पश्चिम बंगाल चुनाव: बीजेपी की जीत में आरएसएस का क्या रोल?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
    • ........से, कोलकाता से
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बड़ी जीत ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

संघ लंबे समय से यह कहता रहा है कि वह चुनावी राजनीति से दूर रहता है, लेकिन बंगाल के नतीजों के बाद यह सवाल ज़ोर पकड़ने लगा है कि क्या इस बार संघ ने पर्दे के पीछे निर्णायक भूमिका निभाई.

राज्य के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि बीजेपी के वैचारिक आधार माने जाने वाले संघ ने इस चुनाव में पहले से कहीं ज़्यादा सक्रियता दिखाई.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में जहां संघ ने खुलकर मैदान में उतरने से परहेज़ किया था, वहीं 2026 के चुनाव में उसने अपने सहयोगी संगठनों के साथ ज़मीनी स्तर पर पूरी ताक़त झोंक दी.

संघ के एक प्रचारक ने हमें बताया कि इस बार के चुनाव में आरएसएस से जुड़े सैकड़ों स्वयंसेवक और कार्यकर्ता एक ही संदेश के साथ गली‑गली पहुंचे कि यह चुनाव बंगाल के हिंदू समाज के "अस्तित्व" से जुड़ा है.

आलोचकों का कहना है कि चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश कर धार्मिक ध्रुवीकरण को तेज़ किया गया.

शाखाओं के ज़रिए ज़मीनी पकड़

संघ की बुनियादी इकाई मानी जाने वाली 'शाखाएँ' उसकी सबसे बड़ी ताक़त मानी जाती हैं. पश्चिम बंगाल में इस समय संघ की क़रीब साढ़े चार हज़ार शाखाएँ सक्रिय हैं. दस साल पहले यह संख्या एक हज़ार के आस-पास थी.

कोलकाता की एक शाखा में आने वाले स्वयंसेवकों का कहना है कि संघ का काम लोगों को अपने मताधिकार के प्रति जागरूक करना और राष्ट्रहित की बात करना है, न कि किसी ख़ास पार्टी का प्रचार.

संघ के प्रांत व्यवस्था प्रमुख सीताराम डागा का कहना है कि स्वयंसेवक घर‑घर जाकर लोगों से मतदान करने की अपील करते हैं और किसी पार्टी का नाम नहीं लेते.

सीता राम डागा कहते हैं, "हमारा इंटरेक्शन ये रहता है कि जो देश के हित के लिए काम करे, जो राष्ट्र हित के लिए काम करे, जो हिंदुत्व के लिए जो काम करे, जो समाज की सेवा का काम करे आप उन्हें चुनिए."

"हम ये नहीं कहते है की आप बीजेपी को चुनिए लेकिन चूँकि संघ के स्वयंसेवक बीजेपी में भी है तो उनसे थोड़ा इंटरेक्शन होता रहता है. ये लोगों को मालूम है तो लोग कुछ समझ जाते हैं लेकिन हम लोग अपने नाम, मुंह से ऐसा प्रचार नहीं करते हैं."

हालांकि आलोचकों का तर्क है कि शाखाओं के ज़रिए ही समाज पर लंबे समय में वैचारिक असर डाला जाता है.

संघ इस आरोप से इनकार करता है, लेकिन यह भी सच है कि चुनावों के दौरान इन स्वयंसेवकों की मौजूदगी ज़मीनी स्तर पर महसूस की जाती है.

बीजेपी की जीत में संघ का कितना योगदान

इस चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया.

कई राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ एंटी‑इंकम्बेंसी उनकी हार की एक बड़ी वजह रही.

लेकिन इसके साथ ही यह दलील भी दी जा रही है कि संघ के सहयोग के बिना बीजेपी को इतनी बड़ी जीत शायद न मिल पाती.

बीजेपी का कहना है कि संघ का बीजेपी के लिए समर्थन स्वाभाविक है क्योंकि दोनों की विचारधारा राष्ट्रवाद पर आधारित है.

पार्टी के प्रवक्ताओं के मुताबिक संघ के कार्यकर्ताओं ने 'गुड गवर्नेंस' और राष्ट्रहित के मुद्दों को लेकर ज़मीनी स्तर पर काम किया.

पश्चिम बंगाल बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता देबजीत सरकार कहते हैं, "संघ ने जो ज़मीनी स्तर पर काम किया वो गुड गवर्नेंस के लिए और राष्ट्रवाद के पक्ष में है. बीजेपी राष्ट्रवाद से जुड़ी हुई है. बीजेपी नेशनलिस्ट दल है इसलिए संघ भी हमको सपोर्ट देता है. नीचे तक उनका काम था. हर जगह पर हमारे लिए उन्होंने बात की. यह काम उन्होंने स्वाभाविक रूप से किया."

'सॉफ्ट' रणनीति और सांस्कृतिक असर

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि संघ का असर तेज़ नारों या बड़े मंचों के ज़रिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्कों से सामने आता है. लोगों से लगातार बातचीत, फोन कॉल, पारिवारिक मुलाक़ातें-यही रणनीति बंगाल में भी रही.

संघ से जुड़े वरिष्ठ प्रचारक बिजॉय आद्या का कहना है कि इस बार चुनाव को हिंदू समाज के अस्तित्व से जोड़कर देखा गया. उनके मुताबिक़ बंगाल के ऐतिहासिक अनुभव-ख़ासकर 1947 के विभाजन-का ज़िक्र कर लोगों को सतर्क किया गया कि "इतिहास दोहराया न जाए."

