दिवाली से पहले सोने और चांदी के दाम क्यों लगातार गिर रहे हैं?

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वैश्विक शेयर बाज़ारों में बिकवाली और कच्चे तेल की क़ीमत 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचने के बीच 23 अक्टूबर को सोने और चांदी की क़ीमतों पर दबाव बना रहा.
घरेलू बाज़ार में चांदी की क़ीमत दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम से नीचे फिसल गई.
वैश्विक बाज़ार में कॉमेक्स पर सोने का वायदा भाव 4,030 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा था, जबकि चांदी करीब 54 डॉलर प्रति औंस पर थी.
घरेलू बाजार में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने का वायदा भाव 1,42,300 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास और चांदी का वायदा भाव 1,96,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रहा था.
यह लगातार दूसरा सप्ताह है, जब सोने की क़ीमतों में गिरावट आई है.
ब्लूमबर्ग से टीडी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ कमोडिटी रणनीतिकार रयान मैके ने कहा, "तेल की क़ीमतों, ब्याज दरों और फ़ेड के रुख़ को लेकर चिंताओं का दबाव सोने पर पड़ रहा है. इसके अलावा, बाज़ार में निवेश भी नकारात्मक रहा है."
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''क़ीमती धातु की क़ीमतों में इस हफ़्ते चार फ़ीसदी की गिरावट आने की आशंका है. जून की शुरुआत के बाद यह इसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट होगी. मैके के मुताबिक, सोना फ़िलहाल जोखिम से बचने के लिए निवेशकों की व्यापक बिकवाली की चपेट में है."
उनके अनुसार, "मध्य-पूर्व में नए सिरे से बढ़े तनाव ने ऊर्जा की क़ीमतों को फिर ऊपर धकेल दिया है, जबकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के शेयरों से निवेश निकलने के कारण निवेशक अमेरिकी बॉन्ड की ओर रुख़ कर रहे हैं. इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ा है, जिससे सोने पर दबाव पड़ा है. आमतौर पर बॉन्ड में रिटर्न बढ़ने से सोने की क़ीमतों में कमज़ोरी आती है.''
बाज़ार के एक हिस्से में सोने की कमज़ोरी का असर दिखाई नहीं दिया है. वह है एक्सचेंज ट्रेडेड फ़ंड यानी ईटीएफ़ में सोने की होल्डिंग.
ब्लूमबर्ग जिन गोल्ड ईटीएफ़ पर नज़र रखता है, उनमें लगातार पिछले 14 सप्ताह से सोना आ रहा है. यह रुझान सोने की क़ीमतों में गिरावट के बिल्कुल उलट है.
सैक्सो बैंक ए/एस में कमोडिटी रणनीति के प्रमुख ओले हानसेन ने एक नोट में लिखा, "लंबी अवधि के निवेशक जियोपॉलिटिकल जोखिमों और करेंसी की क्रय शक्ति घटने से बचाव के लिए ईटीएफ के ज़रिए सोना जमा करना जारी रखे हुए हैं."
चांदी की कीमतों में लगातार गिरावट जारी

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शुक्रवार को चांदी की क़ीमतों में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी थी. अगस्त में 2,48,800 रुपये प्रति किलोग्राम के उच्चतम स्तर से चांदी की क़ीमत 56,000 रुपये गिर चुकी है.
अपने 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड उच्च स्तर से चांदी की क़ीमत आधे से भी अधिक गिर चुकी है.
यह तेज़ गिरावट 2025 में चांदी की क़ीमतों में 170 प्रतिशत की उछाल के बाद आई है. सोने की क़ीमतों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है. अगस्त में 1,64,773 रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्चतम स्तर से सोना 23,000 रुपये सस्ता हो चुका है.
तेल की बढ़ती क़ीमतों से महंगाई की चिंताएं बनी हुई हैं और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंकाएं तेज़ हो गई हैं.
ज़ाय कैपिटल मार्केट्स के मुख्य निवेश अधिकारी नईम असलम ने एक नोट में कहा, "हमारा मानना है कि हालिया कमजोरी के पीछे अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर बढ़ता मुनाफ़ा, डॉलर की मज़बूती और ब्रेंट क्रूड की क़ीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने के कारण महंगाई को लेकर फिर बढ़ती चिंताएं हैं."
बॉन्ड में उँचे रिटर्न और अमेरिकी डॉलर की मज़बूती से सोने की क़ीमतों पर भी दबाव बना हुआ है.
इससे सोने जैसी क़ीमती धातुओं को अपने पास रखने का आकर्षण कम हो जाता है, क्योंकि इनसे नियमित ब्याज आय नहीं होती.
पिछले साल के मुक़ाबले सोना फिर भी महंगा

