फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट क्या वाक़ई तेज़ी से निपटाते हैं केस, आम अदालतों से कैसे होते हैं ये अलग?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, बेंगलुरु से
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते गुरुवार को यह आश्वासन दिया है कि नीट पेपर लीक के कथित अभियुक्तों के मुक़दमों की सुनवाई के लिए फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे.
भारत में फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था पिछले लगभग ढाई दशकों से मौजूद है. लेकिन इन्हें वास्तविक गति तब मिली, जब जस्टिस जेएस वर्मा समिति ने महिलाओं और बच्चों के यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई के लिए ऐसी अदालतें बनाने की सिफ़ारिश की थी.
इसके बावजूद, इन अदालतों में न्याय की प्रक्रिया हमेशा इतनी तेज़ नहीं रही कि पीड़ितों या उनके परिवारों को समय पर राहत मिल सके. कई मामलों में सुनवाई लंबी खिंचती रही.
नतीजा यह हुआ कि अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई और मामले वर्षों तक लटके रहे. कई मामलों में इनकी स्थिति नियमित अदालतों से बहुत अलग नहीं रही है.
गुरुवार रात प्रधानमंत्री मोदी की सोशल मीडिया पोस्ट को कुछ विशेषज्ञ महज़ एक 'बैंडेज' यानी अस्थायी उपाय बता रहे हैं. उनका कहना है कि यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है.
उनकी दलीलों को फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों के कामकाज पर हुए विस्तृत अध्ययनों का समर्थन मिलता है. इन अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे मामलों की सुनवाई में भी अक्सर देरी होती है, जो सिर्फ़ महिलाओं और बच्चों ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को गहरे सदमे और परेशानी में डाल देते हैं.
क्या फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट महज़ 'बैंडेज' है?

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क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालतों के कामकाज में कोई बड़ा फ़र्क नहीं होता.
इस बारे में विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के सह-संस्थापक और वकील आलोक प्रसन्न कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात की.
उन्होंने कहा, "फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालत में कोई अंतर नहीं है. सामान्य अदालतों की वही कमियां यहां भी दिखाई देती हैं. वही जज, वही वकील और वही व्यवस्था होती है. सिर्फ़ अदालत को एक नया नाम देकर उसे फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट कहा जाता है."
उन्होंने कहा, "मान लीजिए अदालत इस मामले को प्राथमिकता देकर सुनवाई शुरू भी कर दे, तब भी औसतन फ़ैसला आने में साढ़े तीन से चार साल लग सकते हैं. पेपर लीक का यह मामला काफ़ी जटिल है. यह ऐसा मामला नहीं है जिसे बहुत जल्दी निपटाया जा सके."
बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर अपर्णा चंद्रा ने बीबीसी से कहा, "मैं इसे एक आकर्षक पट्टी या बैंडेज कहूंगी, लेकिन यह आख़िरकार बैंडेज ही है. इससे समस्या की जड़ दूर नहीं होती. अदालतों के बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों की कमी और काम के भारी बोझ जैसी मूल समस्याएं अब भी बनी हुई हैं."
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्रीनिवासन मुरलीधर भी आलोक कुमार और अपर्णा चंद्रा की इस दलील से सहमत हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैंने फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों के कामकाज में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा है. इसकी मुख्य वजह यह है कि मौजूदा जजों को ही फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की ज़िम्मेदारी दे दी जाती है. इसके लिए अलग से अतिरिक्त जजों की नियुक्ति नहीं की जाती."
उन्होंने आगे कहा, "इस कारण ये अदालतें भी पुराने मामलों के बोझ तले दब जाती हैं. इसलिए यह व्यवस्था वास्तव में पुरानी प्रणाली का ही विस्तार बनकर रह जाती है."
फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रदर्शन कैसा रहा है?

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विशेषज्ञों की ये बातें सिर्फ़ राय नहीं हैं. विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी की ओर से 2017-18 में किए गए दो अध्ययनों से इसे समर्थन भी मिलता है.
इसके पाँच साल बाद वर्ष 2022-23 में एक और अध्ययन किया गया. यह अध्ययन विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी की 'जस्टिस एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया' पहल और विश्व बैंक के डेटा एविडेंस फ़ॉर जस्टिस रिफ़ॉर्म कार्यक्रम के सहयोग से किया गया था.
दूसरे अध्ययन में 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग चार लाख पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण क़ानून) मामलों का डेटा जुटाया गया.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों में केवल 22 फ़ीसदी मामलों का ही निपटारा हो पाया था. सिर्फ़ 22 फ़ीसदी मामलों का फ़ैसला एक साल से कम समय में हुआ.
