डाइटिंग नहीं बल्कि खाने का लुत्फ़ लेकर कैसे फ़िट रहें

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- Author, मेलिसा होगनबूम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
मन और शरीर का संबंध हमारी भूख पर प्रभाव डाल सकता है. इसलिए यह सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप क्या खाते हैं, बल्कि इस पर भी कि आप उसके बारे में कैसे सोचते हैं.
दरअसल हम जो खाने की उम्मीद करते हैं, वह भूख और पेट भरने के बारे में दिमाग़ की धारणाओं को प्रभावित करता है.
अगर आपके सामने एक स्वादिष्ट चॉकलेट बार और कम कैलोरी वाला, प्राकृतिक रूप से मीठा किया गया उसका विकल्प रखा जाए, तो आप किसे चुनेंगे?
हममें से ज़्यादातर लोग जानते हैं कि हमें दूसरा विकल्प चुनना चाहिए, लेकिन एक स्वादिष्ट चीज़ से बचना बेहद मुश्किल होता है. इसी वजह से जो लोग वज़न कम करने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनके लिए डाइट बनाए रखना कठिन हो जाता है.
हमारी बनावट ही ऐसी है कि हम ज़्यादा ऊर्जा देने वाले, मीठे खाद्य पदार्थों की ओर खिंचते हैं, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि हमारे शुरुआती पूर्वज कभी इन्हीं पर निर्भर थे.
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और इस चुनौती को बढ़ाता है, हमारे आस-पास का माहौल, जो बहुत ज़्यादा कैलोरी वाले, अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से भरा हुआ है. और जब हम उन्हें खाते हैं, तो वे खाने की हमारी आदतों को लेकर अपराधबोध की भावना बढ़ा सकते हैं.
मिशिगन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफ़ेसर ऐशली गियरहार्ड्ट कहती हैं, "अल्ट्रा प्रोसेस्ड उत्पाद असल में एक हेवी मेटल कॉन्सर्ट जैसे होते हैं. इन्हें इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि बाकी सब कुछ दब जाए. और ऐसे में लोगों के लिए फल या सब्ज़ी के सूक्ष्म शास्त्रीय संगीत को सुन पाना वाक़ई बहुत मुश्किल हो जाता है."
लेकिन शोध इस विचार की ओर इशारा करते हैं कि स्वस्थ वज़न बनाए रखने के लिए हमें सिर्फ़ इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि हम क्या खाते हैं, बल्कि खाने के प्रति हमारा नज़रिया भी अहम है. सच तो यह है कि खाने का आनंद लेना स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है, क्योंकि हमने क्या खाया है इसे लेकर हमारी सोच ही यह तय करती है कि हमें कितनी भूख लगती है.
असंतोषजनक 'हेल्दी' मिल्कशेक
अब से 15 साल पहले प्रकाशित एक काफ़ी मशहूर प्रयोग में, वैज्ञानिकों के एक समूह ने पाया कि खाने के बारे में हमारे विचार इस बात को प्रभावित कर सकते हैं कि हमारा शरीर कैसे प्रतिक्रिया करता है.
अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक आलिया क्रम के नेतृत्व में एक टीम ने दिखाया कि अगर प्रतिभागियों को लगता है कि वे ज़्यादा कैलोरी वाला, आनंददायक मिल्कशेक पी रहे हैं, तो उनके शरीर की हार्मोनल प्रतिक्रिया अलग होती है.
दरअसल यह इस बात पर निर्भर करती है कि- वे क्या खा रहे हैं, इसके बारे में वे क्या सोचते हैं, न कि इस पर कि उन्होंने वास्तव में कितनी कैलोरी ली है.

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प्रतिभागियों को एक ही मिल्कशेक दिया गया था, लेकिन कुछ को बताया गया कि यह हेल्दी (स्वास्थ्य के लिए अच्छा) है और इसमें सिर्फ़ 140 कैलोरी हैं, जबकि दूसरों से कहा गया कि यह 620 कैलोरी वाला 'आनंददायक' शेक है. हक़ीक़त में वह मिल्कशेक सिर्फ़ 380 कैलोरी का था.
