'स्ट्रीट फ़ाइटर' से सीएम के पद तक: ममता बनर्जी क्या अब पुराने तेवर बरक़रार रख पाएंगी?

    • Author, इशाद्रिता लाहिड़ी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

पश्चिम बंगाल में 15 साल के शासन के बाद ममता बनर्जी सत्ता से बाहर हो गई हैं.

बीजेपी, तृणमूल कांग्रेस को मात देने के बाद पहली बार राज्य में अपना सीएम बनाने की तैयारी कर रही है.

लेकिन 2011 में राज्य की सीएम बनने से पहले ममता बनर्जी ने क़रीब तीन दशक तक ज़मीन पर लंबा संघर्ष किया था. तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी ने अपने बूते खड़ा किया और विपक्ष से सत्ता तक पहुंचाया.

ममता को 'स्ट्रीट फ़ाइटर' माना जाता है यानी कि वह सड़क पर छात्र राजनीति से संघर्ष कर सत्ता की दहलीज़ चढ़ी हैं.

लेकिन अब जबकि उन्हें फिर विपक्ष में बैठना होगा तो यह सवाल है कि क्या उनके पुराने तेवर बरक़रार रहेंगे?

बीते चार दशक में इस जुझारू नेता के कई रंग दुनिया ने देखे हैं. जैसे कि सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में ख़ुद का केस लड़ती हुईं ममता, तो कभी रंग और कूची लेकर पेंटिंग करतीं ममता, कभी कविताएं लिखतीं ममता और कभी मुख्यमंत्री होने के बावजूद, ख़ुद ही धरने पर बैठने वालीं ममता.

लेकिन कुछ पत्रकारों ने ममता के करियर को ज़्यादा क़रीब से देखा है और उनके कुछ रंगों को बदलते हुए भी.

इस ख़बर में हम आपको बचपन में अपने भाई-बहनों का ख़्याल रखने वाली ममता दीदी, कॉलेज में वामपंथी दबंगों से भिड़ जाने वाली युवा नेत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद महिला अपराधों को नकारने वाली नेता बनने तक की यात्रा पर ले चलते हैं.

'जायंट किलर' ममता

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सुर्ख़ियों में साल 1984 में पहली बार आई थीं और तब से लगातार ख़बरों में बनी ही रहीं.

वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ हफ़ीज़ ने ममता के करियर को शुरुआत से देखा है.

वह बताते हैं, "ममता बनर्जी ने जब अपना राजनीतिक करियर शुरू किया तब वह क़रीब 20 साल की थीं. वह कॉलेज में थीं और उन्होंने स्टूडेंट पॉलिटिक्स से राजनीति शुरू की. चंद ही साल बाद राजीव गाँधी ने उन्हें जादवपुर सीट से लोकसभा इलेक्शन लड़वाया. तब वह 30 की भी नहीं रही होंगी."

"कांग्रेस ने उनको कद्दावर कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी के ख़िलाफ़ खड़ा किया, जो बाद में लोकसभा स्पीकर भी बने. तब सोमनाथ चटर्जी के ख़िलाफ़ जीत को असंभव माना जा रहा था और सब यही कह रहे थे कि कांग्रेस ने ममता बनर्जी को बलि का बकरा बनाया है. लेकिन जब रिज़ल्ट निकला सब हैरान रह गए."

इस घटना को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मोनिदीपा बनर्जी बताती हैं, "ममता बनर्जी का नाम अख़बारों की सुर्खियों में सबसे पहले 1984 में आया, जब उन्होंने सीपीएम और वाम मोर्चे के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया. उन्हें 'जायंट स्लेयर' कहा जाने लगा. मुझे याद है कि उस समय मैं एक अख़बार में काम करती थी और तब इस बात पर चर्चा हुई थी कि ममता बनर्जी की ख़बर की सबसे अच्छी हेडलाइन क्या हो सकती है."

उनके शुरुआती कार्यकाल को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल कहते हैं, "संसद के सभी सदस्यों को एक स्थायी समिति और एक सलाहकार समिति का हिस्सा बनना अनिवार्य था. उस समय बैठकें संसद भवन में होती थीं. जब ममता गृह मंत्रालय की स्थायी समिति में थीं, तब वो अपने नोट्स के लिए हरी स्याही का इस्तेमाल करती थीं, उन्हें हरा रंग बहुत पसंद था. उनकी पार्टी का रंग भी यही है."

"वह बैठक के एजेंडा पेपर पर दूसरों की बातें नोट करती थीं, बिल्कुल एक पत्रकार की तरह. उनकी टिप्पणियां बहुत रोचक होती थीं और एक पत्रकार होने के नाते, मैं उस पेपर को पाने के लिए बहुत उत्सुक रहता था."

