सपनों की उड़ान को कैसे पंख दे रही है एक पानी की टंकी

    • Author, अमरेंद्र यारलागड्डा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

"इस पानी की टंकी ने मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी. इसने मुझे ग्रेजुएट बनाया. इसने मुझे चार पैसे कमाने का मौक़ा दिया. इसने मुझे 10 से 12 साल तक खाना खिलाया. इसने मुझे लोगों से बात करना और परिवार की देखभाल करना सिखाया. अगर यह पानी की टंकी मेरी ज़िंदगी में नहीं होती, तो मेरा अस्तित्व ही नहीं होता."

वेन्नेला ने भावुक होकर हमसे उस पानी की टंकी के बारे में बात की जो उनके जीवन का आधार रही है.

जब उनके माता-पिता उनकी शादी करके उन्हें ससुराल भेजना चाहते थे, तब उन्होंने इस पानी की टंकी में अपनी पढ़ाई जारी रखी.

क्या आप जानना चाहते हैं कि पानी की टंकी में पढ़ाई करना कैसा होता है?

इस कहानी को समझने के लिए, आपको हैदराबाद के मियापुर मातृश्री नगर में स्थित वॉटर टैंक स्कूल के बारे में जानना होगा. यह पानी की टंकी कॉलोनी वेलफ़ेयर सोसाइटी की है.

यह पानी की टंकी तीन मंज़िलों में फैली हुई है. पहली दो मंज़िलों में कमरे हैं. वहां बच्चों की कक्षाएं आयोजित की जा रही हैं.

पहली मंज़िल पर एक कंप्यूटर लैब है.

बच्चे पानी की टंकी में क्यों आते हैं?

हर शाम 5:30 बजे एक वैन आती है और पानी की टंकी के सामने रुक जाती है.

कुछ बच्चे इससे नीचे उतरते हैं और पढ़ाई करने के लिए पानी की टंकी पर चढ़ते चले जाते हैं.

कुछ देर बाद, कुछ अन्य बच्चे भी वहां आते हैं और सूर्यास्त तक पढ़ाई करते हैं.

पोथुकुची सोमसुंदरा सोशल वेलफ़ेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट (पीएसएस ट्रस्ट) इन सभी को एक साथ लाया है और उन्हें मुफ़्त शिक्षा दे रहा है.

सिक्योरिटी गार्ड पिता की बेटी बनीं रिसर्च इंजीनियर

वेन्नेला उन स्टूडेंट्स में से एक हैं, जिन्होंने ट्रस्ट की मदद से पढ़ाई की.

उनके पिता सुसिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम करते थे और उनकी मां चाय का ठेला लगाती थीं.

वेन्नेला ने बीबीसी को बताया, "जब मैं डिप्लोमा के अंतिम वर्ष में थी, तब मेरे माता-पिता ने मेरी शादी करने का फ़ैसला किया. मैं शादी नहीं करना चाहती थी, और मैंने कहा कि मैं पढ़ाई जारी रखूंगी, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी. मैं कई दिनों तक रोती रही. उस समय मैंने श्रीनिवास सर को फ़ोन किया. वो आए और मेरे माता-पिता को मना लिया कि मुझे पढ़ाई जारी रखने दें."

वेन्नेला ने कहा कि डिप्लोमा हासिल करने के बाद से लेकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने तक ट्रस्ट ने उनकी फ़ीस और किताबों समेत सभी आर्थिक ज़रूरतें पूरी कीं.

वो वर्तमान में हैदराबाद में हुंडई ट्रांसिस नामक कंपनी में रिसर्च इंजीनियर के रूप में काम कर रही हैं.

वेन्नेला बताती हैं, "मेरे माता-पिता को अब मुझ पर बहुत गर्व है. जो लोग पहले छोटे-मोटे काम करके अपना गुज़ारा करते थे. इस ट्रस्ट की बदौलत उनकी बेटी आज शीशे के ऑफ़िस में बैठकर काम कर पा रही है. इस पानी की टंकी ने मेरी ज़िंदगी बदल दी है."

ऐसे शुरू हुआ पानी की टंकी का इस्तेमाल

पोथुकुची श्रीनिवास ने ग़रीब बच्चों की शिक्षा से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के मक़सद से 15 अगस्त, 2003 को अपने पिता के नाम पर पोथुकुची सोमसुंदरा सोशल वेलफ़ेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट स्कूल (निःशुल्क कोचिंग संस्थान और ट्यूशन सेंटर) की स्थापना की.

श्रीनिवास ने कहा, "मैं एक बार सरकारी स्कूल गया था. वहां के बच्चों को देखकर मुझे लगा कि शिक्षा केवल स्कूल में ही नहीं बल्कि स्कूल के बाद भी जरूरी है. इस ट्रस्ट की स्थापना इस भरोसे के साथ की गई थी कि बच्चों को स्कूल के बाद भी शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे किसी बुरी आदत में न पड़ें."

पहले ट्यूशन कक्षाएं एक छोटी सी झोपड़ी में आयोजित की जाती थीं.

साल 2008 में, वो मातृश्री नगर में एक पानी की टंकी के पास रहने चले गए.

उन्होंने बताया कि चूंकि पानी की टंकी के नीचे के कमरे पहले किसी काम में नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्होंने कॉलोनी के निवासियों की मदद से बच्चों को पढ़ाने के लिए उस जगह का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

ट्रस्ट नौवीं कक्षा से लेकर डिप्लोमा और बीटेक की पढ़ाई पूरी होने तक ट्यूशन और करियर मार्गदर्शन देता है.

हर शाम... और छुट्टियों में पूरे दिन

ट्रस्ट के प्रबंधन में शामिल श्रीधर ने बताया कि यहां आने वाले सभी बच्चे ग़रीब परिवारों से हैं और सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं.

स्कूल के बाद हर रोज़ सभी बच्चे पानी की टंकी के पास पढ़ने आते हैं. छुट्टियों में वे सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक वहीं बैठकर पढ़ाई करते हैं.

ट्रस्ट ने लड़कियों के स्कूल आने-जाने के लिए एक विशेष वैन की व्यवस्था की है.

पोथुकुची श्रीनिवास बताते हैं, "बच्चे शाम को स्कूल ख़त्म होते ही यहां आ जाते हैं. पहले उन्हें पढ़ाने वाले ट्यूटर होते थे. अब यहां के सीनियर छात्र-छात्राएं उन्हें पढ़ाते हैं. वे ख़ुद पढ़ते हैं और छोटे बच्चों के सवालों के जवाब भी देते हैं."

वो कहते हैं, "अगर आप भूखे हैं तो पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा सकते, इसलिए हम यहां खाना भी बनाते हैं."

श्रीनिवास कहते हैं कि भले ही यह एक पानी की टंकी है, फिर भी सभी प्रकार के सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं.

वह बताते हैं, "यहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पानी की टंकी तक जाने वाली सीढ़ियों पर रेलिंग है. जब तक लड़कियां घर नहीं पहुंचतीं, तब तक उनकी सुरक्षा हमारी ज़िम्मेदारी है."

पढ़ाई, खाना बनाना, सफ़ाई करना

बीटेक सेकेंड ईयर के छात्र रामकृष्ण नौवीं कक्षा से ही यहां आते रहे हैं. जब मैं पानी की टंकी के पास गया, तो वह खाना बना रहे थे.

एक तरफ़ वो सेट की तैयारी करते नज़र आ रहे थे, वहीं दूसरी तरफ वो करछुल पकड़े खाना पकाते नज़र आ रहे थे.

रामकृष्ण कहते हैं, "हम अपना काम ख़ुद करते हैं. इस तरह हम कम उम्र में ही चीज़ों को व्यवस्थित करना और प्रबंधित करना सीखते हैं. हम बीटेक और डिप्लोमा कर रहे अपने बच्चों के अनुसार काम बांट लेते हैं."

