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बालेन शाह ने भारत के साथ सीमा विवाद पर ऐसा क्या कहा जिसकी नेपाल में हो रही आलोचना
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा करते हुए कहा है कि 'केवल भारत ने ही नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है.'
इसे लेकर नेपाल में राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया यूज़र्स की ओर से बालेन शाह की तीखी आलोचना हो रही है. नेपाल के विदेश मंत्रालय को पीएम के बयान पर सफ़ाई देनी पड़ी है.
कई नेपाली राजनयिक अब कह रहे हैं कि बालेन शाह के इस बयान ने कालापानी, लिम्पियाधुरा और सुस्ता पर नेपाल के दावे को कमज़ोर कर दिया है.
वहीं दक्षिण एशिया मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि ने प्रधानमंत्री बालेन शाह की साफ़गोई की तारीफ़ की है.
प्रोफ़ेसर एसडी मुनि ने एक्स पर लिखा, "प्रधानमंत्री बालेन शाह इस बात को साहस के साथ स्वीकार करने के लिए बधाई के पात्र हैं कि भारत-नेपाल सीमा विवाद एकतरफ़ा नहीं है. नदी के मार्ग में बदलाव के कारण नेपाल सुस्ता क्षेत्र में भारतीय भूभाग पर बैठा हुआ है."
हालाँकि, उन्होंने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की कोशिश न करने की सलाह दी है.
पिछले साल जेन ज़ी आंदोलन के बाद बीती पांच मार्च को हुए चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने प्रतिनिधि सभा में लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल कर बालेन शाह के नेतृत्व में सरकार बनाई थी.
बालेन शाह ने क्या कहा
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक़, रविवार को नेपाली संसद (प्रतिनिधि सभा) में बोलते हुए बालेन शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की ज़मीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है."
उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को देखना चाहिए.
दरअसल विपक्षी दलों के जन प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री से संसद को संबोधित करने की मांग उठाई थी जिसके बाद बालेन शाह ने संसद को संबोधित किया और सदस्यों के सवालों के जवाब दिए.
संसद सत्र के दौरान श्रम शक्ति पार्टी के सांसद आरेन राय ने भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद पर सवाल किया था.
भारत और चीन के बीच लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के रास्ते होने वाले व्यापार पर यूएमएल की उपनेता पद्मा अर्याल के एक सवाल का जवाब देते हुए शाह ने कहा, "लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी से जुड़े विवादों का समाधान कूटनीतिक संवाद के ज़रिए किया जाएगा."
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने कहा कि नेपाल पहले ही भारत को एक आधिकारिक कूटनीतिक नोट भेज चुका है और उसे जवाब भी मिल चुका है.
शाह ने कहा, "जवाब में कहा गया है कि दोनों सरकारें इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और क्षेत्र की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की टीमें बनाएंगी और बातचीत की मेज़ पर समाधान तलाशेंगी."
उन्होंने कहा कि नेपाल ने सीमा विवाद को लेकर चीन और यूनाइटेड किंगडम के साथ भी कूटनीतिक स्तर पर चर्चा की है.
शाह ने कहा, "हमने केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि यूके सरकार से भी बात की है. हमारा मानना है कि यूके को भी इस मामले में रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उस दौर से जुड़ा है जब ब्रिटिश इंडिया इस क्षेत्र को छोड़कर गया था."
लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी नेपाल के राजनीतिक हलके में एक संवेदनशील मामला रहा है.
जून 2020 में नेपाल की संसद में एक नक्शा पारित किया गया जिसमें इन दोनों क्षेत्रों को नेपाल में दिखाया गया था.
इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दावे एतिहासिक तथ्य और सबूतों पर आधारित नहीं हैं और ना ही इसका कोई मतलब है.
नेपाल में छिड़ी बहस
नेपाल की विपक्षी पार्टियों ने बालेन शाह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.
बीबीसी नेपाली के अनुसार, नेपाली कांग्रेस के नेता वासना थापा ने कहा, "हमें जल्द सूचित किया जाना चाहिए था कि किस भूमि पर अतिक्रमण हुआ है. यह एक गंभीर और आपत्तिजनक मुद्दा है."
उन्होंने पीएम के बयान को संसद के रिकॉर्ड से हटाने की भी मांग की.
