ये करते नहीं थकते बीटी कॉटन की वाहवाही, पर...

रुस्तम जमालुद्दीन तुराक
इमेज कैप्शन, रुस्तम जमालुद्दीन तुराक.
    • Author, विवियन फर्नांडिस
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

महाराष्ट्र के वर्धा ज़िले के सेलसुरा गांव के रुस्तम जमालुद्दीन तुराक का कहना है, "मुझे बीटी कॉटन की फसल से काफी फायदा हो रहा है. एक एकड़ में आठ से दस क्विंटल फसल हो जाती है. अगर ज़मीन में नमी अच्छी हो और हम उसमें बढ़िया खाद-पानी डालते हैं तो यह एक एकड़ 15 क्विंटल तक भी पहुंच सकता है."

तुराक एक जमाने से कपास की खेती कर रहे हैं. ओमप्रकाश बिकमचंद लोहिया के साथ भी कुछ ऐसा ही है. उनका परिवार कई पीढ़ियों पहले राजस्थान से आकर यावतमल ज़िले के हेवरी गांव में बस गया था.

उनका कहना है, "फसल अब अच्छी हो रही है. हमारे बुजुर्ग कम मात्रा में खाद और किटनाशक का इस्तेमाल करते थे. लेकिन अब बीटी कॉटन का इस्तेमाल करने के लिए बहुत कुछ जानना पड़ता है कि कब क्या चीज़ देनी चाहिए. हर किसान ऐसा नहीं करता है. लेकिन जो ये जानते हैं, उन्हें झेलना नहीं पड़ता है."

तुराक और लोहिया दोनों भारत में पहली जेनेटिक रूप से विकसित और बड़े पैमाने पर विवादित बीटी कॉटन फ़सल की सराहना कर रहे हैं.

2002 में बीटी कॉटन की खेती की इजाज़त दी गई थी. बीटी कॉटन बूलवर्म जैसे नुकसानदायक कीटों से मुकाबला करने के लिए सक्षम होता है.

लोहिया कहते हैं कि बीटी कॉटन आने से पहले उनके कंधे कीटनाशक का छिड़काव करते-करते दुखने लगते थे.

बीटी कॉटन की खेती शुरू होने के बाद से कपास के उत्पादन में तीन गुणा से ज्यादा की वृद्धी हुई है. इसका उत्पादन दस लाख बेल्स (एक बेल्स 170 किलोग्राम के बराबर होता है) से बढ़कर 3.5 करोड़ बेल्स तक पहुंच चुका है.

इस दौरान कपास की खेती 90 लाख हेक्टेयर ज़मीन से बढ़कर एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर तक हो गई है.

भारत कपास आयातक से कपास निर्यातक देश बन चुका है. इस दौरान कपास का निर्यात पचास हज़ार बेल्स से बढ़कर 70 लाख बेल्स तक पहुंच गया है.

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉटन रिसर्च के मुताबिक़ बूलवर्म को नियंत्रित करने में जितना कीटनाशक लगता था, उसमें 25 गुणा की कमी दर्ज की गई है.

2002 से लेकर 2011 तक के बीच कीटनाशक की खपत 4470 टन से घटकर 222 टन तक पहुंच गई.

इंसानों, जानवरों और पर्यावरण पर कोई भी हानिकारक प्रभाव के सबूत नहीं मिलने के बावजूद बीटी कॉटन को लेकर विवाद बना हुआ है.

अलग-अलग वैचारिक धारा के लोगों ने इस विवाद को जन्म दिया है.

अलग-अलग वामपंथी धाराओं के लोग इसे इटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के मसलों के कारण पसंद नहीं करते और इसलिए भी कि बीटी हाइब्रिड बीज के लिए भारत बड़ा बाज़ार बन रहा है.

हाइब्रिड बीज, फिर चाहे वो जेनेटिकली विकसित हो या परंपरागत रूप से बने हाइब्रिड बीज, उन्हें हर साल खरीदना पड़ता है.

