पाकिस्तान में बकरी चोरी से शुरू हुआ झगड़ा जिसने ली 48 की जान

    • Author, रियाज़ सोहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

एक कमरे वाले मदरसे में लगभग दो दर्जन बच्चे क़ुरान पढ़ रहे हैं. इसी मदरसे से सटे स्कूल की दो इमारतें हैं जिनमें से एक खंडहर बन चुकी है जबकि दूसरी वीरान है.

यहां पसरी इस वीरानी की वजह दो स्थानीय समुदायों के बीच कई सालों से चला आ रहा झगड़ा था जिसने यहां के स्कूलों को भी वीरान कर दिया.

अधिकारियों ने बताया कि पाकिस्तान के उत्तरी सिंध के शिकारपुर ज़िले में पिछले नौ वर्षों से 'जुनेजो' और 'कल्होड़ा' समुदायों के बीच विवाद में कुल 48 लोगों की जान गई.

इस दौरान दोनों समुदायों के लोगों ने अपने-अपने इलाक़ों को एक-दूसरे के लिए 'नो-गो ज़ोन' में बदल दिया था. इस झगड़े का असर यहां के स्कूलों पर भी पड़ा और आख़िरकार वो वीरान हो गए.

पिछले महीने इन दोनों पक्षों ने एक पंचायत के ज़रिए अपने विवादों का निपटारा कर लिया है. हालांकि अदालतों के रहते हुए और क़ानूनी पाबंदियों के बावजूद जिरगा आयोजित करने पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं.

पिछले नौ साल से जारी इस लड़ाई और तनाव ने इन समुदायों और यहां रहने वाले दूसरे लोगों की ज़िंदगी को कैसे दर्दनाक बनाए रखा, यह जानने के लिए बीबीसी ने पिछले दिनों अंदरूनी सिंध का सफ़र किया.

बकरी की चोरी के आरोप से शुरू हुआ झगड़ा

जलालपुर क़रीब 200 परिवारों वाला एक गांव है जहां हमारी मुलाक़ात क़ुर्बान अली जुनेजो से हुई.

क़ुर्बान ने बताया कि जुनेजो और कल्होड़ा समुदायों के बीच इस विवाद में उनका एक भाई और दो भतीजे उस समय मारे गए जब वे पास के 'कच्चे' (नदी किनारे का क्षेत्र) में अपने मवेशी चराने गए थे.

उनका कहना है कि उनके भाई समेत उनकी बिरादरी के 23 लोग इस दुश्मनी की भेंट चढ़ चुके हैं.

क़ुर्बान बताते हैं कि नौ साल पहले इस दुश्मनी की शुरुआत बकरी चोरी की एक घटना से हुई थी.

स्थानीय लोगों ने बताया कि इस घटना में कथित चोर का संबंध कल्होड़ा समुदाय से था. हालांकि दोनों समुदाय एक-दूसरे पर बकरी चोरी का आरोप लगाते हैं.

बाद में सुलह के लिए हुए जिरगे के दौरान बकरी के मालिक ने इस कथित वारदात में शामिल तीन लोगों को तो माफ़ कर दिया लेकिन एक शख़्स को माफ़ करने से इनकार कर दिया.

उनके अनुसार यह मामला आगे चलकर बढ़ता गया और बाद में सशस्त्र संघर्ष में बदल गया. इससे न केवल इलाक़े में कारोबार को नुक़सान पहुंचा बल्कि लोगों का जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ और बहुत से लोगों की जान चली गई.

हालांकि,अब जिरगे के ज़रिए सुलह के बाद क़ुर्बान जुनेजो को उम्मीद है कि इससे फ़ायदा होगा और इलाक़े के लोग ख़ुशहाल होंगे.

जलालपुर गांव नेशनल हाईवे से एक किलोमीटर दूर स्थित है. यहां बीबीसी की टीम को एक पुराना थाना भी नज़र आया जिसके बारे में स्थानीय लोगों ने बताया कि यह लंबे वक़्त से वीरान है और पुलिस यहां से शिफ़्ट हो गई है.

बाद में हमें लगभग 13 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे के पास पुलिस की चेकपोस्ट दिखी.

आधुनिक हथियार और मोर्चे

जलालपुर से हम 'कच्चे' के इलाक़े में और अंदर की तरफ़ बढ़े. नदी के पास के इलाक़े के दोनों तरफ़ हज़ारों एकड़ में गेहूं की फ़सल तैयार थी और कई जगहों पर कट रही थी.

