पश्चिम बंगाल चुनावः एसआईआर में जहां वोट सबसे अधिक कटे, वहां रिकॉर्ड वोटिंग के क्या हैं मायने

    • Author, प्रत्यूष राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में वोटर टर्नआउट ने राज्य के इतिहास के सभी पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

कुछ जगहों पर झड़पों की छिटपुट घटनाओं के बावजूद मतदाताओं ने भारी संख्या में वोट डाले. इस बात की पुष्टि चुनाव आयोग के आंकड़ों से भी होती है.

इस चरण की वोटिंग में किसी भी पक्ष ने वोट में धांधली या बूथ कैप्चरिंग के संबंध में कोई गंभीर आरोप नहीं लगाया.

इससे पहले, पश्चिम बंगाल चुनावों में सबसे ज़्यादा वोटर टर्नआउट का रिकॉर्ड साल 2011 के नाम था. उस साल टर्नआउट 84.72 प्रतिशत रहा था. वह चुनाव राज्य के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ था.

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उसी चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने लेफ़्ट फ़्रंट गठबंधन के 34 साल के शासन को समाप्त किया और मुख्यमंत्री के रूप में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की.

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में समाज के सभी वर्गों के लोगों ने जिस तरह से हिस्सा लिया, वह सचमुच अभूतपूर्व है.

रिकॉर्ड वोटिंग की वजह

काम के सिलसिले में राज्य से बाहर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में रहने वाले कई बंगाली लोग चुनावों से पहले अपने घर लौट आए हैं.

चुनावों से पहले घर लौटने का चलन पश्चिम बंगाल के लिए कोई नया नहीं है. हालाँकि, इस बार घर लौटने की बेसब्री हर वर्ग में यानी उच्च-पदस्थ पेशेवरों से लेकर प्रवासी मज़दूरों तक साफ़ तौर पर देखी जा सकती थी.

चुनाव से पहले के दस दिनों में, ट्रेनों, बसों और फ़्लाइट्स के टिकट मिलना लगभग असंभव हो गया था. हावड़ा, सियालदह, न्यू जलपाईगुड़ी, मालदा टाउन और बर्धमान जंक्शन जैसे स्टेशन भीड़ से खचाखच भरे हुए थे.

तृणमूल कांग्रेस ने तो चुनाव आयोग में एक शिकायत भी दर्ज कराई है, जिसमें उसने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए दावा किया है कि बीजेपी ने प्रवासी मज़दूरों को घर वापस लाने के लिए कई विशेष ट्रेनों की व्यवस्था की थी.

चुनाव के पहले चरण के दौरान ग्रामीण इलाक़ों में मतदान प्रक्रिया पर नज़र रखने वाले पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के अनुसार, सुबह से ही वोटर टर्नआउट असाधारण रूप से ज़्यादा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बिस्वजीत भट्टाचार्य पिछले लगभग तीन दशकों से पश्चिम बंगाल में चुनावों पर नज़र रख रहे हैं.

वोटिंग के पहले चरण के दिन बीबीसी बांग्ला से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं कई सालों से चुनावों पर नज़र रख रहा हूँ और मैंने हमेशा देखा है कि गर्मी की वजह से वोटरों की लाइनें या तो बहुत सुबह या फिर दोपहर बाद लंबी होती हैं."

"आमतौर पर दोपहर 2.30 या 3.00 बजे के आसपास. लेकिन, इस बार सुबह से ही वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देख रहा हूँ."

गुरुवार, 23 अप्रैल को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों का पहला चरण चल रहा था तब कई इलाकों में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया.

वोटिंग के पहले चरण के दिन बीबीसी न्यूज़ बांग्ला ने नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में सामान्य और शांतिपूर्ण वोटिंग देखी.

यह विधानसभा क्षेत्र पहले भी राजनीतिक हिंसा और झड़पों की वजह से अक्सर सुर्खियों में रहा है. लेकिन, इस बार ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई है. इसके बजाय, वोटर अपने वोट डालने के लिए बूथों पर उत्साह के साथ आते दिखे.

वोट कहाँ और कितने पड़े?

चुनाव आयोग से मिले ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में गुरुवार को कुल 92.88 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई है.

मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में वोटिंग का प्रतिशत ज़्यादा देखा गया है.

उदाहरण के लिए, शीतलकुची में वोटिंग 97.53 प्रतिशत, मोथाबाड़ी में 95.05 प्रतिशत, भगवानगोला में 96.95 प्रतिशत, जंगीपुर में 95.72 प्रतिशत, चोपड़ा में 96.02 प्रतिशत और हेमताबाद में 96.40 प्रतिशत वोटिंग हुई.

यहाँ तक कि उन विधानसभा क्षेत्रों में भी, जहाँ चुनाव के दिन सुबह से ही गड़बड़ी की खबरें आ रही थीं, वोटिंग का प्रतिशत काफ़ी ज़्यादा रहा.

मसलन डोमकल (96.43 प्रतिशत), रेजीनगर (92.17 प्रतिशत) और कुमारगंज (95.87 प्रतिशत) में काफ़ी अच्छी संख्या में वोट डाले गए.

लेकिन, हिंदू बहुल और मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी वाले ज़्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में भी वोटिंग का प्रतिशत काफ़ी ज़्यादा रहा है.

पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, जलपाईगुड़ी और पुरुलिया ज़िलों में, ज़्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में वोटिंग 90 प्रतिशत से ज़्यादा हुई.

एसआईआर का डर और उसका असर

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले, राज्य का राजनीतिक माहौल एसआईआर (वोटर लिस्ट में सुधार) और क़रीब 91 लाख नामों को लिस्ट से हटाने को लेकर चल रहे विवाद से गरमाया हुआ था.

कई आम वोटरों ने मीडिया को बताया कि उन्हें यह डर सता रहा था कि अगर उन्होंने इस बार वोट नहीं डाला, तो हो सकता है कि वे भविष्य की वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज न करवा पाएं- उन्हें डर था कि यह स्थिति बाद में उनकी नागरिकता पर भी सवाल खड़े कर सकती है.

कई प्रवासी मज़दूर भी, अपनी चिंताओं को ज़ाहिर करने के लिए, दूसरी जगहों से पश्चिम बंगाल लौट आए.

पश्चिम बंगाल भर में हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के लोगों में यह डर फैला हुआ है, भले ही अधिकारियों की तरफ़ से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया हो.

चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों के नाम हटाने की दर ख़ास तौर पर ज़्यादा थी, वहां वोट डालने वालों की संख्या भी उसी हिसाब से ज़्यादा रही है.

मुर्शिदाबाद ज़िले के फरक्का, डोमकल, बेलडांगा, भगवानगोला और जंगीपुर जैसे क्षेत्रों में; मालदा ज़िले के हबीबपुर में; बीरभूम के हासना में; और उत्तरी दिनाजपुर के चोपड़ा में, साथ ही कई जगहों पर वोट डालने वालों की संख्या पिछले साल के मुकाबले ज़्यादा रही है.

इन इलाकों के कई निवासी आम तौर पर प्रवासी मज़दूरों के तौर पर काम की तलाश में दूसरी जगहों पर चले जाते हैं. लेकिन, इस बार उनमें से बड़ी संख्या में लोग वोट डालने के लिए वापस लौटे हैं.

'प्रवासी श्रमिक एकता मंच' (माइग्रेंट वर्कर्स यूनिटी फ़ोरम) के राज्य महासचिव आसिफ़ फ़ारूक ने कहा, "जिन लोगों के नाम एसआईआर प्रक्रिया के बाद भी वोटर लिस्ट में बने रहे, वे इस बात को लेकर पक्के थे कि इस बार ज़रूर वोट डालेंगे."

"हम मालदा और मुर्शिदाबाद इलाक़ों में प्रवासी मज़दूर समुदायों के बीच अपनी पहचान का सबूत सुरक्षित रखने की एक साफ़ बेचैनी देख रहे हैं."

वो कहते हैं, "हमने पहले कभी लोगों को अपनी वोटर पर्चियों की फ़ोटोकॉपी करवाते हुए नहीं देखा था; लेकिन, इस बार उन्होंने ठीक ऐसा ही किया है ताकि भविष्य में वे यह सबूत दे सकें कि एसआईआर के बाद उनके नाम सचमुच वोटर लिस्ट में थे और उन्होंने सफलतापूर्वक अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल किया था."