श्रीधर बताते हैं, "हमारे पास आने वाले बच्चे सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं करते, बल्कि सारा काम ख़ुद करते हैं. खाना बनाना, सफ़ाई करना, ट्रस्ट के खर्चों का प्रबंधन करना... ये सब काम बच्चे ही करते हैं."

आर्थिक मुश्किलों के बीच भी जारी रही बच्चों की शिक्षा

यह ट्रस्ट नौवीं और दसवीं कक्षा के स्तर पर शिक्षा देने के साथ-साथ, डिप्लोमा और इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स की फ़ीस का भुगतान करता है और उनकी सभी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करता है.

सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत दानदाताओं और कंपनियों से मिली धनराशि के अलावा, अपनी शिक्षा पूरी कर चुके और नौकरी में स्थापित हो चुके लोग भी ट्रस्ट को वित्तीय सहायता देते हैं.

पोथुकुची श्रीनिवास बताते हैं कि ट्रस्ट के सहयोग से अप्रैल 2026 तक 1531 लोगों ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली थी. 1200 से अधिक लोगों ने डिप्लोमा पूरा किया और उनमें से लगभग 900 को रोज़गार मिल गया. 225 लोगों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और 213 को रोज़गार मिल गया है.

वह कहते हैं, "कुछ मामलों में आर्थिक कठिनाइयां आई हैं. हालांकि, कार्यक्रम पर कोई असर नहीं पड़ा. दानदाताओं के सहयोग से बच्चों की शिक्षा बिना किसी बाधा के जारी है."

'कुछ लोग हर साल एक निश्चित राशि देते हैं'

ट्रस्ट के सहयोग से, अपनी शिक्षा पूरी कर चुके और विभिन्न नौकरियों में स्थापित हो चुके युवा लड़के और लड़कियां अपने-अपने तरीके से ट्रस्ट में योगदान दे रहे हैं.

साईराम कहते हैं, "कुछ लोग हर साल एक निश्चित राशि देते हैं, तो कुछ लोग हर महीने एक निश्चित राशि देते हैं. हमें उम्मीद है कि यह सहायता हम जैसे पढ़ाई में संघर्ष कर रहे बच्चों के लिए मददगार साबित होगी."

साईराम ने ट्रस्ट की मदद से नौवीं कक्षा से लेकर इंजीनियरिंग की डिग्री तक की पढ़ाई पूरी की और वर्तमान में वह यूबीएस बैंक में कार्यरत हैं. अपने खाली समय में, वह पानी की टंकी की देखभाल करते हैं.

वह कहते हैं, "वे न केवल आर्थिक रूप से मदद करते हैं, बल्कि कई लोग शाम को या अपने खाली समय में जूनियर स्टूडेंट्स को पढ़ाने आते हैं. यहां से पढ़े हुए लोग भी किसी न किसी तरह से ट्रस्ट की मदद करते हैं."

श्रीनिवास ने स्पष्ट किया कि वो किसी पर भी मदद के रूप में पैसे देने का दबाव नहीं डालेंगे, और दान तभी स्वीकार करेंगे जब उन्हें यहां का काम पसंद आएगा.

श्रीनिवास कहते हैं कि वह स्टूडेंट्स की मदद न केवल पानी की टंकी पर कर रहे हैं बल्कि 8 अन्य क्षेत्रों में भी कर रहे हैं.

वह बताते हैं, "हमने शिक्षा सेतु कार्यक्रम शुरू किया है. इसके तहत हमने रंगारेड्डी, मेडचल-मलकाजगिरि और संगारेड्डी ज़िलों में विद्यालय स्तर पर 23 केंद्र स्थापित किए हैं. स्कूल बंद होते ही बच्चे वहां रहकर पढ़ाई करेंगे. इसके लिए हमने एक शिक्षा से जुड़े स्वयंसेवक नियुक्त किया है."

नौवीं और दसवीं कक्षा के लगभग एक हज़ार बच्चे इस तरह से पढ़ाई कर रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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