You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने से बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों की जीत तय, वाक़ई कांग्रेस से चूक हुई है?
- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
कांग्रेस के क़रीब 40 विधायक और उनके परिजन भोपाल एयरपोर्ट पर बेंगलुरु जाने वाली विशेष उड़ान में शाम पाँच बजे तक सवार हो चुके थे.
पिछले कई घंटों से वे मीडिया के सवालों का जवाब दे रहे थे. इन सवालों में बार-बार यही पूछा जा रहा था कि क्या कांग्रेस को अपने विधायकों के टूटने का डर है?
क्या राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की आशंका है? क्या बीजेपी की तीसरी उम्मीदवार उतारने की रणनीति सफल होती दिखाई दे रही है?
मध्य प्रदेश में बीजेपी के राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने के बाद कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग का डर सताने लगा था. इसी डर के कारण पार्टी ने अपने विधायकों को कर्नाटक भेजने की तैयारी शुरू कर दी थी.
लेकिन कुछ घंटों बाद हालात पूरी तरह से बदल गए. एक ओर जहाँ फ्लाइट मंगलवार की शाम बेंगलुरु के लिए उड़ान भरने ही वाली थी कि 15 किलोमीटर दूर कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त कर दिया गया.
अब कांग्रेस का दावा है कि यह "ग़ैर-संवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी कारवाई" है जबकि बीजेपी इसे "सत्य की जीत" और "तथ्यों को छिपाने का मामला बता रही है."
राज्यसभा की पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा है, ''बीजेपी की स्मृति ईरानी जी लोकसभा चुनाव में अपनी शैक्षणिक योग्यता के तीन अलग-अलग दावों वाले हलफ़नामों के साथ चुनाव लड़ सकती हैं, चुनाव आयोग सभी शिकायतों को नज़रअंदाज़ कर देता है. लेकिन कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन इसलिए रद्द कर दिया जाता है क्योंकि उनके हलफ़नामे में एक ऐसे अस्पष्ट मामले का उल्लेख नहीं था, जिसमें न कोई एफ़आईआर दर्ज थी और न ही उन्हें चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखने का कोई अवसर मिला.''
कांग्रेस इस फ़ैसले को चुनाव आयोग में चुनौती देगी. मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर नामांकन वापसी की अंतिम तिथि 11 जून दोपहर तीन बजे तक है.
अगर तब तक कांग्रेस को चुनाव आयोग या कोर्ट से राहत नहीं मिलती है तो बीजेपी के तीनों प्रत्याशी तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध जीत जाएंगे.
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए होने वाला चुनाव का नतीजा कुछ दिन पहले तक लगभग तय माना जा रहा था.
विधानसभा में संख्या बल के हिसाब से बीजेपी दो सीटें और कांग्रेस एक सीट जीतती दिखाई दे रही थी. लेकिन बीजेपी ने जब तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारा तो चुनाव अचानक दिलचस्प हो गया.
मंगलवार को दिन भर में हुए घटनाक्रम के बाद अब सवाल केवल यह नहीं है कि कांग्रेस की एक सीट ख़तरे में कैसे पड़ी. सवाल यह भी है कि क्या बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों की जीत का रास्ता साफ़ हो गया है और कांग्रेस से आख़िर चूक कहाँ हुई?
नामांकन रद्द होने की वजह क्या बनी?
विवाद की शुरुआत बीजेपी की उस शिकायत से हुई, जिसमें आरोप लगाया गया कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन के साथ दाखिल फॉर्म 26 में न्यायालय में कथित तौर पर लंबित एक मामले की जानकारी नहीं दी.
बीजेपी की ओर से प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी ने रिटर्निंग अधिकारी को शिकायत दी थी.
शिकायत में कहा गया था कि "हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एक प्राइवेट कंप्लेंट में मीनाक्षी नटराजन अभियुक्त क्रमांक चार के रूप में नामज़द हैं."
रिटर्निंग अधिकारी के आदेश के अनुसार, "उपलब्ध रिकॉर्ड से यह पाया गया कि उस मामले में अदालत ने संज्ञान लिया था. मीनाक्षी नटराजन को समन जारी किए गए थे और उन्होंने स्वयं अदालत के समक्ष अपना जवाब भी दाखिल किया था."
शिकायत पर सुनवाई कर रहे रिटर्निंग अधिकारी अरविंद शर्मा ने यह भी कहा, "अधूरा और अपूर्ण एफिडेविट फॉर्म 26 रखा जाना. इसके अलावा मीनाक्षी नटराजन पर तथ्यों को छुपाने का आरोप लगा."
इसी आधार पर उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया. लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है.
क्या यह मामला फॉर्म 26 में घोषित करना ज़रूरी था?
कांग्रेस और बीजेपी के बीच सबसे बड़ा क़ानूनी मतभेद इसी सवाल पर है.
बीजेपी का तर्क है कि जब अदालत संज्ञान ले चुकी थी, समन जारी हो चुका था और उम्मीदवार ने स्वयं जवाब दाखिल किया था, तब यह एक लंबित मामला था, जिसका उल्लेख फॉर्म 26 में किया जाना चाहिए था.
वहीं कांग्रेस का कहना है कि हैदराबाद का मामला एक निजी शिकायत से जुड़ा था और इसे आपराधिक मुक़दमे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.