दीदी ममता

राजनीति से पहले ममता बनर्जी की ज़िंदगी का सफ़र कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट की बस्ती में एक छोटे से घर में शुरू हुआ था. छोटी उम्र में पिताजी गुज़र गए और पांच भाई-बहन और मां को सँभालने की ज़िम्मेदारी ममता बनर्जी पर आ गई थी.

उनके भाई कार्तिक बनर्जी बताते हैं, "दीदी हमसे बड़ी थी. वही हमें स्कूल ले जाती थी. वही हमारा ख़्याल रखती. जब हमारी मां गांव जाती, तब दीदी पूरे घर की देखभाल करती थी. उस समय वह हमारा ध्यान रखती और हमारे लिए खाना बनाती थीं. और सब कुछ एकदम समय पर होता था."

"जब हम बच्चे थे और खेला करते तो हार-जीत पर दीदी का रुख़ अलग होता था. जीतने वालों को तो सब बधाई देते थे, लेकिन दीदी हारने वालों को दिलासा देती थीं. कहती थीं कि उन्होंने अच्छा खेला और उन्हें नाश्ता ख़रीदने के लिए 5 रुपये देती थीं."

कार्तिक बनर्जी ममता बनर्जी की छात्र राजनीति में शुरुआत के बारे में बताते हैं, "जब वह जोगमाया देवी कॉलेज में पढ़ रही थीं, तभी उन्होंने राजनीति में क़दम रखा. स्थानीय कांग्रेस नेताओं में कई मेरे बड़े भाई के पास आए उन्होंने कहा कि तुम्हारी बहन जिस कॉलेज में पढ़ती है, वहां सीपीएम की छात्र इकाई बहुत मज़बूत है, हमें अपनी इकाई शुरू करनी होगी. वह उस कॉलेज में कांग्रेस की छात्र इकाई शुरू करने वाली पहली व्यक्ति थीं."

फ़ाइटर ममता

इसके बाद का सफ़र उन्हें 1984 में संसद ले गया. सोमनाथ चटर्जी को हराने के बाद ममता बनर्जी ने लेफ़्ट फ्रंट पर निशाना साधा और कांग्रेस के युवा नेता के हिसाब से अपनी स्ट्रीट फ़ाइटर की इमेज बनाई. वही इमेज जो उन्होंने आज तक बरक़रार रखी है.

मोनिदीपा बनर्जी याद करती हैं, "1990 में, कम्युनिस्ट गुंडों ने उनकी पिटाई की थी और वह बुरी तरह घायल हो सकती थीं. मुझे उनकी एक तस्वीर याद है... वह एक दुबली-पतली महिला थीं, उन्हें लाठियों से लैस लंबे-लंबे गुंडों ने घेर रखा था और वे उन पर हमला करने वाले थे. यह उस घटना की एक बेहद चर्चित तस्वीर है."

कार्तिक बनर्जी याद करते हैं, "मैं अस्पताल गया और दीदी को ऑपरेशन थिएटर में देखा, उनके बाल काटे जा रहे थे. मैं यह नहीं बता सकता कि उन्हें उस हालत में देखकर मुझे कैसा महसूस हुआ. मैं अस्पताल से बाहर आ रहा था और सोच रहा था, उन्होंने किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया. कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाई. फिर उन्हें इस तरह क्यों पीटा गया? अस्पताल के सामने एक छोटा सा तालाब है... मुझे याद है मैं वहीं खड़ा रहा और अपने आंसू पोंछे."

फिर एक दौर ऐसा आया जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फ़ैसला लिया और 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की.

बीजेपी का साथ

परवेज़ हफ़ीज़ तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न से जुड़ा एक दिलचस्प वाक़या बताते हैं.

वो कहते हैं, "यह सिंबल ममता बनर्जी ने किसी डिज़ाइनर से तैयार नहीं करवाया है. वह पेंटिंग भी करती हैं, कविताएं भी लिखती हैं. तो यह जो घास और एक जोड़ा फूल है, वह खुद उन्होंने अपने हाथों से बनाया है. एक दिन रिपोर्टिंग करते हुए उन्होंने हमें अपने हाथों से बनाकर दिखाया भी था वह स्केच. बाद में पता चला कि जब पार्टी रजिस्टर की जा रही थी तब वही स्केच चुनाव आयोग को भेजा गया था."

"उन्होंने बताया कि कवि क़ाज़ी नज़रुल की एक पंक्ति से उनको प्रेरणा मिली थी. वह पंक्ति है- एकटी ब्रिन्ते दुति कुसुम- हिंदू मुसलमान यानी कि एक ही डंठल पर खिले दो फूल- हिंदू और मुसलमान. इस तरह यह सिंबल हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक प्रतीक है."

