महिलाओं के लिए चलाई गईं कल्याणकारी योजनाओं ने क्या वोटिंग पैटर्न बदला?
- Author, संजय कुमार
- पदनाम, चुनाव विश्लेषक और सेफ़ोलॉजिस्ट
- पढ़ने का समय: 8 मिनट

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हालिया सालों में सरकारी योजनाओं का सीधा फ़ायदा लोगों तक पहुंचाना भारतीय चुनावी राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है.
तमाम राज्यों में सरकारें डायरेक्ट कैश ट्रांसफर, सब्सिडी, छात्रवृत्ति, मुफ्त बिजली, शिक्षा से जुड़े प्रोत्साहन और अन्य सामाजिक सहायता योजनाएं चला रही हैं.
इसी के बीच महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई योजनाएं ख़ासतौर पर चर्चा में हैं क्योंकि इनके ज़रिए महिलाओं को एक अलग वोट बैंक के रूप में साधने की कोशिश की जाती है.
हाल ही में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए हैं. इनमें से पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में सत्ताधारी पार्टियां हार गईं. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, केरल में वामपंथी गठबंधन और तमिलनाडु में डीएमके को जनता ने सत्ता से बेदख़ल कर दिया.
इन तीनों पार्टियों ने अपने शासन में ग़रीबों और महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई थीं, लेकिन चुनावी नतीजों ने साफ़ कर दिया कि सिर्फ़ कल्याणकारी योजनाएं चलाने से वोट नहीं मिलते.
पोल्समैप एक स्वतंत्र रिसर्च कंपनी है, जो चुनावों में डेटा और सर्वे के ज़रिए राय और अनुमान पेश करती है. चुनाव के बाद पोल्समैप ने आंकड़े जारी किए हैं.
ये आंकड़े बताते हैं कि केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में महिलाओं ने सत्ताधारी सरकारों की महिलाओं से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद किस तरह वोट किया. ये वो तीन राज्य हैं जहां सत्ताधारी दलों का हार का सामना करना पड़ा है.
पश्चिम बंगाल

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पश्चिम बंगाल में क़रीब 70 फ़ीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्हें या उनके घर में किसी को तृणमूल सरकार की प्रमुख योजना 'लक्ष्मीर भंडार' का फ़ायदा मिला. इस योजना के तहत महिलाओं को सीधे नक़द रकम दी जाती है.
आंकड़े बताते हैं कि बाल विवाह रोकने और लड़कियों की पढ़ाई को बढ़ावा देने वाली 'कन्याश्री प्रकल्प' योजना का लाभ भी क़रीब आधी महिलाओं के घरों तक पहुंचा.
पोल्समैप का डेटा बताता है कि 'लक्ष्मीर भंडार' की लाभार्थी महिलाओं में से क़रीब 60 फ़ीसदी ने तृणमूल गठबंधन को और 32 फ़ीसदी ने बीजेपी को वोट दिया.
वहीं जिन महिलाओं को इस योजना का लाभ नहीं मिला, उनमें से 75 फ़ीसदी ने बीजेपी को और सिर्फ़ 11 फ़ीसदी ने तृणमूल गठबंधन को वोट किया.
'कन्याश्री प्रकल्प' पश्चिम बंगाल सरकार की एक प्रमुख कल्याणकारी योजना है. इसे टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और बाल विवाह को रोकने के उद्देश्य से शुरू किया था.
पोल्समैप के मुताबिक इस योजना में भी यही रुझान देखने को मिला. इस योजना की लाभार्थी महिलाओं में से 70 फ़ीसदी ने तृणमूल कांग्रेस को और 23 फ़ीसदी ने बीजेपी को वोट दिया. गैर-लाभार्थियों में 62 फ़ीसदी महिलाएं बीजेपी और 25 फ़ीसदी तृणमूल कांग्रेस के साथ रहीं.
कुल मिलाकर आंकड़े बताते हैं कि योजनाओं का फ़ायदा उठाने वाली महिलाओं ने सत्ताधारी पार्टी को ज़्यादा वोट दिए, लेकिन एक बड़ा तबका फिर भी विपक्ष के साथ गया. इसका मतलब साफ़ है कि योजना का लाभ मिलना वोट की गारंटी नहीं है.
