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पश्चिम बंगाल में टीएमसी बनाम बीजेपी की जंग में कहाँ हैं वामपंथी पार्टियां?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दमदम से
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हर गली में और चौराहे पर बीजेपी-टीएमसी की मौजूदगी है.
इनके झंडे, बैनर और पोस्टर हर तरफ़ दिखते हैं. लेकिन रविवार की शाम कोलकाता के दमदम उत्तर विधानसभा क्षेत्र के कल्चर मोड़ पर नज़ारा बिल्कुल अलग था.
जहाँ तक नज़र जा रही थी, वहाँ तक लोग सीपीआई (एम) के लाल झंडे लिए खड़े थे. यहाँ से सीपीएम की उम्मीदवार दीपसीता धर रोड शो कर रही थीं. दीपसीता जेएनयू स्टूडेंट यूनियन की अध्यक्ष भी रही हैं.
अपर्णा घोष एक सरकारी कर्मचारी हैं. वह इस रोड शो को अपने घर के दरवाज़े से देख रही हैं. उनसे मैंने पूछा कि पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट बहुत कमज़ोर हो चुका है लेकिन इस रोड शो में अच्छी ख़ासी भीड़ है. इसके जवाब में अपर्णा कहती हैं, ''ये लड़की बहुत पढ़ी-लिखी है. समझदार है. मेरा मानना है कि बंगाल में टीएमसी का विकल्प लेफ्ट ही है.''
घोष कहती हैं, ''टीएमसी महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये दे रही है और बीजेपी हर महीने 3000 रुपये देने का वादा कर रही है. क्या इससे बंगाल की महिलाएं सशक्त हो जाएंगी? इससे महिलाएं अपाहिज होंगी. महिलाओं को शिक्षा और काम चाहिए न कि ख़ैरात. ख़ैरात के दम पर पार्टियां लोगों को नागरिक नहीं अपना वोटर बना रही हैं.''
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लेफ़्ट को लेकर आम लोग क्या कह रहे हैं?
अपर्णा के घर के बगल में ही एक चाय की दुकान है. इस दुकान पर चाय बना रहे अन्ना मंडल लेफ़्ट को लेकर कहते हैं, ''इनकी रैली में बहुत लोग आते हैं लेकिन वोट के समय ग़ायब हो जाते हैं. इसलिए मैं लेफ़्ट की रैली में लोगों की भीड़ से बहुत आश्वस्त नहीं होता हूँ. इतना कह सकता हूँ कि दमदम उत्तर सीट पर टक्कर में टीएमसी, बीजेपी और लेफ़्ट तीनों हैं.''
साल 2016 के विधानसभा चुनाव में दमदम उत्तर में सीपीएम को जीत मिली थी लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में टीएमसी जीतने में कामयाब रही थी.
पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. सीपीएम का वोट शेयर भी पाँच प्रतिशत से नीचे रहा था. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सीपीएम को एक भी सीट नहीं मिली थी. 2011 से सीपीएम न केवल सत्ता से बाहर है बल्कि कमज़ोर भी होती गई.
ऐसे में इस बार के चुनाव में लेफ़्ट जीत की उम्मीद किस आधार पर कर रही है? इसके जवाब में दीपसीता धर कहती हैं, ''हम लोकप्रिय राजनीति नहीं कर रहे हैं. हमारी राजनीति लोगों को जागरूक और सशक्त बनाने वाली है. लोग अब समझने लगे हैं कि टीएमसी ने बंगाल का क्या हाल कर दिया है. बीजेपी शासित राज्य भी लोग देख रहे हैं कि वहां कैसा शासन चल रहा है. इस बार लेफ़्ट पश्चिम बंगाल में बहुत अच्छा करने जा रहा है.''
दीपसीता कहती हैं, ''पश्चिम बंगाल में टीएमसी को केवल लेफ़्ट ही हरा सकता है. यहाँ बीजेपी जितनी मज़बूत होगी, टीएमसी भी उतनी ही मज़बूत होगी. अगर टीएमसी को हराना है तो बीजेपी को कमज़ोर करना होगा. लोगों के बीच यह धारणा बनाई जा रही है कि टीएमसी को सीपीआई (एम) और कांग्रेस नहीं हरा सकती हैं.''
सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता बिमान बोस की उम्र 87 साल हो गई है लेकिन रोज़ चुनाव कैंपेन में जाते हैं. बिमान बोस कहते हैं, ''रोज़ कम से कम 12 से 15 किलोमीटर चलकर कैंपेन कर रहा हूँ. इतना तो कह सकता हूँ कि इस बार हमारी पार्टी शून्य पर नहीं रहेगी.''
लेफ़्ट के नेता क्या बीजेपी में गए?
कई लोग मानते हैं कि 2011 में जब टीएमसी सत्ता में आई तो लेफ़्ट के काडर बीजेपी में शिफ़्ट हो गए थे. वरिष्ठ पत्रकार सायंतन घोष ने अपनी किताब 'बैटलग्राउंड बंगाल' में एक ऐसे ही वाकिए का ज़िक्र किया है.
घोष ने अपनी किताब में लिखा है, ''दक्षिण कोलकाता की एक धुएँ से भरी चाय की दुकान में मेरी पहली मुलाक़ात हिरेन चटर्जी से हुई. उन्हें सब हरु दा के नाम से जानते थे. तब मैं बस एक स्कूल का लड़का था. हरु दा खुली हुई शर्ट, घिसी हुई पैंट में रहते थे. लेकिन उनकी आवाज़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एक अनुभवी ट्रेड यूनियनिस्ट की खनक थी.''
