दिया जाने लगा.
ख़बर लिखे जाने तक प्रधानाचार्य के अनुसार नए सत्र के लिए कुल पंद्रह छात्राओं का प्रवेश हो चुका था. इनमें से कक्षा ग्यारह में सात, कक्षा बारह में छह छात्राओं को प्रवेश दिया गया है. प्रधानाचार्य के अनुसार, कुछ छात्राओं ने प्रवेश फॉर्म जमा किया है लेकिन डॉक्युमेंट्स कम्प्लीट नहीं हैं.
जिला विद्यालय निरीक्षक संजय सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "कॉलेज में एडमिशन शुरू हो गया है. लगभग पंद्रह छात्राओं का एडमिशन हो गया है. शौचालय की समस्या को दूर कर दिया गया है. कॉलेज में जो पुराने शौचालय थे उसे ही दुरुस्त करा दिया गया है."
छात्राओं ने बीबीसी को क्या बताया?
झिनकू लाल त्रिवेनी राम चौधरी इंटर कॉलेज, कलवारी एक एडेड या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान है. इस कॉलेज की शुरुआत साल 1951 में हुई थी.
कॉलेज में वर्तमान में छह लेक्चरर, तेईस एलटी ग्रेड शिक्षक और लगभग छह गैर-शिक्षण कर्मचारी मौजूद हैं. इनमें एक महिला एलटी ग्रेड शिक्षिका भी शामिल हैं.
हमारी मुलाकात पकड़ी छब्बर की रहने वाली छात्रा प्रतीक्षा से हुई. प्रतीक्षा ग्यारहवीं पास करके झिनकू लाल इंटर कॉलेज में बारहवीं क्लास में प्रवेश लेना चाहती हैं, लेकिन अभी तक उन्हें प्रवेश नहीं मिल सका है.
प्रतीक्षा ने बताया, "मैं गरीब परिवार से हूँ. मेरे घर वालों के पास इतना पैसा नहीं है कि मुझे प्राइवेट कॉलेज में पढ़ा सकें. इसलिए मैं झिनकू लाल त्रिवेनी इंटर कॉलेज में एडमिशन लेना चाहती हूँ लेकिन प्रिंसिपल ने बोला कि शौचालय नहीं है इसलिए आपका एडमिशन यहां नहीं हो सकता है. दूसरे दिन गई तो उन्होंने बोला आपका विषय गृह विज्ञान है, इस विषय की हमारे यहां मान्यता नहीं है."
प्रतीक्षा ने कहा, "मैं अपने गांव से पहली लड़की हूं जो उस कॉलेज में एडमिशन लेने की कोशिश कर रही हूँ लेकिन मेरा एडमिशन नहीं हो रहा है. अभी तक वहां सिर्फ़ लड़के पढ़ रहे हैं. क्या कोई सरकारी चीज़ या स्कूल सिर्फ लड़कों के लिए होता है? प्राइवेट कॉलेज में बहुत पैसा लगता है क्या गरीब घर की बेटी पढ़ेंगी नहीं, ऐसे ही बैठी रहेंगी?"
प्रतीक्षा की मां विद्यावती ने कॉलेज पर आरोप लगाते हुए कहा, "कॉलेज में शौचालय नहीं है इसलिए हमारी बच्ची का नाम नहीं लिख रहे हैं. इतनी कमाई नहीं है कि हम अपनी बच्ची का नाम कन्या इंटर कॉलेज में लिखवा सकें. वह प्राइवेट है. वहां ज्यादा पैसा लगता है. हम चाहते हैं हमारी बच्ची का नाम सरकारी झिनकू लाल में लिखा जाए."
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने जब इस बारे में कॉलेज के प्रधानाचार्य एआर चौधरी से प्रतीक्षा को प्रवेश न देने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा, "हमें उनका फॉर्म मिला है जिसमें विषय संबंधित विसंगतियां हैं. इस सम्बंध में उच्चाधिकारियों से संपर्क किया गया है. वहां से निर्देश मिलने के बाद ही हम आगे की कार्रवाई करेंगे."