जब प्रतिभागियों को लगा कि वे 'आनंददायक' शेक पी रहे हैं, तो उनमें भूख बढ़ाने वाले हार्मोन घ्रेलिन में कहीं ज़्यादा तेज़ गिरावट देखी गई. घ्रेलिन भूख को उत्तेजित करता है और आम तौर पर तब बढ़ता है जब हमें भूख लगती है, और तब घटता है जब हमारा पेट भर जाता है. लेकिन जब उन्हें बताया गया कि वे एक हेल्दी शेक पी रहे हैं, तो घ्रेलिन में गिरावट कम थी.
इससे यह पता चला कि खाने को लेकर उनका नज़रिया और अपेक्षाएं इस बात को बदल देती हैं कि उनका शरीर कैसे प्रतिक्रिया देता है. क्रम कहती हैं, "यह मानना कि आपने काफ़ी खा लिया है, शरीर को ऐसे प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करता है जैसे कि उसने सच में काफ़ी खा लिया हो."
स्वस्थ वज़न बनाए रखने के लिहाज़ से यह बात अहम है, क्योंकि घ्रेलिन हमारे मेटाबॉलिज़्म को प्रभावित करता है. अगर हमें पेट भरा हुआ महसूस नहीं होता और मेटाबॉलिज़्म धीमा पड़ जाता है, तो हमारा शरीर उतनी ऊर्जा नहीं खर्च कर पाता.
इसलिए बहुत ज़्यादा संयम वाला माइंडसेट स्वस्थ वज़न बनाए रखने में उल्टा असर डाल सकता है. "अगर आप वज़न कम करने की कोशिश में चीनी, वसा और कुल कैलोरी तो घटा देते हैं, लेकिन लगातार खुद को रोकने वाले माइंडसेट में रहते हैं, तो इससे आपका वज़न उतना कम नहीं हो पाएगा, जितना हो सकता था."
क्रम ने पेट भरने की हमारी आनुवंशिक प्रवृत्ति के संदर्भ में भी समान नतीजे पाए. जिन लोगों से कहा गया कि उनके भीतर ऐसे जीन हैं जो उन्हें आसानी से ज़्यादा भरा भरा महसूस कराते हैं, तो उन्होंने वज़न को नियंत्रित करने वाले हार्मोन डीएलपी-1 का ज़्यादा उत्पादन किया, भले ही उनके पास वास्तव में ऐसे जीन नहीं थे.
लेबलिंग क्यों मायने रखती है

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लेबलिंग भी फ़र्क़ डालती है. एक अन्य अध्ययन में, प्रतिभागियों से एक प्रोटीन बार खाने को कहा गया, जिस पर या तो 'स्वादिष्ट' या 'हेल्दी' लिखा हुआ था- जबकि दोनों का पोषण स्तर एक सा था. प्रतिभागियों के एक तीसरे समूह से केवल बार की बनावट का मूल्यांकन करने को कहा गया.
'हेल्दी बार' खाने के बाद प्रतिभागियों ने बताया कि वे कम संतुष्ट महसूस कर रहे थे और उन्हें ज़्यादा भूख लगी. इसके बाद उन्होंने ज़्यादा खाना खाया, यहां तक कि उन लोगों से भी ज़्यादा जिन्होंने वह बार खाया ही नहीं था.
इससे पता चलता है कि स्वास्थ्य से जुड़े लेबल लुत्फ़ आने की उम्मीद को कम कर सकते हैं, यानी जिन खाद्य पदार्थों को हेल्दी कहकर बेचा जाता है, वे हमें कम संतुष्ट महसूस करा सकते हैं.