वैसे आश्चर्य की बात यह है कि आज जिस बीजेपी को वह अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती हैं, तृणमूल की शुरुआत में उन्होंने उसी बीजेपी का साथ लिया था. 1999 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियां साथ में चुनाव मैदान में उतरी थीं.

मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "वह अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में एक बहुत ही युवा मंत्री बनीं. 2002 के गोधरा कांड पर उनकी प्रतिक्रिया को लेकर आज भी काफ़ी चर्चा होती है. नरेंद्र मोदी के शासनकाल में हुए गोधरा कांड पर उन्होंने उतनी उग्र प्रतिक्रिया नहीं दी जितनी कई लोगों को उम्मीद थी."

"प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके घर आए थे और ममता की माता को प्रणाम किया था. उन्होंने ममता बनर्जी की माता को पारंपरिक प्रणाम किया था. प्रधानमंत्री का आपके छोटे से घर में आना बहुत बड़ी बात होती है. इस सबके बावजूद उन्होंने बीजेपी के साथ अपने रिश्ते को बिगाड़ लिया."

2004 की हार और वाम सरकार का पतन

एनडीए सरकार में ममता बनर्जी दो बार मंत्री रहीं. एक बार वह रेलवे मिनिस्टर भी रहीं.

2004 में उन्हें लोकसभा चुनाव में बड़े झटके का सामना करना पड़ा. ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर में इसे उनका एक बेहद ख़राब समय माना जाता है. तब तृणमूल पश्चिम बंगाल में बस एक संसदीय सीट जीत सकी थी और वह थी ममता बनर्जी की ख़ुद की सीट.

लेकिन यह आंधी के पहले सन्नाटा था. तब क़रीब तीन दशक से पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाले हुए लेफ़्ट फ्रंट को अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही सालों में उनको सत्ता छोड़नी पड़ेगी.

मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "वामपंथियों को लगता था कि ममता बनर्जी बंगाली भद्र महिला नहीं हैं. वामपंथियों के पास ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे भद्र लोग थे, जो साफ़-सुथरे सफ़ेद कपड़े, पायजामे, कुर्ते और धोती में सजे रहते थे. वे उच्च वर्ग के लोगों की तरह दिखते थे. ममता बनर्जी उच्च वर्ग की नेता नहीं थीं, वह ज़मीनी स्तर की नेता थीं, वह झुग्गी-झोपड़ियों से आई थीं. उनमें कोई बनावटीपन नहीं था."

परवेज़ हफ़ीज़ कहते हैं, "2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते थे- वह 30 हैं और हम 230. उनका बात हमें सुनना पड़ेगा?"

इसके बाद ममता बनर्जी ने अपनी किस्मत ख़ुद बदली. 2006 में सिंगूर आंदोलन और 2007 में नंदीग्राम के आंदोलन ने उन्हें राज्य में विपक्ष की आवाज़ बना दिया. लेफ़्ट सरकार को सत्ता अपने हाथ से जाती दिखी.

परवेज़ हफ़ीज़ कहते हैं, "ममता बनर्जी ने उस वक़्त उम्मीद नहीं छोड़ी. एक या दो महीने के अंदर उन्होंने बाउंस बैक किया. उस वक़्त सिंगूर में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने टाटा मोटर्स के स्मॉल कार प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन अधिग्रहण करना शुरू किया था. वहां के किसान उसका विरोध कर रहे थे. उन्होंने पैसे लेने से इनकार कर दिया था. ममता बनर्जी ने उस वक़्त मौका देखा और आंदोलन में शामिल हो गईं."

"इन दोनों मूवमेंट से उन्हें वह राजनीतिक ज़मीन भी वापस मिली जो वह हार गई थीं. यही नहीं, बल्कि बंगाल के सभी लेफ़्ट माइंडेड और लेफ़्ट फ्रंट से नाराज़ लोगों- कलकत्ता के कवि, पेंटर, कलाकार, बुद्धिजीवी और फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने भी ममता को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया. उसके बाद जो हुआ वह तो इतिहास है."

मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "जब वह मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने सबसे पहले जो काम किया, वह था सिंगूर जाने का. वह सिंगूर गईं और उस बंजर भूमि पर सरसों और चावल के बीज बो दिए."

वाम मोर्चा से टक्कर

2011 में 34 साल लंबे वाम मोर्चा शासन को हटाकर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं. उसके बाद 2016 और 2021 में भी वह भारी बहुमत से सत्ता में लौटीं. विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ ममता बनर्जी के व्यक्तित्व में बदलाव भी आया लेकिन तब भी वह ज़मीनी नेता बनी रहीं.

वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल कहते हैं, "15 साल के शासन के बाद, वह हर गांव को जानती हैं. ग्रामीण नेताओं और वहां के लोगों को वह उनके नाम से पुकारती हैं."

