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पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजे इतने अहम क्यों हो गए हैं?
- Author, संजीव श्रीवास्तव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
चार मई यानी सोमवार को भारत के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव परिणाम आने वाले हैं.
तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल, केरल के साथ-साथ पुडुचेरी के चुनावी नतीजों से पता चलेगा कि इन राज्यों में किनकी सरकार बनने वाली है.
लेकिन ज़्यादातर पॉलिटिकल ऑब्ज़र्वर का ध्यान अगर कहीं सबसे ज्यादा केंद्रित है, तो वह है पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्यों पश्चिम बंगाल का चुनाव इतना महत्वपूर्ण बन गया है?
इसको अलग-अलग नज़रिए से देखना होगा. सबसे पहले यही देखते हैं कि बीजेपी के लिए यह राज्य इतना अहम क्यों है? क्योंकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो जनसंघ के फ़ाउंडर थे, पश्चिम बंगाल उनका गृह राज्य है.
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यही वजह है कि 1950 से बीजेपी का लगातार प्रयास रहा है कि वह किसी तरह से पश्चिम बंगाल में कामयाब हों, वहां अपनी सरकार बना सके. हालांकि अभी तक वह सफल नहीं हुए हैं.
इस बार के चुनाव में बीजेपी की ओर से हर संभव कोशिश हुई. साधन, प्रचार और संसाधनों की कोई कमी नहीं रखी गई. सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग तक के आरोप लगे हैं और राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती भी हुई है.
हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर नज़र
इसके अलावा दूसरा जो अहम कारण है, वह यह है कि यह राज्य बीजेपी के लिए एक बड़ा टेस्ट केस भी है कि वह कितने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर सकते हैं.
क्योंकि ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक 25 से 30 प्रतिशत तक मुस्लिम मतदाता हैं.
तो बाकी दूसरी तरफ़ का पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) काफ़ी मजबूत होना चाहिए. क्योंकि बीजेपी को मुस्लिम वोट तो बहुत कम या नहीं के बराबर ही मिले होंगे.
एक और अहम बात है बीजेपी के नज़रिए से और विपक्ष के नज़रिए से भी, राजनीतिक हलकों में पश्चिम बंगाल को एक लास्ट फ्रंटियर की तरह से देखा जा रहा है क्योंकि उत्तर में, केंद्रीय भारत में, पूर्वी भारत में ज़्यादातर जगह बीजेपी अपनी जीत का झंडा, परचम फहरा चुकी है.
बंगाल अभी तक उससे बचा हुआ है. बीजेपी अब तक यहां जीतने में कामयाब नहीं हुई है. इसलिए यह चुनाव बीजेपी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
और विपक्ष के लिए इसलिए कि अगर बीजेपी को रोकना है, बीजेपी के बढ़ते हुए प्रभाव को, उसके एकछत्र राज को रोकना है, तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी को बने रहना होगा. यह उसके लिए तो बहुत महत्वपूर्ण है ही, समूचे विपक्ष के लिए भी अहम है.
तो दोनों तरफ़ से मुक़ाबला इसलिए बहुत अहम हो जाता है.
ऐसे चुनाव में एक अहम मुद्दा एसआईआर का भी रहा है, वोटर लिस्ट में जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न हुआ है, वह राज्य के चुनाव में एक ऐसा विषय बना हुआ है, जिसकी वजह से लोगों का पारा भी काफ़ी चढ़ा हुआ है, तनाव भी है और यह एक संवेदनशील मुद्दा भी है.
बड़ी संख्या में लोगों के वोट कटे हैं और उस बड़ी संख्या में जो वोट कटे हैं उसमें भी बड़ी संख्या अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम मतदाताओं की है.
लेकिन यह वोट सेंट्रल बंगाल, मुर्शिदाबाद, मालदा और इनके आस-पास के इलाकों में कटे हैं.
एसआईआर का असर
जब हम पश्चिम बंगाल में उन इलाकों में घूम रहे थे तो यह स्पष्ट दिख रहा था कि उसमें कई जगह गड़बड़ हुई है, ग़लतियां हुई हैं.
