भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध बेहतर न होने की प्रार्थना क्यों कर रहे हैं असम के मुख्यमंत्री?

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, दिल्ली
    • Author, अमिताभ भट्टासाली
    • पदनाम, कोलकाता
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

पूर्वोत्तर राज्य असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वो हमेशा भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध बेहतर न हों.

सरमा ने हाल में अपने एक इंटरव्यू में कहा, "मैं रोज सुबह भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान जैसे संबंध थे, वैसे ही बने रहें. आपसी संबंध बेहतर नहीं हों."

एक निजी टीवी चैनल 'एबीपी न्यूज़' के साथ एक लंबे इंटरव्यू में उन्होंने इस बात का भी विस्तार से ब्योरा दिया कि भारत से रात के अंधेरे में किसी तरह घुसपैठियों को बांग्लादेश में पुश-बैक किया जाता है.

हिमंता बिस्वा सरमा का कहना था, "सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) कई बार ऐसे लोगों को (जिनको सीमा पार पुश-बैक किया जाना है) को अपने पास 10 से 40 दिनों तक रखता है. जब सीमा पर बांग्लादेश राइफल्स (बीडीआर) के जवान मौजूद नहीं होते तो उन लोगों को जबरन धकेल कर सीमा पार भेज दिया जाता है."

अब बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बल का नाम बदल कर बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने बीडीआर के पुराने नाम से ही उसे संबोधित किया.

असम के मुख्यमंत्री के इस इंटरव्यू का प्रसारण तो 15 अप्रैल को हुआ था. लेकिन उसका कुछ हिस्सा सोमवार से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

भारत-बांग्लादेश संबंधों के विशेषज्ञों का कहना है कि असम के मुख्यमंत्री ने ऐसे समय में यह बातें कही हैं जब केंद्र सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारतीय उच्चायुक्त के तौर पर नियुक्त करने की घोषणा की है.

विश्लेषकों का कहना है कि यह पहली बार किसी राजनेता को उच्चायुक्त के तौर पर ढाका भेज कर दिल्ली ने दोनों देशों के आपसी संबंधों में बेहतरी का संदेश देने की कोशिश की है.

भारत-बांग्लादेश के बीच बेहतर संबंध क्यों नहीं चाहते हिमंत?

'एबीपी न्यूज़ हिंदी' पर इंटरव्यू के दौरान हिमंत बिस्वा सरमा से बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और ऐसे लोगों के पुश-बैक के मुद्दे पर सवाल पूछा गया था.

इस पर अपने जवाब में हिमंत का कहना था, "भारत और बांग्लादेश के बीच बेहतर संबंध नहीं होना हमें अच्छा लगता है. इसका कारण यह है कि आपसी संबंध बेहतर होने की स्थिति में भारत सरकार भी पुश-बैक का समर्थन नहीं करना चाहती. इन दोनों देशों के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध होना असम के लोगों को अच्छा लगता है. दोनों देशों में संबंधों की बेहतरी के बाद जब बीएसएफ़ और बीडीआर के जवान हाथ मिलाने लगते हैं तो यह असम के लिए ख़तरनाक हो जाता है."

उनका कहना था, "संबंध दोस्ताना होने की स्थिति में सब कुछ सहज हो जाता है और हर मामले में ढिलाई नज़र आने लगती है. इसलिए हम लोग हमेशा भगवान से प्रार्थना करते हैं कि दोनों देशों के आपसी संबंधों में सुधार नहीं हो. वैसी स्थिति में बीएसएफ मुस्तैदी से बंदूक लेकर सीमा की निगरानी करती है और सेना भी आ जाती है. सीमा पार से कंटीले तारों की बाड़ लांघकर कोई इधर नहीं आ सकता."

इस पर एबीपी की पत्रकार मेघा प्रसाद ने कहा, "यह बातें तो भारत-विरोधी हैं."

इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा, "आपने सवाल किया है तो मैंने अपने मन की बात आपको बता दी है. मैं हमेशा भगवान से मनाता हूं कि दोनों देशों के आपसी संबंध वैसे ही रहें जैसे मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान थे. इनमें कोई सुधार नहीं हो."

असम से 'पुश-बैक' कैसे किया जाता है?

सीमा पार से असम में घुसपैठ लंबे समय से सबसे बड़ा मुद्दा रहा है. पत्रकार मेघा प्रसाद ने सरकार की ओर से विधानसभा में पेश कुछ आंकड़ों के हवाले मुख्यमंत्री से सवाल पूछा था.

इस पर हिमंत बिस्वा सरमा का कहना था, "बांग्लादेश के एक नागरिक को भी पुश-बैक करना आसान नहीं है. सीमा पर बांग्लादेश के सुरक्षा बल तैनात रहते हैं. वो इन लोगों को वापस नहीं लेना चाहते. भारत और बांग्लादेश के बीच क़ैदियों की अदला-बदली का कोई समझौता नहीं है."

भारत से किसी घुसपैठिए को बांग्लादेशी सीमा के पार भेजने को 'पुश-बैक' कहा जाता है जबकि बांग्लादेश के नज़रिए से इसे 'पुश-इन' कहा जाता है.

मुख्यमंत्री ने बताया, "हम अंधेरे में उस जगह से पुश-बैक करते हैं जहां बीडीआर के जवान मौजूद नहीं रहते. इसके लिए कई बार ऐसे लोगों को 10 से 40 दिनों तक बीएसएफ़ के शिविरों में रखा जाता है. उसके बाद मौक़ा देख कर उनको जबरन पुश-बैक कर दिया जाता है."

उनका कहना था, "अगर हम कानूनी तरीके से ऐसे लोगों को वापस भेजने की कोशिश करें तो पहले पूरे मामले की जानकारी विदेश मंत्रालय को देनी होगी. इसके बाद यह बांग्लादेश सरकार पर निर्भर है कि वह किसे अपना नागरिक मानेगी और किसे नहीं. बांग्लादेश ऐसे मामलों में सबूत मांगता है."

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि कानूनी तौर पर आप किसी को आसानी से बांग्लादेश नहीं भेज सकते हैं. बांग्लादेश उनको अपना नागरिक ही नहीं मानता. ऐसे में हमारे सामने दूसरा क्या विकल्प है?

हिमंत ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने क़रीब एक साल पहले अपने एक फैसले में कहा था कि अगर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (डीएम) को लगता है कि कोई व्यक्ति भारतीय नहीं है तो वो उसे निर्वासित करने का निर्देश दे सकता है. निर्वासित करने का मतलब भारत से निर्वासित करना है."

लेकिन उसे निर्वासित कर कहां भेजा जाएगा? पत्रकार के इस सवाल पर हिमंत का कहना था, "कानून या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है. वहां लिखा है कि आप अपने देश से उसे निर्वासित कर सकते हैं. इसलिए हमने बांग्लादेश सीमा से होकर उनको निर्वासित करना शुरू किया है."

उन्होंने बताया कि सिर्फ असम में रहने वाले कथित घुसपैठियों को ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न इलाक़ों में रहने वाले ऐसे लोगों को भी यहां लाकर उन्हें पुश-बैक किया गया है.

मुख्यमंत्री ने किस कानून की बात कही?

बिस्वा सरमा ने जिस कानून का ज़िक्र किया है वो अप्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम, 1950 नामक बहुत पुराना कानून है.

बीते साल बड़ी तादाद में पुश-बैक की घटनाओं के दौरान ही यह कानून चर्चा में आया. हिमंत ने उस समय कहा था, "किसी अज्ञात कारण से हमारे कानूनी सलाहकारों ने हमें पहले इसकी जानकारी नहीं दी. हमें भी इसके इस्तेमाल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी."

