नासिक टीसीएस मामला: धर्मांतरण के आरोप और जांच पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

    • Author, आशय येडगे
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी
    • Author, मयुरेश कोण्णूर
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

"क्या मेरे पति ने कोई बम धमाका किया है? एक ही रात में आठ शिकायतें कैसे दर्ज हो गईं और उन्हें तुरंत क्यों गिरफ़्तार कर लिया गया?" यह सवाल नासिक टीसीएस मामले के एक अभियुक्त की पत्नी ने उठाया.

जब इस मामले की सुनवाई नासिक ज़िला अदालत में हो रही थी, तब हिरासत में बंद अपने पति से मिलने आईं यह महिला पूरी स्थिति को लेकर उलझन में थीं.

एफ़आईआर नंबर 166 में सह-अभियुक्त शाहरुख़ कुरैशी के पिता शौकत कुरैशी भी वहां रिश्तेदारों की भीड़ में खड़े थे. हमने उनसे बात करने की कोशिश की.

सिंचाई विभाग से रिटायर्ड शौकत क़ुरैशी कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि मेरे बेटे ने ऐसा कुछ किया होगा. लेकिन उसकी रिहाई तक उसके लिए यहां आना मेरा फ़र्ज़ है. अगर शाहरुख़ दोषी है, तो अदालत कार्रवाई करेगी, लेकिन मीडिया में जो दिखाया जा रहा है, वह मैं देख नहीं पाता."

उस दिन की सुनवाई क़रीब तीन घंटे तक चली. अभियुक्त के परिजन और वहां सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी पूरे तीन घंटे तक वहीं एक ही जगह खड़े रहे.

इस मामले ने आईटी कंपनी टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़) का नाम भी चर्चा में ला दिया है. टीसीएस भारत के आईटी सेक्टर की एक बड़ी कंपनी है, जिसमें देशभर में हज़ारों लोग काम करते हैं.

यह केस एक और वजह से चर्चा में है और वह है इस मामले में लगाए जा रहे आरोप.

इस मामले की रिपोर्टिंग और इससे जुड़ी चर्चाओं में कथित 'धर्मांतरण की कोशिश' जैसे शब्दों का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया.

कुछ लोगों ने इसे विदेश में मौजूद व्यक्तियों से भी जोड़ने की कोशिश की, हालांकि पुलिस का कहना है कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं है.

लेकिन इन सभी आरोपों और थ्योरी से आगे बढ़कर सवाल यह है कि असल तथ्य क्या हैं? पुलिस ने जांच और अदालत में क्या कहा है?

पहली एफ़आईआर दर्ज होने के एक महीने बाद अब कुछ सामाजिक संगठन, अभियुक्तों के परिजन और वकील कई सवाल उठाने लगे हैं.

अब तक का घटनाक्रम

इस मामले की शुरुआत 26 मार्च से हुई. नासिक के इंदिरानगर इलाके के अशोका बिज़नेस एन्क्लेव स्थित टीसीएस के ऑफ़िस में काम करने वाली 23 वर्षीय महिला ने तीन कर्मचारियों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई.

इस शिकायत के आधार पर दानिश शेख़, तौसीफ़ अत्तर और निदा ख़ान के ख़िलाफ़ शादी का झांसा देकर धोखाधड़ी, छेड़छाड़ और धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए मामला दर्ज किया गया.

नासिक के पुलिस आयुक्त संदीप कार्णिक ने बीबीसी मराठी को बताया, "इस मामले में पहली शिकायत दर्ज कराने आई महिला बहुत डरी हुई थी और शिकायत देने की मानसिक स्थिति में नहीं थी. पुलिस ने उसे भरोसा दिया, हिम्मत बढ़ाई और उसके बाद उसने शिकायत दर्ज कराई."

26 मार्च को पहली एफ़आईआर दर्ज होने के बाद 2 और 3 अप्रैल के बीच आठ और एफ़आईआर दर्ज की गईं. ये सभी एफ़आईआर नासिक के मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में दर्ज हुईं.

इन शिकायतों में कहा गया है कि ये घटनाएं 2022 से 2026 के बीच, क़रीब चार साल के दौरान, टीसीएस के ऑफ़िस में हुईं.

फ़िलहाल, इन नौ मामलों की सुनवाई नासिक ज़िला एवं सत्र न्यायालय में अलग-अलग दिनों पर जारी हैं.

क्या धर्मांतरण की कोशिश की गई?

इस मामले का सबसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दा धर्मांतरण का है. पुलिस का कहना है कि अभियुक्तों की मंशा सामूहिक रूप से धर्मांतरण कराने की थी.

