कहीं आप पर भी जासूसों की नज़र तो नहीं?

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राजनेता, व्यापारी औऱ फ़िल्मी सितारों से लेकर आम लोगों तक, कोई भी जासूसी की जद से बाहर नहीं है.

कुछ दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की कथित जासूसी की ख़बर ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी. लेकिन वो पहले व्यक्ति नहीं हैं जिनका नाम किसी कथित जासूसी प्रकरण से जुड़ा हो.

क्यों और कैसे होती है हाई-प्रोफ़ाइल लोगों की जासूसी? आइए जानते हैं दिल्ली के एक प्राइवेट डिटेक्टिव गौरव से.

कौन करवाते हैं प्राइवेट सर्विलेंस?

कॉरपोरेट क्षेत्र से बगिंग की सबसे ज़्यादा मांग आती है. कंपनियां अपने कर्मचारियों पर नज़र रखना चाहती हैं. उन्हें डर होता है कि कही उनके ट्रेड सिक्रेट्स लीक न हो जाए. जिन्हें वो नौकरी पर रखने वाले हैं उनका रिकॉर्ड कैसा है ये भी जानने की कोशिश होती है.

वहीं राजनीतिज्ञों की निगरानी करवाने में कई तरह के लोगों की रुचि होती है. उनकी पार्टी हाईकमान से लेकर, विरोधियों और व्यापारिक हित रखने वाले लोगों तक, सभी अपने मतलब की जानकारी जुटाना चाहते हैं.

इसके अलावा कपल भी एक-दूसरे की पल-पल की ख़बर पाना चाहते हैं, जानना चाहते हैं कि कही उनका पार्टनर उन्हें धोखा तो नहीं दे रहा.

कैसे की जाती है बगिंग?

सर्विलेंस कोई नई बात नहीं है, लेकिन बीते सालों में टेक्नॉलॉजी विकसित होने के साथ ही ये काम और आसान हो गया है.

शर्ट की बटन से भी छोटे कैमरे बनने लगे हैं जो हाई डेफ़िनेशन वीडियो और तस्वीरें रिकॉर्ड कर सकते हैं. इसके अलावा माइक्रोफ़ोन भी नए किस्म के आ चुके हैं, जिन्हें ‘टार्गेट’ के घर, दफ्तर या कार में लगा दिया जाता है.

ये माइक्रोफ़ोन बहुत छोटे होते हैं, लेकिन एक किलोमीटर की दूरी से भी रिकॉर्ड हो रही आवाज़ें सुनी जा सकती है.

कई डिवाइसों का आउटपुट तो इंटरनेट से ज़रिए दुनिया के किसी भी हिस्से में बैठकर सुना जा सकता है. ऑडियो और वीडियो, दोनों रिकॉर्ड करने वाले डिवाइस भी उपलब्ध है.

घर, दफ्तर, कार में टार्गेट क्या बोल रहा है, किससे मिल रहा है, हर गतिविधि की ख़बर मिल जाती है.

स्मार्टफ़ोन ने काम और आसान कर दिया है ज़्यादातर लोगों के पास एंड्रॉएड या एपल के फ़ोन होते हैं, उनमें ऐसे ऐप्स लोड कर दिए जाते हैं जो मोबाइल पर हर कॉल, एसएमएस, सोशल मीडिया मैसेज की जानकारी उपलब्ध करा देता है.

टार्गेट को पता भी नहीं चलता है कि उनके मोबाइल में कोई जासूसी ऐप लोड है.

कहां से आते हैं ख़ुफ़िया साजोसामान?

ख़ुफ़िया उपकरण बिलकुल आम बाज़ार में मिलने लगे हैं. अधिकतर उपकरण चीन से भारत लाए जाते हैं.

ये बेहद कम क़ीमतो पर उपलब्ध होते हैं. मसलन पेन कैमरा जो अब एक आम डिवाइस हो चुका है, सिर्फ 750 रुपए में मिल जाता है और ठीक-ठीक वीडियो - ऑडियो रिकॉर्ड कर लेता है.

रिमोट कैमरे, माइक और कैमरायुक्त रोबोट 10-15 हज़ार से लेकर कई लाख तक में मिलते हैं.

ऐप्स और सॉफ्टवेयर भी कोई खास महंगे नहीं है. इनमें से कई भारत में भी बने हैं.

वैध होता है निजी सर्विलेंस?

सूचना एवं प्रौद्योगिकी क़ानून के तहत निजी सर्विलेंस क़ानूनन अपराध है.

साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल के अनुसार सूचना एवं प्रौद्योगिकी क़ानून के तहत सर्विलेंस का अधिकार केवल केंद्र और राज्य सरकार को राष्ट्र सुरक्षा के हित में दिया गया है.

पवन दुग्गल कहते हैं, “प्राइवेट बगिंग ग़ैरक़ानूनी है और दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की सज़ा और पांच लाख रुपए जुर्माना लगाया जा सकता है.”

“जासूसी करने के दोषी की अगर पहचान हो जाए तो उससे पांच करोड़ रुपए तक का हर्जाना भी मांगा जा सकता है.”

हालांकि पवन दुग्गल ये भी बताते हैं कि आईटी क़ानून नई चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह से सक्षम नहीं है. स्नोडन खुलासे नई चुनौतियों पर रोशनी डालती है.

उनके अनुसार नई तकनीक की बगिंग की रोकथाम के लिए क़ानून को जल्द अपडेट किया जाना ज़रूरी हो गया है.

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