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के सांसद रमेश मल्ला ने भी इसे गंभीर मामला बताते हुए रिकॉर्ड से हटाने की मांग की.
सीपीएन-यूएमएल ने पीएम के बयानों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उन्हें गैर-ज़िम्मेदाराना, तथ्यात्मक रूप से ग़लत और राष्ट्रीय हित के ख़िलाफ़ बताया है.
यूएमएल ने प्रधानमंत्री बालेन शाह से माफ़ी मांगने और स्पष्ट बयान जारी करने की मांग की है. पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री के बयान से भ्रम की स्थिति पैदा हुई है और सुरक्षाकर्मियों, विशेषज्ञों और आम जनता की भावनाओं को ठेस पहुंची है.
नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री को लगता है कि नेपाल ने ज़मीन का अतिक्रमण किया है तो सम्मान के साथ उसे भारत को वापस कर देना चाहिए.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "उन्हें जनता को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वह कौन-सी जगह है और उसके क्या सबूत हैं. उन्हें तुरंत उस ग़लती को सुधारना चाहिए और सम्मानपूर्वक वह ज़मीन भारत को वापस कर देनी चाहिए. हालाँकि, मेरे विचार में प्रधानमंत्री का यह बयान बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया और ग़लत है"
कमल थापा ने आगे लिखा, "ऐसे समय में, जब लिम्पियाधुरा, कालापानी, लिपुलेख और सुस्ता क्षेत्रों में नेपाल के अभिन्न भूभाग पर भारत के अतिक्रमण को लेकर पूरे देश में बहस और चिंता है, प्रधानमंत्री का यह कहना कि 'नेपाल ने भी भारत की सीमा पर अतिक्रमण किया है', पूरी तरह गैर-ज़िम्मेदाराना है."
उन्होंने 'हल्के और आपत्तिजनक' बयान में सुधार करने की प्रधानमंत्री से अपील की.
हंगामा बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने विदेशी मीडिया के लिए एक बयान जारी किया.
इस बयान में कहा गया है, "भारत की ओर से नेपाल के लिपुलेख इलाक़े से होकर मानसरोवर तीर्थ यात्रा का रास्ता खोलने के मुद्दे पर नेपाल सरकार ने अपनी आधिकारिक स्थिति डिप्लोमेटिक नोट के ज़रिए भारत को भेजा था जिसका जवाब भी मिल गया है."
बयान में साफ़ किया गया है कि नदियों के घुमाव के कारण इन जगहों के अलावा, कुछ और जगहों पर 'क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन' जैसी अतिक्रमण की समस्याएं हैं, जिन्हें दोनों देशों ने बातचीत के ज़रिए हल करने पर सहमति दी है.
कुछ लोगों ने बालेन शाह के बयान का बचाव भी किया है.
विदेश मामलों और रणनीतिक मामलों के जानकार, नेपाल के पत्रकार परशुराम काफले ने एक्स पर लिखा, "नेपाल-भारत बॉर्डर पर दोनों ने क्रॉस-होल्डिंग की हुई है (सुस्ता और कालापानी अलग मुद्दे हैं). सिक्योरिटी एजेंसियों और सरकारी एजेंसियों को यह बात पता है. दूसरी सरकारों ने झूठ बोला है."
अरुन सुबेदी ने एक्स पर लिखा, "पीएम ने इतिहास में पहली बार बॉर्डर पार से प्रॉपर्टी और रहने की जगह पर कब्ज़े का मुद्दा उठाया. पहले लेफ्टिस्ट दबदबे की वजह से इस मुद्दे को नज़रअंदाज़ किया जाता था; पीएम की हिम्मत तारीफ़ के काबिल है."
उन्होंने लिखा, "अगर यह प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती है, तो सिर्फ़ सुस्ता और कालापानी ही बचेंगे."
सोशल मीडिया पर आलोचना
सोशल मीडिया पर भी बालेन शाह के बयान को लेकर बहस छिड़ी हुई है.
एक्स यूज़र रंजन यादव ने लिखा, "हम नेपाली लोगों ने केवल सोशल मीडिया पर मिली लोकप्रियता के आधार पर एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री चुन लिया. आज संसद में दिए गए उनके भाषण ने एक बार फिर दिखा दिया कि वास्तव में उन्हें जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, वह उससे कहीं कम काबिल हैं. नेपाल ने भी भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है? क्या सच में ऐसा है?"
