मिलिए मुंह में कलम दबाकर लिखने वाले फ़ैज़ानउल्ला से, जो बने 10वीं बोर्ड के 'टॉपर'

मोहम्मद फ़ैज़ानउल्ला

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद फ़ैज़ानउल्ला को बचपन से ही सेरेब्रल पाल्सी की बीमारी है जिससे उनकी हाथ और अन्य अंगों की मांसपेशियां बहुत सक्रिय नहीं हैं
    • Author, मोहम्मद सरताज आलम
    • पदनाम, गोड्डा से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित मोहम्मद फ़ैज़ानउल्ला का जब 10वीं बोर्ड का रिज़ल्ट आया तो उनके एक वीडियो ने लोगों के दिल को छू लिया.

वो उस वीडियो में दांत के बीच कलम दबाकर कॉपी पर लिख रहे थे. दरअसल सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित फ़ैज़ानउल्ला के हाथ-पैर बचपन से ही काम नहीं करते थे. लेकिन वो खुद और उनका परिवार चाहता था कि वो खूब पढ़ाई करें.

उन्होंने झारखंड में 10वीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल किए और वो इस परीक्षा में 'दिव्यांग कैटेगरी' में टॉपर बने. उन्होंने परीक्षा में राइटर की उपलब्धता के बाद भी ज़्यादातर कॉपी खुद ही लिखी.

सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित गोड्डा टाउन के रहने वाले फ़ैज़ानउल्ला अपनी बीमारी की वजह से दूसरे बच्चों की तरह कभी स्कूल नहीं जा सके, लेकिन उनके परिवार ने और उनके शिक्षक ने पूरा सहयोग भी किया.

मोहम्मद फ़ैज़ानउल्ला ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, "मैं कभी स्कूल की कक्षाओं में नहीं पढ़ सका. अब इस बात का मुझे मलाल नहीं है, क्योंकि मेरे अंक ख़ुद ही ज़ाहिर करते हैं कि मैं कम से कम पढ़ाई के मामले में सामान्य वर्ग के बच्चों से कम नहीं हूं."

वीडियो कैप्शन, बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद 10वीं बोर्ड परीक्षा में हासिल किए 93% अंक

जन्म के साथ संघर्ष की शुरुआत

फ़ैज़ानउल्ला

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इमेज कैप्शन, फ़ैज़ानउल्ला अपने माता पिता के साथ

फ़ैजानउल्ला का परिवार शिवाजी नगर में दो कमरे के घर में रहता है .

इनमें से एक छोटे कमरे का इस्तेमाल दुकान चलाने के लिए किया जाता है. वहीं, दूसरे एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार रहता है.

परिवार को फ़ैज़ानउल्ला की बीमारी का अहसास तब हुआ जब वो छह महीने के थे. उनकी दादी को लगने लगा था कि बच्चे के शरीर में बिल्कुल भी मूवमेंट नहीं है. उस समय को याद करते हुए फ़ैज़ानउल्ला के पिता मोहम्मद अनवार आलम ग़मगीन लहजे में कहते हैं, "स्थानीय डॉक्टर ने हमें बताया कि मेरा बेटा सेरेब्रल पाल्सी नाम की बीमारी से पीड़ित है."

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समाप्त

मोहम्मद अनवार आलम उस वक़्त इस बीमारी से बिल्कुल अनजान थे. लेकिन डॉक्टर की बात से ये ज़ाहिर हो गया था कि उनके बेटे फ़ैज़ानउल्ला जन्म से एक बड़ी बीमारी की चपेट में आ गए हैं. रिश्तेदारों की सलाह पर अनवार आलम बेटे का इलाज कोलकाता में करवाते रहे. लेकिन साल गुज़रता गया और कोई बड़ा सुधार नज़र नहीं आया.

इस बारे में उनकी मां नज़मा कहती हैं कि उनके लिए उम्मीद की किरण वो थी जब फ़ैज़ानउल्ला किसी भी दूसरे स्वस्थ बच्चे की तरह सही उम्र में बोलने लगे थे.