यदि ऐसा न करें तो हाइब्रिड बीज की क्षमता खत्म हो जाएगी. तकनीक का इस्तेमाल करके मुनाफा कमाने का यह एक तरीका है.

भारत में एक पैकेट बीटी कॉटन बीज की क़ीमत 830 रुपए है जिसे हाल ही में सरकार ने घटाकर 800 रुपए कर दिया है.

बीटी कॉटन बीज की कंपनियों ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी है.

अमरीका में जहां किसानों की तदाद बहुत कम है और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को लेकर कड़े क़ानून हैं.

किसान वहां बीजों को संरक्षित कर सकते हैं और इसका इस्तेमाल अगले मौसम में कर सकते हैं.

वे प्रति एकड़ के हिसाब से रॉयल्टी देते हैं. भारत में इसे लागू करना मुश्किल है.

जेनेटिक मोडिफिकेशन एक उच्च तकनीक है इसलिए किसान इसमें संशोधन नहीं कर सकते हैं. उन्हें या तो इसके लिए सरकार पर निर्भर होना पड़ेगा या फिर बीज कंपनियों पर.

वामपंथियों को इस बात का डर है कि अमरीकी कंपनियों पर निर्भरता भारतीय किसानों को उनका गुलाम बना देगी.

वे किसानों की आत्महत्या के लिए बीटी कॉटन को जिम्मेदार मानते हैं.

कुछ ऐसे लोग भी है जो प्रकृति से छेड़छाड़ करने के कारण होने वाले नुकसान के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं.

लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति में हमेशा इवॉलूशन की प्रकिया के माध्यम से छेड़छाड़ होती रहती है.

जेनेटिक मोडिफिकेशन इसे बस तेज़ और धारदार बनाता है.

स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे दक्षिणपंथी समूह बीटी कॉटन का इसलिए विरोध करते हैं क्योंकि वे पश्चिम-विरोधी हैं.

यह सच है कि हाइब्रिड नस्ल के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है जिसकी वजह से सिंचाई पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है.

दो साल पहले एक बैक्ट्रीया के जीन वाले बीटी कॉटन का पेटेंट खत्म हो गया था.

अब दो बैक्ट्रीया के जीन वाला बीटी कॉटन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

सरकार को किसानों को सस्ता बीटी कॉटन बीज देने के लिए एक बैक्ट्रीया के जीन वाली तकनीक इस्तेमाल करनी चाहिए.

नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक़ बीटी कॉटन बीज का खर्च खेती के कुल खर्च का आठ से दस फ़ीसदी पड़ता है.

जेनेटिक मोडिफिकेशन के क्षेत्र में अकेले अमरीका ही नहीं लगा हुआ है.

भारतीय वैज्ञानिक भी इसमें लगे हुए हैं. असम एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया की मदद से बीटी चिकपी (चना) विकसित किया है.

इसके इस्तेमाल से चने की पैदावार तीस फ़ीसदी तक बढ़ सकती है. जेनेटिक तकनीक के अलावा कोई दूसरा ऐसा रास्ता नहीं है जो स्टेम बोर्रस जैसे कीट से निपट सके.

ए के सिंह
इमेज कैप्शन, ए के सिंह.

स्टेम बोर्रस धान की फसल को बुरी तरह से प्रभावित करता है.

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के जेनेटिक विभाग के मुखिया एके सिंह कहते हैं, "बूलवर्म के ख़िलाफ़ प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल किए जाने वाले बीटी जीन का स्टेल बोर्रस को खत्म करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन तमाम तरह के विरोधों ने इसमें अड़ंगा डाल रखा है."

कहा जाता है कि दुनिया भर में भारत का जीएम फसलों को परखने और उन्हें अपनाने की इजाज़त देने का तरीका सबसे बेहतरीन है.

एक बड़ी आबादी वाला देश जो पहनने और खाने की कमी से जूझ रहा हो, वो इस तकनीक से मुंह नहीं मोड़ सकता है.

(विवियन फर्नांडिस www.smartindianagriculture.in के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)