राजनाथ सिंह के कश्मीर दौरे से क्या हासिल?

kashmir impasse
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित कश्मीर में जारी गतिरोध अगर जल्द ख़त्म न हुआ, वहां प्रदर्शन जारी रहे तो ये आंदोलन कट्टरपंथी ताकतों के हाथों में जा सकता है.

भारत विरोधी और इस्लामिक कट्टरपंथी सैयद सलाहुद्दीन और मौलाना मसूद अज़हर का असर दक्षिण कश्मीर में पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है.

जानकारों को डर है कि यदि केंद्र सरकार और कश्मीर के आंदोलनकारियों के बीच गतिरोध जारी रहा तो युवाओं के बीच इन लोगों का असर बहुत ज़्यादा बढ़ सकता है

पिछले महीने 8 जुलाई को हिज़्बुल मुजाहिदीन के चरमपंथी बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद वहां जारी हिंसा के कारण सामान्य जनजीवन ठप पड़ा है.

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इस पृष्ठभूमि में अगर गृह मंत्री राजनाथ सिंह की 24-25 अगस्त की कश्मीर यात्रा का कोई नतीजा नहीं निकला तो इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों का मनोबल और बढ़ेगा.

पिछले महीने उनकी पहली यात्रा कामयाब साबित नहीं हुई थी.

उनकी पहली यात्रा के बाद भी हिंसा जारी रही और कर्फ्यू में ढील नहीं दी गई है. उनकी दूसरी यात्रा के पहले दिन अर्धसैनिक बलों की गोलियों से एक युवक मारा गया.

अब तक 60 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं. पत्थरबाज़ी जारी है, हड़ताल ख़त्म नहीं हुई है, यानी कश्मीर में गतिरोध जारी है.

ये केंद्रीय सरकार के लिए बुरी ख़बर है

तो अब इस यात्रा का क्या असर होगा? कश्मीर के वामपंथी नेता और विधायक यूसुफ़ तारिगामी कहते हैं- "हम उम्मीद ही कर सकते हैं." उनके लहजे से ऐसा लगा कि उनकी उम्मीद में नाउम्मीदी छिपी है.

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लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि निराश होने का समय नहीं रहा. उनके अनुसार इस बार का आंदोलन 2008 और 2010 में हुए आंदोलनों से अलग है. इस बार ये आंदोलन नहीं बल्कि विद्रोह है.

कश्मीर पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत सरकार को कश्मीर के लोगों से बातचीत की पहल समय बर्बाद किए बगैर करनी चाहिए. बातचीत विपक्ष से अधिक अलगाववादी दलों से करने की ज़रूरत है. प्रदर्शनकारियों का कोई लीडर नहीं है, लेकिन ये प्रदर्शन और हड़तालें हुर्रियत लीडरों के कहने पर ही हो रही हैं.

यूसुफ़ तारिगामी कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हुर्रियत कांफ्रेंस के अलावा और भी लोगों से भी बातचीत की पहल की थी. वो कहते हैं कि मौजूदा सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वो हुर्रियत वालों से बातचीत के लिए तैयार है.

केंद्र सरकार के अनुसार मुनासिब माहौल तैयार करने की ज़िम्मेदारी राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की भी बनती है.

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राजनाथ सिंह का दो बार कश्मीर जाना और प्रधानमंत्री का दो बार विपक्षी दलों से मुलाक़ात करना इस बात का संकेत देते हैं कि केंद्र कश्मीर के मामले को लेकर गंभीर है.

केंद्र कश्मीर में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भी भेजने का इरादा रखता है.

भारत प्रशासित कश्मीर के विपक्ष का कहना है कि बातचीत के लिए केंद्र घाटी में विश्वास बहाली के उपायों पर जल्द ध्यान दे. इसके लिए वो चाहते हैं कि पैलेट गन के इस्तेमाल पर तुरंत पाबंदी लगाई जाए और सुरक्षा बलों के हाथों 60 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत की जांच कराई जाए.

उनका कहना है कि साथ ही भारत सरकार कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान से फ़ौरन बातचीत की पहल करे. हाल में कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत करने से इंकार करने के बाद केंद्र असमंजस में नज़र आती है. लेकिन कश्मीर के मुद्दे के स्थायी समाधान का ये अवसर है जिसे भारत सरकार को गंवाना नहीं चाहिए.

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