वो कहती हैं, "न फ़ैज़ान खुद से हिल सकते थे, न उठ सकते थे, न बैठ सकते थे. उम्र के साथ सुधार के नाम पर बस वह बातचीत करने लगे थे. फ़ैज़ान का सामान्य बच्चों की तरह बातचीत करना हम लोगों के लिए भविष्य की एक उम्मीद बन गया."

फ़ैज़ानउल्ला का बोलना उनके माता-पिता के लिए उम्मीद की तरह था और अनवार ने पांच साल की उम्र से उन्हें मौखिक तौर पर धीरे-धीरे पढ़ाना शुरू किया. मोहम्मद अनवार एक प्राइवेट मदरसे में बतौर शिक्षक के तौर पर काम करते हैं.

उन्होंने मौखिक तौर पर अपने पुत्र फै़ज़ानउल्ला को उर्दू, अरबी, हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित की शुरुआती तालीम घर पर ही देनी शुरू की.

जब फ़ैज़ानउल्ला आठ साल के हुए तो उनका दाख़िला स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में करवा दिया गया. लेकिन हाथ-पैर के काम नहीं करने की वजह से वो रोज़ाना स्कूल नहीं जा पाए.

इसके बाद घर पर ही एक स्थानीय शिक्षक आदिल हुसैन ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया.

बतौर शिक्षक मोहम्मद अनवार आलम ये जानते थे कि सिर्फ़ मौखिक शिक्षा काफी नहीं थी. लेकिन तरह-तरह के प्रयासों के बावजूद भी वो फै़ज़ानउल्ला को लिखना नहीं सिखा पा रहे थे.

वह बताते हैं, "फै़ज़ानउल्ला का दाखिला जब छठी कक्षा में उच्च उत्क्रमित विद्यालय शिवाजी नगर में हुआ तो शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत एक फ़रिश्ता बनकर सामने आए."

शिक्षक ने मुंह से लिखने की कराई प्रैक्टिस

जितेंद्र कुमार भगत

दरअसल झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोड्डा में विकलांग बच्चों को शिक्षित करने के लिए विशेष शिक्षा विशेषज्ञ के तौर पर शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत की भर्ती हुई थी.

जितेंद्र कुमार कहते हैं, "जब मुझे फै़ज़ानउल्ला के स्कूल नहीं आने की वजह का पता चला तो मैं खुद उसके घर चला गया. फै़ज़ानउल्ला का आईक्यू लेवल, आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति से मैं बहुत प्रभावित हुआ."

वो कहते हैं, "मैंने ठान लिया कि फै़ज़ानउल्ला को हर हाल में शिक्षित करूंगा और इस संकल्प को पूरा करने के लिए मैंने उसे घर जाकर ही पढ़ाना शुरू किया."

उनके अनुसार, फ़ैज़ानउल्ला का बिल्कुल न लिख पाना सबसे बड़ी समस्या थी.

शुरुआत में उन्होंने कलम को धागे से बांधकर भी लिखवाने की कोशिश की लेकिन वो इस प्रयास में लगातार असफल रहे.

वह कहते हैं, "साल 2022 में मैंने एक कलम फ़ैज़ानउल्ला के मुंह में दातों के बीच पकड़ा कर लकीर खिंचवाने की कोशिश शुरू की."

धीरे-धीरे ये कोशिश कामयाब होती दिखी और फ़ैज़ानउल्ला लिखने में समर्थ होते गए और उनकी लिखावट भी अच्छी हो गई.

फ़ैज़ानउल्ला कहते हैं, "आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते मेरी लिखावट इतनी अच्छी हो गई कि अगर दो कॉपी की तुलना की जाए तो कोई अंतर नहीं बता सकता है कि कौन सी मेरी लिखी कॉपी है और कौन सी सामान्य बच्चे की."

