You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
एयर इंडिया विमान हादसा: 'पोती की याद आती है तो बिस्कुट याद आने लगते हैं, मौत यहाँ बेवजह आई थी'
- Author, जोया मतीन
- ........से, अहमदाबाद
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
चेतावनी: इस कहानी में कुछ ऐसे विवरण हैं, जिससे कुछ पाठक परेशान हो सकते हैं.
प्रह्लोद ठाकुर जब सुबह उठते हैं, तो सबसे पहले उनकी नज़र तस्वीरों पर पड़ती है. ये तस्वीरें अहमदाबाद के उनके छोटे से घर की चमकीली हरी, उखड़ती दीवारों पर टंगी हैं.
दीवारों पर देवी देवताओं की तस्वीरें हैं. पीतल के बर्तन रखे हैं. पुराने पारिवारिक फोटो लगे हैं. एक फ्रेम में उनकी पत्नी सरलाबेन का चेहरा है. दूसरे में उनकी पोती आध्या हैं, जो सफ़ेद कपड़े में मुस्कुरा रही हैं.
पिछले साल जून में एयर इंडिया का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. वह विमान बी.जे. मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर में गिरा था.
यह जगह अहमदाबाद एयरपोर्ट से दो किलोमीटर से भी कम दूरी पर है. इस हादसे में कुल 260 लोगों की मौत हुई थी. इनमें 241 लोग विमान में थे. सरलाबेन और आध्या उन 19 लोगों में थीं, जिन्होंने ज़मीन पर अपनी जान गंवाई.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सालभर बाद भी हरे हैं ज़ख़्म
एक साल बीत गया है, लेकिन दुख की जड़ें कमज़ोर नहीं पड़ी हैं. ठाकुर कहते हैं, "मैं उन्हें बहुत याद करता हूं. तस्वीरें देखता हूं, तो रोने का मन करता है."
जांचकर्ता जल्द ही हादसे की रिपोर्ट जारी कर सकते हैं. पिछले एक साल में ज़्यादा ध्यान विमान के यात्रियों और हादसे के कारणों पर रहा.
लेकिन अहमदाबाद में एक और सवाल गूंजता है. हादसे के बाद किसी जगह का क्या होता है.
आमतौर पर समय के साथ हादसे के निशान मिट जाते हैं. लेकिन बीजे. मेडिकल कॉलेज में दुख अब स्थायी हो गया है. एक साल बाद भी हॉस्टल ऐसे ही खड़ा है, जैसे कोई खुला ज़ख़्म हो.
ऊपरी मंजिलें टूटकर आसमान की ओर खुल गई हैं. कंक्रीट के टुकड़े टेढ़े मेढ़े लटके हैं. सीढ़ियां धुएं से काली हो चुकी हैं. वे अंधेरे में ग़ायब हो जाती हैं.
दीवारों पर कालिख जमी है. सूटकेस और कपड़े अब भी मलबे में दबे हैं. चारों तरफ़ धूल, पत्थर और मुड़ी हुई लोहे की छड़ें हैं.
अधिकारियों ने इस इमारत को गिराने की मंज़ूरी दे दी है. यहाँ नया हॉस्टल बनाया जाएगा. लेकिन अभी मलबा वहीं पड़ा है. छात्र रोज़ इस हॉस्टल के पास से क्लास के लिए जाते हैं.
ऊपर हर कुछ मिनट में विमान उड़ते हैं. पहले यह आवाज़ शहर की आदत का हिस्सा थी. जैसे सड़क का शोर. लेकिन अब इसका मतलब बदल गया है.
ठाकुर कहते हैं, "जब भी विमान गुज़रता है, हमें वही दर्द महसूस होता है. हम आसमान की ओर देखते भी नहीं हैं."
क़रीब 15 साल तक इस परिवार ने टिफिन सेवा चलाई. वे पास के अस्पतालों में डॉक्टरों के लिए खाना बनाते और पहुंचाते थे. पूरा मेडिकल कैंपस उनकी सेवा से जुड़ा था.
उनकी दो साल की पोती का ज़्यादा समय भी यहीं बीतता था. वह लगभग हमेशा अपनी दादी के साथ रहती थी. जिस समय विमान गिरा, उस वक़्त मेस में दोपहर का खाना परोसा जा रहा था.
सरलाबेन वहीं काम कर रही थीं. उसी दौरान आध्या को बाथरूम जाना था. इसलिए वह उसे ऊपर ले गईं. कुछ ही पल बाद विमान वहां आ गिरा.
ठाकुर उस समय दूसरी इमारत में काम कर रहे थे. उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया और धुएं की तरफ़ भागे.
अब उन्हें उस दिन की कुछ तस्वीरें ही याद हैं. धमाका हुआ था. तेज़ गर्मी थी. रसोई में गैस सिलिंडर बिखरे पड़े थे. वह कमरे कमरे दौड़ रहे थे.
