तीनों ख़ान में कौन है सबसे करिश्माई?

    • Author, आकार पटेल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

बॉलीवुड के ख़ान, शायद हॉलीवुड और हॉन्गकॉन्ग सिनेमा जगत के सितारों के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय फ़िल्मी सितारें हैं. तीनों ख़ानों का जन्म 1965 में हुआ था. आमिर खान आज 50 साल के हो गए हैं. बाकी दोनों खान भी इस साल 50 के हो जाएंगे.

हिन्दी फ़िल्म जगत पर पिछले 20 सालों से तीनों ख़ानों का दबदबा बरक़रार है.

टिकट बिक्री और फ़िल्मों की संख्या के हिसाब से दुनिया की दूसरे सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री पर तीन अधेड़ उम्र के अभिनेताओं का एकाधिकार क़ाबिले-तारीफ़ है, ख़ासकर तब जब समूचा मनोरंजन जगत युवा केंद्रित है.

ऐसे में आधुनिक समय के इन तीन लीजेंड की उपलब्धियों और प्रभाव के बारे में चर्चा करना लाज़िमी है.

( ये लेख 25 जनवरी 2015 को प्रकाशित हो चुका है)

पढ़ें लेख विस्तार से

सलमान ख़ान, आमिर ख़ान, शाहरुख़ ख़ान, हिन्दी फ़िल्म, हीरो

ख़ान, उपनाम से अफ़ग़ान मूल की ध्वनि आती है लेकिन बॉलीवुड का कोई भी ख़ान देखने में पख़्तूनों जैसा नहीं दिखता, उनकी लंबाई भी औसत या औसत से कम ही है.

तीन साल पहले जिस अख़बार में मैं काम करता था उसने एक सर्वे कराया था कि तीनों ख़ानों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय और करिश्माई कौन है?

ये जानने के लिए हमने पोस्ट ऑफ़िस वालों से पता किया कि किस हीरो को सबसे अधिक ख़त आते हैं. हमें पता चला कि सलमान ख़ान को बाक़ी दोनों ख़ानों को कुल मिलाकर जितने ख़त या पार्सल आते थे उससे क़रीब दोगुने ज़्यादा ख़त-पार्सल आते थे.

हम इससे ज़्यादा हैरान नहीं हुए क्योंकि सलमान की लोकप्रियता का प्रमाण उनके बांद्रा स्थित घर के बाहर रोज़ ही दिखता है. सलमान का घर बैंडस्टैंड रोड के गैलेक्सी अपार्टमेंट में है.

इस सड़क पर मैं कई बार टहलने जाता हूँ. सलमान का घर सड़क की शुरुआत में ही है और उसी सड़क के अंत में शाहरुख़ ख़ान का बंगला 'मन्नत' है. शाहरुख़ के बंगले पर शायद ही कोई दिखता था. उनके बंगले की ऊँची दीवारें भी ताकने-झांकने वालों को हतोत्साहित करती थीं.

आम जनता का हीरो

सलमान ख़ान, जैकलीन फर्नांडिज़

सलमान के फ़्लैट के सामने सड़क के दूसरी तरफ़ हमेशा ही कई लोग या अक्सर ही एक भीड़ मौजूद रहती है.

इन चाहने वालों को अक्सर ही उनके सब्र का फल मिलता है जब सलमान साइकिल चलाते दिख जाते या उनके घर का कोई सदस्य बाहर बॉलकनी में आ जाता है.

सलमान के चाहने वालों में ज़्यादातर मुस्लिम युवक होते हैं, जिनके सिर पर टोपियाँ होती हैं. सलमान का करिश्मा ज़मीनी है, इन सितारों के पीछे छिपे असल आदमियों के बारे में कुछ जानने की मुझे अक्सर इच्छा होती है.

बहुत कम लोगों को पता है कि बांद्रा में आमिर ख़ान का घर कहाँ है, और उन्हें भी शायद यही पसंद है. आमिर फ़िल्मी सितारों वाली तड़क-भड़क को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते.

एक बार पाली हिल में मैंने उन्हें मारुति 800 कार में अपनी पत्नी किरण राव के साथ जाते हुए देखा था.

कौन किसका हीरो?

आमिर ख़ान, किरण राव

आमिर ख़ान भारत के सोचने-समझने वाले दर्शकों के हीरो हैं. आख़िर, उनके अलावा चेतन भगत की कहानी में कौन जान डाल सकता है?

पिछले दस साल में आमिर ने केवल छह फ़िल्मों में हीरो की भूमिका की है, शाहरुख़ ने 17 और सलमान ने 27 फ़िल्मों में.

फ़िल्मों की ये संख्याएं आमिर के समझदार लोगों के हीरो, शाहरुख़ की मध्य वर्ग के हीरो और सलमान के आम लोगों के हीरो की छवि को ही प्रतिबिंबित करती हैं.