लेकिन कुछ कानूनी सलाहकारों का कहना है कि यह कानून साल 1950 में एक ख़ास वजह से बनाया गया था.

गुवाहटी हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील हाफिज रशीद चौधरी ने बीबीसी बांग्ला को बताया था, "सरकार विदेशी न्यायाधिकरणों की अनदेखी करते हुए कार्यकारी आदेश जारी करके लोगों को यहां से जबरन वापस भेजने का प्रयास कर रही है. ऐसा नहीं किया जा सकता."

रशीद ने कहा, "सरकार जिस पुराने कानून की दलील दे रही है उसकी मदद से पुश-बैक नहीं किया जा सकता. यह कानून तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से असम आने वाले लोगों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. ऐसे लोगों में किसी का रवैया भारत के हितों के ख़िलाफ़ होने या भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की स्थिति में ही उसे निर्वासित किया जा सकता है."

'पुश-बैक' किए गए लोगों के अनुभव

असम के मुख्यमंत्री ने 'पुश-बैक' करने के जिस तरीके की बात सार्वजनिक तौर पर स्वीकार की है, बीबीसी बांग्ला बीते एक साल से अपनी रिपोर्टों में उसका ज़िक्र करता रहा है.

बीते साल 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर की पहलगाम घाटी में आतंकी हमले के बाद ही देश के विभिन्न राज्यों में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान करने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया गया था.

उसके बाद विभिन्न राज्यों से घुसपैठिया करार देते हुए कई लोगों को बांग्लादेश में पुश-बैक कर दिया गया था. असम में तो कुछ लोगों को घर से बुला कर भी जबरन सीमा पार भेज दिया गया था.

मोरीगांव जिले के कंदपुखरी गांव के पूर्व शिक्षक खैरुल इस्लाम भी ऐसे लोगों में शामिल थे. बीते साल मई के आख़िर में पुलिस उनको घर से बुला कर अपने साथ ले गई थी.

इसके कुछ दिनों बाद एक वीडियो में उनको बांग्लादेश के अंदरूनी कुड़ीग्राम सीमा के नो मेंस लैंड में देखा गया. उस वीडियो में कई अन्य लोगों को भी देखा गया था.

पहले उनको माटिया डिटेंशन कैंप में रखा गया था और वहां से बीएसएफ की सहायता से उनको जबरन सीमा पार बांग्लादेश भेज दिया गया. उन लोगों ने ख़ुद को असम का निवासी होने का दावा किया था.

उस वीडियो के वायरल होने के बाद भारत सरकार उस दौरान पुश-बैक किए गए कई लोगों को वापस ले आई थी. उन लोगों में इस्लाम भी शामिल थे.

ऐसे लोगों में सकीना बेगम का मामला भी काफ़ी चर्चित रहा था. पुलिस उनको असम के नलबाड़ी ज़िले स्थित घर से अपने साथ ले गई थी. उसके कई दिनों बाद बीबीसी बांग्ला ने सकीना के ढाका के मीरपुर में खोज निकाला था. उन्होंने विस्तार से बताया था कि उनको किस तरह रात के अंधेरे में जबरन बांग्लादेश में धकेल दिया गया था.

सोनाली खातून नाम की पश्चिम बंगाल की एक गर्भवती महिला को भी उनके परिवार के साथ बांग्लादेश में पुश-बैक कर दिया गया था. लेकिन भारत और बांग्लादेश दोनों देशों की अदालतों ने तब कहा था कि वह महिला भारतीय नागरिक है. उसके बाद उनको भारत लौटाया जा चुका है.

ऐसे में यह दावा सही नहीं है कि जिनको पुश-बैक किया जा रहा है वो बांग्लादेशी नागरिक हैं और अवैध तरीके से भारत आए थे.

हिमंत बिस्वा सरमा ने ऐसा क्यों कहा?