अपनी पत्नी को पुकार रहे थे, "सरला, सरला." उनके आसपास कुछ लोग मलबे से बाहर निकल रहे थे. कुछ लोग अंदर ही फंसे थे. बचाव दल धुएं और मलबे के बीच रास्ता बना रहे थे.
क़रीब एक हफ़्ते तक परिवार ने तलाश जारी रखी. उन्होंने अहमदाबाद के अस्पतालों, वार्डों और राहत शिविरों में खोजा. वे हर जगह वही सवाल पूछते रहे. हर बार उम्मीद के साथ.
छह दिन बाद उन्हें सरलाबेन और आध्या मिलीं. वे अस्पताल के शवगृह में थीं.
आज भी ठाकुर जब आध्या को याद करते हैं, तो उन्हें बिस्कुट याद आते हैं. वे बिस्कुट जो वह उसके लिए घर लाते थे. उन्हें वह पल भी याद आता है, जब आध्या दौड़कर उनकी गोद में आती थी. हमारे कैंपस में मौत बेवजह आई थी.
जब वह सरलाबेन की बात करते हैं, तो उन्हें उनका पूरा जीवन याद आता है. एक ऐसी महिला, जिसने लोगों को खाना खिलाने में जीवन बिताया.
ठाकुर कहते हैं, "सब लोग उनसे घुल मिल जाते थे, वो बहुत अच्छी महिला थीं."
'मेस में धुएं की गंध आज भी मेरे साथ है'
जब ठाकुर धुएं की तरफ़ भाग रहे थे, उसी समय मेस के अंदर मौजूद छात्र यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या हुआ है?
अरमान ख़ान पठान दोपहर के खाने के लिए देर से पहुँचे थे. उनका सबसे अच्छा दोस्त आदित्य दयाल उससे भी ज़्यादा देर से आने वाला था.
इन्हीं कुछ मिनटों ने हादसे को लेकर उनके अनुभव अलग कर दिए. लेकिन यादें अलग नहीं हुईं.
पठान अभी खाने के लिए बैठे ही थे. तभी एक बहुत तेज़ आवाज़ हुई. कुछ ही सेकंड में इमारत का एक हिस्सा उनके आसपास गिर गया. एक मेज उनके पैरों पर आ गिरी.
इसी बीच गैस सिलिंडर फटने लगे. कमरा धूल से भर गया. नए धमाकों की वजह से बचाव दल को पीछे हटना पड़ा. पठान वहीं फंसे रहे. उन्हें सांस लेने में दिक्क़त हो रही थी.
उन्होंने अपने हाथ से खिड़की तोड़ दी. वह कहते हैं, "चारों तरफ पूरा अंधेरा था. मुझे घुटन हो रही थी."
जब तक बचाव कर्मियों ने उन्हें बाहर निकाला, तब तक दयाल वहां पहुंच चुके थे. दयाल को याद है कि उसी इमारत से धुआं उठ रहा था, वहीं जहां वह और उनके दोस्त रोज़ खाना खाते थे.
छात्र हर दिशा में भाग रहे थे. सब समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या हुआ है.
दयाल ने बाक़ी लोगों के साथ मिलकर पठान को उठाया. उसे गद्दे पर लिटाकर एंबुलेंस तक पहुंचाया. एक साल बाद भी दोनों दोस्त अपने हॉस्टल के कमरे में बैठकर उस दिन को याद करते हैं.
उन्हें उस दोपहर लाए गए शव याद हैं. ट्रेनी डॉक्टर होने के कारण वे मौत से अनजान नहीं थे. लेकिन इसके लिए वे तैयार नहीं थे. कई शव बुरी तरह जल चुके थे. उन्हें पहचानना मुश्किल था.
दयाल कहते हैं, वह गंध लंबे समय तक उनके साथ रही. जाने के बाद भी. आज भी अचानक याद आ जाती है. वह कहते हैं, "मुझे उल्टी जैसा महसूस होता था."
बात धीरे धीरे उन दोस्तों की तरफ़ चली जाती है, जिन्हें उन्होंने खो दिया. पठान एक सहपाठी का ज़िक्र करते हैं. वह कई बहनों का इकलौता भाई था. परिवार की सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं.
दूसरों की तरह उसने भी अपने भविष्य के लिए सालों मेहनत की थी. लेकिन कुछ ही सेकंड में सब ख़त्म हो गया. कुछ लोगों के लिए यह हादसा अलग तरह का असर दे गया.
बृजेश उस समय अपने दो दोस्तों के साथ स्कूटर पर मेस जा रहा था. तभी विमान गिरा. आज भी अपने जलने की चोटों के लिए फिजियोथेरेपी करवा रहे हैं.
अहमदाबाद की गर्मी में भी वह प्रेशर क्लॉथ पहनते हैं. उन्हें किताब के पन्ने तक पलटने में दिक्क़त होती है. वे कहते हैं, "जो हुआ, सो हुआ, अब क्या किया जा सकता है."
कभी-कभी वह उस खंडहर के पास से गुज़रते हैं. कई स्टूडेंट की तरह बृजेश ने भी उससे नज़रें फेरना सीख लिया है कि जैसे वह इमारत उन्हें न दिखे तो शायद ग़ायब हो जाए.
