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कॉकरोच जनता पार्टी: वो सोशल मीडिया आंदोलन जिन्होंने दुनियाभर में सत्ता को चुनौती दी
- Author, मयूरेश कोण्णूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
इस समय सबसे ज्यादा चर्चाओं में है 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी). सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान ने 'कॉकरोच' को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
स्वाभाविक रूप से, यह 'कॉकरोच' वाला बयान कई लोगों को पसंद नहीं आया. इस पर आपत्तियों की बाढ़ आ गई. इसके बाद प्रतिक्रियाएं भी आईं.
अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' की घोषणा की. देखते ही देखते उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर फॉलोअर्स की बाढ़ आ गई. इंस्टाग्राम पर उन्होंने कुछ ही घंटों में बीजेपी, कांग्रेस और देश के अन्य दलों को पीछे छोड़ दिया.
इन आंकड़ों और समर्थकों को छोड़ दें तो मुख्य गंभीर चर्चा का विषय यह है कि इस जनता पार्टी के प्रति दीवानगी क्या दर्शाती है? इसका क्या अर्थ है? क्या यह सत्ताधारी दल और संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है? या फिर यह एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश का प्रयास है? क्या एक नए राजनीतिक आंदोलन का जन्म हो रहा है?
इन सवालों के जवाब मिलने में अभी काफी समय लगेगा, क्योंकि ऐसी किसी भी प्रक्रिया में लंबा समय लगता है.
इस 'पार्टी' का नाम सामने आए अभी कुछ ही दिन हुए हैं. इसलिए इसका कोई आधिकारिक ढांचा, संगठन या पदाधिकारी तय नहीं हुआ है. हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक है कि क्या वे चुनाव लड़ेंगे.
इसका एक कारण यह है कि पिछले एक दशक में भारत, भारत के पड़ोसी देशों और दुनिया भर के अन्य देशों में इस तरह की किसी घटना की प्रतिक्रिया के रूप में, राजनीति से बाहर के युवाओं का एक आंदोलन सोशल मीडिया पर शुरू हुआ.
धीरे-धीरे यह फैल गया और इसने स्थापित राजनीतिक दलों को हिलाकर रख दिया और यहां तक कि चुनावी राजनीति में चमत्कार भी कर दिखाया.
कभी-कभी यह चमत्कार लंबे समय तक कायम रहा. कभी-कभी यह क्षणिक रहा. आज 'कॉकरोच जनता पार्टी' की बहुत चर्चा हो रही है, तो आइए हाल के इतिहास के कुछ ऐसे उदाहरणों पर नज़र डालते हैं जो सोशल मीडिया ट्रेंड से शुरू होकर सत्ता तक पहुंचे.
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उस आंदोलन के फैलने के क्या कारण थे. अब, चूंकि 'कॉकरोच जनता पार्टी' भारत से है, तो आइए भारत से ही एक उदाहरण से शुरुआत करते हैं.
भारत: भ्रष्टाचार विरोधी संगठन से लेकर आम आदमी पार्टी तक
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन 2011 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ. धीरे-धीरे यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया.
उस समय सोशल मीडिया उतना व्यापक रूप से प्रचलित नहीं था जितना आज है. लेकिन भारतीय राजनीति पर इसके प्रभाव की शुरुआत यहीं से हुई थी.
अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में 'जन लोकपाल विधेयक' के लिए एक आंदोलन शुरू किया था.
अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास और अन्य कई लोगों ने 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' नामक संगठन के माध्यम से इस आंदोलन में हिस्सा लिया.
यह विरोध प्रदर्शन कथित टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले और अन्य भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भड़का था. इस विरोध प्रदर्शन और उससे उत्पन्न असंतोष को भारत में 2014 के सत्ता परिवर्तन के कारणों में से एक माना जाता है.
लेकिन इसी आंदोलन से प्रेरित होकर अरविंद केजरीवाल ने 2012 में 'आम आदमी पार्टी' की स्थापना की थी.
केजरीवाल के आंदोलन में शामिल कुछ सहयोगी उनके राजनीति में आने के ख़िलाफ़ थे. हालांकि, केजरीवाल के राजनीति में आते ही उनकी पार्टी 'आप' को जबरदस्त सफलता मिली.
2015 में 'आप' ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 67 सीटें जीतकर सरकार बनाई. बाद में इसने 2020 में फिर से जीत हासिल की. फिर 2022 में इसने पंजाब जैसे बड़े राज्य में जीत हासिल करके सबको चौंका दिया. गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में भी पार्टी का विस्तार हुआ.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके कुछ सहयोगियों को जेल तक जाना पड़ा. आम आदमी पार्टी हमेशा से कहती आई है कि यह एक राजनीतिक साजिश है.
'आप' ने 2025 में दिल्ली में सत्ता खो दी. मूल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब बिखर चुका है और उससे उभरी पार्टी एक चुनौतीपूर्ण राजनीतिक स्थिति से गुजर रही है.
इटली: फाइव स्टार मूवमेंट (एम5एस)
2009 में इटली में शुरू हुए एक आंदोलन ने वहां की राजनीति में एक नया विकल्प खड़ा कर दिया. इस आंदोलन की शुरुआत एक हास्य ब्लॉगर बेप्पे ग्रिलो ने की थी.
उन्होंने दरअसल 2005 से ही 'मीटअप' जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके लोगों को एक साथ लाना शुरू कर दिया था. समान विचारधारा वाले लोग इकट्ठा होते और पर्यावरण और अन्य नीतिगत बदलावों पर चर्चा करते. धीरे-धीरे लोगों की प्रतिक्रिया बढ़ती गईं.
फिर 2007 में उन्होंने एक ब्लॉग के माध्यम से भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग के ख़िलाफ़ एक व्यंग्यात्मक आंदोलन वी-डे शुरू किया. यह अगला क़दम था.
इसके चलते स्वच्छ संसद की मांग उठने लगी. जिसका अर्थ था आपराधिक या भ्रष्ट पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों का न होना. साथ ही चुनावी प्रक्रिया में सुधार की मांग भी उठने लगी. इसे व्यापक समर्थन मिलने लगा.
2009 में उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया. लोगों को एकजुट करने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हुए उन्होंने फाइव स्टार मूवमेंट (एम5एस) पार्टी की स्थापना की.
इसका चार्टर प्रकाशित किया और प्रत्यक्ष लोकतंत्र को लागू करने और स्थापित राजनीति को अस्वीकार करने का संकल्प लिया.
इसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों और अर्थशास्त्रियों ने भाग लिया. शुरुआत में स्थानीय चुनावों में भाग लेने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव दिखाया.
यह पार्टी 2013 के इटली के राष्ट्रीय चुनावों में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. इसने लगभग 25 प्रतिशत वोट हासिल किए. फिर यह पार्टी 2018 के चुनावों में सत्ता में आई. उस चुनाव में इसे 32.7 प्रतिशत वोट मिले.
इस पार्टी के दो प्रधानमंत्री रहे लेकिन उसके बाद पार्टी में फूट पड़ गई. अलग-अलग गुट उभर आए.
मेलोनी की सरकार 2022 के चुनावों में सत्ता में आई. एम5एस पार्टी वर्तमान में विपक्ष में है और 2018 की तुलना में उसका समर्थन कम हो गया है.
स्पेन: इंडिग्नाडोस 15 मिलियन आंदोलन
स्पेन में 2011 के आसपास शुरू हुआ इंडिग्नाडोस 15-एम आंदोलन , आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और पारंपरिक दो-दलीय राजनीतिक प्रणाली के ख़िलाफ़ एक जन आक्रोश था. इंडिग्नाडोस का अर्थ है क्रोधित, असंतुष्ट नागरिक. उस समय इस क्रोध के कई कारण थे.
2008 में मंदी के समय कई खर्चे घटाने के क़दम उठाए गए. लेकिन नागरिकों को राजनीतिक भ्रष्टाचार भी देखने को मिल रहा था. बेरोजगारी बढ़ गई थी. इसके विरोध में स्पेन के विभिन्न शहरों के चौकों पर लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए.
इसके बाद आंदोलन ने सीधे तौर पर राजनीति में प्रवेश किया. 2014 में पाब्लो इग्लेसियस सहित विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ने 'पोडेमोस' नामक राजनीतिक दल की स्थापना की. फिर वे चुनावी मैदान में उतरे.
स्पेन में हमेशा से दो-दलीय राजनीतिक ढांचा रहा है. तीसरा विकल्प मौजूद नहीं था. पोडेमोस ने वह विकल्प प्रदान किया. उन्होंने चुनावों में भी सफलता हासिल की. 2020 में उन्होंने स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (पीएसओई) के साथ गठबंधन सरकार बनाई.
ग्रीस: खर्चे घटाने के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ विरोध
लगभग 2010 के आसपास ऐसी खबरें आईं कि ग्रीस वित्तीय संकट में है. यह यूरोपीय देश एक बड़े ऋण संकट का सामना कर रहा था. इसका असर वेतन और पेंशन पर पड़ा.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कड़े आर्थिक संकट के उपाय लागू किए थे. ग्रीस के नागरिक इन तमाम कठिनाइयों से नाराज़ थे.
इसीलिए यहां उस स्थिति के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इस विरोध प्रदर्शन से कोई नई पार्टी नहीं बनी. हालांकि, पहले से मौजूद एक छोटी पार्टी 'सीरीज़ा' ने इसमें भाग लिया. इसकी अगुवाई की और देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पार्टी बन गई.
2015 के चुनावों में, इस पार्टी को लगभग 35 प्रतिशत वोट मिले और एलेक्सिस सिप्रास प्रधानमंत्री बने.
बांग्लादेश
भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में 2024 में भारी उथल-पुथल हुई. इसका कारण युवाओं की सरकार में बदलाव लाने की इच्छा और स्थापित राजनीतिक नेतृत्व के प्रति उनका आक्रोश था.
यहां 'जेन जी' ने सोशल मीडिया से इस आंदोलन की शुरुआत की और इसे अपने हाथों में ले लिया.
इसका कारण वह विधेयक था जिसमें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण जारी रखने का प्रावधान था. अधिकतर युवाओं को यह कोटा स्वीकार्य नहीं था.
इससे तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सत्तारूढ़ अवामी लीग के ख़िलाफ़ जनता में आक्रोश फैल गया. उन पर पहले से ही चुनावी प्रणाली में हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के आरोप थे. आंदोलन हिंसक हो गया. हसीना को देश छोड़कर जाना पड़ा.
विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और अराजकता बढ़ने पर इसमें शामिल छात्रों ने 'नेशनल सिटिजन पार्टी' नामक एक नई पार्टी का गठन किया.
इसके बाद इस पार्टी ने नोबेल पुरस्कार विजेता बांग्लादेशी अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस को देश में वापस आमंत्रित किया. उनके नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ.
स्थिरता बहाल होने के बाद बांग्लादेश में हाल ही में 2026 में नए चुनाव हुए. बांग्लादेश नेशनल पार्टी के तारिक रहमान जो हसीना के कार्यकाल के दौरान देश छोड़कर चले गए थे वो वापस लौटे और प्रधानमंत्री बने.
नेपाल: 'जेन ज़ी' आंदोलन और सत्ता का हस्तांतरण
बांग्लादेश का आंदोलन अब खबरों में नहीं है. लेकिन भारत के एक अन्य पड़ोसी देश नेपाल में सितंबर 2025 में सोशल मीडिया के माध्यम से फैला 'जेन ज़ी' आंदोलन एक तख्तापलट में तब्दील हो गया.
नेपाल के युवा सोशल मीडिया पर आर्थिक असमानता और रोजगार के घटते अवसरों को लेकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे. वे राजनीतिक नेताओं के बच्चों, जिन्हें 'नेपोकिड्स' कहा जाता है, पर अपना गुस्सा निकाल रहे थे.
सरकार ने फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर प्रतिबंध लगा दिया. इससे जनता में भारी आक्रोश फैल गया. नेपाल लंबे समय से राजनीतिक रूप से अस्थिर रहा. लेकिन सत्ता लगातार बदलती रही और कुछ चुनिंदा लोगों के हाथों में जाती रही. इसके ख़िलाफ़ भी असंतोष था.
अंत में यह आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा. बड़े पैमाने पर हिंसा और आगजनी हुई. प्रदर्शनकारी संसद में भी घुस गए. कई राजनीतिक नेताओं और मंत्रियों पर हमले हुए. प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इस अस्थिरता के बाद प्रदर्शनकारियों ने नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की से अगले चुनाव से पहले तक अंतरिम प्रधानमंत्री बनने का अनुरोध किया.
कार्की ने थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया. इसके बाद नेपाल में मार्च 2026 में फिर से चुनाव हुए.
प्रदर्शनकारियों ने पूर्व रैपर और राजधानी काठमांडू के मेयर बालेन शाह और उनकी 'राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी' का समर्थन किया. बालेन शाह बहुमत से निर्वाचित हुए और नेपाल के प्रधानमंत्री बने.
दुनिया भर में अन्य उदाहरण
ऊपर दिए गए उदाहरणों के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी अन्य आंदोलन हुए. इनसे सरकार परिवर्तन तो नहीं हुआ, लेकिन लोगों की भावनाओं और आक्रोश को व्यक्त करने का अवसर अवश्य मिला.
उदाहरण के लिए लगभग 2008-09 के आसपास आर्थिक संकट के दौरान आइसलैंड में राजनीतिक, अमीर और ताक़तवर लोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए.
लोगों ने संसद के सामने एक सप्ताह तक इकट्ठा होकर और बर्तन पीटकर एक अनूठा विरोध प्रदर्शन किया.
बाद में 'पाइरेट पार्टी' नामक एक पार्टी का गठन हुआ. उन्हें वोट मिले कुछ प्रतिनिधि संसद तक पहुंचे. लेकिन वे सरकार नहीं बना पाए.
2022 में आए गहरे आर्थिक संकट के कारण श्रीलंका में भी आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी. तब वहां भी लोग सड़कों पर उतर आए थे. विरोध प्रदर्शन हुए थे.
इसके परिणामस्वरूप समय बीतने के साथ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को इस्तीफ़ा देना पड़ा. लंबे समय से विपक्ष में रही पार्टी वहां सत्ता में आई. वहां का आर्थिक संकट अभी तक टल नहीं पाया है.
विश्व के पूर्वी भाग दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया में भी 2024-25 में सोशल मीडिया पर आधारित कुछ आंदोलन हुए. इनमें युवाओं ने भी भाग लिया. लेकिन वहां ये आंदोलन किसी राजनीतिक आंदोलन या पार्टी में परिवर्तित नहीं हो सके.
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए एक बात कही जा सकती है कि सोशल मीडिया के युग में, भले ही आक्रोश को व्यक्त करने का कोई रास्ता मिल जाए, लेकिन सभी आंदोलन पार्टियों में परिवर्तित नहीं होते, या यदि वे परिवर्तित हो भी जाते हैं, तो वे सत्ता में नहीं आते, जैसा कि इन उदाहरणों से पता चलता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.