किसी घर में पिता का वोट तो रह गया है, बाकी सदस्यों का नहीं है. कहीं पति का रह गया है, पत्नी और बच्चों का कट गया है.
कहीं पत्नी का रह गया है बाकी घर वाले नहीं हैं. बिल्कुल सही हुआ है, इसके तो आसार कम ही नज़र आते हैं.
फिर एक मुद्दा ध्रुवीकरण का है, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति का, वहां की जो सियासी ज़मीन है, उसकी एक सच्चाई है.
अब ध्रुवीकरण शहरी इलाकों में काफ़ी है, ख़ासकर उन लोगों में जो मूलतः बंगाली नहीं हैं, चाहे वे मारवाड़ी हैं, चाहे हिन्दी भाषी लोग हैं, जो लंबे समय से बंगाल में रह रहे हैं.
लेकिन वे काफ़ी कुछ बीजेपी का साथ देते हुए दिख रहे हैं.
और शहरों में आपको हिंदू-मुस्लिम की चर्चा ज़्यादा दिखेगी, ग्रामीण इलाकों में उसकी बात कम दिखेगी. लेकिन अच्छी बात यह है कि बात कितनी भी हो, मुद्दा जितना भी अहम हो, चुनावी असर जो भी दिखा हो, लेकिन अपेक्षाकृत और अमूमन हमें पूरे बंगाल में सात दिन घूमने के दौरान कोई कम्युनल टेंशन या सांप्रदायिक तनाव की झलक दिखी नहीं.
कई जगह लोग काफ़ी अमन-चैन से रह रहे थे. मुस्लिम इलाके अलग हैं, हिंदू इलाके अलग हैं.
यह तो अब पूरे देश की कहानी है और यह पश्चिम बंगाल की कहानी भी है. गांव में भी ऐसा ही है, एक-दूसरे से जुड़े हुए घर आपको बहुत कम जगहों पर मिलेंगे.
अब ज़मीनी स्थिति क्या है इन चुनावों की? एक बात जो समझ में आती है, वह यह है कि ममता शासन और ममता गवर्नमेंट ख़ासी अलोकप्रिय है.
उसने कुछ ख़ास अच्छा काम नहीं किया है, विकास के नज़रिए से हम देखें तो पश्चिम बंगाल की विकास दर देश में सबसे धीमी गति से है.
अगर विकास दर की दृष्टि से देखें तो पश्चिम बंगाल की ग्रोथ रेट जो है वह शायद सबसे स्लो है.
दरअसल हमारे साथ जो लोग घूम रहे थे उसमें से एक जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने तो इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए अपने एक लेख में इस बात का ज़िक्र भी किया है कि ममता शासन में पश्चिम बंगाल में वास्तव में यह धीमी पड़ी है. यानी जहां दूसरी जगह ग्रोथ रेट या वृद्धि दर बढ़ रही है, वहां पश्चिम बंगाल में यह धीमी हुई है.
लेकिन उसके बावजूद, जैसे एक हमारे दूसरे साथी रुचिर शर्मा, ने अपने कॉलम और इंडियन एक्सप्रेस के अड्डा में कहा है कि कोई विकास की वजह से चुनाव जीत जाए, यह बिल्कुल तय बात नहीं है.
लगभग 50 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो विकास के बाद भी चुनाव हार जाते हैं और लगभग 50 प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जब विकास करने के बाद भी लोग मुख्यमंत्री नहीं बन पाते और 50 प्रतिशत ऐसे मामले होते हैं जहां विकास कम होता है लेकिन फिर भी दोबारा मुख्यमंत्री बन जाते हैं.
इसका मतलब है कि दूसरी चीजें ज़्यादा भारी पड़ती हैं राजनीति में और जिनमें से एक चीज़ इस बार भी हमने बंगाल में देखी और वह हैं महिला मतदाता.
पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि चुनावों में महिला मतदाता अहम भूमिका निभा रही हैं, चाहे वह बिहार में हमने देखा, चाहे मध्य प्रदेश में देखा कि महिलाएं मदद करने वालों को वोट करती हैं और उनके बीच में बीजेपी की पैठ बेहतर हुई है.