'जहाँ भी देखता हूँ, आग ही नज़र आती है'
लेकिन कॉलेज के आसपास रहने वाले लोगों के पास यह विकल्प नहीं है.
हादसे वाले दिन दोपहर में विजय अपने घर पर थे. वे वहां से क़रीब 200 मीटर दूर रहते हैं. उन्हें एक ज़ोरदार धमाके की आवाज़ सुनाई दी थी.
वह तुरंत बाइक पर बैठकर उस दिशा में निकल पड़े, जब वह वहाँ पहुंचे तो विमान के टुकड़े हो चुके थे और उसमें लगी आग कई बिल्डिंगों में तेज़ी से फैल रही थी.
कई घंटों तक पूरा इलाक़ा बचाव केंद्र बन गया. स्थानीय लोग भी मदद के लिए आगे आए. वे फायरकर्मियों, सैनिकों और राहतकर्मियों के साथ जुट गए. वे कंबल और पानी ला रहे थे. शवों को ढक रहे थे. घायलों की मदद कर रहे थे.
यह दृश्य आज भी उन्हें परेशान करते हैं. विजय कहते हैं, "जहाँ भी देखता हूं, आग ही नज़र आती है. कहीं किसी का सिर, कहीं किसी के हाथ."
बरसी की तैयारियों के बीच थमा हुआ कॉलेज
हादसे के बाद के हफ़्तों में धीरे‑धीरे शहर का ध्यान दूसरी ओर जाने लगा. एंबुलेंस वहां से चली गईं. चैनलों की टीमें भी लौट गईं.
जिस तेज़ी ने पूरे कैंपस को घेर लिया था, उसकी जगह अब एक कठिन काम ने ले ली थी- हादसे के बाद की स्थिति से निपटना.
बीजे. मेडिकल कॉलेज में ज़िंदगी को फिर से शुरू करना था. इसकी बड़ी ज़िम्मेदारी डीन मीनाक्षी पारिख पर आ गई. उन्हें गहरे दुख के बीच भी मेडिकल कॉलेज को चलाए रखना था.
पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें एक नहीं, बल्कि कई दुख एक साथ याद आते हैं. जैसे सब एक ही हादसे में समा गए हों. माता‑पिता अपने बच्चों को ढूंढ़ रहे थे. छात्र अपनी चोटों से उबर रहे थे.
उनका स्टाफ काम के बोझ से दबा था. कई परिवार डीएनए जांच के नतीजों का इंतजार कर रहे थे.
वह कहती हैं, "मेरा एक हिस्सा उस काम में लगा था, जो करना जरूरी था. दूसरा हिस्सा यह समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर हुआ क्या?"
उन्हें ऐसी ही एक पीड़ित परिवार से हुई बातचीत आज भी याद है. वह बताती हैं, एक आदमी ने अपने बेटे, बहू और पोती को खो दिया था. वह उनके शव देखे बिना वहां से जाने को तैयार नहीं थे.
अधिकारियों ने उसे समझाया कि पहचान की पुष्टि के लिए डीएनए जांच ज़रूरी है. लेकिन वह अड़े रहे. उन्होंने कहा, "मेरी आंखें ही डीएनए टेस्ट हैं."
वह कहते रहे कि वे अपने परिवार को किसी भी हालत में पहचान लेंगे. पारिख यह बात याद करते हुए थोड़ी देर रुकती हैं.
वह कहती हैं, "मैं उसकी भावना समझ सकती थी."
समय के साथ धीरे-धीरे कॉलेज की ज़िंदगी सामान्य होने लगी. क्लास फिर से शुरू हुईं, परीक्षाएं भी हुईं. नए स्टूडेंट्स भी आ गए.
12 जून को हुए हादसे की बरसी आने वाली है. इस मौके पर कॉलेज ने कुछ कार्यक्रम तय किए हैं. प्रार्थना सभा होगी, रक्तदान शिविर लगाया जाएगा. मृतकों की याद में पेड़ लगाए जाएंगे.
कॉलेज की डीन मीनाक्षी पारिख कहती हैं, आगे बढ़ना और भूल जाना एक जैसा नहीं होता. वह कहती हैं, "ऐसा कोई एक पल नहीं था, जब लगा हो कि उस दिन जो हुआ, वो मैंने पूरी तरह समझ लिया हो. जिंदगी में वापस लौटने की प्रक्रिया धीमे-धीमे आगे बढ़ती है."
प्रह्लोद ठाकुर भी अपने घर में यही कोशिश कर रहे हैं. वह अपना फोन उठाते हैं, उसमें एक वीडियो है, जिसे वह अक्सर देखते हैं.
यह वीडियो हादसे से एक दिन पहले का है. वीडियो में आध्या अपनी दादी को प्यार से खाना खिला रही हैं. सरलाबेन मुस्कुरा रही हैं. बाहर आसमान में एक और विमान गुजरता है. पर ठाकुर अब ऊपर नहीं देखते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.