बालेन शाह ने भारत के साथ सीमा विवाद पर नेपाल की संसद में क्या किया दावा

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नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा करते हुए कहा है कि 'केवल भारत ने ही नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है.'
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक़, रविवार को नेपाली संसद (प्रतिनिधि सभा) में बोलते हुए बालेन शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की ज़मीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है."
उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को देखना चाहिए.
दरअसल विपक्षी दलों के जन प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री से संसद को संबोधित करने की मांग उठाई थी जिसके बाद बालेन शाह ने संसद को संबोधित किया और सदस्यों के सवालों के जवाब दिए.
संसद सत्र के दौरान श्रम शक्ति पार्टी के सांसद आरेन राय ने भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद पर सवाल किया था.
पिछले साल जेन ज़ी आंदोलन के बाद बीते पांच मार्च को हुए चुनावों में आरएसपी ने प्रतिनिधि सभा में लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी.
बालेन शाह को लेकर भारत में उम्मीद थी कि संबंधों में गर्मजोशी आएगी, लेकिन उनकी ओर से कोई गर्मजोशी नहीं दिखाई गई.
मार्च के बाद से कई ख़बरें आईं जो भारत के साथ नेपाल के संबंधों को सहज करने वाला नहीं कहा जा सकता.
बीते अप्रैल में ही नेपाल एयरलाइंस ने एक 'नेटवर्क मैप' में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखा दिया जिस पर विवाद के बाद एयरलाइंस ने "मानचित्र संबंधी ग़लतियों" के लिए माफ़ी मांगी.
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भारत और चीन के बीच लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के रास्ते होने वाले व्यापार पर यूएमएल की उपनेता पद्मा अर्याल के एक अलग सवाल का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी से जुड़े विवादों का समाधान कूटनीतिक संवाद के ज़रिए किया जाएगा.
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने कहा कि नेपाल पहले ही भारत को एक आधिकारिक कूटनीतिक नोट भेज चुका है और उसे जवाब भी मिल चुका है.
शाह ने कहा, "जवाब में कहा गया है कि दोनों सरकारें इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और क्षेत्र की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की टीमें बनाएंगी और बातचीत की मेज़ पर समाधान तलाशेंगी."
उन्होंने कहा कि नेपाल ने सीमा विवाद को लेकर चीन और यूनाइटेड किंगडम के साथ भी कूटनीतिक स्तर पर चर्चा की है.
शाह ने कहा, "हमने केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि यूके सरकार से भी बात की है. हमारा मानना है कि यूके को भी इस मामले में रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उस दौर से जुड़ा है जब ब्रिटिश इंडिया इस क्षेत्र को छोड़कर गया था."
लिपुलेख और लिम्पियाधुरा कालापानी नेपाल के राजनीतिक हलके में एक संवेदनशील मामला रहा है. जून 2020 में नेपाल की संसद में एक नक्शा पारित किया गया जिसमें इन दोनों क्षेत्रों को नेपाल में दिखाया गया था.
इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दावे एतिहासिक तथ्य और सबूतों पर आधारित नहीं हैं और ना ही इसका कोई मतलब है.
बालेन शाह का रुख़

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बीबीसी नेपाली के अनुसार, सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रवि लामिछाने अगले सप्ताह दिल्ली का दौरा करने वाले हैं.
बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के बाद से लामिछाने सत्तारूढ़ पार्टी के पहले उच्च स्तरीय नेता हैं जिन्हें नई दिल्ली से निमंत्रण मिला है.
हालांकि दोनों पक्षों ने अभी तक आधिकारिक तौर पर तीन दिवसीय दौरे की घोषणा नहीं की है.
भारत को लेकर बालेन शाह का रुख़ अभी बहुत साफ़ नहीं है. प्रधानमंत्री बनने के बाद काठमांडू में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव बालेन शाह से व्यक्तिगत रूप से मिलकर बधाई देना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
बालेन शाह ने काठमांडू में मौजूद सभी राजदूतों को सामूहिक रूप से मुलाक़ात का समय दिया. यानी भारत के राजदूत के लिए कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं रहा.
यही नहीं, आरएसपी ने बयान जारी कर कहा कि नेपाली प्रधानमंत्री कम से कम एक साल तक कोई विदेश यात्रा नहीं करेंगे. जबकि परंपरा रही है कि नेपाल में प्रधानमंत्री बनने के बाद शीर्ष नेतृत्व सबसे पहले भारत का दौरा करता है.
काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, बालेन शाह भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री से भी नहीं मिले क्योंकि उनका कहना था कि वह मंत्री स्तर से नीचे के किसी भी विदेशी अधिकारी से नहीं मिलेंगे.
हालांकि बीबीसी नेपाली के अनुसार, रवि लामिछाने का यह संभावित दौरा भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के निमंत्रण पर किया जा रहा है. और दिल्ली पहुंचने पर उनकी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा करने की उम्मीद है.
भारत और नेपाल के बीच विवाद का मुद्दा

भारत और नेपाल के बीच मानचित्र को लेकर विवाद काफ़ी पुराना है. इसमें लिपुलेख से जुड़ा विवाद अहम है.
नेपाल दावा करता रहा है कि महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख सहित सभी क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल के क्षेत्र का हिस्सा हैं.
लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में स्थित है. यह भारत, नेपाल और चीन की सीमा से जुड़ा है. भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है.
नवंबर 2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए और इसके साथ ही नया नक्शा जारी किया. इस नक्शे में ये इलाके शामिल थे.
नेपाल ने इस पर तीखी आपत्ति जताई और कहा कि भारत अपना नक्शा बदले क्योंकि कालापानी उसका इलाक़ा है. इसके पाँच महीने बाद, मई 2020 में लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ गया.
इसके बाद 18 जून 2020 को नेपाल ने संविधान में संशोधन कर देश के राजनीतिक नक्शे को अपडेट किया. संशोधन के बाद नेपाल के मानचित्र में तीन रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्र- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा दिखाए गए.
भारत ने इसे 'एकतरफ़ा क़दम' बताते हुए नेपाल के क्षेत्रीय दावों को 'कृत्रिम विस्तार' मानने से साफ इनकार कर दिया.
भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है.
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