इन्हीं आरोपों के आधार पर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इस घटना को अलग-अलग शब्दों में पेश किया गया.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इसे संगठित धर्मांतरण से जोड़कर देखा गया, तो कुछ जगह इसे संभावित 'अंतरराष्ट्रीय रैकेट' तक बताया गया.

नासिक के पुलिस आयुक्त संदीप कार्णिक के मुताबिक़, "इस मामले में दर्ज नौ गंभीर मामलों में धर्मांतरण की कोशिश, धार्मिक भावनाएं आहत करना और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न जैसी धाराओं के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई हैं."

लेकिन अब, ख़ासकर अभियुक्तों के वकीलों की ओर से एक बड़ा सवाल उठाया जा रहा है. अगर ऐसा है, तो फिर एफ़आईआर में इसका स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं है?

क्या एफ़आईआर में कथित धर्मांतरण का ज़िक्र है?

अभियुक्तों के वकील राहुल कसलीवाल कहते हैं, "इस मामले की किसी भी एफ़आईआर में धर्मांतरण का ज़िक्र नहीं है. कुछ जगह धार्मिक भावनाएं आहत करने की धारा ज़रूर लगाई गई है, लेकिन धर्मांतरण का उल्लेख नहीं है."

एक अन्य वकील बाबा सैयद के अनुसार, "पुलिस की रिमांड रिपोर्ट में भी जबरन धर्मांतरण या वास्तविक धर्मांतरण होने का कोई स्पष्ट ज़िक्र नहीं है. फिर यह मुद्दा किस आधार पर उठाया जा रहा है?"

बीबीसी मराठी ने इस मामले की एफ़आईआर को पढ़ा, लेकिन इसमें धर्मांतरण का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिला.

अब कुछ संगठन भी इसी तरह के सवाल उठा रहे हैं. शुक्रवार को मुंबई में 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर)' नामक संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की.

इस संगठन की पांच सदस्यीय टीम नासिक गई थी और उसने एक फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी की.

इस रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि यहां धर्मांतरण की कोशिश का कोई सबूत नहीं मिला.

एपीसीआर के राष्ट्रीय सचिव नदीम ख़ान कहते हैं, "अगर यह धर्मांतरण का मामला होता, तो चार साल में कम से कम एक व्यक्ति का धर्मांतरण हुआ होता. लेकिन जबरन धर्मांतरण का एक भी मामला सामने नहीं आया. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह सब एक प्रतिष्ठित कंपनी टीसीएस में हो रहा था. इतनी बड़ी कंपनी में चार साल तक एक भी कर्मचारी का सामने न आना थोड़ा हैरान करने वाला है."

शिकायत पुलिस तक कैसे पहुंची?

इसे लेकर भी अलग-अलग तरह की जानकारी सामने आई है.

पुलिस के अनुसार, उनकी एक टीम कुछ समय के लिए टीसीएस के ऑफिस गई थी, जहां उन्होंने महिलाओं से बातचीत कर उन्हें आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया.

लेकिन इससे पहले यह भी ख़बरें आईं कि एक ऐसे व्यक्ति ने, जिसका शिकायतकर्ता से कोई संबंध नहीं था, इस मामले को लेकर पुलिस में शिकायत की थी.

नासिक के पुलिस आयुक्त संदीप कार्णिक के मुताबिक़, "शुरुआती शिकायत के बाद सादे कपड़ों में महिला पुलिसकर्मी टीसीएस ऑफिस गईं. उन्होंने कुछ महिलाओं से बात की और उन्हें भरोसा दिलाया. इसके बाद और शिकायतें सामने आईं और 26 मार्च को पहली एफ़आईआर दर्ज की गई."

इस मामले में अब तक टीसीएस ने जो एक सार्वजनिक बयान जारी किया है, उसमें कंपनी ने कहा कि इस तरह के आरोपों को लेकर उसकी आंतरिक समिति को कोई शिकायत नहीं मिली थी.

17 अप्रैल को जारी बयान में टीसीएस ने कहा, "नासिक ऑफिस से जुड़े सिस्टम और रिकॉर्ड की प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि इस तरह के आरोपों से संबंधित कोई शिकायत हमारी एथिक्स या प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट कमेटी को नहीं मिली."

इस पर पुलिस आयुक्त कार्णिक का कहना है कि "संभव है कि अभियुक्त टीम लीडर या ऊंचे पद पर रहे हों, इसलिए महिलाएं इतने वर्षों तक चुप रही हों."

लेकिन इसके बाद एक बड़ा सवाल उठता है. एक ही रात में इतने मामले कैसे दर्ज हो गए?