हमारी मुलाकात एक अन्य छात्रा अंशु से हुई, जो बेलवाडाड़ की रहने वाली हैं. अंशु को झिनकू लाल इंटर कॉलेज में महिला शौचालय न होने की बात कह कर प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया था लेकिन कुछ दिन बाद अंशु को कक्षा आठ में प्रवेश दे दिया गया.
टॉयलेट सीट लेकर कॉलेज पहुंचे अभिभावक ने क्या बताया?
स्थानीय स्तर पर कई वर्षों से अभिभावक अपनी बच्चियों का एडमिशन कराने के लिए इंटर कॉलेज का रुख़ कर रहे हैं, लेकिन शौचालय का हवाला देकर बालिकाओं का प्रवेश देने से इनकार किया जाता रहा है.
जब साइकिल पर टॉयलेट सीट लेकर मज़दूर जसवंत कुमार झिनकू लाल इंटर कॉलेज पहुंचे, तो उसका वीडियो चर्चा में आ गया. वो अपने परिवार की बच्चियों का दाखिला छठी कक्षा में करवाना चाह रहे थे.
जसवंत कुमार ने बीबीसी को बताया, "मैं अपने परिवार की बच्चियों का नाम झिनकू लाल इंटर कॉलेज में लिखवाना चाहता था लेकिन वहां के मैनेजर ने कहा कि यहां शौचालय नहीं है इसलिए नाम नहीं लिख सकते. मैं टॉयलेट सीट गिफ़्ट करने गया था लेकिन उन्होंने न टॉयलेट सीट लिया और न ही बच्चियों का नाम लिखा. जिसके बाद मैं टॉयलेट सीट और बच्चियों को घर लेकर आ गया."
आप झिनकू लाल इंटर कॉलेज में ही अपने परिवार की बच्चियों का प्रवेश क्यों कराना चाहते हैं?
इस सवाल के जवाब में जसवंत कुमार ने बीबीसी से कहा, "वह एक सरकारी कॉलेज है. वहां फ़ीस कम लगती है. कहीं प्राइवेट में नाम लिखवाते तो हज़ार रुपये महीने देना पड़ता. हम गरीब आदमी हैं सौ-दो सौ रुपये की मज़दूरी करके लाते हैं. तो हम कहाँ इतने महंगे स्कूल में पढ़ा सकते हैं? इसलिए हम सरकारी विद्यालय में अपने घर के बच्चों का नाम लिखवाना चाहते हैं."
स्थानीय लोगों के प्रबंधन समिति पर आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सहायता प्राप्त झिनकू लाल त्रिवेनी इंटर कॉलेज में कई वर्षों से छात्राओं का प्रवेश नहीं दिया जा रहा है, ताकि प्रबंधक अमित चौधरी के निजी संस्थान को लाभ मिल सके.
कॉलेज की दीवार से सटा प्रबंधक अमित चौधरी का निजी चौधरी त्रिवेनी राम बालिका इंटर कॉलेज स्थित है, जहां वर्तमान में लगभग एक हज़ार छात्राएं हैं. जबकि सहायता प्राप्त कॉलेज में एक भी छात्रा नहीं थी.
स्थानीय निवासी और पेशे से इलेक्ट्रो होम्योपैथी डॉक्टर प्रेम नारायण ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "पच्चीस साल पहले वर्तमान प्रबंधक अमित चौधरी के पिता प्रेम नाथ चौधरी प्रबंधक थे. उन्होंने सरकारी कॉलेज झिनकू लाल इंटर कॉलेज के बगल ही अपना इंटर कॉलेज खोल लिया. अपने निजी कॉलेज को लाभ देने के लिए सरकारी कॉलेज से क्लास छः, सात और आठ की बालिकाओं का नाम काट कर उस कॉलेज में ले गए थे. जिसमें हमारी बेटी भी थी."
