गोवा से मुँह मोड़ रहे हैं विदेशी पर्यटक, श्रीलंका से मिल रही है कड़ी चुनौती

    • Author, निखिल इनामदार
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आंखें चौधियां देने वाली सूरज की तेज़ रोशनी, तपिश इतनी तेज़ की सिर चकरा जाए लेकिन फिर भी गोवा के पालोलेम बीच पर सैलानियों की भीड़ समुद्र में नहाने से पीछे नहीं हट रही है.

अक्सर 'भारत की पार्टी राजधानी' कहे जाने वाले गोवा में बीच साइड शैक्स और सस्ते बैकपैकर्स होटलों में अब भी पर्यटकों भरे हुए हैं.

हालांकि, कुछ साल पहले के मुक़ाबले यहाँ एक बात अलग है. यूरोपीय और रूसी पर्यटक कम होते जा रहे हैं. कभी पालोलेम और गोवा के अन्य तटीय गांवों में रूसी और यूरोपीय सैलानियों की भीड़ उमड़ी रहती थी लेकिन अब वे यहाँ दिखाई नहीं दे रहे हैं.

यहाँ की भीड़ लगभग पूरी तरह से स्थानीय लोगों की है. जो यह बताती है कि अब विदेशी पर्यटकों के बीच गोवा उतना लोकप्रिय नहीं रहा है.

दूसरी ओर स्थानीय लोगों की भारी भीड़ यह दिखाती है कि देश के अलग-अलग कोनों में गोवा का क्रेज बढ़ा है.

सरकारी आँकड़ों से समझिए

गोवा के पर्यटन विभाग के आँकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं. साल 2017 में लगभग नौ लाख विदेशी पर्यटक गोवा आए थे. साल 2025 तक यह संख्या घटकर लगभग 5 लाख रह गई.

इसके उलट साल 2016 में 68 लाख स्थानीय पर्यटक गोवा आए थे, जिनकी संख्या साल 2025 तक बढ़कर एक करोड़ से ज़्यादा हो गई .

राज्य के पर्यटन विभाग ने हाल ही में कहा कि ग्लोबल जियोपॉलिटिकल हालात के कारण भी विदेशी पर्यटकों के आने पर असर पड़ रहा है.

गोवा के पर्यटन मंत्री रोहन खौंते ने एक स्थानीय मीडिया आउटलेट से कहा, "आगे की योजना बनाते समय हमें निराशावादी और आशावादी दोनों ही नज़रिए को अपनाना होगा."

लेकिन गोवा में विदेशी पर्यटकों की संख्या में गिरावट दुनियाभर में जारी हालिया संघर्ष से पहले ही शुरू हो चुकी थी. इससे यह सवाल उठता है कि 1960 और 1970 के दशक के "हिप्पी दौर" से लेकर अब तक जिस गोवा को विदेशी लोग पसंद करते रहे, अब वे दूरी क्यों बना रहे हैं?

क्या कह रहे हैं विदेशी पर्यटक?

पाँचवीं बार गोवा घूमने आईं रूस की बैले डांसर सोफ़ी का कहना है, "लोग सच में पैसों की तंगी से जूझ रहे हैं. पहले कोविड आया फिर यूक्रेन युद्ध हुआ और अब मिडिल ईस्ट में जो कुछ हो रहा है, उसकी वजह से फ़्लाइट्स बहुंत महंगी हो गई हैं. पैसा यक़ीनन एक बड़ा फैक्टर है. मेरे कुछ दोस्त इस साल गोवा के बजाय तुर्की या मिस्र को चुन रहे हैं क्योंकि वे घर के ज़्यादा क़रीब हैं और सस्ते भी हैं."

रिको, जो पिछले 20 सालों से गोवा आ रहे हैं, वो भी यूरोपीय पर्टयकों के न आने के बारे में यही राय रखते हैं.

रिको कहते हैं, "निश्चित रूप से मेरे देश में लोगों के पास इस समय विदेश घूमने के लिए पैसे बहुत कम हैं. पिछले तीन-चार सालों से वे ज़्यादातर छुट्टियां अपने ही देश में बिताना पसंद कर रहे हैं,"

बीबीसी से बात करने वाले लगभग आधे दर्जन विदेशी पर्यटकों ने भी लोगों की संख्या में आई गिरावट के लिए वीज़ा प्रोसेस के लंबे और जटिल होने साथ ही पांच साल के वीज़ा फ़ीस में हुई बढ़ोतरी को ज़िम्मेदार ठहराया है.

क्या कह रहे हैं स्थानीय

गोवा के पर्यटन विभाग की समिति के सदस्य और एक बड़ी ट्रैवल चार्टर कंपनी के संचालक अर्नेस्ट डायस कहते हैं कि सस्ते होटलों और आसानी से मिलने वाले ऑन-अराइवल वीज़ा ने यूरोपीय और रूसी पर्यटकों को एशिया में दूसरी जगहों को भी देखने के लिए प्रेरित किया है. खासकर वियतनाम और श्रीलंका को.

डायस कहते हैं, "आज लोग जल्दी फ़ैसले लेना चाहते हैं और आख़िरी समय पर ट्रिप फाइनल करना चाहते हैं. इसलिए वीज़ा में देरी निश्चित रूप से लोगों की संख्या में आई गिरावट का एक बड़ा कारण है."