हेल्दी खाद्य पदार्थों को इस तरह लेबल करना कि उसमें स्वास्थ्य या पोषण की बजाय स्वाद और आनंद पर ज़ोर हो, लोगों के उन चीज़ों का लुत्फ़ लेने की संभावना को बढ़ाता पाया गया है. यानी ऐसी चीज़ों को खाकर लोगों को ज़्यादा संतुष्टि मिलती है.
इसी तरह, जो लोग चॉकलेट केक जैसी किसी लुभावनी चीज़ खाने को लेकर अपराधबोध महसूस करते हैं, वो वज़न घटाने की मुहिम में बहुत कामयाब नहीं होते.
इन सभी अध्ययनों को साथ में देखें, तो ये उन लोगों के लिए अहम संकेत देते हैं जो अपना वज़न कम करना चाहते हैं.
जैसा कि मेरे सहयोगी डेविड रॉबसन ने अपनी किताब 'द एक्सपेक्टेशन इफ़ेक्ट' में विस्तार से बताया है कि खुद को किसी ट्रीट से वंचित करना अपने आप में यह नहीं सुनिश्चित करता कि आप कुल मिलाकर कम कैलोरी ही खाएंगे. वास्तव में, ज़्यादा संयम बाद में इसकी भरपाई के तौर पर ज़्यादा खाने की ओर ले जा सकता है.
क्रम कहती हैं कि इसके बजाय हमें अपने शरीर पर भरोसा करने और ऐसे खाने के वर्णनों से बचने पर ध्यान देना चाहिए जो कुछ छूटने का एहसास कराते हों, जैसे 'लाइट', 'लो' या 'रिड्यूस्ड'. वह कहती हैं, "यह अहसास कि आपको काफ़ी नहीं मिल रहा है, वास्तव में डाइटिंग के असर को उल्टा ही कर सकता है."

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गियरहार्ड्ट भी इससे सहमत हैं और कहती हैं कि हमारे लिए भोजन को आनंददायक के रूप में सोचना फ़ायदेमंद होगा, न कि केवल पोषक तत्वों और कैलोरी पर ध्यान केंद्रित करना. वह कहती हैं, "जब हम खुद को रोकते हैं, तो यह एक बोझ बन सकता है."
गियरहार्ड्ट कहती हैं कि इसके बजाय, हमें बिना प्रोसेस किया हुआ भोजन जिसमें प्रोटीन और भरपूर फल व सब्ज़ियां शामिल हों- पर ध्यान देना चाहिए.
"यही वह भोजन है जिसे मानव शरीर को पोषण पाने के लिए बनाया गया है, और जो उसे संतोषजनक व आकर्षक लगता है."
अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को कम करना भी इसमें मदद करेगा, क्योंकि वे हमें ज़रूरी पोषक तत्व नहीं देते और हममें और ज़्यादा खाने की इच्छा पैदा कर सकते हैं.
क्रम का तर्क है कि हम यह सब एक 'आनंद पाने के भाव' के साथ भी कर सकते हैं. इसका मतलब है यह सुनिश्चित करना कि आपके शरीर को वही मिल रहा है जिसकी उसे ज़रूरत है, बजाय इसके कि आप केवल संयम बरतने पर ध्यान दें.
क्रम कहती हैं, "ख़ुद पर और अपने शरीर पर भरोसा रखें कि उसे सही समय पर सही चीज़ों की भूख लगेगी."
संतुलित आहार के साथ-साथ, कभी-कभार कुछ स्वादिष्ट खाना और उसका आनंद लेना, स्वस्थ वज़न बनाए रखने में स्पष्ट रूप से एक भूमिका निभा सकता है.
मेलिसा होगनबूम बीबीसी की वरिष्ठ स्वास्थ्य संवाददाता हैं और 'ब्रेडविनर्स' (2025) तथा 'द मदरहुड कॉम्प्लेक्स' की लेखिका हैं. वह इंस्टाग्राम पर melissa_hogenboom नाम से मौजूद हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


