''मीठी चाय के कपों और बीड़ी के धुएँ की हल्की लहरों के बीच, हरु दा कम्युनिज़म, मज़दूरों के संघर्ष और ट्रेड यूनियनों के कठोर इतिहास की कहानियाँ सुनाते थे. उनकी कहानियाँ ऑटो चालकों, राहगीरों जो भी सुनने की दूरी में होता, सबको खींच लाती थीं. एक ऐसी दुनिया की तस्वीर पेश करती थीं, जहाँ लाल झंडा न्याय का वादा करता था. एक बच्चे के रूप में, मैं उनकी बातें आँखें फाड़े सुनता रहता, यह जाने बिना कि आगे चलकर मैं एक राजनीतिक पत्रकार के रूप में उनकी कहानी का पीछा करूँगा.''
घोष ने लिखा है, ''2011 तक, जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथ के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका, हरु दा की एक संदिग्ध मामले में गिरफ़्तारी की फुसफुसाहटें फैलने लगीं. उन्होंने कभी इसके बारे में खुलकर बात नहीं की, सवालों को एक कंधे उचकाकर टाल देते थे.''
''जब मैं 2017 में दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता लौटा, तो ऑटो चालकों का यूनियन, जो कभी सीपीआईए(एम) का गढ़ था, टीएमसी का क़िला बन चुका था. हरु दा कहीं नज़र नहीं आए. मैंने मान लिया कि वो शहर के हाशिए में खो गए होंगे. बंगाल की बदलती सियासी लहरों के शिकार हो गए होंगे. फिर, एक शाम, मैंने उन्हें एक जानी-पहचानी चाय की दुकान पर देखा, उम्रदराज़, लेकिन अब भी जीवंत, उसी जोश के साथ कहानी बुनते हुए. लेकिन अब कहानी बदल चुकी थी. अब यह वर्ग संघर्ष की नहीं बल्कि बीजेपी के ममता को सत्ता से हटाने के वादे की थी. उन्होंने मेरे हैरान चेहरे को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, 'सिर्फ़ बीजेपी ही ममता को हरा सकती है'."
लेफ़्ट की मुश्किलें
''मुझे यकीन नहीं हुआ. हरु दा, जो कभी कट्टर कम्युनिस्ट थे, अब भारतीय जनता पार्टी के लिए रैली कर रहे थे? मेरी हैरानी भांपकर वह हँस पड़े और कहा- 'हम वाम से राम की ओर आ गए हैं'."
घोष कहते हैं, ''उनके शब्द सिर्फ़ एक निजी बदलाव नहीं थे. वे बंगाल के बड़े राजनीतिक बदलाव की झलक थे, जहाँ वामपंथ के लाल झंडों की जगह बीजेपी का केसरिया रंग ले रहा था."
लेकिन वृंदा करात इस बात से सहमत नहीं हैं कि लेफ़्ट का काडर बीजेपी में शिफ्ट हो गया था.
करात कहती हैं, ''लेफ़्ट का वोटर ज़रूर टीएमसी के डर से बीजेपी में शिफ़्ट हुआ लेकिन काडर की बात मैं नहीं मानती'.'
वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य कहते हैं कि वृंदा पूरा सच बताने से बच रही हैं.
भट्टाचार्य कहते हैं, ''शंकर घोष जो पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी के उपनेता हैं, वो कहाँ से आए हैं? ज़ाहिर है कि सीपीएम से. इनके हाथ पर अब भी चे ग्वेरा का टैटू है. सुवेंदू अधिकारी के साथ जो बंकिम घोष रहते हैं, वे सीपीएम की सरकार में कैबिनेट मंत्री थे."
"आरामबाग से सीपीएम के सात बार सांसद रहे अनिल बसु के बेटे क्या बीजेपी में नहीं हैं? दमदम से सीपीआईएम के सांसद अमिताबो नंदी के बेटे क्या बीजेपी में नहीं हैं? सीपीएम के ट्रेड यूनियन के नेशनल सेक्रेटरी रहे तपन सेन के बेटे क्या बीजेपी में नहीं हैं? देखिए मेरा मानना है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में सीपीएम को टेकओवर किया है. वोट भी और काडर भी.''
भट्टाचार्य कहते हैं, ''2011 में जब ममता ने वामपंथ के प्रभुत्व को ख़त्म किया, तो ज़्यादातर लोगों को लगा था कि बंगाल की राजनीति की लड़ाई टीएमसी और वामपंथ के बीच ही रहेगी. लेकिन 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, बदलाव की हल्की लहरें शुरू हो चुकी थीं. बीजेपी बंगाल में उभरने लगी और इसकी क़ीमत वामपंथ के घटते प्रभाव के रूप में चुकानी पड़ी.''
2019 लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में एक भी सीट हासिल नहीं कर सका था. उसका वोट शेयर पूरे राज्य में 7 प्रतिशत रह गया था.
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की कहानी और भी निराशाजनक रही. इतिहास में पहली बार, लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस दो ऐसी ताकतें, जिन्होंने दशकों तक बंगाल की राजनीति को आकार दिया, वे शून्य पर आ गईं. टीएमसी 213 सीटों तक पहुँच गई जबकि बीजेपी 77 सीटों तक उछल गई.
कोलकाता के अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित सीपीआई(एम) के मुख्यालय में चुनाव के दिनों में भी सन्नाटा है. कुछ बुज़ुर्ग यहाँ बैठे, बीड़ी पीते या कंप्यूटर पर काम करते दिखते हैं.
87 साल के बिमान बोस इसी दफ़्तर में रहते हैं. 30 साल की उम्र में बोस ने घोर छोड़ दिया था और तब से पार्टी में लगे हैं. सीपीआईएम की इस दशा का एक कारण बोस यह भी बताते हैं कि वह टीएमसी के बनने और पहचान की राजनीति को ठीक से हैंडल नहीं कर पाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.