इन कलाकारों की ये छवियाँ उनके व्यक्तित्व के अनुरूप हैं और इसलिए सटीक भी हैं. कार, क़लम या बिस्किट जैसे पारिवारिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ शाहरुख़ से विज्ञापन कराना पसंद करती हैं.

वहीं डॉलर बनियान और डिक्सी स्कॉट बनियान सलमान ख़ान के हिस्से आते हैं. कोका-कोला ने अपने उत्पादों में कीटनाशक मिले होने की ख़बरें आने के बाद विश्वसनीयता हासिल करने के लिए आमिर का सहारा लिया.

आमिर को लगा झटका

शाहरुख़ ख़ान, गौरी ख़ान, आमिर ख़ान

लेकिन जब आमिर ने नर्मदा पर बने बांध से विस्थापित हुए लोगों की मदद के लिए ज़मीनी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया तो वो मुसीबत में घिर गए.

उन्हें शायद उम्मीद ही नहीं थी कि गुजराती लोग उनकी इस हरकत से कितने नाराज़ हो जाएंगे. उन्हें इस बात की भी उम्मीद नहीं रही होगी कि उनकी फ़िल्म 'फ़ना' का बहिष्कार किया जाएगा. उसके बाद से उन्होंने उस मुद्दे को छोड़ ही दिया.

आमिर के गंभीर पक्ष में कोई गहराई और प्रतिबद्धता नहीं है इसलिए उनके बारे में लिखना बोरियत भरा है.

उनके बारे में ज़्यादा कुछ कहने को होता नहीं है क्योंकि एक विचारक से जो उम्मीद की जाती है वो उनमें नहीं है.

किसी बॉलीवुड स्टार से गंभीर वैचारिकता की उम्मीद करना शायद अन्याय ही है, लेकिन क्या किया जाए...अपनी ये छवि उन्होंने ख़ुद बनाई है.

सबसे मज़ेदार ख़ान

सलमान ख़ान, करीना कपूर

तीन खानों में सबसे मज़ेदार और करिश्माई हैं, सलमान ख़ान.

कुछ साल पहले एक पार्टी में वो पूरी रात टॉयलेट में बैठकर शराब पीते रहे और मेहमानों को वहीं बुलाकर मिलते रहे.

साल 2003 में सलमान विजय माल्या के याट द इंडियन प्रिंसेज पर किंगफ़िशर कैलेंडर के उद्घाटन के मौक़े पर मौजूद थे.

मैंने उन पर ग़ौर किया और देखा कि वो अमरीकी लेखक फ़िट्ज़गेराल्ड के उपन्यास 'टेंडर इज़ द नाइट' के हीरो डिक डाइवर जैसी मुद्रा में थे. उन्होंने सफ़ेद शर्ट और जींस पहन रखी थी.

उनके हाथ में वोदका का ग्लास था. एक समय उन्होंने सिगरेट ली और उसे सुलगाने से पहले ग्लास को जींस के पीछे की पॉकेट में रखा, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई हीरो फ़िल्मों में रखता.

मज़ाक़ करना आता है

पैरिस हिल्टन, सलमान ख़ान

सलमान मज़ाक़ करना भी जानते हैं. एक बार जब किसी पत्रकार ने उनसे पूछा कि उनके उच्चारण के लहजे में विदेशी पुट कहाँ से आया है तो उन्होंने जवाब दिया, "ढेर सारी विदेशी लड़कियों के साथ 'सोने' से." हालाकि उन्होंने 'सोने' के लिए कुछ और ही शब्दों का प्रयोग किया था.

शनिवार, 28 सितंबर, 2002 को सलमान जुहू के एक नाइटक्लब 'रेन' में बैठकर शराब पी रहे थे. उसके बाद वो गाड़ी में बैठकर बांद्रा स्थित अपने घर के लिए निकले.

उनपर आरोप है कि उनकी लैंड क्रूज़र गाड़ी एक दुकान की सीढ़ियों पर सो रहे ए-वन बेकरी के कर्मचारियों पर चढ़ गई. इस घटना में नूरुला शरीफ़ नामक एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई, चार अन्य लोग घायल हो गए.

सलमान ख़ान पर आरोप है कि वह मरते-बिलखते ग़रीबों को वहीं छोड़कर भाग गए. कुछ पीड़ितों ने उन्हें ड्राइवर की सीट से उतरते हुए देखने की बात अदालत में कही है. घटना के आठ घंटे बाद सलमान ने आत्मसमर्पण किया. पुलिस के अनुसार तब भी उनके रक्त में 62 मिलीग्राम अल्कोहल था.

लेकिन सलमान का कहना है कि गाड़ी उनके पुलिस गार्ड रविंद्र पाटिल चला रहे थे. पाटिल को नौकरी से निकाल दिया गया और उनके घर वालों ने भी उनसे नाता तोड़ लिया.

