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राघव चड्ढा के नेतृत्व में आप में हुई टूट क्या बीजेपी को फ़ायदा पहुँचा सकती है?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का एलान किया है. पार्टी छोड़ने के बाद राघव चड्ढा ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाक़ात की.
शुक्रवार को संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर राघव चड्ढा ने कहा, "हमने तय किया है कि हम, राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य संविधान के प्रावधानों के अनुसार बीजेपी में शामिल हो रहे हैं."
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ताज़ा घटनाक्रम को लेकर एक्स पर राघव चड्ढा का नाम लिए बिना सिर्फ़ इतना लिखा, "बीजेपी ने फिर से पंजाबियों के साथ किया धक्का."
इससे पहले दिल्ली में भी आप के कई नेता पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. इन्हीं में से एक कपिल मिश्रा हैं, जो कभी केजरीवाल सरकार में मंत्री हुआ करते थे और अब दिल्ली में बीजेपी की सरकार में मंत्री हैं.
लेकिन राज्यसभा सांसदों का पार्टी छोड़ना कुछ मायनों में काफ़ी अलग है क्योंकि ये आम लोगों के वोट से चुनकर नहीं आते हैं. ऐसे में इन सांसदों से बीजेपी को क्या कोई फ़ायदा हो सकता है. आगे हम कुछ एक्सपर्ट्स से बातचीत के आधार पर इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे.
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राघव चड्ढा ने एक एक्स पोस्ट में कहा, "आज, भारत के संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए, राज्यसभा में आप के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया है."
"सात सांसदों ने इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे राज्यसभा के माननीय सभापति को सौंपा गया. मैंने दो अन्य सांसदों के साथ मिलकर हस्ताक्षरित दस्तावेज़ ख़ुद सौंपे हैं."
आम आदमी पार्टी का बीजेपी पर आरोप
वहीं दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा, "जो राज्यसभा सदस्य आज बीजेपी के सामने झुक गए, अपनी निजी मजबूरियों, डर और लालच के कारण जिन्होंने पंजाब के लोगों के साथ गद्दारी की है, उन्हें पता होना चाहिए कि पंजाब गद्दारों को कभी माफ़ नहीं करता है."
आम आदमी पार्टी ने इस महीने की शुरुआत में राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर की ज़िम्मेदारी राघव चड्ढा की जगह अशोक कुमार मित्तल को दे दी थी.
पार्टी के इस फ़ैसले के बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में पार्टी के प्रति नाराज़गी जताई थी. इसके बाद आप के कई नेताओं से सोशल मीडिया पर ही उनकी बहस भी हुई थी.
उस समय आप के कई नेताओं ने राघव चड्ढा पर संसद में अपने भाषणों में बीजेपी के प्रति नरम रुख़ अपनाने का आरोप लगाया था.
आम आदमी पार्टी नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी के समय राघव चड्ढा के लंदन में होने पर भी सवाल उठाए थे.
आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में मौजूदा घटनाक्रम को 'बीजेपी की चाल' बताया.
उन्होंने आरोप लगाया, "यह सब बीजेपी का लिखा हुआ है. राघव चड्ढा को हटाकर अशोक मित्तल को राज्यसभा में उप नेता बनाया तो 15 अप्रैल को उनके घर ईडी पहुंच गई. पहले ईडी भेजो, सीबीआई भेजो, फिर जेल भेजो. इसके बाद चुनाव आयोग लगा दो और वोट कटवा दो."
सोमनाथ भारती दावा करते हैं, "बीजेपी पंजाब में अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहती है. उनको लगता है कि इन राज्यसभा सांसदों की मदद से वो पार्टी को फैला पाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इनमें से किसी के पास राजनीतिक अनुभव तो है नहीं. सबकी ताक़त अरविंद केजरीवाल हैं."
पंजाब में अगले साल होने हैं विधानसभा चुनाव
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.
राज्य में साल 2022 में हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो बीजेपी ने उन चुनावों में 73 उम्मीदवार खड़े किए थे. इनमें से महज़ दो उम्मीदवार ही जीत हासिल कर पाए थे, जबकि पार्टी के 55 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई.
वहीं आम आदमी पार्टी ने सभी 117 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और उसे 92 सीटों पर जीत मिली थी. यानी आप पंजाब में एक बड़ी पार्टी के तौर पर स्थापित हो गई.
जबकि राज्य में परंपरागत रूप से मज़बूत मानी जाने वाली पार्टी कांग्रेस को सभी सीटों पर चुनाव लड़कर 18 सीटों पर जीत मिली थी.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "बीजेपी पंजाब में ख़ुद को मज़बूत करना चाहती है. वो नहीं चाहती है कि अगले साल होने वाले चुनाव में कांग्रेस जीतकर आए. इस लिहाज से आप के सांसदों का बीजेपी में जाना महत्वपूर्ण है."