असम के मुख्यमंत्री ने एक ऐसे समय में भारत-बांग्लादेश संबंधों और कानून से आगे जाकर पुश-बैक करने के तरीके पर टिप्पणी की है जब भारत बांग्लादेश को दोनो देशों के आपसी संबंधों में बेहतरी का संदेश देने का प्रयास कर रहा है.

विश्लेषकों का मानना है कि शेख़ हसीना को सत्ता से हटाने और बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आई थी. इसे दूर करने की कोशिश के तहत ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीनों के भीतर ढाका में एक नए उच्चायुक्त की नियुक्ति की घोषणा की है.

इससे भी अहम बात यह है कि पहली बार है कि किसी पेशेवर राजनयिक के बजाय किसी राजनेता (दिनेश त्रिवेदी) को ढाका में उच्चायुक्त के तौर पर भेजा जा रहा है.

मौजूदा परिस्थिति में हिमंत बिस्वा सरमा की इस टिप्पणी से विश्लेषक हैरान हैं.

भारत में ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और भारत-बांग्लादेश संबंधों की विशेषज्ञ श्रीराधा दत्त ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "यह सही है कि असम में घुसपैठ की समस्या है. लेकिन इस समस्या के दोनों पहलुओं को देखना जरूरी है. कुछ लोग अवैध तरीके से असम में पहुंच रहे हैं और भारत में पहचान पत्र हासिल कर रहे हैं, यह भारत की समस्या है. आख़िर उनको पहचान पत्र कैसे मिल रहे हैं?"

उनका कहना था कि यह समस्या दोनों देशों की है. ऐसे में दोनों को मिल कर ही इसका समाधान तलाशना होगा. लेकिन हिमंत बिस्वा सरमा की टिप्पणी से समाधान का रास्ता नहीं खुलेगा.

श्रीराधा दत्त का कहना था, "भारत अगर दक्षिण एशिया का नेता होने का दावा करता है तो उसे ख़ुद को और ज़्यादा परिपक्व और जिम्मेदार भी दिखाना होगा. लेकिन अंधेरे में जबरन पुश-बैक करने वाली टिप्पणी से समस्या का हल नहीं निकलेगा."

ढाका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती हालांकि हिमंत की टिप्पणी का 'बचाव' तो नहीं करते लेकिन उनका मानना है कि असम के मुख्यमंत्री ने कुछ गलत नहीं कहा है.

चक्रवर्ती का कहना था, "हिमंत बिस्वा सरमा ने जो कहा है उसमें कुछ नया नहीं है. सबको पता है कि पुश-बैक इसी तरह होता है. उन्होंने महज़ सार्वजनिक रूप से यह बात कह दी है."

उन्होंने कहा, "भारत में जिन बांग्लादेशी घुसपैठियों को गिरफ़्तार किया जाता है उनको वापस भेजने की प्रक्रिया लंबे समय से काफ़ी जटिल है. भारत ऐसे लोगों के नाम-पतों की सूची पुष्टि के लिए बांग्लादेश को सौंपता है. लेकिन बांग्लादेश इसे लंबे समय तक लंबित रखता है. ऐसे में मजबूरी में पुश-बैक का तरीका अपनाना पड़ा है ताकि गिरफ़्तार लोगों को जल्दी वापस भेजा जा सके."

हालांकि कुछ मामलों में इस तरीके से बांग्लादेश भेजे गए लोग बाद में भारतीय नागरिक साबित हुए और उनको वापस बुला लिया गया.

हिमंत की टिप्पणी के संदर्भ में इस अनुभवी पूर्व राजनयिक का कहना था, "कई बार घरेलू राजनीति और कूटनीति अलग रास्ते पर चलती है. हिमंत ने शायद अपने राजनीतिक हित को ध्यान में रखते हुए ऐसी बातें कही हैं. लेकिन मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा कि उनका ऐसा कहना उचित है या नहीं."

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