मोनिदीपा बनर्जी के अनुसार, "सरल शब्दों में कहें तो, अनप्रेडिक्टबल स्वभाव वाली ममता बनर्जी से एक कुशल राजनीतिज्ञ ममता बनर्जी के रूप में उनके उदय का सफ़र है. 1990 और 2000 के दशक में वह बेहद अनप्रेडिक्टबल स्वभाव की थीं."

"वह किसी के भी सामने अपना आपा खो बैठती थीं. उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं या उनके कार्यालय में कोई सचिव. वह कार्यालय छोड़कर चली जाती थीं. वह आप पर दस्तावेज़ फेंक सकती थीं. वह कुछ भी कर सकती थीं. उनकी राजनीति का विकास शायद इसी तरह हुआ है."

लेकिन समय के साथ उनके स्वभाव और व्यवहार में भी बदलाव आया.

मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "मुझे याद है कि 2011 में जब वह मुख्यमंत्री बनीं, राजभवन में एक भव्य समारोह था. सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या उन्होंने वामपंथी नेताओं को आमंत्रित किया है और क्या वे आएंगे? वे आए. बुद्धदेव भट्टाचार्य भी, जिन्हें ममता ने हराकर मुख्यमंत्री पद से हटाया था."

"जिस अगली बात पर हमारा ध्यान था, वह यह थी कि वह उनके प्रति कैसी प्रतिक्रिया देंगी? यह अविश्वसनीय था... उन्होंने उनका बहुत ही शालीन और विनम्र तरीके से अभिवादन किया... उनके सामने झुककर."

बतौर मुख्यमंत्री कई चुनौतियां

मुख्यमंत्री के तौर पर 15 साल में ममता बनर्जी की सरकार के सामने काफ़ी चुनौतियां आईं, बहुत सारे सवाल भी उठे. तृणमूल कार्यकर्ताओं का भ्रष्टाचार और एक महिला मुख्यमंत्री के तौर पर महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों पर उनके व्यवहार ने लोगों को नाराज़ किया.

शारदा, रोज़ वैली, टीचर रिक्रूटमेंट, कोल स्मगलिंग, कैटल स्मगलिंग जैसे घोटाले भी उनकी सत्ता में सामने आए.

मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "मुझे वह दिन याद हैं जब शुरुआत में वह सुर्खियों में आई थीं. वह कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ज्योति बसु के कार्यालय के बाहर एक ऐसी महिला को साथ लेकर धरने पर बैठ गई थीं, जिसके साथ कथित तौर पर एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता ने बलात्कार किया था. और उन्हें राइटर्स बिल्डिंग से बाहर निकाल दिया गया था. यह ख़बर आज भी सुर्खियों में बनी हुई है."

"90 के दशक में ऐसी थीं ममता बनर्जी. लेकिन जब वह सत्ता में आईं, तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता बदल गई. मुझे पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड याद है, मुझे याद है कि कैसे उन्होंने लगातार इस बात से इनकार किया कि यह बलात्कार का मामला था."

मोनिदीपा याद करती हैं, "एक दिन वह राइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थीं. हम सब सीढ़ियों के ऊपर रुक गए और पूछा, 'पार्क स्ट्रीट कांड का क्या हुआ? वहां क्या हुआ था? आप इसके बारे में क्या कर रही हैं?' और वह मुड़ीं और मुझे लगा कि बेहद क्रूर लहजे में बोलीं, 'शजानो घोटोना' मतलब यह सब साज़िश थी."

आगे क्या?

अब जबकि चुनाव परिणाम सामने हैं तो सवाल यह उठता है कि ममता बनर्जी के लिए आगे का रास्ता क्या होगा? क्या यह उनके राजनीतिक करियर का अंत है या फिर वह विपक्ष की राजनीति में मज़बूत ताक़त के रूप में फिर से शुरुआत करेंगी?

जयंत घोषाल कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि टीएमसी को निष्क्रिय किया जा सकता है. यह सच नहीं है. वह काम से प्यार करती हैं, वह जुझारू हैं, संकट आने पर वह बहुत ख़ुश होती है. अगर कोई संकट आता है, तो वह उसका मुकाबला करेंगी."

मोनिदीपा बनर्जी का भी कुछ इसी तरह का ख़याल है, "उनके दोस्त नहीं होंगे. लेकिन मैं आपको यकीन दिलाती हूं कि वह इसका पूरा फ़ायदा उठाएंगी. वह अपने रंग में होंगी क्योंकि वह ठीक उसी जगह हैं जहां उन्हें रहना पसंद है, और वह है विपक्ष. ममता बनर्जी के विपक्ष में रहने के दौरान बीजेपी को एक बेहद मुश्किल दौर से गुज़रना पड़ेगा."

हालांकि, ममता बनर्जी चुनाव हारने के साथ-साथ अपनी भवानीपुर सीट भी हार गई हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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