बिजॉय आद्या कहते हैं, "संघ के लोगों ने घर-घर जाकर लोगों को संघ की भूमिका के बारे में बताया और कहा कि इस बार का चुनाव हिन्दुओं के अस्तित्व का सवाल है. संघ ने लोगों को बताया कि बांग्लादेश में जो हिन्दुओं का हाल है वही हाल बंगाल में भी होगा."

"उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल बंगाली हिन्दुओं का एकमात्र होमलैंड है इसलिए तृणमूल कांग्रेस को हटाना चाहिए क्योंकि उनकी नीति तुष्टिकरण की है और वो मुसलमान समुदाय का तुष्टिकरण करती है. हमने लोगों से कहा कि अगर बीजेपी की सरकार नहीं बनी तो हिन्दुओं को एक बार फिर बंगाल छोड़ कर जाना पड़ेगा."

धार्मिक ध्रुवीकरण का सवाल

चार मई को चुनाव के नतीजे आने के बाद बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी जो अब पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं, ने अपनी पार्टी की जीत को हिंदुत्व की जीत बताया था.

तो क्या वाक़ई इस बार का बंगाल चुनाव हिंदू बनाम मुसलमान बन गया था? अगर हाँ, तो क्या इसमें भी संघ की कोई भूमिका थी?

कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज़ाद महमूद का कहना है कि इस चुनाव में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण साफ़ तौर पर दिखा.

प्रोफ़ेसर महमूद कहते हैं, "शुभेंदु अधिकारी जब भवानीपुर के नतीजों पर बोल रहे थे तो एक जगह उन्होंने कहा कि मुसलमान एरिया का ईवीएम खुलेगा, हिंदू एरिया का ईवीएम खुलेगा, हिंदू वोट यहां आएगा मुस्लिम वोट यहां आएगा. ये जो आज बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण नज़र आ रहा है, ये जो मानसिकता में बदलाव है, इस बदलाव में आरएसएस की भूमिका रहती है."

अपनी बात जारी रखते हुए प्रोफ़ेसर महमूद कहते हैं, "आरएसएस का काम लोगों के बीच धीरे‑धीरे, नरमी से सांस्कृतिक असर डालना है और उनकी सोच बदलना है."

"आरएसएस हर जगह इसी तरह काम करता है. वह लोगों के लिए काम करता है, लेकिन उसके स्कूलों और उनके पाठ्यक्रम में एक ख़ास तरह की विचारधारा सिखाई जाती है. आख़िर में यही विचारधारा बीजेपी की राजनीतिक सोच और उसके राजनीतिक एजेंडे की मदद करती है."

प्रोफ़ेसर महमूद के मुताबिक़ बंगाल के लोगों के ज़हन में बीजेपी के लिए जगह बनाने का काम आरएसएस ने किया.

वो कहते हैं, "भारत के बाक़ी हिस्सों में एक बंगाली मध्यमवर्गीय भद्रलोक की क्या छवि होती है? आम तौर पर लोग मानते हैं कि ऐसा व्यक्ति रबिंद्रनाथ टैगोर की बात करेगा, पढ़ा‑लिखा होगा, बुद्धिजीवी होगा. यानी यही बुनियादी तस्वीर बनती है. यह एक स्टीरियोटाइप है, लेकिन यह धारणा मौजूद है. अब जब हम देखते हैं कि ऐसे ही बहुत से लोग खुलकर बीजेपी के समर्थक बन रहे हैं, तो साफ़ है कि कुछ बदल गया है."

अपनी बात को जारी रखते हुए वो कहते हैं, "यह बदलाव क्या है और कैसे हुआ, इसे लंबे समय में हुए उन सांस्कृतिक और सामाजिक बदलावों के संदर्भ में समझना होगा, जिन पर आरएसएस काफ़ी सफलतापूर्वक काम करता रहा है."

वो कहते हैं, "बीजेपी एक विकल्प बन जाए, पढ़े-लिखे वर्गों के लिए स्वीकार्य बन जाए, जिस पार्टी को तृणमूल कांग्रेस ने बाहरी लोगों की पार्टी बताया, जिसके बारे में कहा गया कि उसका कोई बंगाली विचार या संस्कृति नहीं है और उसे बंगाल की समझ नहीं है, यह बात 2021 में काम कर गई थी, लेकिन इस बार काम नहीं की, इसमें आरएसएस की एक भूमिका है."

आगे क्या?

बंगाल चुनाव में ज़मीनी स्तर पर संघ की कई सहयोगी संस्थाएं ख़ास तौर पर सक्रिय रहीं. संघ ने महिलाओं और युवाओं तक अपने संदेश पहुँचाने की भी भरसक कोशिश की.

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ सीमा से सटे ज़िलों में इस अभियान की अगुवाई संघ के सीमांत चेतना मंच ने की जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखकर अभियान चलाया गया.

तो अब जब बंगाल में बीजेपी की सरकार बन गई है तो संघ की पार्टी (बीजेपी) से क्या उम्मीद रहेगी?

संघ से जुड़े लोग मानते हैं कि बंगाल में अब डर का माहौल कम हुआ है और आने वाले समय में और ज़्यादा लोग खुलकर संघ की गतिविधियों से जुड़ेंगे.

वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि संघ का काम सरकार बनने या न बनने पर निर्भर नहीं करता. चाहे बीजेपी सत्ता में हो या विपक्ष में, संघ अपनी वैचारिक और संगठनात्मक गतिविधियाँ जारी रखता है.

बंगाल के नतीजों ने फिर एक बार इस तरफ इशारा किया है कि जब विचारधारा और संगठन लंबे समय तक ज़मीन पर साथ‑साथ काम करते हैं तो उसका असर चुनावी राजनीति में दिखाई देता है.

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद पश्चिम बंगाल में संघ का प्रभाव किस दिशा में और किस हद तक बढ़ता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.