एक अन्य यूज़र बिजय पौडेल ने एक्स पर लिखा, "प्रधानमंत्री ने ख़ुद संसद में यह कहकर कि नेपाल ने ज़मीन पर अतिक्रमण किया है, इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड का हिस्सा बना दिया. अब दोनों देशों को इससे राहत मिल गई है."
एलिजा ढकाल ने एक्स पर लिखा, "यह इरादों पर शक करने की बात नहीं है, बल्कि यह बात है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे व्यक्ति को एक डिप्लोमैटिक मामले पर इतनी हल्की और बचकानी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. जब प्रधानमंत्री ने ऐसी टिप्पणी की, तो उन्हें याद रखना चाहिए था कि वे नेपाल के प्रधानमंत्री हैं."
भारत के प्रति बालेन शाह का रुख़
बीबीसी नेपाली के अनुसार, सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रवि लामिछाने अगले सप्ताह दिल्ली का दौरा करने वाले हैं.
बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के बाद से लामिछाने सत्तारूढ़ पार्टी के पहले उच्च स्तरीय नेता हैं जिन्हें भारत आने का न्योता मिला है.
बीजेपी के बयान के अनुसार, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के निमंत्रण पर लामिछाने एक जून से भारत आ रहे हैं.
भारत को लेकर बालेन शाह का रुख़ अभी बहुत साफ़ नहीं है.
मार्च के बाद से कई ख़बरें आईं जो भारत के साथ नेपाल के संबंधों को सहज करने वाली नहीं हैं. बीते अप्रैल में ही नेपाल एयरलाइंस ने एक 'नेटवर्क मैप' में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखा दिया जिस पर विवाद के बाद एयरलाइंस ने "मानचित्र संबंधी ग़लतियों" के लिए माफ़ी मांगी.
इससे पहले बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद काठमांडू में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर बधाई देना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
बालेन शाह ने काठमांडू में मौजूद सभी राजदूतों को सामूहिक रूप से मुलाक़ात का समय दिया. यानी भारत के राजदूत के लिए कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं रहा.
यही नहीं, आरएसपी ने बयान जारी कर कहा कि नेपाली प्रधानमंत्री कम से कम एक साल तक कोई विदेश यात्रा नहीं करेंगे. जबकि परंपरा रही है कि नेपाल में प्रधानमंत्री बनने के बाद शीर्ष नेतृत्व सबसे पहले भारत का दौरा करता है.
काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, बालेन शाह भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री से भी नहीं मिले क्योंकि उनका कहना था कि वह मंत्री स्तर से नीचे के किसी भी विदेशी अधिकारी से नहीं मिलेंगे.
हालांकि बीबीसी नेपाली के अनुसार, रवि लामिछाने का यह संभावित दौरा भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के निमंत्रण पर किया जा रहा है.
दिल्ली पहुंचने पर उनकी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा करने की उम्मीद है.
भारत और नेपाल के बीच विवाद का मुद्दा
भारत और नेपाल के बीच मानचित्र को लेकर विवाद काफ़ी पुराना है. इसमें लिपुलेख से जुड़ा विवाद अहम है.
नेपाल दावा करता रहा है कि महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख सहित सभी क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल के क्षेत्र का हिस्सा हैं.
लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में स्थित है. यह भारत, नेपाल और चीन की सीमा से जुड़ा है. भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है.
नवंबर 2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए और इसके साथ ही नया नक्शा जारी किया. इस नक्शे में ये इलाके शामिल थे.
नेपाल ने इस पर तीखी आपत्ति जताई और कहा कि भारत अपना नक्शा बदले क्योंकि कालापानी उसका इलाक़ा है. इसके पाँच महीने बाद, मई 2020 में लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ गया.
इसके बाद 18 जून 2020 को नेपाल ने संविधान में संशोधन कर देश के राजनीतिक नक्शे को अपडेट किया. संशोधन के बाद नेपाल के मानचित्र में तीन रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्र- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा दिखाए गए.
भारत ने इसे 'एकतरफ़ा क़दम' बताते हुए नेपाल के क्षेत्रीय दावों को 'कृत्रिम विस्तार' मानने से साफ इनकार कर दिया.
भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.