ऑन-अराइवल वीज़ा के अलावा गोवा की तुलना में इन देशों का किफ़ायती होना भी एक कारण है.

डायस के अनुसार, "देश के भीतर घूमने वाले लोगों की बढ़ती संख्या और मीटिंग, कॉन्फ्रेंस, प्रदर्शनियां आदि के बढ़ने की वजह से अच्छे स्टार वाले होटलों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि अब कई विदेशी पर्यटकों के लिए वहां ठहरना महंगा पड़ने लगा है."

गोवा में सस्ते बीच-किनारे वाले रिसॉर्ट्स की संख्या भी वियतनाम, श्रीलंका और थाईलैंड के मुक़ाबले कम है. वहां लोग आधे दाम में या उससे भी सस्ते में पूरा पैकेज लेकर घूम सकते हैं.

लंदन के गैटविक एयरपोर्ट से गोवा के लिए एयर इंडिया की सीधी फ्लाइट सेवा बंद होने से भी असर पड़ा है.

गोवा में अपने दोस्तों के साथ छुट्टियां मनाने आईं निकोला ने बीबीसी को बताया कि सीधी फ्लाइट बंद होने की वजह से उन्हें मुंबई में लेऑवर लेना पड़ा जो उनके लिए काफ़ी असुविधाजनक था.

निकोला ने बताया कि उनके भाई ने इस साल गोवा आने के बजाय श्रीलंका जाना चुना.

उन्होंने कहा, "श्रीलंका अब तेज़ी से लोगों की पसंद बन रहा है. उसे लगा कि वहां घूमना ज़्यादा सस्ता है और गोवा के मुक़ाबले काफ़ी साफ़-सुथरा भी है."

क्या साफ़ सफ़ाई भी एक कारण है?

अर्नेस्ट डायस का कहना है कि सरकार ने समुद्र तटों को कूड़ा-मुक्त रखने के अपने प्रयासों को तेज़ कर दिया है लेकिन वह यह भी मानते हैं कि समुद्र तटों की ओर जाने वाली कई सड़कें कूड़े-कचरे के कारण अब सुंदर नहीं रही हैं.

वह कहते हैं कि ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं का स्थानीय यूनियनों की ओर से ज़ोरदार विरोध किया जाता है, जिससे टैक्सी के किराए बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं और यह भी एक "बड़ी समस्या" है.

उन्होंने कहा, "गोवा में हालत ऐसे हैं जैसे लोग अब भी पुराने ज़माने में जी रहे हों. गोवा में आप ऐप से टैक्सी बुक नहीं कर सकते क्योंकि स्थानीय यूनियन वाले उनका विरोध करने लगते हैं."

ये सारी बातें गोवा की स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकतीं, क्योंकि यह काफ़ी हद तक पर्यटकों पर निर्भर है.

गोवा के मशहूर बागा बीच के पास 100 कमरों का होटल चलाने वाले शर्विन लोबो कहते हैं, "उनके होटल में विदेशी पर्यटकों की संख्या कम से कम 10% घट गई है. हालांकि स्थानीय सैलानियों की ज़्यादा बुकिंग ने इसके असर को कुछ संभाल लिया है.

वह कहते हैं, "उनके जैसे होटलों में विदेशी पर्यटकों को ज़्यादा पसंद किया जाता है क्योंकि वे ज़्यादा दिन रुकते हैं."

डायस कहते हैं, "विदेशी पर्यटक स्थानीय लोगों की तुलना में ज़्यादा बाहर घूमने जाते हैं, बाइक किराए पर लेते हैं और बीच के शैक या रेस्तरां में खाना खाते हैं. जबकि भारतीय पर्यटक अक्सर ऐसे पैकेज लेते हैं जिसमें खाना-पीना और ठहरना सब शामिल होता है. इस वजह से विदेशी पर्यटकों की कमी का असर पूरे पर्यटन से जुड़े बड़े सिस्टम पर पड़ रहा है.

डायस का कहना है कि अब सरकार इस समस्या को लेकर सतर्क हो गई है. वह यह भी मानते हैं कि शायद गोवा ने काफ़ी समय तक इस मामले में लापरवाही बरती थी.

उन्होंने कहा, "अब हम विदेशियों को वापस लाने के लिए रोड शो के ज़रिए पूरी कोशिश कर रहे हैं. हाल ही में हम पोलैंड गए थे और अब हमारा अगला टार्गेट मार्केट स्कैंडिनेविया है."

डायस ने यह भी बताया कि गोवा आने वाले सालों में एशिया और अफ्रीका से भी पर्यटकों को लुभाना चाहता है.

लेकिन जैसे-जैसे पूरे एशिया में सस्ते, ज़्यादा साफ़-सुथरे और पर्यटन के अन्य विकल्प उभर रहे हैं, सफ़ेद रंग से पुते चर्चों, रंग-बिरंगे पुर्तगाली घरों और "सुसेगाद" यानी धीमी और आरामदायक जिंदगी जीने वाले लोगों की इस धरती को पर्यटकों को वापस खींचने के लिए अब कहीं ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित.