नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद क‍ितनी मज़बूत होगी?

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इमेज कैप्शन, पीएम मोदी शनिवार को कोलकाता में शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण में शामिल हुए
    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत में विधानसभाओं के चुनावी नतीजे सिर्फ़ उन राज्यों तक ही सीमित नहीं रहते. ये आने वाले चुनावों का भाव या यूं कह लें कि वो किन मुद्दों के इर्द-गिर्द होगा इसको भी एक हद तक तय कर देते हैं.

बीते सप्ताह केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों में तीनों ही राज्यों में सत्ता परिवर्तन हुआ.

लेकिन सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन पश्चिम बंगाल में हुआ जहां बीजेपी ने अपने 46 साल के इतिहास में पहली बार चुनाव जीता है. ये राज्य जनसंघ जिसे हम अब बीजेपी के नाम से जानते हैं इसके संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का गृह राज्य है.

चार मई, 2026 की शाम को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत का भाषण दे रहे थे. उन्होंने कहा, "डॉ मुखर्जी ने जिस सशक्त बंगाल का सपना देखा था वो सपना कई दशकों से पूरा होने का इंतज़ार कर रहा था."

ये बीजेपी की एक दशक की मेहनत है जो नरेंद्र मोदी की जीत के बाद 2016 में पहली बार पश्चिम बंगाल के विधानसभा में बीजेपी का खाता खुलने से शुरू हुई और अब दस साल बाद बीजेपी 3 सीटों से 207 सीटों का सफ़र तय कर चुकी है.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की छह सीटें कम हुई थीं और उसने 12 सीटें जीती थीं, अब दो साल बाद वही बीजेपी टीएमसी के मुक़ाबले दोगुनी सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रही है.

एसआईआर फ़ैक्टर

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इमेज कैप्शन, 9 मई शनिवार को कोलकाता में बीजेपी की नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में नरेंद्र मोदी ने जनता का कुछ इस तरह आभार जताया

वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय देश में आरएसएस और दक्षिणपंथी राजनीति के विस्तार पर चार दशकों से काम कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल की इस जीत को वो साल 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बैकड्रॉप में कैसे देखते हैं?

इस सवाल पर मुखोपाध्याय कहते हैं, "साल 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों में बीजेपी की सीटें 2019 के चुनाव से कम आई थीं, लेकिन उसके बाद से ही हम बाकी के विधानसभा चुनाव में देखें तो बीजेपी ने उस नज़रिए को तोड़ा है जिसमें माना जाने लगा था कि मोदी की लोकप्रियता घटी है."

"विपक्ष को लोकभा चुनाव में जो एक दरवाज़ा मिला था वो बीजेपी की हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार में जीत के बाद धीरे-धीरे बंद होता गया."

बीजेपी की इस जीत को ममता बनर्जी की 15 साल की सत्ता के अंत के ही तौर पर नहीं बल्कि बीजेपी की लगातार कोशिश की जीत के रूप में भी देखा जाना चाहिए.

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जब साल 2021 में चुनाव हुए तब पीएम मोदी ने कोविड-19 महामारी के दौरान भी रैलियां की थीं. हालांकि इन सारी कोशिशों के बाद भी बीजेपी को 77 सीटें मिली थीं.

नीलांजन मानते हैं कि बीजेपी ने "बहुत ही सुनियोजित तरीके़ से हिंदुत्व की भावना को बंगाल में उभारा है." लेकिन वो इस बार इलेक्टोरल रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न यानी एसआईआर की प्रक्रिया को एक बड़ा फ़ैक्टर मानते हैं.

वह कहते हैं, "एक बात जिसका ज़िक्र बार-बार करना ज़रूरी है वो ये कि जिस तरह से इलेक्टोरल रोल को बदला गया और एसआईआर की प्रक्रिया के ज़रिए लाखों की संख्या में वोट कटे, चुनाव में इसकी अहम भूमिका रही. मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने उतनी निष्पक्षता से चुनाव प्रक्रिया को पूरा नहीं किया जैसा हमने पहले होते देखा है."

"एक पॉलिटिकल कॉमनसेंस से अगर हम देखें तो चुनाव से तीन महीने पहले एसआईआर की प्रक्रिया शुरू करना और उसे हड़बड़ी में करना आयोग की मंशा पर सवाल तो उठाता ही है."

"भवानीपुर का उदाहरण देख लीजिए जहां ममता बनर्जी 15 हज़ार वोटों से हारी हैं और वहां तक़रीबन 50 हज़ार नाम वोटर लिस्ट से हटे हैं. ये कह देना की एसआईआर की कोई भूमिका नहीं है या ना के बराबर है, मुझे पॉलिटिकल कॉमनसेंस से ठीक नहीं लगता."

रशीद किदवाई का बयान ग्राफ़िक्स में

बीजेपी की मेहनत

पश्चिम बंगाल में चुनाव से कुछ महीने पहले ही चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया शुरू की थी. जिसके ज़रिए जो इलेक्टोरल रोल थे उनमें बड़ा बदलाव आया.

जो फ़ाइनल डेटा पब्लिश किया गया उसमें 27 लाख वोटर्स के नाम अयोग्य बताते हुए काट दिए गए. जब मतदान हुए तो इन लाखों लोगों की अपील 19 अपीलीय ट्राइब्यूनल में पेंडिंग पड़ी रही और वो इस चुनाव में वोट नहीं डाल सके.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई एसआईआर की भूमिका को उतना अहम नहीं मानते. वह कहते हैं कि ये जीत बीजेपी के लगातार मैदान में डटे रहने से मिली है और इसका असर और पार्टी का बढ़ा हुआ मनोबल आने वाले चुनावों में भी दिखेगा.

आरजी कर मामले में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सितंबर 2024 में कोलकाता में डीसी सेंट्रल ऑफ़िस का घेराव किया

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इमेज कैप्शन, आरजी कर मामले में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सितंबर 2024 में कोलकाता में डीसी सेंट्रल ऑफ़िस का घेराव समेत कई आंदोलन किए थे

किदवई कहते हैं, "जब हम एसआईआर को तमिलनाडु में बड़े उलटफेर की वजह नहीं मान रहे तो यहां उसे ही ज़िम्मेदार बताना सही नहीं होगा."

"इस चुनाव में जिस तरह की जीत मिली है उससे हमें ये समझ में आया है कि बीजेपी अब दक्षिण भारत में भी नए कॉन्फ़िडेंस के साथ चुनाव लड़ेगी. बीजेपी और ख़ासकर नरेंद्र मोदी के लीडरशिप वाली बीजेपी की एक बात है कि वो अगर विपक्ष में भी हैं तो मोमेंटम बनाए रखते हैं, चाहे कर्नाटक में विपक्ष में हों या पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहे हों."

"वो तमाम मुद्दों पर सड़कों पर निकल जाते हैं, जबकि हम विपक्ष में नतीजे आने के बाद इस तरह का मोमेंटम नहीं देखते."

"बीजेपी ने जब साल 2016 के विधानसभा चुनाव में अपना खाता खोला था तब से अब तक पश्चिम बंगाल में चाहे वो आरजी कर अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर के रेप और मौत का मुद्दा हो या संदेशखाली, वो हर मुद्दे पर ममता बनर्जी सरकार से लड़ते नज़र आती थी तो हमें उनके मैदान में लगातार बने रहने की कोशिशों को मानना पड़ेगा."

बाक़ी राज्यों पर असर

बीजेपी रैली

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजों का फ़ायदा नरेंद्र मोदी और बीजेपी को काफ़ी ज़्यादा हो सकता है

रशीद किदवई इस नतीजे का असर आने वाले पंजाब, यूपी और उत्तराखंड के चुनावों में भी दिखने की बात करते हैं.

पश्चिम बंगाल की आबादी 10 करोड़ है और इसमें 27 फ़ीसदी मुसलमान हैं. ऐसे में धर्म के नाम पर चुनाव में ध्रुवीकरण हुआ लेकिन जानकार कहते हैं कि ममता बनर्जी सरकार में बड़े से लेकर छोटे स्तर पर भ्रष्टाचार को शह देने के आरोप भी टीएमसी की हार का बड़ा कारण रहा है.

नीलांजन कहते हैं, "इस परिणाम का फ़ायदा नरेंद्र मोदी और बीजेपी को काफ़ी ज़्यादा हो सकता है क्योंकि आने वाले समय में दक्षिण भारत में भी उसकी सरकार बने तो हमें हैरानी नहीं होगी. कर्नाटक में तो वो पहले ही सत्ता में रह चुके हैं लेकिन तमिलनाडु, केरल बचता है, वहां भी बीजेपी पैठ बना पाएगी."

"राजनीतिक रूप से तो फ़ायदा होगा लेकिन उनकी जो ध्रुवीकरण की राजनीति है वो पहले ही इसे मज़बूत बना चुके हैं जिसे वो और भी आगे बढ़ाएंगे. क्योंकि ये जीत उनकी इसी राजनीति को बंगाल में भी स्वीकार्यता दिलाने वाली है."

इस चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल के लिए क्या बदलेगा?

इस सवाल पर नीलांजन कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में साम्प्रदायिक तनाव का इतिहास रहा है, देश के विभाजन के समय दंगे हुए. ग्रेट कलकत्ता किलिंग और 1964 के दंगे, तो मैं मानता हूं कि वो एक अनफ़िनिश्ड चैप्टर था."

"हालांकि उसके बाद लेफ्ट की सरकार और टीएमसी की सरकार ने ऐसी राजनीति को बिलकुल बढ़ावा नहीं दिया तो हमें हालिया इतिहास में ऐसे दंगों के उदाहरण नहीं मिलते, लेकिन ये सांप्रदायिकता बंगाल के इतिहास में हैं."

नीलांजन कहते हैं, "अब जब बीजेपी लोगों को ये यकीन दिला रही है कि सांप्रदायिक होने में कोई बुराई नहीं है. शुभेंदु अधिकारी भी चुनाव जीतने के बाद कह रहे हैं कि वो 100 फ़ीसदी काम हिंदुओं के लिए करेंगे. तो हमें ये संकेत मिल रहे हैं कि ये राज्य आने वाले समय में कैसे बदल सकता है."

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