ईरान के ख़िलाफ़ ट्रंप अब क्या क़दम उठाएंगे, अरब जगत के मीडिया में कैसी है चर्चा

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अमेरिका और ईरान के बीच फ़िलहाल दूसरे दौर की बातचीत होने के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं.
8 अप्रैल को हुए दो हफ़्ते के युद्धविराम के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति वार्ता के पहले दौर की बातचीत के लिए पाकिस्तान गए, लेकिन चंद घंटों की बातचीत के बाद बिना किसी ठोस नतीजे के वॉशिंगटन लौट आए.
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 अप्रैल को ईरान के साथ अनिश्चितकाल तक युद्धविराम बढ़ाने का फ़ैसला किया था. लेकिन पहले दौर की बातचीत के सफल नहीं होने के बाद अमेरिकी सेना ने होर्मुज़ स्ट्रेट पर नाकाबंदी की थी.
अमेरिकी सेना की नाकाबंदी फ़िलहाल कायम है और ये अमेरिका-ईरान के बीच मौजूदा तनाव के बढ़ने की बड़ी वजह बनी हुई है.
इसी बीच अरब के मीडिया संस्थानों ने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित नए सैन्य टकराव को लेकर चिंता जताई है. क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर आर्थिक नाकाबंदी जारी रखने के इरादे पर विचार किया है.
ट्रंप के बयानों को प्रमुखता

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प्रमुख पैन-अरब टीवी चैनलों ने 30 अप्रैल को ट्रंप के उन बयानों को प्रमुखता से दिखाया जिनमें उन्होंने ईरान को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा था और देश पर लंबी नाकाबंदी लगाने की चेतावनी दी थी.
कुछ चैनलों ने एक्सियोस की उस रिपोर्ट को भी प्रमुखता से दिखाया जिसमें कहा गया था कि अमेरिका ईरान पर 'कम समय में लेकिन शक्तिशाली' हमलों की एक श्रृंखला पर विचार कर रहा है.
मीडिया संस्थानों ने यह भी बताया कि ट्रंप ने ईरान के उस नए प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया जिसमें आर्थिक और परमाणु मुद्दों को अलग करने की बात कही गई थी. अमेरिका ने कहा है कि किसी भी समझौते पर पहुंचने के लिए ईरान को अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को छोड़ना होगा.
अरब मीडिया के कई चैनलों के मुताबिक़, ईरान पर इसके सीधे आर्थिक प्रभाव को देखते हुए ट्रंप लंबे समय तक नाकाबंदी कायम रखने का विकल्प चुनेंगे.
क़तर के अल जज़ीरा टीवी चैनल ने परमाणु मुद्दे पर समझौते को लेकर ईरान पर अमेरिका के दबाव की वजह से बने 'मुश्किल हालात' पर चर्चा की.
चर्चा के दौरान पैनल में मौजूद गेस्ट से यह सवाल भी पूछा गया कि क्या ईरान पर अमेरिकी आर्थिक नाकाबंदी मौजूदा सत्ता को गिराने या ईरानी सत्ताधारियों में बड़े बदलाव लाने के लिए पर्याप्त होगी?

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संयुक्त अरब अमीरात स्थित स्काई न्यूज़ अरबिया के मुताबिक़, ट्रंप पर सैन्य विकल्प से बचने के लिए लोकल लेवल पर 'भारी' दबाव है.
उन्होंने इसके पीछे एक्सपर्ट्स का हवाला दिया, क्योंकि एक्सपर्ट्स ने ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान की 'भारी राजनीतिक लागत' की ओर इशारा किया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह का संघर्ष 'इस साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन को भारी नुक़सान पहुंचा सकता है.'
चैनल ने अमेरिकी विदेश विभाग की एक प्रमुख एजेंसी नियर ईस्टर्न अफ़ेयर्स के उप सचिव डेविड शेनकर का इंटरव्यू भी किया. उन्होंने कहा, "ट्रंप मानते हैं कि सैन्य अभियानों से ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा, क्योंकि टारगेट बहुत कम हैं."
शेनकर के मुताबिक़, ट्रंप ने ईरान पर सख़्त नाकाबंदी इसलिए लगाई है क्योंकि इसका "ईरान के लोगों पर बड़ा असर पड़ेगा और इससे ईरान की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होगी, ख़ासकर तब जब ईरान के ऊर्जा भंडार भी कम होने लगे हैं."
काहिरा स्थित अल-मशहद टीवी के मुताबिक़, ईरान के प्रति ट्रंप की वर्तमान रणनीति सीधे सैन्य विकल्प के बजाए आर्थिक नाकाबंदी को और सख़्त करने पर केंद्रित है. इसे 'ईरानी अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने के लिए दबाव का साधन' माना जा रहा है.
अमेरिकी सैन्य विकल्प पर चर्चा

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कुछ मीडिया संस्थानों ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी सैन्य विकल्प पर चर्चा की.
मिस्र के सरकारी समाचार पत्र अल-क़ाहिरा ने अमेरिका और ईरान के बीच 'नए सिरे से तनाव बढ़ने' का हवाला देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच संबंध 'न शांति, न युद्ध' की स्थिति में पहुंच गए हैं.
इसी बीच, सैन्य विश्लेषक मोहम्मद अल-समादी ने ईरान पर हमला करने की स्थिति में अमेरिका के पास उपलब्ध सैन्य विकल्पों की समीक्षा की और ईरानी प्रतिक्रिया के संभावित परिदृश्यों पर चर्चा की.
अल-अरबी टीवी से बात करते हुए समादी ने कहा, "अमेरिका के पास विमानवाहक पोतों और पूरे क्षेत्र में फैले सैन्य अड्डों सहित कई विकल्प मौजूद हैं. लेकिन उसे ईरान के हथियारों का सामना करना पड़ेगा. इनमें एंटी‑शिप मिसाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म, तेज़ हमले करने वाली नौकाएं और नौसैनिक बारूदी सुरंगें शामिल हैं."
होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण के संबंध में, समादी ने कहा, "ज़मीनी और समुद्री अभियानों की संभावना हो सकती है, लेकिन वे अत्यधिक जोखिमों से जुड़े हैं."
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ईरान के भीतर अमेरिकी सैन्य अभियान 'न तो विचाराधीन है और न ही व्यावहारिक', और किसी भी सैन्य अभियान की स्थिति में इस बात की अधिक संभावना होगी कि हवाई हमलों के ज़रिए महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने तक सीमित रहा जाए.
सऊदी अल‑अरबिया ने समीक्षा की कि अमेरिका का वॉर पावर्स रेज़ॉल्यूशन ईरान के खिलाफ बल प्रयोग करने की ट्रंप की कोशिशों में कैसे बाधा बन सकता है. क्योंकि अगर कांग्रेस युद्ध की घोषणा पर सहमत नहीं होती, तो यह उन्हें सैनिकों को वापस बुलाने के लिए मजबूर कर सकता है.
इस प्रस्ताव के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना केवल 60 दिनों तक ही युद्ध शुरू कर सकते हैं. ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष में ये समयसीमा एक मई को पूरी हो गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


