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इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के सेक्रेटरी कुमार जैन का कहना है कि पिछले साल के मुक़ाबले लोगों को सोने में अच्छा रिटर्न मिला है. इससे निवेशकों में उम्मीद बनी हुई है.
समाचार एजेंसी एएनआई से उन्होंने कहा, "...त्योहारों का सीज़न चल रहा है. धनतेरस और दिवाली नज़दीक हैं, इसलिए लोग जमकर ख़रीदारी कर रहे हैं. सोने को रीसाइकिल करने का चलन भी काफ़ी बढ़ा है."
उनके अनुसार, पिछले साल दशहरे पर सोने की क़ीमत 1,16,000 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जबकि इस साल यह दशहरे के मौके पर इसकी क़ीमत 1,49,000 रुपये प्रति 10 ग्राम थी.
कुमार जैन का कहना है, ''क़ीमतों में इस बढ़ोतरी से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है."
उन्होंने कहा कि "शादी का सीजन भी आने वाला है और लोग गहने बनवाने के लिए सोना ख़रीद रहे हैं. यह मांग बढ़ने की एक बड़ी वजह है."
हालांकि उन्होंने कहा कि चांदी को लेकर लोगों के अनुभव काफ़ी ख़राब रहे हैं.
भविष्य में क्या होगा

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हालांकि, केंद्रीय बैंकों की ख़रीदारी और गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ़) में मज़बूत मांग ने सोने की गिरावट को सीमित रखा है.
XS.com की बाज़ार विश्लेषक लिन ट्रान ने एक नोट में कहा, "बाज़ार सोने की ख़रीदारी की मांग और ऊंची ब्याज दरों के दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. बिकवाली का दबाव कुछ कम हुआ है, लेकिन मौजूदा ख़रीदारी की मांग इतनी मज़बूत नहीं है कि क़ीमतों को नई दिशा दे सके."
असलम ने कहा कि औद्योगिक इस्तेमाल में चांदी की महत्वपूर्ण भूमिका होने के कारण मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों में कमज़ोरी का असर भी इसकी क़ीमतों पर पड़ता है, जिससे इस पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है.
उन्होंने कहा कि ज़ाय कैपिटल को उम्मीद है कि चांदी की क़ीमतों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि औद्योगिक मांग में सुधार और फिजिकल चांदी की आपूर्ति में बनी सीमाएं अमेरिकी मौद्रिक नीति के सख़्त रुख़ से पैदा होने वाले दबाव को पीछे छोड़ पाती हैं या नहीं.
फ़ॉरेक्स डॉट कॉम के बाज़ार विश्लेषक फवाद रजाकजादा ने एक नोट में कहा कि महंगाई का सोने पर दोहरा प्रभाव पड़ता है.
उन्होंने कहा, "सैद्धांतिक रूप से, क़ीमतों में लगातार बनी रहने वाली तेज़ी से मूल्य के सुरक्षित भंडार के रूप में सोने की मांग बढ़नी चाहिए."
"लेकिन अगर महंगाई इतनी लंबे समय तक बनी रहती है कि केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक रुख़ बनाए रखें, तो इसके परिणामस्वरूप वास्तविक और नाममात्र ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी होती है, जिससे सोने का आकर्षण कुछ हद तक कम हो जाता है."
तेल की क़ीमतों का असर

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तेल की क़ीमतें सोने और चांदी को मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं. इसका असर महंगाई, ब्याज़ दरों और आर्थिक विकास के ज़रिए देखने को मिलता है.
हालांकि, ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं है कि तेल महंगा होगा तो क़ीमती धातुओं के भाव गिरेंगे.
तेल महंगा होता है तो इससे ईंधन, परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ जाती है. बाज़ार को चिंता होने लगती है कि महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है.
निवेशकों को लगता है कि केंद्रीय बैंक ब्याज़ दरों में कम कटौती करेंगे या उन्हें लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखेंगे. ऐसे में बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है. इससे सोने का आकर्षण कम हो सकता है, क्योंकि सोने से ब्याज़ नहीं मिलता.
एक दूसरी स्थिति भी है. तेल की क़ीमतों में तेज़ उछाल से महंगाई और जियोपॉलिटिकल तनाव को लेकर चिंताएं बढ़ने पर निवेशक सुरक्षित निवेश के विकल्प के रूप में सोने की ओर रुख़ कर सकते हैं.
ऐसे में अगर ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी का दबाव सीमित रहता है, तो सोने की क़ीमतों को मज़बूती आ सकती है.
चांदी एक क़ीमती धातु होने के साथ-साथ औद्योगिक कच्चा माल भी है. इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर पैनलों और अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में होता है. साल 2024 में वैश्विक चांदी की कुल मांग में औद्योगिक इस्तेमाल की हिस्सेदारी लगभग 56 प्रतिशत थी.
इसलिए, अगर तेल की क़ीमतों में उछाल से उत्पादन लागत बढ़ती है और मैन्युफ़ैक्चरिंग गतिविधियां कमज़ोर पड़ती हैं, तो चांदी के लिए एक अतिरिक्त चिंता पैदा हो सकती है यानी औद्योगिक मांग में गिरावट हो सकती है.
जब बाज़ार को सख़्त मौद्रिक नीति और धीमी आर्थिक वृद्धि, दोनों की आशंका होती है, तब इस कारण चांदी की क़ीमतें सोने के मुक़ाबले अधिक दबाव में आ सकती हैं.
हालांकि, यह मांग से जुड़ा एक संभावित जोखिम है.
तेल की क़ीमतें क़ीमती धातुओं के भाव को सीधे नियंत्रित नहीं करतीं.
असल में यह देखना महत्वपूर्ण है कि तेल की तेज़ी से ब्याज दरों की उम्मीदों, महंगाई को मैनेज करने के बाद मिलने वाले बॉन्ड रिटर्न और चांदी के मामले में औद्योगिक गतिविधियों पर क्या असर पड़ता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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