"हमें अपनी बेटी का एडमिशन झिनकू लाल इंटर कॉलेज में करवाने के लिए हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी. साल 2000 में हमारी बेटी का एडमिशन कक्षा नौ में हुआ. लागभग दस साल तक झिनकू लाल इंटर कॉलेज में बालिकाओं का एडमिशन हुआ लेकिन अपने निजी बालिका इंटर कॉलेज को लाभ देने के लिए सहायता प्राप्त झिनकू लाल इंटर कॉलेज में बालिकाओं का प्रवेश देना पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया."
कॉलेज प्रशासन का पक्ष
प्रबंधक अमित चौधरी ने सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए बीबीसी से कहा, "झिनकू लाल इंटर कॉलेज से दो-तीन किलोमीटर की दूरी में कम से कम तीन राजकीय विद्यालय हैं. यदि बालिकाओं को प्रवेश लेना होगा तो वे वहां ले सकती हैं. यह मुद्दा कुछ लोग ईर्ष्या बस उठा रहे हैं. हमें यदि पैसा कमाना होता तो हम कॉन्वेंट स्कूल खोलते. क्यों महिला इंटर कॉलेज और महाविद्यालय खोलते?"
इसके अलावा कॉलेज प्रशासन ने टॉयलेट सीट लेकर छात्रा का प्रवेश कराने पहुंचे अभिभावक के मामले को प्रायोजित बताया है.
प्रधानाचार्य एआर चौधरी ने कहा, "यह बात पूरी तरह गलत है कि 67 सालों से झिनकू लाल त्रिवेनी कॉलेज में छात्राओं का प्रवेश नहीं दिया जा रहा है. साल 2021 के बाद से मूलभूत सुविधाओं की कमी और बालिकाओं की सुरक्षा के मद्देनज़र अभिभावक स्वयं यहां अपनी बालिकाओं का प्रवेश नहीं कराना चाहते हैं."
उन्होंने आगे कहा, "टॉयलेट सीट लेकर एडमिशन कराने आना कोई बात नहीं होती है. यह प्रायोजित था. अब उसके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है. जो बच्चियां आ रही हैं, हम उन्हें एक प्रॉसेस के तहत प्रवेश दे रहे हैं."
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि बालिकाओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था होनी चाहिए.
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
जिला विद्यालय निरीक्षक संजय सिंह ने कहा, "हमें सूचना मिली है कि कलवारी स्थिति झिनकू लाल एडेड विद्यालय में मैनेजमेंट बालिका शौचालय न होने के कारण बालिकाओं का प्रवेश नहीं देते हैं. इस प्रकरण का संज्ञान लेते हुए मैनेजमेंट और प्रधानाध्यापक को कड़े निर्देश जारी किए गए हैं."
"यह एक अर्धशासकीय विद्यालय है, जहां पहले बच्चियों का एडमिशन किया जाता था, लेकिन बीच में मैनेजमेंट ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया कि मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण यहां बच्चियों का एडमिशन न लिया जाए."
ये इंटर कॉलेज है, यहां कक्षा छह से 12 वीं तक की पढ़ाई होती है
"चूंकि विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं को पूरा करना मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी है, इस आधार पर बच्चियों का एडमिशन न लेना मैनेजमेंट की अनुशासनहीनता है. इस तरह एडेड विद्यालय में शौचालय न होना मैनेजमेंट की सोची-समझी चाल लगती है, इसलिए हम इसका निरीक्षण करवा रहे हैं."
उन्होंने आगे कहा, "यदि आगे भी इस तरह की कोई जानकारी सामने आती है तो माध्यमिक शिक्षा अधिनियम 1921 और विभागीय अध्यादेश के तहत मैनेजमेंट भंग करने की कार्रवाई की जा सकती है. प्रधानाचार्य को निलंबित किया जा सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.