"भले ही वे लोग राज्यसभा से हैं और जनता के नेता नहीं हैं. लेकिन इनकी पृष्ठभूमि देखें तो ये समाज में ख़ास जगह रखते हैं, जो जनता के बीच काफ़ी मायने रखती है. हरभजन सिंह क्रिकेटर रहे हैं. अशोक मित्तल बड़े पैसे वाले हैं."
रशीद किदवई एक ख़ास बात की तरफ भी इशारा करते हैं.
उनका कहना है, "अगर आप गौर करें तो साल 2014 के पहले कोई नेता अपनी पार्टी से नाराज़ होकर अलग होता था तो अपनी नई पार्टी बनाता था. लेकिन साल 2014 के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक और अब पंजाब में किसी पार्टी में टूट होती है तो नेता बीजेपी में शामिल होते हैं. अब नई पार्टी बननी बंद हो गई है."
पश्चिम बंगाल की बात करें तो सुवेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय और दिनेश त्रिवेदी जैसे कई नेताओं ने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का हाथ थामा. जबकि इसी राज्य में किसी ज़माने में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ी तो अपनी पार्टी बनाई.
दिल्ली की बात करें तो अरविंदर सिंह लवली और राजकुमार चौहान सहित अन्य कई कांग्रेस नेता, जिन्होंने साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद अपनी पार्टी छोड़ी वे बीजेपी में शामिल हो गए और अपनी पार्टी नहीं बनाई.
अब पंजाब में भी आप नेता अपनी पार्टी से नाराज़ होकर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं.
बीजेपी को क्या फ़ायदा हो सकता है
साल 2013 में जब अन्ना हज़ारे का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन अपने आख़िरी दौर में था, तब पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव चड्ढा राघव लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई कर के भारत लौटे थे.
माना जाता है कि आम आदमी पार्टी में आतिशी और राघव चड्ढा के शामिल होने में प्रशांत भूषण जैसे उस वक़्त के पार्टी नेताओं की अहम भूमिका थी.
आम आदमी पार्टी में अपने शुरुआती दिनों में राघव चड्ढा और आतिशी (दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री) को अक्सर पार्टी में नीतिगत मुद्दों पर काम में व्यस्त देखा जाता था.
पंजाब की सियासत पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "बीजेपी का मुक़ाबला आप से नहीं बल्कि कांग्रेस से है. पंजाब में बीजेपी के ऊपर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है, इसलिए अब अकाली दल भी कभी उसके साथ नहीं जाएगा, जबकि बीजेपी के लिए अकाली दल सबसे पुरानी सहयोगी रही है."
हेमंत अत्री के मुताबिक़ पंजाब में क़रीब 57 फ़ीसदी सिख आबादी है और मौजूदा समय में पंजाब की राजनीतिक व्यवस्था बीजेपी को मैच नहीं करती है.
वह कहते हैं, "जो नेता आप छोड़कर बीजेपी में जा रहे हैं, उनमें से किसी का जनाधार नहीं है. लेकिन एक बार में इतने लोगों के जाने से आप के लिए माहौल ख़राब होगा, जो बीजेपी चाहती है. लोगों को लगेगा कि ये क्या करते हैं जो सब छोड़कर चले गए."
हालाँकि राघव राघव चड्ढा दिल्ली के राजेंद्र नगर से विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में भी कार्य किया है, लेकिन इसका पंजाब से कोई ताल्लुक नहीं है.
बीबीसी पंजाबी के अनुसार, राघव चड्ढा का परिवार जालंधर से है और कई दशकों पहले दिल्ली में आकर बस गया था.
साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले, आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को पंजाब का सह-प्रभारी नियुक्त किया था. उन्होंने पंजाब में आम आदमी पार्टी की भारी जीत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्हें साल 2023 में पार्टी ने पंजाब से राज्यसभा सांसद बनाया था.
पंजाब से राघव चड्ढा का राजनीतिक तौर पर फ़िलहाल इतना ही संबंध दिखता है, तो क्या यह बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है?
हेमंत अत्री कहते हैं, "जो लोग आप छोड़कर गए, उनमें से कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे बीजेपी पंजाब में सीएम का चेहरा बनाकर पेश करे, लेकिन इस माहौल में बीजेपी अपने लिए थोड़ी जगह तलाश सकती है. जैसे हरियाणा में जाट बनाम नॉन जाट, महाराष्ट्र में मराठी बनाम नॉन मराठी किया जाता है, वैसे ही पंजाब में सिख बनाम नॉन सिख की कोशिश होगी और वहां हिंदू वोटरों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश बीजेपी करेगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.