आठवीं बोर्ड परीक्षा में स्कूल टॉपर

फ़ैज़ानउल्ला

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इमेज कैप्शन, पिछले साल फ़रवरी में ज़िला शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित भाषण प्रतियोगिता में फ़ैज़ानउल्ला को पहला स्थान मिला

शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत की कड़ी मेहनत और फ़ैज़ानउल्ला की लगन का नतीजा ये रहा कि उन्होंने आठवीं की बोर्ड परीक्षा और नौवीं की परीक्षा खुद लिखकर स्कूल के हर कैटेगरी के स्टूडेंट्स के बीच टॉपर बन गए.

इन परिणामों के बाद फै़ज़ानउल्ला के बढ़े हौसले को और बल तब मिला जब साल 2025 की फ़रवरी में उन्होंने 'शिक्षा के महत्व' पर ज़िला शिक्षा विभाग के द्वारा आयोजित भाषण प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया और पुरस्कार में उन्हें लैपटॉप मिला.

फै़ज़ानउल्ला

फै़ज़ानउल्ला कहते हैं, "मेरी उंगलियां इधर-उधर नहीं होती हैं, लेकिन मेरी दो उंगलियां टच कर सकती हैं, जो लैपटॉप के कीबोर्ड को इस्तेमाल करने के लिए काफ़ी हैं."

ऐसे में लैपटॉप मिलने के बाद फ़ैज़ानउल्ला ने एमएस एक्सेल, पावर प्वाइंट और एआई का इस्तेमाल करना भी सीख लिया.

अब उनकी पढ़ाई में तकनीक की मदद मिलनी शुरू हुई.

इस बारे में वो कहते हैं, "मैं एनसीईआरटी के हर एक अध्याय की पीडीएफ़ को चैटजीपीटी पर अपलोड कर प्रोम्प्ट देता कि इससे जुड़े सभी प्रश्न उपलब्ध करें. फिर मैं उन प्रश्नों को खुद ही हल करता."

इस बारे में उनके शिक्षक कहते हैं, "ये कुछ ऐसा तरीका निकला जिससे वो दिन प्रतिदिन आगे बढ़ता गया."

कुछ इस तरह तैयारियां कर फै़ज़ानउल्ला को 10वीं कक्षा के बीच में ये अहसास होने लगा कि वह बोर्ड परीक्षा अच्छे नंबर से पास कर सकते हैं.

वो बताते हैं, "जितेंद्र सर लगातार रिवीज़न पर ज़ोर देते और याद किए हुए जवाबों को मुझ से दस-दस बार लिखवाते ताकि मैं भूल न जाऊं."

एल एफ़ मरांडी

इस तरह की परीक्षा में वो लोग जो लिख पाने में असमर्थ होते हैं उनके लिए राइटर की व्यवस्था होती है लेकिन फ़ैज़ानउल्ला ने खुद को पूरी तरह से उस पर निर्भर नहीं रखा.

वो बताते हैं कि कई विषयों जब वो मुंह से लिखकर थक जाते थे तो थोड़ी देर के लिए राइटर का इस्तेमाल करते.

आख़िर उन्होंने ये फ़ैसला क्यों किया, इस पर वो कहते हैं, "बोल-बोलकर लिखवाने में वह संतुष्टि नहीं मिलती जो खुद लिखने में है. उदाहरण के लिए गणित विषय को लीजिए, इस पेपर को बोलकर मैं कैसे लिखवाता, इसलिए गणित का पेपर मैंने खुद ही लिखा."

गणित विषय में 98 अंक लाने वाले फै़ज़ानउल्ला की आंखों में अब एक तरफ़ झारखंड के मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री से मिलने की हसरत, तो दूसरी तरफ़ सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने की तमन्ना है.

फै़ज़ानउल्ला की इस सफलता पर उनके स्कूल उच्च उत्क्रमित विद्यालय शिवाजी नगर की प्रधानाचार्या एलएफ़ मरांडी कहती हैं, "ये गर्व का क्षण है कि एक तरफ़ फै़ज़ानउल्ला जैसे छात्र हमें मिले तो दूसरी तरफ़ उनको पांच सालों में निखारने वाले शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत की सेवा मिली. दोनों ही अनमोल हैं, दोनों को भविष्य के लिए शुभकामनाएं."

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