लोकप्रियता पर असर नहीं

सलमान ख़ान, कटरीना कैफ़

एक अख़बार ने पाटिल की एक तस्वीर छापी थी जिसमें वो एक ख़ाली कमरे के फ़र्श पर बैठे थे. टीबी से पीड़ित होने के कारण उनका शरीर कंकाल जैसा दिख रहा था और उनके पास इलाज कराने के लिए पैसे नहीं थे. पाटिल महज़ 30 साल की उम्र में साल 2007 में एकाकी और दिवालिया हालत में मरे.

इन घटनाओं का सलमान की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ. सच तो ये है कि उनके करियर का सबसे अच्छा दौर इसके बाद ही आया.

किसी सभ्य देश में, उनके दर्शक ऐसी घटना के बाद उनसे बिदक जाते, जैसे अमरीका में अभिनेता एर्रोल फ्लाइन पर बलात्कार का आरोप लगने के बाद हुआ था.

संयोगवश, सलमान एक ऐसी संस्कृति वाले समाज में लोकप्रिय हैं जहाँ नैतिकता का स्तर शायद थोड़ा नीचा है और ऐसी संस्कृति में वो अपने किए पर हँस भी सकते हैं. आख़िरकार उनका करिश्मा बरक़रार ही है.

साल 2007 में जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने उनसे पूछा कि वो इतने कम विज्ञापन क्यों करते हैं तो सलमान बोले, "अरे, मिलते नहीं हैं विज्ञापन. करना कौन नहीं चाहता?"

उनके अनुसार उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामले के कारण विज्ञापन देने वाले उनसे दूर हो गए हैं. लेकिन ये बात ग़लत हैं. किसी विज्ञापनदाता को भी ऐसी बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता. उनकी छवि ही आम लोगों यानी ग़रीब तबके के स्टार की है.

टोपी की भावना

शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान

सलमान अवैध शिकार के मामले में जब अदालत में हाज़िर हुए तो उन्होंने सिर पर टोपी लगा रखी थी. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने ऐसा सहानुभूति हासिल करने के लिए नहीं किया लेकिन इस कृत्य के भावनात्मक असर को नकारना आसान नहीं है.

आम तौर पर सलमान शायद ही कभी टोपी में दिखे हों और ख़ान परिवार अपने बहुलवादी परंपराओं को लेकर गर्व व्यक्त करता रहा है.

तीनों ख़ान समावेशी हैं और अपनी धार्मिक आस्था का कोई विशेष प्रदर्शन नहीं करते. शाहरुख़ और आमिर ने हिन्दू लड़कियों से शादियाँ की हैं.

शाहरुख़ का करिश्मा एक तरह से रहस्यमयी है क्योंकि उनके अंदर का व्यक्तित्व हमेशा छिपा रहता है. वो अपने प्रशंसकों और मीडिया से सहजता से मिलते हैं और इसका मज़ा लेते हैं. सेलेब्रिटी होने का वो पूरा आनन्द लेते हैं.

एसएमएस चुटकुलों में शाहरुख़ के समलैंगिक झुकावों पर मज़ाक़ होते हैं लेकिन लगता नहीं कि उनमें कोई सच्चाई है.

जब एक पार्टी में सलमान से इस बात पर उनका झगड़ा हो गया कि दोनों में कौन ज़्यादा बड़ा गेम शो होस्ट है, तो सलमान के मुक्का मारने की धमकी से पीछे नहीं हटे.

उन्होंने पलटवार करते हुए कहा, "तू क्या मारेगा? तू हाथ तो उठा, मैं मारूँगा तुझे. वो भी तेरी पार्टी में, और तेरे दोस्तों के सामने." अपनी बॉडी के लिए मशहूर सलमान बैठे ही रहे. मैंने कहीं पढ़ा था कि शाहरुख़ ने ख़ुद को दिल्ली का गुंडा कहा था.

सितारों का अक्स

सलमान ख़ान, शाहरुख़ ख़ान

डरपोक सलमान, छिछले आमिर और ठग सरीखे शाहरुख़ ख़ान, शीशे में हमारे फ़िल्मी सितारों का प्रतिबिंब गज़ब ही नज़र आता है.

रूडयार्ड किपलिंग ने अपने उपन्यास 'किम' में लिखा है कि भारत दुनिया का एकमात्र लोकतांत्रिक समाज है. शायद ये सच हो लेकिन ये समाज गुणवत्ता को सबसे ऊपर रखने वाला समाज नहीं है.

किसी भी और देश की तुलना में भारत में इस बात का आपको सबसे अधिक लाभ मिलता है कि आप किस घर में पैदा हुए हैं. लेकिन बॉलीवुड के लिए ये पूरी तरह सही नहीं है.

अगर आप का जन्म किसी फ़िल्मी परिवार में हुआ हो तो आपको ज़्यादा आसानी से मौक़ा मिल जाता है लेकिन आख़िरकार जनता ही इस बात का फ़ैसला करती है कि किसमें ज़्यादा करिश्मा है.

तीनों ख़ानों ने दुनिया के सबसे मुश्किल कारोबार में विजय पताका फहराई है, और इससे भी उनके चरित्र का एक अलग ही पहलू उजागर होता है.

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