इस इलाक़े तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है. इसलिए बारिश की वजह से रास्ता मुश्किल हो गया था और हमारी गाड़ी भी कई जगहों पर कीचड़ में फंसती रही. हम क़रीब 15 किलोमीटर का सफ़र तय करके कल्होड़ा समुदाय के गांव 'मीरल कल्होड़ा' पहुंचे.

हम जैसे ही गांव की एक बड़ी बैठक में पहुंचे, हमें दीवार पर आरपीजी मोर्टार, एलएमजी और एसएमजी जैसे आधुनिक हथियार टंगे हुए दिखे.

स्थानीय लोगों ने बताया कि उनके गांव की चार बैठकों में इसी तरह के हथियार हैं.

हफ़ीज़ कल्होड़ो दावा करते हैं कि उनके पिता समेत उनके समुदाय के 28 लोग इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं.

उन्होंने हमें मिट्टी की बोरियों से बना एक मोर्चा भी दिखाया और बताया कि यहां 24 घंटे पहरा दिया जाता था क्योंकि हमला कभी भी हो सकता था. हालांकि उनके अनुसार अब सुलह हो चुकी है, इसलिए पहले जैसा सख़्त पहरा नहीं दिया जाता.

सुलह से पहले पूरे गांव के चारों ओर ऐसे मोर्चे बने हुए थे. वह भी इस विवाद की शुरुआत की वजह बकरी चोरी की घटना को ही बताते हैं. लेकिन उनका आरोप है कि चोर जुनेजो समुदाय से था जो चोरी की कथित वारदात के दौरान मारा गया था.

जब उनसे पूछा गया कि तनाव के दिनों में हथियार रखने और सुरक्षा उपायों पर हर माह कितना ख़र्च आता था तो उन्होंने बताया कि झगड़ा जब सबसे ज़्यादा बढ़ा हुआ था तो उस वक़्त यह ख़र्च 50 लाख (पाकिस्तानी रुपये) से भी ज़्यादा हो जाता था.

उनसे यह भी पूछा गया कि वह ऐसे आधुनिक हथियार कहां से लाते हैं, तो उन्होंने बताया कि यह सब कॉन्टैक्ट्स से होता था. "जैसे मैंने आप तक पहुंचाया और आपने मुझ तक."

हालांकि अब उन्हें उम्मीद है कि सुलह के बाद हथियारों और सुरक्षा पर होने वाला ख़र्च कम हो जाएगा.

हफ़ीज़ कल्होड़ो का कहना था कि तनाव की वजह से इस इलाक़े में रहने वालों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में दुश्वारी होती थी और स्थानीय मर्दों को दिन-रात पहरा देना पड़ता था. "अब जब से यह मसला हल हुआ है, हालात पहले से बहुत बेहतर हैं."

हालांकि यह सिंध का इलाक़ा है लेकिन बीबीसी की टीम ने देखा कि यहां जो भी शख़्स नज़र आता था उसके कंधे पर किसी न किसी तरह का हथियार ज़रूर होता था.

गांव वालों ने बताया कि लोग आराम से बाहर नहीं जा सकते थे क्योंकि गांव के लगभग सभी मर्दों के ख़िलाफ़ कई मामले दर्ज हैं. ऐसे में अपने इलाक़े से बाहर निकलने पर उन्हें विरोधी पक्ष के अलावा गिरफ़्तारी का डर भी रहता है.

सिंध के इन इलाक़ों में समुदाय के नेताओं का रहता है असर

शिकारपुर समेत उत्तरी सिंध के कई इलाक़ों में कथित राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के कारण समुदायों के नेता अपना बड़ा प्रभाव रखते हैं. यहां खेतों की हदबंदी, मवेशियों की चोरी और दूसरे समुदाय में पसंद की शादी करने पर अक्सर झगड़े होते रहते हैं.

बहुत से स्थानीय लोगों ने बताया कि समुदायों के नेताओं के प्रभाव के कारण लोग विवादों के हल के लिए स्थानीय परंपराओं और अनौपचारिक न्याय प्रणाली, जैसे कि 'जिरगा' पर निर्भर करते हैं.

कल्होड़ा और जुनेजो समुदायों का समझौता भी एक जिरगे के ज़रिए ही मुमकिन हुआ है. इस जिरगे में दोनों पक्षों पर एक-दूसरे के जान-माल का नुक़सान करने के बदले में कुल 14 करोड़ 91 लाख रुपये (पाकिस्तानी रुपये) का जुर्माना लगाया गया है. साथ ही यह फ़ैसला भी किया गया कि भविष्य में हमला करने वाले पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा.

बीबीसी ने हफ़ीज़ कल्होड़ो से पूछा कि अतीत में इस तरह का समझौता क्यों नहीं हो पाया? उन्होंने कहा, "यह तो समुदाय के नेताओं को पता होगा. इस वक़्त चूंकि सरकार का भी दबाव था और हमारे शीर्ष के लोगों की भी कोशिशें थीं, तो मिलकर फ़ैसला हो गया."

उनका यह भी कहना था कि अगर जिरगा न हो तो मसले हल नहीं हो सकते. उन्होंने कहा, "जिरगे इसलिए होते हैं क्योंकि अदालतें सालों-साल मामलों पर कार्रवाई नहीं करतीं. आठ-आठ साल तक केस आगे नहीं बढ़ते."

इस फ़ैसले के गवाह व मध्यस्थ ग़ौस बख़्श मेहर हैं. मेहर नेशनल असेंबली के सदस्य और सिंध विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

हमने उनसे सवाल किया कि दोनों बिरादरियों में इतने लंबे वक़्त झगड़ा चलता रहा और पहले क्यों यह हल नहीं हुआ? उन्होंने जवाब दिया, "पहले प्रशासनिक कमज़ोरी थी, इसलिए इस विवाद का जिरगा नहीं हो रहा था. अगर एक क़त्ल पर प्रशासन सख़्ती करता, गिरफ़्तारी करता और अदालतों से जल्द सज़ा मिलती तो ऐसे हालात न बनते."

उन्होंने दावा किया कि निर्वाचित जन प्रतिनिधियों ने भी कोशिशें कीं लेकिन वह कामयाब नहीं हुए क्योंकि स्थानीय प्रशासन मदद नहीं कर रहा था. "अब चूंकि प्रशासन ने डंडा उठाया है, तो लोग सीधे हो रहे हैं."

समुदायों के बीच विवादों का अंत सरकारी नीति का हिस्सा

शिकारपुर समेत उत्तरी सिंध के आठ ज़िले अलग अलग समुदायों के बीच जारी झगड़ों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. इनमें ख़ैरपुर, शिकारपुर, लाड़काना, कशमोर, सक्खर, क़ंबर शहदादकोट, घोटकी और जैकबाबाद शामिल हैं. इनमें से 'कच्चे' के कुछ इलाक़े 'नो-गो एरिया' बने हुए हैं.

घोटकी और शिकारपुर के विवादों के हल के लिए सक्खर के सर्किट हाउस में एक 'बड़ा जिरगा' आयोजित किया गया जो तीन दिन तक चला. इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हुए जिन्हें अतीत में प्रशासन डाकू घोषित कर चुका था और उन पर लाखों का इनाम रखा गया था लेकिन बाद में सिंध सरकार की 'सरेंडर पॉलिसी' के तहत उन्होंने गिरफ़्तारी दी.

एसएसपी शिकारपुर कलीम मलिक कहते हैं कि समुदायों के बीच झगड़ों के फ़ैसले भी 'सरेंडर पॉलिसी' का हिस्सा हैं क्योंकि यह साफ़ है कि कई डाकू क़बीलाई दुश्मनी की वजह से डकैत बने.

"इन समुदायों के फ़ैसलों से यह फ़ायदा होता है कि दुश्मनी ख़त्म होती है और फिर सरकार वहां विकास के काम करा सकती है."

उनके मुताबिक़, पहले ऐसी कोशिशें व्यक्तिगत थीं लेकिन अब यह एक नियमित सरकारी नीति है जिसमें पुलिस, न्यायपालिका और राजनीतिक नेतृत्व 'एक ही पेज' पर हैं.

"यहां जो जिरगा सिस्टम है या यहां जो फ़ैसले की व्यवस्था है, वह सिंध की संस्कृति का हिस्सा रहा है. अब इसी का फ़ायदा उठाते हुए स्थानीय समुदायों के नेताओं ने लोगों को इस बात पर एकमत किया है. अगर सभी नेता इन फ़ैसलों के पक्ष में हैं तो यह अच्छी बात है. अगर मान लें कि कुछ अपराधी प्रतिरोध कर रहे थे तो उनके लिए बहुत सख़्त पॉलिसी है."