करीब 42 फ़ीसदी मामलों में सुनवाई पूरी होने में तीन साल से ज़्यादा समय लगा. वहीं 17 फ़ीसदी मामलों में पाँच साल से भी अधिक समय लग गया.
झारखंड, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों में अधिकांश मामलों का निपटारा एक साल के भीतर हो गया था. लेकिन हिमाचल प्रदेश में मामलों के निपटारे में तीन साल से अधिक समय लगा.
हालांकि, 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल करने वाला दूसरा अध्ययन कहीं ज़्यादा व्यापक था. इसमें लगभग चार लाख पॉक्सो मामलों को शामिल किया गया. इनमें से 2,30,730 मामलों का मेटाडेटा विश्लेषण किया गया.
उत्तर प्रदेश में लंबित मामलों की संख्या सबसे ज़्यादा थी. वहाँ 2012 से फ़रवरी 2021 के बीच दर्ज़ पॉक्सो मामलों में तीन-चौथाई से अधिक केस लंबित थे.
दूसरी ओर, तमिलनाडु में मामलों के निपटारे की दर सबसे अधिक 80.2 फ़ीसदी दर्ज़ की गई.
औसतन किसी पॉक्सो मामले के निपटारे में 507.78 दिन, यानी लगभग एक साल और पाँच महीने का समय लगा. जबकि क़ानून की धारा 35 के तहत ऐसे मामलों का निपटारा एक साल के भीतर होना चाहिए.
चंडीगढ़ और पश्चिम बंगाल में मामलों के निपटारे का औसत समय लगभग एक साल रहा. बाकी अधिकांश राज्यों में सुनवाई में इससे अधिक समय लगा.
आंध्र प्रदेश में दोषमुक्ति (बरी होने) के मामलों की संख्या दोषसिद्धि (सज़ा मिलने) के मामलों से सात गुना ज़्यादा थी. पश्चिम बंगाल में यह अनुपात पाँच गुना था.
केरल एकमात्र ऐसा राज्य था, जहाँ दोषसिद्धि और दोषमुक्ति के मामलों के बीच का अंतर सिर्फ़ 20.5 फ़ीसदी था.
पॉक्सो मामलों के निपटारे में लगने वाला औसत समय राज्यों के अनुसार काफ़ी अलग था. हिमाचल प्रदेश में एक मामले के निपटारे में औसतन 877 दिन, यानी लगभग दो साल और पाँच महीने लगे. वहीं चंडीगढ़ में यह समय औसतन 215.43 दिन, यानी लगभग सात महीने था.
2023 की रिपोर्ट में कई सुझाव दिए गए. इनमें पॉक्सो मामलों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में विशेष लोक अभियोजकों (स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) की नियुक्ति की सिफ़ारिश भी शामिल थी.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि जांच और आरोप-पत्र दाख़िल करने में काफ़ी देरी होती है. इसकी एक प्रमुख वजह पुलिस जांच की धीमी रफ़्तार है, जिससे मामलों का लंबित बोझ बढ़ जाता है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफ़एसएल) में नमूने जमा कराने में होने वाली देरी से भी यह समस्या और गंभीर हो जाती है. अध्ययन ने कहा कि यह निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले में दर्ज़ आंकड़ों पर आधारित है.
सिर्फ़ 35 फ़ीसदी पॉक्सो मामलों में जांच 60 दिनों के भीतर पूरी हो सकी. वहीं, 36 फ़ीसदी मामलों में जांच पूरी करने में छह महीने से ज़्यादा समय लगा.
अध्ययन में कहा गया, "अगर जांच पूरी होने में ही इतना समय लग जाता है, तो अदालत की ओर से मामले का संज्ञान लेने के बाद एक साल के भीतर मुक़दमे की सुनवाई पूरी होने की संभावना बेहद कम रह जाती है."
व्यापक सोच की ज़रूरत
प्रोफ़ेसर अपर्णा चंद्रा का कहना है कि न्यायाधीश अकेले काम नहीं करते. उन्हें अच्छी जांच, मज़बूत अभियोजन और प्रभावी बचाव पक्ष की भी ज़रूरत होती है.
उन्होंने कहा, "सिर्फ़ फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट बना देने से ये सारी चीज़ें अपने-आप सुनिश्चित नहीं हो जातीं. अगर कोई फ़ास्ट-ट्रैक अदालत किसी मामले का फ़ैसला दो या तीन महीने में भी कर दे, तब भी अपील उसी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाएगी, जहाँ पहले से ही मामलों का भारी बोझ है. इससे मुक़दमे में और समय जुड़ जाता है."
प्रोफ़ेसर चंद्रा ने यह भी कहा कि इस पूरी बहस में आरोपियों के अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा, "हम किसी व्यक्ति को पहले से दोषी नहीं मान सकते. क़ानूनी प्रक्रिया को ठीक ढंग से पूरा करने में समय लगता है. सिर्फ़ दिखावे के लिए न्याय प्रक्रिया को तेज़ नहीं किया जाना चाहिए."
उन्होंने आगे कहा, "मौजूदा सोच यह लगती है कि नियमित न्याय व्यवस्था में मामलों का बड़ा बैकलॉग है, इसलिए विशेष अदालतें बना दी जाएं. ऐसी अलग-अलग व्यवस्थाएं देखने में अच्छी लग सकती हैं, लेकिन अब तक का अनुभव बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है."
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील के रूप में प्रैक्टिस कर रहे दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्रीनिवासन मुरलीधर ने जजों और वकीलों की तरफ़ से अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा, "अगर सरकार और व्यवस्था वास्तव में फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों को लेकर गंभीर है, तो अतिरिक्त जजों की नियुक्ति करनी होगी. इन जजों को सिर्फ़ ऐसे मामलों की सुनवाई की ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए. उन्हें बार-बार दूसरी अदालतों में स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए और न ही उन पर पुराने मामलों का अतिरिक्त बोझ डाला जाना चाहिए."
उन्होंने कहा कि इसके साथ-साथ वकीलों का सहयोग भी ज़रूरी है. वे बोले, "जो वकील दूसरे मुक़दमों में व्यस्त रहते हैं, उन्हें भी सहयोग करना होगा ताकि फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें मामलों का जल्द निपटारा कर सकें."
इस तरह जस्टिस मुरलीधर मानते हैं कि फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों को सफल बनाना है तो उनके लिए विशेष और ठोस व्यवस्था करनी होगी. पर्याप्त संख्या में जज नियुक्त करने होंगे और वकीलों का सहयोग भी सुनिश्चित करना होगा.
उनके अनुसार, "यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि सिर्फ़ फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट का नाम दे देने से मामले अपने-आप संतोषजनक ढंग से मुक़ाम तक पहुंच जाएंगे."
सरकार का पक्ष

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जुलाई 2022 में तत्कालीन केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू), दिल्ली के एक अध्ययन का हवाला दिया था.
उन्होंने कहा था, "फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना के साथ न तो विशेष बुनियादी ढांचा विकसित किया गया, न अलग प्रशासनिक व्यवस्था बनाई गई और न ही उनके लिए अलग कर्मचारी ढांचा तैयार किया गया. अदालत की प्रक्रियाओं में भी कोई विशेष ढील नहीं दी गई. इसलिए उनका कामकाज नियमित अदालतों से अलग नहीं है."
एनएलयू ने अपनी सिफ़ारिशों में कहा था कि फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों में अनुभवी जजों की नियुक्ति की जानी चाहिए. साथ ही, हर मामले के लिए अलग समय-सीमा तय की जानी चाहिए, जैसा कि भारत के विधि आयोग की 245वीं रिपोर्ट में सुझाया गया था.
अध्ययन में यह भी कहा गया था कि ज़िला स्तर पर मामलों की प्रगति की निग़रानी के लिए हर महीने समीक्षा बैठके हों. इसके अलावा, दिल्ली की तर्ज़ पर ज़िलों में संवेदनशील गवाहों के बयान दर्ज़ करने के लिए विशेष परिसर भी बनाए जाएं.
आलोक कुमार ने न्याय व्यवस्था की धीमी रफ़्तार का उदाहरण देते हुए अपने एक मित्र के रिश्तेदार के मामले का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, "मेरे एक मित्र के रिश्तेदार का निधन हो गया था. उन्होंने एक वसीयत छोड़ी थी. परिवार में किसी ने भी उस वसीयत को चुनौती नहीं दी. सभी लोग इस बात पर सहमत थे कि वसीयत मृतक की इच्छा के अनुरूप है."
सिर्फ़ अदालत के एक आदेश की ज़रूरत थी, ताकि संपत्ति का मालिकाना हक़ नए नाम पर स्थानांतरित किया जा सके. लेकिन इतना सीधा और निर्विवाद मामला होने के बावजूद छह साल बीत चुके हैं और अब तक अंतिम फ़ैसला नहीं आया है.
वे कहते हैं, "हमारी न्याय व्यवस्था इसी तरह काम करती है. किसी अदालत को 'फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट' कह देने भर से बहुत कुछ नहीं बदल जाता."
भले यह उदाहरण किसी फ़ास्ट-ट्रैक अदालत का नहीं था. लेकिन इससे प्रोफ़ेसर अपर्णा चंद्रा की यह दलील मज़बूत होती है कि, "व्यवस्था से जुड़ी किसी गहरी समस्या का समाधान अलग-थलग विशेष व्यवस्थाएं बनाकर नहीं किया जा सकता."
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