मीनाक्षी नटराजन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अजय गुप्ता ने कहा, "यह पूरी तरह असंवैधानिक और राजनीति से प्रेरित फ़ैसला है."
उन्होंने कहा, "जिस नोटिस का उल्लेख किया जा रहा है, वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223(1) के तहत जारी किया गया था."
यह प्रावधान मैजिस्ट्रेट को किसी निजी शिकायत पर अपराध का संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित अभियुक्त को सुनवाई का अवसर देने के लिए बाध्य करता है.
गुप्ता का कहना है, "अदालत ने अभी मामले का संज्ञान नहीं लिया था और न ही कोई समन जारी किया गया था, इसलिए इसे लंबित आपराधिक प्रकरण नहीं माना जा सकता. यह लंबित आपराधिक प्रकरण नहीं है इसलिए क़ानूनन इसके बारे में ज़िक्र करने के लिए हम बाध्य नहीं हैं."
यानी अब विवाद इस बात पर नहीं है कि हैदराबाद में कोई विचाराधीन मामला था.
विवाद इस बात पर है कि क्या उस मामले को हलफ़नामे में अनिवार्य रूप से घोषित करना ज़रूरी था?
क्या कांग्रेस से चूक हुई?
मंगलवार की शाम को नामांकन रद्द होने के बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है.
पत्रकारों ने कांग्रेस के कई नेताओं से यह सवाल पूछा कि अगर सितंबर 2025 में अदालत की ओर से नोटिस जारी हुआ था और अक्तूबर 2025 में उसका जवाब भी दाखिल किया जा चुका था, तो क्या कांग्रेस की क़ानूनी टीम को उम्मीदवार के नामांकन से पहले इस विवाद की समीक्षा नहीं करनी चाहिए थी?
कई वरिष्ठ नेताओं से बातचीत में यह बात सामने आई कि पार्टी का ध्यान पिछले कुछ दिनों में मुख्य रूप से क्रॉस वोटिंग रोकने और विधायकों को एकजुट रखने पर था.
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "बीजेपी के पास तीसरा उम्मीदवार जिताने के लिए ज़रूरी विधायकों की संख्या नहीं थी. बावजूद इसके उन्होंने अपना प्रत्याशी उतारा. हम लोगों को तभी से यह संदेह हो गया था कि बीजेपी कुछ न कुछ साज़िश रच रही है. ऐसे में पार्टी ने सारा ध्यान विधायकों को एकजुट करने में लगाया लेकिन उन्होंने दबाव बनाकर नामांकन ही निरस्त करवा दिया."
भोपाल एयरपोर्ट से लौटे एक अन्य कांग्रेसी नेता ने कहा, "हमें तो अंदाज़ा ही नहीं था कि बीजेपी इस हद तक जा सकती है. उनके तौर तरीक़ों के हिसाब से कांग्रेस अपने सभी विधायकों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही थी. लेकिन बीजेपी को लेकर ऐसा अंदेशा नहीं था. यह क़ानून का ग़लत इस्तेमाल है और हम इसके ख़िलाफ़ लड़ेंगे."
हालांकि सार्वजनिक रूप से कांग्रेस के बड़े नेताओं ने पार्टी की ओर से किसी चूक से साफ़ इनकार किया है.
वहीं बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने नामांकन रद्द होने के बाद दिए बयान में कहा कि केस से संबंधित दस्तावेज़ कांग्रेस पार्टी से ही बीजेपी तक पहुँचे थे.
महेश केवट कौन हैं?
मीनाक्षी नटराजन के चुनाव नहीं लड़ पाने की स्थिति में बीजेपी उम्मीदवार महेश केवट राज्यसभा सांसद चुने जाएंगे.
महेश केवट का राजनीतिक और संगठनात्मक सफ़र चार दशक से अधिक पुराना बताया जाता है. बुंदेलखंड के निवाड़ी ज़िले के ओरछा से आने वाले केवट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े रहे हैं. बाद में उन्होंने बीजेपी युवा मोर्चा और पार्टी संगठन में विभिन्न ज़िम्मेदारियां संभालीं.
वे टीकमगढ़ ज़िले में पार्टी के ज़िला मंत्री और ज़िला उपाध्यक्ष जैसे पदों पर काम कर चुके हैं. स्थानीय निकाय राजनीति से लेकर संगठन के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रहे महेश केवट वर्तमान में मध्य प्रदेश मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास बोर्ड के अध्यक्ष हैं.
2022 में नगरीय निकाय चुनाव के दौरान उन पर बीजेपी के अधिकृत उम्मीदवार के ख़िलाफ़ काम करने के आरोप लगे थे, जिसके बाद पार्टी ने उन्हें चार साल के लिए निष्कासित कर दिया था. हालांकि एक साल बाद ही उनकी वापसी हो गई थी और उसके बाद से ही उन्होंने संगठन में सक्रिय भूमिका जारी रखी.
बीजेपी नेताओं के अनुसार उनकी उम्मीदवारी केवल एक राज्यसभा सीट का सवाल नहीं है. केवट समुदाय से आने वाले महेश केवट के ज़रिए पार्टी पिछड़े वर्गों, विशेषकर मछुआरा और निषाद समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मज़बूत करने का संदेश देना चाहती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.