महिला मतदाताओं का वोट होगा अहम
नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी की, वह चुनाव जीते. इस बार उनकी एक डायरेक्ट बेनेफिशियरी स्कीम थी, उसकी वजह से जीते.
यहां पर ममता बनर्जी ने एक लक्ष्मी भंडार करके योजना चलाई हुई है जिसके तहत हर महीने पन्द्रह सौ रुपये महिलाओं के ख़ाते में ट्रांस्फ़र होते हैं. अब उसका कितना असर पड़ेगा?
बीजेपी ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह तीन हज़ार रुपये देंगे. तो लोग जो मिल रहा है उस पर ज़्यादा भरोसा करेंगे कि जो मिलने का आश्वासन दिया गया है उस पर ज़्यादा भरोसा करेंगे, यह देखने की बात है.
लेकिन कुल मिलाकर, अगर ममता बनर्जी या टीएमसी जीतती है तो वह इसलिए नहीं जीतेंगे कि उन्होंने बहुत अच्छा शासन दिया है, बहुत अच्छी गवर्नेंस है उनकी. वह इसलिए जीतेंगे कि बीजेपी को अब भी बंगाल में स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है.
ख़ासकर वे लोग जो मूलतः बांग्ला हैं- मतलब जो हिंदी भाषी बांग्ला नहीं हैं, जो मारवाड़ी नहीं हैं, जो बाहर से आकर बसे नहीं हैं-जो मूलतः बांग्ला जनसंख्या है, मतदाता हैं, वह अब भी उस तरह का जुड़ाव महसूस नहीं करते और बीजेपी को एक बाहरी पार्टी की तरह देखते हैं.
क्या होगा आने वाली राजनीति पर असर
इसके कारण भी बड़े स्पष्ट हैं. बीजेपी के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है ममता के मुकाबले. जो उनके बड़े नेता आते हैं राज्य में चुनाव प्रचार के लिए वह भी हिंदी में बोलते हैं, बांग्ला नहीं बोल पाते तो वह एक डिस्कनेक्ट सा रहता है.
फिर जो बीजेपी के ख़ास चेहरे हैं, प्रतीक हैं, राम मंदिर है, हिंदुत्व है, जो कल्चरल नेशनलिज्म (सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) है, जिसे बीजेपी ने परिभाषित किया है उसके साथ भी बांग्ला लोग अपने को बहुत ज्यादा आइडेंटिफाई नहीं कर पाते. क्योंकि उनके जो प्रतीक या सिम्बल्स हैं वह दुर्गा हैं, शक्ति हैं, काली हैं, शिव हैं. और जो लोकल बांग्ला आइकॉन्स हैं, चाहे वह राममोहन राय हैं, चाहे सुभाष बाबू हैं, चाहे वह कुछ लोगों के लिए अमर्त्य सेन या सत्यजीत रे हैं या बिपिन चंद्र पाल हैं.
तो एक डिस्कनेक्ट है जो मूलतः बांग्ला पॉपुलेशन है, मतदाताओं की, वह अभी तक बीजेपी को उस तरह से नहीं अपना रही जिस तरह से बीजेपी प्रयास कर रही है, लेकिन बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ रही है.
एक बड़ा फ़ैक्टर इस चुनाव में यह भी रहा है कि जो बड़ी संख्या में बंगाल से बाहर रहने वाले लोग जो बंगाल लौट के वोट कर रहे हैं, वह किसके पक्ष में मतदान करेंगे.
एसआईआर की वजह से लोगों के जो वोट कटे हैं, उससे पूरे राज्य में ख़ासकर उन लोगों में जो राज्य से बाहर रहते हैं, उनमें से संदेश गया है कि अगर उन्होंने वापस जाकर अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग नहीं किया तो अगली बार शायद उनका वोटर लिस्ट में नाम नहीं होगा.
और बात सिर्फ़ वोटर लिस्ट की नहीं है. उनको लगता है कि कहीं हमारी नागरिकता पर ही प्रश्नचिह्न नहीं लग जाए. कहीं ऐसा नहीं हो कि जो हमें फ़ायदे मिल रहे हैं भारतीय नागरिक होने की वजह से, चाहे वह फ्री राशन है, चाहे दूसरी सुविधाएं, उन पर कहीं आंच न आ जाए.