यह फ़र्क़ वोटिंग के आंकड़ों में भी साफ़ दिखा. महिला वोटरों में तृणमूल गठबंधन और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर रही. तृणमूल गठबंधन को 47 फ़ीसदी और बीजेपी को 42 फ़ीसदी महिला वोट मिले.
पश्चिम बंगाल चुनाव में महिला सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा. विपक्ष ने क़ानून-व्यवस्था और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया.
साल 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में रेप के बाद हुई हत्या ने इस मुद्दे को और आक्रामक बना दिया.
सुरक्षा को लेकर महिलाओं की राय ने भी वोटिंग पर असर डाला. पोल्समैप के मुताबिक़, क़रीब 36 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि तृणमूल सरकार में उनकी सुरक्षा पहले से ख़राब हुई है. इनमें से 63 फ़ीसदी महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया.
यहां तक कि जिन महिलाओं को लगा कि हालात में ख़ास बदलाव नहीं आया है, उनमें से भी 59 फ़ीसदी महिलाओं ने बीजेपी को चुना. यानी महिलाओं ने वोट देते वक़्त सुरक्षा के साथ-साथ और भी कई पहलुओं को ध्यान में रखा.
केरल

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केरल में जहां लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को हार मिली, वहां महिलाओं ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की तरफ ज़्यादा झुकाव दिखाया. यहां 48 फीसदी महिलाओं ने यूडीएफ को, 36 फीसदी ने एलडीएफ को और 14 फीसदी ने नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) को वोट दिया.
केरल में वामपंथी सरकार ने महिला एवं बाल विकास और मज़दूर कल्याण से जुड़ी कई योजनाएं चलाईं. इनका मकसद मां और बच्चे की सेहत, पोषण और मज़दूरों की भलाई का ख्याल रखना था.
डेटा बताता है कि इन योजनाओं का फायदा सभी तक नहीं पहुंच सका. सिर्फ 18 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें महिला एवं बाल विकास योजनाओं का लाभ मिला.
वहीं मज़दूर कल्याण योजनाओं का फायदा केवल 11 फीसदी को ही मिल पाया. इनमें 15 हज़ार रुपये की मातृत्व सहायता, पढ़ाई में मदद और विकलांग लोगों की दी जाने वाली सहायता शामिल थी.
पोल्समैप के मुताबिक महिला एवं बाल विकास योजनाओं की लाभार्थी महिलाओं में से 68 फीसदी ने एलडीएफ को और 24 फीसदी ने यूडीएफ को वोट दिया.
श्रम कल्याण योजनाओं की लाभार्थियों में 77 फीसदी एलडीएफ के साथ और 18 फीसदी यूडीएफ के साथ रहीं. हालांकि लाभार्थियों की तादाद काफी कम थी, इसलिए यह रुझान महज़ एक छोटे तबके तक ही सीमित रहा.
यहां भी यही बात सामने आई कि योजना का फायदा मिलने का मतलब वफादारी नहीं है. महिला एवं बाल विकास योजनाओं की करीब एक चौथाई और श्रम कल्याण योजनाओं की करीब हर पांचवीं लाभार्थी महिला ने यूडीएफ को वोट दिया.
गैर-लाभार्थी महिलाओं ने बड़े पैमाने पर यूडीएफ का साथ दिया. इससे साफ है कि केरल में यूडीएफ की बढ़त मुख्य रूप से उन महिलाओं की वजह से थी जो इन योजनाओं के दायरे से बाहर थीं.
तमिलनाडु

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तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में जहां डीएमके को हार मिली वहीं तमिलगा वेत्री कड़गम यानी टीवीके एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी.
यहां महिलाओं की वोटिंग का पैटर्न भी अलग रहा. कुल मिलाकर 38 फीसदी महिलाओं ने टीवीके को, 31 फीसदी ने डीएमके गठबंधन को और 25 फीसदी ने एआईएडीएमके गठबंधन को वोट दिया. यानी महिलाओं में टीवीके सबसे बड़ी पसंद बनकर उभरी.
तमिलनाडु में महिलाओं तक योजनाओं की पहुंच का पैटर्न भी कुछ-कुछ वैसा ही रहा, लेकिन कुछ अंतर भी दिखाई दिए. यहां तीन प्रमुख योजनाएं थीं.
'मगलीर उरिमाई थोगई' योजना के तहत पात्र गृहिणी को हर महीने 1,000 रुपये सरकार देती है. वहीं 'पुधुमई पेन्न' योजना में सरकारी स्कूलों की कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मासिक सहायता मिलती है.
इसके अलावा 'डॉ. धर्मम्बल अम्मैयार निनैवु विधवा पुनर्विवाह सहायता योजना' में विधवाओं के पुनर्विवाह और पुनर्वास के लिए 25 हज़ार से 50 हज़ार रुपये की मदद सरकार करती है.
आंकड़े बताते हैं कि 'मगलीर उरिमाई थोगई' योजना का फायदा 71 फीसदी महिलाओं तक पहुंचा, जबकि 'पुधुमई पेन्न' योजना सिर्फ 26 फीसदी और विधवा पुनर्विवाह योजना केवल 17 फीसदी महिलाओं तक ही पहुंच पाई. इसका मतलब साफ है कि अलग-अलग योजनाओं की पहुंच में काफी फर्क रहा.
'मगलीर उरिमाई थोगई' की लाभार्थी महिलाओं में 36 फीसदी ने टीवीके को, 33 फीसदी ने डीएमके गठबंधन को और 26 फीसदी ने एआईएडीएमके गठबंधन को वोट दिया.
इतनी बड़ी तादाद में योजना का फायदा देने के बावजूद डीएमके इसे चुनावी फायदे में नहीं बदल पाई.
वहीं जिन महिलाओं को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिला. उनमें से 44 फीसदी ने टीवीके को, 28 फीसदी ने डीएमके गठबंधन को और 22 फीसदी ने एआईएडीएमके गठबंधन को वोट दिया.
इसके उलट 'पुधुमई पेन्न योजना' की लाभार्थी महिलाओं में डीएमके गठबंधन के प्रति ज़्यादा झुकाव दिखा. इनमें 45 फीसदी ने डीएमके गठबंधन को, 28 फीसदी ने टीवीके को और 22 फीसदी ने एआईएडीएमके गठबंधन को वोट दिया.
लेकिन इस योजना के लाभार्थी कम थे. विधवा पुनर्विवाह सहायता योजना में भी यही रुझान दिखाई दिया. इस योजना की 52 फीसदी लाभार्थी महिलाओं ने डीएमके गठबंधन को वोट दिया, लेकिन यहां भी लाभार्थियों की संख्या सीमित थी.
जिन महिलाओं को 'पुधुमई पेन्न योजना' का लाभ नहीं मिला, उन महिलाओं ने टीवीके को सबसे ज़्यादा पसंद किया और करीब 45 फीसदी महिला वोटरों ने अपना वोट दिया.
वहीं विधवा पुनर्विवाह योजना की बात करें तो गैर-लाभार्थी महिलाओं में से 43 फीसदी ने टीवीके को वोट दिया. वहीं डीएमके गठबंधन और एआईएडीएमके गठबंधन को लगभग लगभग बराबर वोट मिले. इसका मतलब है कि जहां योजना की पहुंच नहीं थी, वहां मुकाबला ज़्यादा कड़ा था.
तीनों राज्यों के नतीजे एक बात साफ़ करते हैं. महिलाओं के लिए चलाई गई कल्याणकारी योजनाएं अपने आप में वोट की गारंटी नहीं हैं. महिला वोटर भी बाकी मतदाताओं की तरह कई बातें देखकर वोट करती हैं. चुनावी माहौल और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर उनके फैसले पर भी उतना ही पड़ता है.
संजय कुमार एक चुनाव विश्लेषक और सेफ़ोलॉजिस्ट हैं.
विभा अत्री और अरिंदम कबीर लोकनीति-सीएसडीएस में शोधकर्ता हैं.
(लेखकों के विचार उनके निजी हैं. यह किसी भी संस्था के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करता.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































