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रायपुर में दीमक चाट गई म्यूज़ियम के रिकॉर्ड, हज़ारों साल पुरानी चीज़ों की सुरक्षा ख़तरे में
- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- ........से, रायपुर
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के डेढ़ सौ साल पुराने महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय के छह में से पाँच एक्सेशन रजिस्टरों को दीमक खा गई है.
पिछले बुधवार को जब संग्रहालय का डबल लॉक कमरा खोला गया, तब इस बात का पता चला.
एक्सेशन रजिस्टर संग्रहालयों और पुस्तकालयों में इस्तेमाल होने वाली आधिकारिक लॉगबुक को कहते हैं जिसमें उनके संग्रह में जोड़ी गई हर नई वस्तु का स्थायी रिकॉर्ड रखा जाता है.
इस ख़बर के बाहर आने के बाद संग्रहालय में हड़कंप मचा हुआ है.
संग्रहालय के संयुक्त संचालक डॉक्टर जेआर भगत ने बीबीसी से कहा, "फ़रवरी के महीने में राष्ट्रपति के छत्तीसगढ़ दौरे के समय डबल लॉक के भीतर रखी गई दुर्लभ कलाकृतियों को देखने के लिए संबंधित कमरे को खोला गया था, उस समय एक्सेशन रजिस्टर सुरक्षित थे."
"लेकिन मैंने जब बुधवार को कमरा खोला तो पता चला कि छह में से पांच रजिस्टरों को दीमक खा चुकी है. मैंने शासन को इस बारे में सूचित कर दिया है."
कितने अहम होते हैं एक्सेशन रजिस्टर?
एक्सेशन रजिस्टर को संग्रहालय का आधिकारिक अभिलेख माना जाता है, जिसमें हर वस्तु का स्थायी विवरण दर्ज किया जाता है.
किसी भी वस्तु के संग्रहालय में आने पर उसे एक विशिष्ट एक्सेशन नंबर दिया जाता है, जिसके माध्यम से उसकी पहचान की जाती है.
इस रजिस्टर में वस्तु का नाम, विवरण, प्राप्ति की तारीख़, प्राप्ति का स्रोत, संरक्षण की स्थिति और संग्रहालय में उसके रख-रखाव के स्थान जैसी अहम जानकारियां दर्ज की जाती हैं.
छत्तीसगढ़ के जाने-माने पुराविद और श्री शंकराचार्य प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉक्टर एलएस निगम के अनुसार एक्सेशन रजिस्टर न केवल प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है, बल्कि शोध, प्रलेखन और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में भी इसकी अहम भूमिका रहती है.
संग्रहालयों में यह रजिस्टर किसी वस्तु के इतिहास और प्रामाणिकता का सबूत माना जाता है. साथ ही चोरी, क्षति या वस्तु के गुम होने की स्थिति में उसकी पहचान और रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में भी यह उपयोगी सिद्ध होता है.
डॉक्टर एलएस निगम ने बीबीसी से कहा, "यह बहुत गंभीर मामला है. इन रजिस्टरों के न होने से यह बता पाना ही मुश्किल है कि संग्रहालय में क्या था और अब क्या है. अगर रजिस्टर में 10 स्वर्ण मुद्राएं दर्ज थीं और अब केवल 8 स्वर्ण मुद्राएं हैं तो इसका पता कैसे चलेगा? अगर इसकी कोई दूसरी प्रति कहीं उपलब्ध हो तो गंभीरता से उसका पता लगाने की ज़रूरत है."
निजी सहयोग से बना देश का पहला संग्रहालय
लगभग डेढ़ सौ साल पुराना रायपुर का यह संग्रहालय, अविभाजित भारत के आरंभिक संग्रहालयों में शुमार रहा है. 1875 में इस संग्रहालय का निर्माण राजनांदगांव के राजा महंत घासीदास के सहयोग से किया गया था.
संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख पर लिखा है - 1875 में तामीर पाया बसर्फे़ महंत घासीदास रईस नांदगांव.
पुराविद मानते हैं कि रायपुर का यह संग्रहालय देश में निजी सहयोग से बना पहला संग्रहालय था.
आज़ादी के बाद इस संग्रहालय को नया भवन मिला, जिसका उद्घाटन 21 मार्च 1953 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने किया. इसके दो साल बाद, 1955 से यह संग्रहालय उसी भवन से संचालित है.
इस संग्रहालय में प्रागैतिहासिक पत्थर के औजारों से लेकर आदिवासी संस्कृति से जुड़ी दुर्लभ वस्तुओं तक, लगभग 15 हज़ार से अधिक पुरावशेष संरक्षित हैं.
संग्रहालय की धरोहरों में प्राचीन प्रतिमाएं, ताम्रयुगीन उपकरण, विभिन्न कालखंडों के ठप्पांकित और अन्य प्राचीन सिक्के, ताम्रपत्र और शिलालेख विशेष महत्व रखते हैं. सिरपुर, मल्हार और महानदी घाटी क्षेत्र से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री यहां के संग्रह को विशिष्ट बनाती है.
संग्रहालय में संरक्षित सिरपुर से मिली मंजुश्री की दुर्लभ कांस्य प्रतिमा, इसकी सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है. बौद्ध कला की उत्कृष्ट मिसाल मानी जाने वाली यह प्रतिमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान हासिल कर चुकी है.
इसे विभिन्न देशों में आयोजित 'भारत महोत्सव' प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया जा चुका है, जहां भारतीय प्राचीन कला और सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि स्वरूप इसे विशेष महत्व मिला.
सिरपुर की यह प्रतिमा छठी-सातवीं शताब्दी की मानी जाती है.ये धातु कला, शिल्प कौशल और तत्कालीन बौद्ध सांस्कृतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण देती है.
यहां संग्रहित लगभग दो हज़ार साल पुराने एक काष्ठस्तंभ को भारत की दुर्लभ धरोहरों में माना जाता है, जो सक्ती ज़िले के किरारी गांव के तालाब से 1921 में मिला था.
महुआ की लकड़ी पर उत्कीर्ण अभिलेख का पाठ, हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों में शुमार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के पिता डॉक्टर हीरानंद शास्त्री ने तैयार किया था.
50 साल पहले संग्रहालय में हुई थी हेराफेरी
डॉक्टर एलएस निगम बताते हैं कि मार्च 1975 में इस संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष महेशचंद्र श्रीवास्तव को सोने के प्राचीन सिक्कों की हेराफेरी करने के आरोप में पांच साल की सज़ा सुनाई गई थी.
उन पर आरोप था कि उन्होंने कुशाणवंश, महेंद्र दत्ता काल और गोविंदचंद्र के काल के सिक्कों को बदल दिया था.
संग्रहालय के संयुक्त संचालक डॉक्टर जेआर भगत इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि पिछले कुछ सालों में संग्रहालय की कुछ धरोहरें लापता हुई होंगी.
वह कहते हैं, "मुझे 2005 में राज्य शासन ने प्रभारी संग्रहाध्यक्ष नियुक्त किया था लेकिन 2013 के बाद से, नियम के विरुद्ध मेरी जगह एक के बाद एक तीन संग्रहाध्यक्षों की नियुक्ति की गई. इस दौरान भी मैंने राज्य शासन को सूचना दी कि जिन संग्रहाध्यक्षों की नियुक्ति की गई है, वे मनमाने तरीके से संग्रहालय में निर्माण कार्य कर रहे हैं, धरोहरों को इधर से उधर किया जा रहा है. ऐसे में इन धरोहरों को नुकसान होने या उनके ग़ायब होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता."
लेकिन अब जबकि एक्सेशन रजिस्टर को ही दीमक खा गई है तो यह पता लगाना और भी मुश्किल हो गया है कि संग्रहालय में कितनी धरोहरें उपलब्ध हैं या लापता हैं.
हालांकि डॉक्टर जे आर भगत का दावा है कि एक्सेशन रजिस्टरों की प्रति, पुरातत्व अभिलेखागार और संग्रहालय, भोपाल में रखी हुई है. वर्ष 2000 में अलग राज्य बनने के बाद इस प्रति को रायपुर लाना चाहिए था लेकिन 26 साल बाद भी यह प्रति रायपुर नहीं लाई गई है.
डॉक्टर जेआर भगत कहते हैं, "अलग राज्य बनने के बाद, पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय, भोपाल को यह प्रति छत्तीसगढ़ भेज देनी चाहिए थी. अब जबकि हमारी अवाप्ति पंजी नष्ट हो गई है, मैंने विभाग के संचालक को पत्र लिख कर इसकी प्रति भोपाल से मंगाने के लिए अनुरोध किया है. मुझे भरोसा है कि इसकी प्रति वहां ज़रूर होगी."
हालांकि छत्तीसगढ़ के पर्यटन, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के मंत्री राजेश अग्रवाल इस पूरे मामले से ख़ुद को अनजान बता रहे हैं. उनका कहना है कि रजिस्टरों को दीमक लगने के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है.
राजेश अग्रवाल ने बीबीसी से कहा, "मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है. लेकिन हम केवल रायपुर ही नहीं, राज्य के दूसरे हिस्सों में भी जो संग्रहालय हैं, उनका डिजिटलाइजेशन करने वाले हैं. जब चीजें डिजिटल हो जाएंगी तो दीमक का खतरा भी नहीं रहेगा."
संस्कृति विभाग के संचालक ने, रजिस्टरों को दीमकों द्वारा नष्ट किए जाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए जेआर भगत को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया है.
फ़िलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना ही है कि संग्रहालय में दर्ज कितनी वस्तुएं वास्तव में मौजूद हैं और कितनी समय के साथ गायब हो चुकी हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.