इसलिए बड़ी संख्या में लोग बाहर से लौट के वोट डाल रहे थे, बंगाल जा रहे थे. और यह वोट चुनाव परिणाम में बड़ी भूमिका निभा पाएगा.
नतीजा जो भी हो, दो-तीन बातें गौर करने की है. देश की राजनीति पर पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणाम का बड़ा असर पड़ेगा.
एक तो अगर टीएमसी जीतती है तो वह विपक्ष के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी. उनको लगेगा कि बीजेपी का मुक़ाबला हो सकता है.
लेकिन अगर कोई इसका यह अर्थ निकाले कि टीएमसी का जीतना कोई सेक्यूलर फोर्सेस (धर्मनिरपेक्ष ताकतों) की जीत है या कम्युनल फोर्सेस (सांप्रदायिक ताकत) की हार है तो वह भी इस चुनावी नतीजे का एक सरलीकरण होगा.
ध्यान रहे कि अगर वह चुनाव जीतते हैं तो बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट टीएमसी की बुनियाद है, जैसा कि सब लोग कहते हैं, ख़ासकर बीजेपी के नेता कहते नहीं थकते कि टीएमसी का तो वोट ही 28-30 प्रतिशत से शुरू होता है.
और उस तरह का रिवर्स मोबिलाइजेशन हो नहीं रहा है शायद बंगाल में जिससे कि बीजेपी आ जाए, मतलब बाकी सारे हिंदू एक तरफ़ हो गए. तो उसकी संभावना आसान नहीं है क्योंकि वहां पर मुद्दा बांग्ला आइडेंटिटी और बांग्ला सब-नेशनलिज्म का भी है.
अगर बीजेपी जीतेगी तो क्या होगा
अब दूसरे पहलू पर नज़र डालते हैं कि अगर बीजेपी जीतती है तो क्या होगा?
बीजेपी जीतती है तो एक तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि काफ़ी बड़ी तादाद में और काफ़ी कामयाब तरीके से हिंदू वोट का ध्रुवीकरण करने में बीजेपी कामयाब हो गई है.
उसके क्या नतीजे होंगे? बीजेपी का परचम अब करीब-करीब पूरे नॉर्थ, वेस्ट, सेंट्रल और ईस्टर्न इंडिया में लहराने लगेगा. तो एक तरह से इन इलाकों में बीजेपी का एकछत्र राज हो जाएगा.
इसका असर पड़ेगा विपक्ष के मनोबल पर और वह किस तरह से हतोत्साहित होंगे वह भी महत्वपूर्ण बात है.
कई लोगों का मानना है कि देश के लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि देश का इतना एकतरफ़ा राजनीतिक नक्शा न बने.
बहरहाल जो भी होगा, बहुत ही दिलचस्प होने वाला है. कांटे का मुक़ाबला रहा है और जब हम घूम रहे थे तब भी लग रहा था कि इस चुनाव को समझ पाना, कि इसका निष्कर्ष क्या होगा, इतना आसान नहीं है.
फिर भी मुझे ऐसा लगता है कि टीएमसी को बढ़त (एज) है. अब वह बढ़त कितनी ज्यादा सीटों में तब्दील होती है, कितना अंतर रहेगा बीजेपी और उनके बीच में, यह देखने की बात है.
लेकिन यह तय है कि इस बार का चुनाव कांटे का हुआ है और बहुत हिंसा भी नहीं हई है. क्योंकि ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि अब तक चुनावों में टीएमसी के लोग अपनी मनमर्जी करते थे, वह इस बार केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की वजह से नहीं हो पाई है.
उससे कितना मनोबल टूटा है या उससे कितना उनका वोट कटा होगा, यह भी एक पहलू है. जब चुनावी नतीजे आएंगे तब इस पर चर्चा होगी.
लेकिन यह बहुत ही महत्वपूर्ण चुनाव, बहुत कांटे का चुनाव और एक ऐसा चुनाव है जिसका देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.
( लेखक बीबीसी हिंदी के इंडिया एडिटर रहे हैं. लेख में उनके निजी विचार हैं.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.