अभियुक्तों के वकील बाबा सैयद कहते हैं, "2 से 3 अप्रैल के बीच कुछ ही घंटों में कुल 8 एफ़आईआर दर्ज हुईं और उसी दिन अभियुक्तों को गिरफ्तार भी कर लिया गया. इतनी जल्दी क्यों? चार साल तक प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट या एचआर में कोई शिकायत नहीं और अचानक एक ही दिन में सभी लोग पुलिस स्टेशन पहुंचकर 8 शिकायतें दर्ज कराते हैं. इससे संदेह पैदा होता है."

जब हमने यह सवाल नासिक पुलिस से पूछा, तो जांच से जुड़े एक अधिकारी ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर कहा कि शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई की गई.

नासिक के वरिष्ठ पत्रकार निरंजन टकले के मुताबिक़, "हमारी जानकारी के मुताबिक़, एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने पुलिस को सूचना दी थी कि उसकी जानकारी में एक हिंदू महिला रमज़ान के महीने में रोज़ा रख रही है. पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर जांच शुरू की. लेकिन सवाल यह है कि ऐसे मामले में शिकायत दर्ज करने का क़ानूनी आधार क्या है? ऐसा कोई क़ानून नहीं है."

निदा ख़ान के ख़िलाफ़ क्या आरोप लगाए गए?

नासिक के टीसीएस मामले में निदा ख़ान का नाम ख़ास तौर पर चर्चा में आया.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें पूरे मामले का 'सहायक' या 'मास्टरमाइंड' बताया गया. फ़िलहाल, उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका अदालत में लंबित है और पुलिस उनकी तलाश कर रही है.

हालांकि, पुलिस ने दर्ज की एफ़आईआर कुछ अलग तस्वीर पेश करती हैं.

इन नौ मामलों में से केवल एक एफ़आईआर में ही निदा ख़ान का नाम सह-अभियुक्त के रूप में दर्ज है.

26 मार्च को दर्ज इस शिकायत में उन पर महिला की धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया गया है.

उनके वकील बाबा सैयद कहते हैं, "निदा ख़ान केवल एक ही मामले में अभियुक्त हैं. बाक़ी आठ एफ़आईआर में उनका कहीं ज़िक्र नहीं है, वे अन्य मामलों में सह-अभियुक्त भी नहीं हैं. फिर उन्हें मुख्य अभियुक्त कैसे बना दिया गया, यह समझ से परे है."

नासिक के पुलिस आयुक्त संदीप कार्णिक ने बीबीसी मराठी को बताया, "इस मामले में कुल नौ अभियुक्त हैं. उनमें से दो महिलाएं हैं और निदा ख़ान एक मामले में अभियुक्त हैं. उन पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप है."

वहीं टीसीएस ने अपने बयान में उनकी भूमिका स्पष्ट की है.

कंपनी के अनुसार, मीडिया में उन्हें 'एचआर मैनेजर' बताया गया, लेकिन वास्तव में वो 'प्रोसेस एसोसिएट' के पद पर कार्यरत थीं.

इस पूरे मामले के मद्देनज़र टीसीएस ने उन्हें निलंबित कर दिया है.

'ये बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग है'

नासिक के इस पूरे मामले में कुछ मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग के तरीक़े को लेकर गंभीर बहस हो रही है.

कुछ ऐसी ख़बरें भी सामने आईं, जिनका ज़िक्र न तो पुलिस जांच में है और न ही अदालत की कार्यवाही में.

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ख़ुद पत्रकार रही हैं. उन्होंने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस रिपोर्टिंग पर नाराज़गी जताई.

उन्होंने कहा, "इस तरह के यौन शोषण को किसी धर्म या किसी एक जेंडर से नहीं जोड़ा जा सकता. ऐसा शोषण 'पावर के दुरुपयोग' की वजह से होता है. इसे धार्मिक रंग क्यों दिया गया, यह मेरा सवाल है. यह सवाल पुलिस, सरकार और सबसे ज़्यादा मीडिया से है."

उन्होंने आगे कहा, "मीडिया में जो बढ़ रहा है, वह बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार और असंवैधानिक रिपोर्टिंग है. साथ ही, इस मामले में महाराष्ट्र के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रही है. यह सीधे-सीधे ध्रुवीकरण की कोशिश है."

कुल मिलाकर, नाशिक के इस पूरे मामले में अभी वास्तविक सचाई सामने आना बाक़ी है और उससे पहले किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है.

(बीबीसी मराठी के सहयोगी पत्रकार प्रवीण ठाकरे की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)