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भोजशाला पर फ़ैसले के बाद पहला शुक्रवारः 'हम जीत गए' और 'हमसे छीन लिया गया' के बीच धार
"हमारे तो बाप दादाओं का सपना था जिसे हम जी रहे हैं", यह कहते हुए 55 साल की वैशाली सुर्वे धार ज़िले के भोजशाला से सैकड़ों पुलिसकर्मियों की चाक चौबंद व्यवस्था को पार करके आगे बढ़ रहीं थीं.
धार शहर में विवादित भोजशाला परिसर पर हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद पहला शुक्रवार सुरक्षा के घेरे में बीता. बाज़ार के कई हिस्से बंद थे. गलियों में पुलिस तैनात थी, अर्धसैनिक बल गश्त कर रहे थे. भोजशाला के आस-पास बैरिकेड्स और वॉच टावर लगाए गए थे.
भोजशाला परिसर तक जाने के लिए अलग रास्ता बनाया गया है, जिसे दोनों तरफ़ से सफ़ेद चादरों से ढका हुआ है. इसी परिसर के दोनों तरफ़ मौजूद दरगाहों और कब्रिस्तान के हिस्सों के सामने भी यही सफ़ेद चादरों से ढके बैरिकेड्स लगे हुए थे.
सुबह आरती के लिए बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु पहुंचे, लेकिन आस-पास मुस्लिम समुदाय के लोग लगभग दिखाई नहीं दिए. स्थानीय लोग बताते हैं कि कई दशकों में यह पहला शुक्रवार था जब परिसर में नमाज़ नहीं हुई.
वैशाली कहती हैं, "वैसे तो शहर में हमेशा शांति रहती है लेकिन शुक्रवार के दिन यहां थोड़ी असहजता रहती थी. दोनों ही पक्षों के लिए यह दिन ख़ास था. अब अंततः कोर्ट ने हमारे हक़ में फ़ैसला दिया है".
इसी भोजशाला परिसर से लगभग एक किलोमीटर दूर 74 साल के फहरुख मनसबी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "हाईकोर्ट ने बहुत ग़लत फ़ैसला दिया है."
उन्होंने आगे कहा, "हम 700 साल से उस जगह पर नमाज़ अदा कर रहे हैं. लेकिन एक झटके में हमसे सब कुछ छीन लिया गया. मेरे जीते जी पहली बार ऐसा हो रहा है कि शहर में सबकुछ शांत होते हुए हम जुम्मे की नमाज़ वहां नहीं पढ़ पाए".
दरअसल, 15 मई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप को देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र माना. अदालत ने एएसआई के साल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज़ और हिंदू समुदाय को सीमित पूजा की अनुमति दी गई थी.
कोर्ट ने एएसआई को परिसर के संरक्षण का अधिकार देते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो धार ज़िले में वैकल्पिक भूमि के लिए राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है.
हिंदुओं में जश्न, युवाओं से लेकर महिलाओं तक की भीड़
भोजशाला परिसर में सुबह 6 बजे से ही हिंदू समुदाय के लोगों का आना शुरू हो गया था. दोपहर होते-होते यह संख्या बढ़ने लगी. इक्का-दुक्का लोगों की जगह महिलाओं की टोलियां, युवाओं के समूह भोजशाला पहुंच रहे थे.
24 साल के हर्ष आरोरे अपने दोस्तों के साथ भोजशाला पहुंचे थे. उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह सर्व हिन्दू समाज की जीत है. हम लोग बहुत खुश हैं, अब हर शुक्रवार हम यहां आकर पूजा कर पाएंगे".
भीड़ में खड़े खड़े हर्ष ने कई बार जय श्री राम के नारे भी लगाए. हालांकि बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्हें इस जगह के इतिहास के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है. लेकिन वह खुश हैं कि 'हिंदू समाज की जीत हुई है'.
इन सबके दौरान पुलिस बल, एंटी रायट वाहन, बम निरोधक दस्ते के साथ स्निफ़र डॉग्स इलाक़े में हर तरफ से नज़र बनाए हुए थे.
बीते कुछ दिनों से मुस्लिम पक्ष ने शुक्रवार की नमाज़ और हिंदू संगठनों ने 'महा आरती' की घोषणा की हुई थी. इसे देखते हुए प्रशासन दोनों समुदायों के नेताओं के साथ लगातार बैठकें कर रहा था.
गुरुवार रात दोनों पक्षों द्वारा अपने कार्यक्रम वापस लेने के बाद स्थिति शांतिपूर्ण रही, हालांकि पूरे दिन तनाव और सतर्कता का माहौल बना रहा.
मंदिर परिसर के अंदर अपनी दो सहेलियों के साथ आईं मीनाक्षी चौहान ने बीबीसी से कहा, "हम बहुत ख़ुश हुए हैं क्योंकि अब हम कभी भी आकर सरस्वती माता की पूजा और दर्शन कर सकते हैं."
वह कहती हैं कि उन्हें इस फ़ैसले का इंतज़ार बहुत दिनों से था और जो भी हुआ है वह "बहुत अच्छा हुआ है".
मुस्लिम पक्षः कई लोगों ने काली पट्टी पहनकर पढ़ी नमाज़
शहर के एक कोने में इतनी हलचल होने के बावजूद, शहर की गलियों में दुकानें बंद रहीं.
मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद पहले जुम्मे पर विरोध के तौर पर हाथ में काली पट्टी बांधकर नमाज़ पढ़ी.
पेशे से ग्राफिक्स डिजाइनर 26 साल के शाहरुख़ ने नमाज़ से लौटते हुए बीबीसी से कहा, "होश संभालने के बाद पहली बार जुम्मे की नमाज़ अपने घर पर पढ़ी है. बहुत बुरा लग रहा है. पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा को जबरन तोड़ने पर मजबूर कर दिया गया".
धार में मुस्लिम समाज के सदर और कमाल मौला वेलफ़ेयर सोसायटी के अध्यक्ष अब्दुल समद कहते हैं, "पूरी कौम दुखी है. कोर्ट के इस फ़ैसले ने कई लोगों को रुला दिया है. लेकिन हमने मिलकर यह तय किया है कि लड़ाई जारी रखेंगे. हमने सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले के विरुद्ध स्पेशल लीव पिटिशन लगाई है और हमें पूरी उम्मीद है कि इंसाफ़ मिलेगा".
शाहरुख कहते हैं, "अगर कोर्ट जो जैसा था उस स्थिति को भी बनाए रखने के लिए कहता तो बेहतर था लेकिन कोर्ट ने एकतरफा फ़ैसला देकर ग़लत किया".
74 साल के फहरुख मनसबी धार शहर में तैनात पुलिस के जवानों की ओर देखते हुए कहते हैं, "सत्य का साथ ऊपर वाला देता है. हमें भरोसा है कि इस बार भी न्याय होगा".
शाम तक भोजशाला परिसर के आस-पास भीड़ कम होने लगी थी, लेकिन फ़ैसले को लेकर दोनों समुदायों के बीच अलग-अलग भावनाएं साफ़ दिखाई दे रही थीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.