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वीडी सतीशन: केरल में मुख्यमंत्री पद के लिए कैसे बने कांग्रेस की पसंद
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरू से बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
केरल के मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस हाईकमान ने वीडी सतीशन को चुना है.
वे ऐसे आक्रामक कांग्रेसी के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने सख़्त छवि वाले एलडीएफ़ मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से सीधी टक्कर ली.
अब तक ऐसा कोई मौका नहीं आया है, जब सतीशन ने एलडीएफ़ सरकार या विजयन को बख़्शा हो. वे ये सब तब कर रहे थे जब विजयन को कोई चुनौती नहीं दे रहा था.
कई मुद्दों पर अपने सख्त रुख़ के चलते विजयन को "मुंडू में मोदी" तक कहा जाने लगा था. केरल में मुंडू धोती का एक नाम है.
हालांकि 61 साल के वीडी सतीशन भी कुछ मायनों में बहुत अलग नहीं हैं.
एक बार एझावा समुदाय के संगठन एसएनडीपी और नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) चाहते थे कि सतीशन उनसे मिलें.
लेकिन उन्होंने जाति संगठनों से कोई संबंध न रखने का रुख़ अपना लिया. ऐसा करके उन्होंने संकेत दिया कि वो सीधे जनता से जुड़ेंगे.
राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफे़सर जे. प्रभाष ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "वे सीधे जनता के पास गए और उनका समर्थन हासिल किया. वे अपने निर्णायक फैसलों के लिए जाने जाते हैं. दूसरे नेताओं की तरह वो कभी भी जातियों के नाम पर बने संगठनों के पास नहीं गए. इस एक फै़सले ने उन्हें समाज के अन्य वर्गों का समर्थन भी दिलाया."
उनका सीधा 'हाँ' या 'ना' कहने वाला रवैया ईसाई और मुस्लिम समुदायों को पसंद आया.
इससे इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) खुलकर उनके समर्थन में आई.
आईयूएमएल की ओर से भी लगातार कहा गया कि वो कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सतीशन को पसंद करेगी.
सहयोगी दलों में अपनी पैठ और आम लोगों के बीच लोकप्रियता ने उन्हें कांग्रेस की पहली पसंद बना दिया.
कैसे बने ताक़तवर नेता
आईयूएमएल का यह रुख़ कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों को अलग-अलग कारणों से खटका.
कांग्रेसियों को यह अखरा कि गठबंधन सहयोगी इस मामले में दख़ल दे रहे हैं. वहीं, बीजेपी ने इसे राज्य में "मुस्लिम शासन" लाने की कोशिश के रूप में देखा.
लेकिन पिछले पांच वर्षों में राजनीति और शासन को लेकर सतीशन के रवैये और उनके दौरों को आम लोगों से पूरे राज्य में समर्थन मिला.
पोनान्नी से कांग्रेस विधायक केपी नौशाद अली ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "इसी समर्थन ने उन्हें एक ताक़तवर नेता बनाया है. उन्होंने ध्रुवीकरण का विरोध करके अल्पसंख्यकों का दिल जीता. समाज के सभी वर्गों को धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता ने भरोसा दिलाया."
मतगणना के दिन तिरुवनंतपुरम में पार्टी कार्यालय के बाहर मौजूद एक राजनीतिक पर्यवेक्षक ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा "ज़मीन पर उनकी लोकप्रियता ने ही उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे लाकर खड़ा किया है."
उनका आकलन था, "भले सतीशन के पास प्रशासनिक अनुभव नहीं है लेकिन इतने बड़े बहुमत के साथ बनने वाली सरकार की अगुआई वे ही कर सकते हैं. "
जब नहीं बन पाए थे मंत्री
केरल के पूर्व सीएम ओमन चांडी के मंत्रिमंडल में सतीशन लगभग मंत्री बनने वाले थे.
लेकिन आख़िरी समय में उनके नेता रमेश चेन्निथला ने उनका नाम हटाकर वीएस शिवकुमार का नाम रख दिया. यही बात रमेश चेन्निथला के साथ उनके संबंधों में खटास का कारण बनी.
अगस्त 2025 में सतीशन ने दो सम्मेलन आयोजित किए जो स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा को लेकर थे.
मक़सद था कि दोनों क्षेत्रों में विशेषज्ञों की राय लेकर ऐसी नीतिगत दिशा तय की जा सके जिसका ज़मीनी स्तर पर प्रभाव पड़े.
एक अधिकारी ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बताया, "स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बनी दो समितियों ने नीति में कई बदलाव सुझाए हैं. हेल्थ सिस्टम काफी मजबूत है, लेकिन अभी भी कुछ कमियां हैं."
सतीशन ने अपने करियर की शुरुआत केरल हाई कोर्ट में एक वकील के रूप में की.
हालांकि राजनीति में उनकी रुचि छात्र जीवन से ही शुरू हो गई थी.
वो पहली बार 2001 में विधानसभा के लिए चुने गए और तब से लेकर अब तक पारावुर विधानसभा क्षेत्र से लगातार हर चुनाव जीतते आए हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित