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एयर इंडिया क्रैश में बेटे को खोने वाली मां का दर्द: 'वह हर जगह मेरे साथ रहता है दिन-रात'
- Author, ज़ोया मतीन
- ........से, मुंबई
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
उस विमान दुर्घटना के लगभग एक साल बाद जिसमें उनके भाई जावेद, भाभी मरियम और उनके दो बच्चे मारे गए थे, जब मैंने इम्तियाज़ अली को फ़ोन करके पूछा कि क्या हम मिल सकते हैं, तो हमने पहले तय किया कि मुंबई में उनके घर पर बात करेंगे. कुछ घंटे बाद इम्तियाज़ ने अपना मन बदल लिया और कहा, "इसके बजाय हम होटल में मिलते हैं."
बाद में मुंबई के एक होटल की हल्की रोशनी में उन्होंने मुझे इसकी वजह बताई.
जावेद और उनका परिवार ब्रिटेन में रहता था, लेकिन अक्सर मुंबई लौटकर वो इम्तियाज़ और बाकी परिवार से मिलते थे. लेकिन दुर्घटना के बाद घर अब वैसा नहीं रह गया था. उसमें कुछ ऐसा बदल गया था जिसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी की दिनचर्या न समझा सकती थी और न ही ठीक कर सकती थी.
इम्तियाज़ ने धीरे से कहा, "ऐसा लगता है जैसे जावेद अब भी वहीं है."
बाद में उनकी माँ फ़रीदा बानो ने इसे और आसान शब्दों में कहा, "वह हर जगह मेरे साथ रहता है. दिन-रात."
कुछ ही हफ़्तों में जाँचकर्ता एयर इंडिया फ़्लाइट एआई171 (AI171) की दुर्घटना पर अपनी अंतिम रिपोर्ट जारी करने वाले हैं. यह अहमदाबाद से लंदन जाने वाली उड़ान थी, जो पिछले जून में टेकऑफ़ के एक मिनट से भी कम समय में आसमान से गिर गई थी. विमान में सवार 242 लोगों में से केवल एक ही व्यक्ति जीवित बचा था.
एक साल से पीड़ित परिवारों के पास कई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब उन्हें नहीं मिले हैं: जैसे कॉकपिट में क्या हुआ, विमान ने थ्रस्ट क्यों खोया, क्या यह हादसा मानवीय ग़लती थी, तकनीकी ख़राबी थी या कुछ और.
'वे दोनों पूरा दिन बातें करते रहते थे'
मैं इम्तियाज़ से पहले दो बार अहमदाबाद में मिली थी- दुर्घटना के बाद के स्तब्ध करने वाले दिनों में. उस समय परिवार अपने प्रियजनों की पहचान के लिए डीएनए की पुष्टि किए जाने का इंतज़ार कर रहे थे. यह वह समय था जब वह उस कड़वी हक़ीक़त को पचाने की कोशिश कर रहे थे. तब उन्होंने मुझसे कहा था, "शायद वह वापस आ जाए."
मुंबई में लगभग एक साल बाद अविश्वास का धुंधलका तो हट चुका था, लेकिन इंतज़ार अब भी था. इस केस की जांच का परिणाम सामने न आने को लेकर उन्होंने कहा, "यह उलझन, यह अधर में रहना हमें परेशान रखता है."
अली परिवार कई मायनों में मुंबई के एक साधारण परिवार जैसा था, जिसे प्रवास और त्याग ने आकार दिया था. पिता का साया सर से जल्दी उठ गया था. बच्चों की परवरिश ज़्यादातर मुंबई में दादी ने की, जबकि माँ कई साल तक दुबई में काम करती रहीं.
जावेद बाद में ब्रिटेन चले गए. वे उन हज़ारों भारतीयों में शामिल थे जो आर्थिक स्थिरता की तलाश में विदेश जाते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अपने परिवार से जुड़े रहते हैं. वहाँ उनकी मुलाक़ात मरियम से हुई और उन्होंने शादी कर ली. मरियम लंदन के हैरड्स में काम करती थीं. उनके बच्चे ज़ैन और अमानी वहीं पैदा हुए.
भारत की उनकी यह यात्रा ख़ास होनी चाहिए थी. पहली बार यह दंपति अपने बच्चों को भारत लाया था.
लेकिन परिवार का दुख दुर्घटना पर ख़त्म नहीं हुआ. मरियम की माँ, जो ब्रिटेन में जावेद और मरियम के साथ रहतीं थीं, पिछले साल चल बसीं. वह कई साल से बीमार थीं, लेकिन इम्तियाज़ उनकी मौत को उस हादसे से अलग नहीं कर पाते. उन्होंने कहा, "किसी भी बीमारी के मुक़ाबले ग़म ने उन्हें तेज़ी से घेरा."
इससे उनकी अपनी माँ के लिए डर और गहरा हो गया है, जिनका जावेद से मज़बूत रिश्ता था. इम्तियाज़ ने कहा, "वे दोनों पूरा दिन बातें करते रहते थे." फिर वे रुके और कहा "अब, यही ख़ामोशी उन्हें मार रही है."
'मैंने उनसे झूठ बोला'
दुर्घटना के बाद कई दिन बाद तक उन्होंने अपनी माँ को सच्चाई से बचाने की कोशिश की. वह दिल की मरीज़ थीं. एयर इंडिया अधिकारियों और डॉक्टरों ने सावधानी बरतने की सलाह दी. एक मनोवैज्ञानिक को बुलाया गया. उनका दिल नाज़ुक था और परिवार को डर था कि सदमा उनकी जान भी ले सकता है.
इसलिए ख़बर टुकड़ों में दी गई. पहले बताया गया: हादसा हुआ है. मरियम और बच्चे घायल हैं. उनके लिए दुआ करो. कुछ घंटे बाद कहा गया: मरियम की हालत गंभीर है. वह बार-बार पूछती रहीं, "जावेद का क्या हुआ? बच्चों का क्या हुआ?"
इम्तियाज़ ने कहा, "मैंने उनसे झूठ बोला. मैंने कहा वे ठीक हैं."
किसी के साफ़-साफ़ कुछ कहने से पहले ही उन्हें आभास हो गया था कि कुछ गड़बड़ है. उन्होंने कहा, "जब मेरा बेटा गया, तो उसने दो दिन तक मुझे फ़ोन नहीं किया. उसने कभी ऐसा नहीं किया."
रिश्तेदारों ने उन्हें दिलासा देने की कोशिश की, लेकिन ख़ामोशी ने उन्हें बेचैन कर दिया. उन्होंने कहा, "मैं सो नहीं पाई. मैं बार-बार पूछती रही: मेरा बेटा कहाँ है?"
आख़िरकार उन्हें अहमदाबाद ले जाया गया. बहाना बनाया गया कि किसी बीमार रिश्तेदार से मिलने जाना है. उन्होंने कहा कि जैसे ही वह होटल के कमरे में दाख़िल हुईं, जहाँ परिवार इकट्ठा था, उन्हें सब समझ आ गया. इम्तियाज़ बताते हैं, "मैंने उन्हें बताया कि विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. जावेद मर चुका है."
जब इम्तियाज़ बोल रहे थे, बाहर शहर गर्मी से तप रहा था. उन्होंने कहा कि परिवार आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दुख है कि जाता ही नहीं. उनकी माँ आज भी जावेद के बारे में अब भी ऐसे बात करती हैं जैसे वह मौजूद हो. परिवार के खाने में उसकी पसंदीदा डिशें अब भी शामिल रहती हैं. भाई-बहनों की बातचीत वहीं रुक जाती है जहाँ जावेद की आवाज़ ख़ामोशी को भर दिया करती थी.
'हमने उन पर भरोसा किया था'
सबसे मुश्किल समय सितंबर में आया, जब उनकी माँ की दिल की बीमारी बिगड़ गई. डॉक्टरों ने तीन और स्टेंट लगाए, जो कुल मिलाकर पाँच हो गए. उन्होंने चेतावनी दी कि तनाव उनकी दिल की बीमारी, डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर को और बढ़ा रहा है. इम्तियाज़ ने कहा, "जब वह जावेद को याद करके रोती हैं, तो उनका शुगर लेवल अचानक बढ़ जाता है."
और उसी के साथ एयर इंडिया और टाटा ग्रुप अधिकारियों को लेकर उनकी नाराज़गी और बढ़ गई. उन्होंने बताया कि परिवार महीनों तक जाँच की जानकारी, सामान की वापसी और उस मेडिकल सपोर्ट का इंतज़ार करता रहा, जिसका वादा किया गया था. जवाब अक्सर देर से मिलते थे और अस्पष्ट होते थे. उनका मानना था कि कार्रवाई तभी होती थी जब मीडिया का ध्यान जाता या सार्वजनिक दबाव बनता. टाटा से जुड़ी सहायता योजनाओं के तहत एक बार तो डॉक्टरों ने उनकी माँ की जाँच करने में महीनों लगा दिए.
इम्तियाज़ ने धीरे से कहा, "हमने उन पर भरोसा किया था. हमें लगा था कि वे हमारे साथ खड़े रहेंगे."
बीबीसी ने परिवार के आरोपों पर टिप्पणी के लिए एयर इंडिया से संपर्क किया है.
विमान दुर्घटना की जाँच जटिल होती है और इनमें अक्सर महीनों लगते हैं. अंतरराष्ट्रीय विमानन नियमों के तहत अंतिम रिपोर्ट आम तौर पर एक साल के भीतर आ जानी चाहिए. इस मामले में अंतरिम रिपोर्ट दुर्घटना के एक महीने बाद जारी हुई थी. लेकिन परिवारों के लिए तकनीकी विवरण केवल दर्द बढ़ाते हैं. इम्तियाज़ ने कहा, "हम आधुनिक देश में रहते हैं. हम जवाबों के लिए एक साल क्यों इंतज़ार करें?"
जावेद भी उन कई लोगों में थे जिन्होंने अपने परिवार का सहारा बनने के लिए सालों तक विदेश में काम किया. दोनों भाइयों ने दुबई में मिलकर व्यापार शुरू करने की योजना भी बनाई थी. सिर झुकाते हुए इम्तियाज़ ने कहा, "और फिर, ज़िंदगी का सबसे अच्छा दौर शुरू होने से ठीक पहले, वह चला गया."
उनके बगल में बैठी माँ ने हल्का-सा कंधा उचकाया. उन्होंने कहा, "अब मुझे रिपोर्ट की परवाह नहीं. क्या कोई रिपोर्ट मेरा बेटा वापस ला सकती है?"
'उसने कहा था कि वह जल्द ही वापस आएगा'
उनके लिए अब यह दुख छोटी-छोटी यादों में ज़िंदा है. वह जावेद के अहमदाबाद जाने से पहले की रात के खाने को याद करती हैं- 'बहुत हँसी-ख़ुशी की रात थी'. और फिर पोते-पोतियों की पहली लंबी मुलाक़ात, जिन्होंने "मुझे इतनी तेज़ गले लगाया कि वे जाना ही नहीं चाहते थे."
इस पूरी यात्रा के दौरान जावेद उनका ख़्याल रखता रहा. उन्हें बाज़ार ले गया और ज़िद करके 15 नए कपड़े ख़रीदवाए. उन्होंने कहा, "मैंने उससे पूछा, 'क्यों? क्या मैं शादी में जा रही हूँ?'" और यह कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू आ गए."
मुंबई में अपनी आख़िरी रात वह अपना सिर उनकी गोद में रखकर सोया था. उन्होंने कहा, "उसने कहा था कि वह जल्द ही वापस आएगा."
शाम को, जब मुंबई की गर्मी थोड़ी नरम पड़ने लगती है, वह अकेली कब्रिस्तान जाती हैं. साथ में वही खाना ले जाती हैं जो जावेद को पसंद था- मटन स्ट्यू, फिश फ्राई, कभी-कभी आम- ऐसे पैक करके जैसे वह अब भी लौट आएगा. धीरे-धीरे बैठती हैं. दिल में लगे स्टेंट्स ने चलना-फिरना मुश्किल कर दिया है.
फिर वह उससे बात करती हैं. वह धीरे से पुकारती हैं, "देखो, मैं आ गई हूँ, मेरे बेटे. मैं तुमसे मिलने आई हूँ."
जिस दिन परिवार को एयरलाइन से जावेद का टूटा हुआ सूटकेस मिला, किसी ने उसे खोला नहीं. इम्तियाज़ ने कहा, "वह अलग रखा है. हम उसे छूते नहीं."
ऐसे पलों ने इम्तियाज़ को जवाबों की तलाश में डुबो दिया है. उन्होंने एयरलाइन को ईमेल लिखे, वकील रखे और समझने की कोशिश की कि दुर्घटना कैसे हुई. एक समय रिश्तेदारों ने उन्हें दुबई भेज दिया ताकि वह इस खोज से दूर हो जाएँ. उसके बाद उन्हें पैनिक अटैक आने लगे. उन्होंने कहा, "कभी-कभी मैं काँपते हुए उठता हूँ. लगता है जैसे मैं फिर वहीं हूँ- पहली बार ख़बर सुन रहा हूँ."
'कुछ सवालों के जवाब सिर्फ़ मृतक ही दे सकते हैं'
कई महीनों तक इम्तियाज़ को लगता रहा कि जाँच रिपोर्ट शायद उन्हें शांति देगी. लेकिन उन्हें सँभालने वाली चीज़ कुछ और थी.
दफ़न किए जाने के कुछ हफ़्तों बाद उनकी बड़ी बहन ने उन्हें जावेद का पुराना ऑडियो संदेश भेजा. यह संदेश दुर्घटना से पहले रिकॉर्ड किया गया था. उसमें जावेद ने एक सपने के बारे में बताया था: दो फ़रिश्ते उसके पास आए थे और उसे ले जाने से पहले गुलाब जैसी ख़ुशबू में नहलाया था. रिकॉर्डिंग में जावेद ने कहा था, "जब मैं जागा, तो अब भी वही ख़ुशबू आ रही थी."
यह सुनने के बाद इम्तियाज़ चुपचाप बैठे रहे. आँखों में आँसू भर आए.
इस्लामी परंपरा में शहादत को आध्यात्मिक पवित्रता से जोड़ा जाता है. परिवार अक्सर ऐसे निधन को सम्मानित मौत कहकर दिलासा पाते हैं. अंतिम संस्कार के बाद रिश्तेदारों ने इम्तियाज़ से कहा कि जावेद ने सम्मानजनक मौत पाई है. उस समय उन्होंने विश्वास नहीं किया. लेकिन भाई की आवाज़ सुनकर कुछ बदल गया. उन्होंने धीरे से कहा, "यही जवाब मुझे चाहिए था. उसे शांति मिल गई है."
जाँच रिपोर्ट शायद बताएगी कि विमान कैसे दुर्घटनाग्रस्त हुआ. लेकिन उस वॉइस नोट ने उन्हें जीना सिखाया.
बाहर शाम हो रही थी. कहीं से नम हवा में अज़ान की आवाज़ उठी.
इम्तियाज़ ने कहा, "कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब सिर्फ़ मारे गए लोग ही दे सकते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.