जिरगे की परंपरा पाकिस्तान के पिछड़े ज़िलों में आम है. जिरगा आमतौर पर प्रभावशाली बुज़ुर्गों, समुदायों के सरदारों या स्थानीय प्रतिष्ठित लोगों का एक अनौपचारिक मंच होता है. यहां विवाद सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को सुना जाता है और उनके बीच समझौता करवाने की कोशिश की जाती है

आमतौर पर दोनों तरफ़ से पक्ष रखे जाते हैं. फिर बुज़ुर्ग उन पर सोच-विचार करते हैं और उसके बाद जुर्माना, दीयत (ब्लड मनी), माफ़ी या भविष्य में हमले रोकने की गारंटी जैसे फ़ैसले आते हैं.

क़त्ल या समुदायों के बीच दुश्मनी के मुक़दमों में आर्थिक जुर्माना, ब्लड मनी या एक दूसरे को गारंटी का फ़ैसला भी जिरगे में हो सकता है.

जिरगा सिस्टम के समर्थकों का कहना है कि जहां राज्य की संस्थाएं कमज़ोर हों वहां जिरगा तुरंत हल मुहैया करता है. दूसरी तरफ़ आलोचकों का मानना है कि यह प्रणाली अदालती दायरे से बाहर, बिना क़ानूनी सुरक्षा और पारदर्शिता के चलती है.

जिरगों पर पाबंदी और 'निजी अदालतों' पर सवाल

सिंध हाईकोर्ट की सक्खर बेंच ने 10 साल पहले जिरगा आयोजित करने पर पाबंदी लगाई थी और इसे 'प्राइवेट कोर्ट' क़रार दिया था.

इस फ़ैसले के याचिकाकर्ता वकील शब्बीर शाह बताते हैं कि उन्होंने अपनी अर्ज़ी में कहा था कि सिंध में जिरगा सिस्टम को अवैध, असंवैधानिक और क़ानून के ख़िलाफ़ घोषित किया जाए.

उनके अनुसार जब संविधान में निजी अदालतों की कोई जगह नहीं है, तो ये 'अदालतें' क्यों चल रही हैं? हत्या के मुक़दमों के फ़ैसले ऐसे मंच कैसे कर सकते हैं?

"अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था कि जहां भी जिरगा होगा या प्राइवेट अदालत लगाई जाएगी, पुलिस उसकी एफ़आईआर दर्ज करेगी और ख़ुद मुद्दई (वादी) बनेगी."

उन्होंने कहा कि हाल में जो जिरगे आयोजित किए गए वह तो 'न्यायालय की अवमानना' हैं, "लेकिन यह मामला तब दर्ज है जब कोई प्रभावित पक्ष या स्वयंसेवक अदालत को इसकी सूचना दे कि यह जिरगा हुआ है."

उन्होंने कहा कि इन मामलों में प्रशासन और पुलिस ख़ुद प्रॉक्सी बनी हुई है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा था कि जिरगा और ऐसी 'पंचायत प्रणाली' पाकिस्तान के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से किए गए वादों और प्रतिबद्धताओं के ख़िलाफ़ है.

अदालत ने यह आदेश भी दिया था कि क़ानून लागू करने वाले संस्थान सतर्क रहें और अगर किसी जिरगा की रिपोर्ट दर्ज न हुई हो तो वह ख़ुद एफ़आईआर दर्ज कर तफ़्तीश शुरू करें.

इस पर सरदार ग़ौस बख़्श मेहर का कहना है कि जिरगा दोनों पक्षों की मर्ज़ी से होता है और रज़ामंदी होने पर ही फ़ैसला होता है.

हालांकि जब उनसे पूछा गया कि जिरगा हत्या जैसे मामले कैसे तय कर सकता है, तो उन्होंने कहा, "लोग एक-दूसरे को माफ़ कर देते हैं. लेकिन मैं ख़ुद चाहता हूं कि ऐसे मामले अदालत में जाएं और सज़ाएं हों, तभी स्थायी शांति होगी."

ध्यान रहे कि सक्खर के सर्किट हाउस में हुए इस तीन दिन के बड़े जिरगे में पुलिस और प्रशासन ने भी समुदाय के नेताओं की मदद की थी. जुनेजो और कल्होड़ा समुदायों में 10 साल पहले भी जिरगे के ज़रिए सुलह हुई थी लेकिन वह टिकाऊ साबित नहीं हुई थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)