कोलकाता स्थित सामाजिक शोध संस्थान 'सबर इंस्टीट्यूट' के शोधकर्ता साबिर अहमद ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "ऐसा लगता है कि मुर्शिदाबाद ज़िले के मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की भारी भीड़ उमड़ी है."

साबिर अहमद ने कहा, "मतदाताओं की इस भागीदारी दर को देखते हुए, ऐसा लगता है कि लोग सबसे बढ़कर यह सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ हैं कि इस बार वे अपना वोट डाल सकें."

आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, एसवाई कुरैशी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड तोड़ मतदाता भागीदारी को "बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया" कहा है.

बीबीसी बांग्ला से बात करते हुए उन्होंने कहा, "पश्चिम बंगाल ऐतिहासिक रूप से 'ज़्यादा मतदान' वाले राज्य के तौर पर जाना जाता रहा है. हालांकि अगर मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटा दिए जाएं और संशोधित सूची के आधार पर आंकड़ों की गणना होगी तो वोटिंग स्वाभाविक रूप से ज़्यादा दिखेगी."

कुरैशी का मानना ​​है, "हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कई लोग डर के मारे वोट डालने के लिए अपने घर लौटे, लेकिन अगर चुनाव पिछली मतदाता सूची का इस्तेमाल करके कराया गया होता, तो मतदान में बढ़ोतरी पिछली बार की तुलना में 2 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होती."

भारतीय चुनावी इतिहास में आमतौर पर देखा गया है कि जब सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ़ लोगों में नाराज़गी होती है, तो अक्सर मतदाताओं की भागीदारी बढ़ जाती है.

हालांकि एसवाई कुरैशी ऐसा नहीं मानते कि पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड वोटिंग के पीछे ऐसी कोई वजह है.

पुरुलिया, कलिम्पोंग और झाड़ग्राम ज़िलों में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सबसे कम नाम हटाए गए.

चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इन ज़िलों वोटिंग, मतदान के पहले चरण में पूरे राज्य में हुई औसत वोटिंग से कम थी. सबसे कम मतदान कलिम्पोंग ज़िले में देखा गया, जहां यह 83 प्रतिशत से थोड़ा ही ज़्यादा था.

सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष, दोनों ही रिकॉर्ड वोटिंग को लेकर आशावादी हैं.

चुनाव के बाद, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी बीजेपी, दोनों ने ही उम्मीद जताई है कि यह रिकॉर्ड वोटिंग उनके अपने-अपने खेमों के लिए वोटों में तब्दील होगा.

हालांकि, कोई भी पक्ष केवल ज़ुबानी आश्वासनों को ही सच मानकर संतुष्ट नहीं है. तृणमूल और बीजेपी दोनों के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, दोनों पार्टियां इस समय हर सीट का अलग-अलग विश्लेषण कर रही हैं ताकि इस रिकॉर्ड वोटिंग के असर को बारीकी से समझा जा सके.

मतदान का पहला चरण ख़त्म होने के बाद, राज्य की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की शीर्ष नेता, ममता बनर्जी ने कोलकाता के चौरंगी इलाके में एक सभा को संबोधित किया.

उन्होंने कहा, "लोग इसे अपने अधिकारों की रक्षा की लड़ाई के तौर पर देख रहे हैं. वे परिसीमन, एनआरसी और ऐसे ही दूसरे मामलों को लेकर डर के साए में जी रहे थे."

गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.

इस दौरान उन्होंने कहा, "हमारी उम्मीदवारों की सूची में कई ऐसे लोग शामिल हैं, जिन्हें तृणमूल के भ्रष्टाचार की वजह से नुक़सान उठाना पड़ा है. इसके अलावा, कई ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो तृणमूल की धमकियों के डर में जी रहे थे और अब हमारे उम्मीदवारों को अपना समर्थन देने के लिए आगे आ रहे हैं."

वोटरों की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "इस चुनाव में फर्जी वोटरों और घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने, प्रशासन के सक्रिय रवैये और चुनाव आयोग की पहल की वजह से लोग बिना किसी डर के बाहर निकलकर अपना वोट डाल पाए हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.