ममता बनर्जी के सामने टीएमसी को टूट से बचाने के लिए अब क्या हैं विकल्प, आगे क्या करेंगी?

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
    • ........से, कोलकाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

ममता बनर्जी ने जिस पार्टी का गठन करके अपनी मेहनत के बूते उसे महज़ 13 साल के भीतर शून्य से शिखर तक पहुंचाया था, क्या वह उनके हाथों से निकल जाएगी?

क्या उन पर अपने ही घर (पार्टी) में बेघर होने का ख़तरा मंडरा रहा है? पार्टी के 58 विधायकों की बग़ावत और निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के सदन में विपक्ष का नेता बनने के बाद, पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछे जा रहे हैं.

इसके साथ ही इस बात पर भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि ममता अब आगे क्या करेंगी. क्या वो जादुई पौराणिक पक्षी 'फ़ीनिक्स' की तरह एक बार फिर राख से उठकर खड़ी हो सकती हैं?

अपने चार दशक से भी ज़्यादा लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने एक से बढ़कर एक विकट हालात का सामना किया है.

मिसाल के तौर पर वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का महज़ एक सीट पर जीतना हो या फिर वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में महज़ 29 सीटों तक सिमट जाना. लेकिन यह पहली बार है कि पूरी पार्टी उनके हाथों से निकलती नज़र आ रही है.

दो-तिहाई विधायकों की बग़ावत के बाद फ़ौरी क़दम उठाते हुए ममता ने पार्टी की तमाम कमेटियों और संगठनों को भंग कर दिया है और चुनावी नतीजों के गहन विश्लेषण की बात कही है.

महासचिव अभिषेक बनर्जी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ वो लगातार बैठकों में व्यस्त हैं. इस बग़ावत के बाद उन्होंने अब तक आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

लेकिन शायद उनको पहले से ही पार्टी में इस टूट का आभास मिल गया था.

अभिषेक बनर्जी को लेकर उठे सवाल

बाग़ी विधायकों ने साफ़ कर दिया है कि उनकी नाराज़गी अभिषेक बनर्जी और पार्टी चलाने के उनके तौर-तरीक़ों से है, ममता से नहीं.

लेकिन ममता की मुश्किल यह है कि यह जानते हुए भी कि वो अभिषेक को नहीं छोड़ सकतीं. इसकी वजह भी है.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "यह सही है कि पार्टी में अभिषेक का कद बढ़ने के साथ ही कई पुराने नेताओं की नाराज़गी बढ़ने लगी थी."

"उनके अलावा, नई पीढ़ी के कई नेताओं में भी असंतोष बढ़ रहा था. शुभेंदु अधिकारी ने भी इसी वजह से पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था."

इस नेता ने यह भी कहा कि "सब कुछ जानते हुए ममता, अभिषेक को नहीं छोड़ सकतीं. यह सिर्फ़ पारिवारिक मामला नहीं है."

"अभिषेक को छोड़ने या उनके ख़िलाफ़ किसी कार्रवाई से यह संदेश जाएगा कि वो बाग़ियों की धमकी के आगे झुक गई हैं. लेकिन झुकना ममता के स्वभाव में नहीं है."

तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि "बदली हुई परिस्थिति में ममता बनर्जी, विधानसभा की घटना की क़ानूनी वैधता को अदालत में चुनौती देने पर विचार कर रही हैं."

"इसके लिए विधि विशेषज्ञों से भी सलाह ली जा रही है. पार्टी अदालत में सवाल उठाएगी कि पार्टी से निकाले गए किसी विधायक को विधानसभा में उसी पार्टी का नेता कैसे बनाया जा सकता है?"

इस मुद्दे पर पार्टी अगले सप्ताह कलकत्ता हाईकोर्ट में मामला दायर करेगी.

क़ानूनी चुनौती देने की तैयारी में टीएमसी

तृणमूल कांग्रेस सांसद और एडवोकेट कल्याण बनर्जी कहते हैं, "असली तृणमूल कांग्रेस से टूटकर बना गुट, जिसे विपक्षी पार्टी का दर्जा मिला है, अवैध है. ऋतब्रत को पार्टी ने पहले ही निकाल दिया था. जो पार्टी का सदस्य ही नहीं है वो तृणमूल कांग्रेस की ओर से विपक्ष का नेता कैसे बन सकता है?"

वह कहते हैं, "बंगाल के विधानसभा अध्यक्ष ने जो किया है, देश में उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती. जो नेता पार्टी में ही नहीं है, उसे विपक्ष का नेता बना दिया गया है. पार्टी इस मामले को क़ानूनी चुनौती देगी."

इसके अलावा पार्टी अब अपने सांसदों की गतिविधियों पर भी निगाह रख रही है. ख़ासकर हाल में चार बार की सांसद रही काकोली घोष दस्तीदार के बग़ावती रुख़ के बाद पार्टी में यह आशंका बढ़ रही है कि कहीं उसके सांसदों का हाल भी आम आदमी पार्टी के सांसदों की तरह न हो.

बुधवार देर रात को ममता के आवास पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति की बैठक में भी इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई.

दिल्ली की ओर बढ़ते क़दम

दूसरी ओर, बंगाल में सत्ता और उसके बाद पार्टी के भी लगभग हाथ से निकलने के बाद ममता ने अब दिल्ली की ओर ध्यान केंद्रित किया है.

अभिषेक के साथ आठ जून को वो दिल्ली में होने वाली इंडिया ब्लॉक की बैठक में हिस्सा लेंगी. पार्टी सूत्रों ने बताया कि ममता अगले लोकसभा चुनाव में 'एक के ख़िलाफ़' (एक यानी बीजेपी के ख़िलाफ़) हर सीट पर विपक्षी गठबंधन का साझा उम्मीदवार उतारने के फ़ॉर्मूले की वकालत करेंगी.

पार्टी के एक नेता बताते हैं, "ममता उस बैठक में बम फोड़ने की तैयारी में हैं. यानी वो एक नया फ़ॉर्मूला पेश कर सकती हैं." लेकिन उस नेता ने इस बारे में विस्तार से कुछ कहने से मना कर दिया."

तृणमूल कांग्रेस के एक नेता बताते हैं, "मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद शुभेंदु अधिकारी के पहले दिल्ली दौरे के दौरान ही वहां बंग भवन में ऋतब्रत बनर्जी ने उनसे मुलाक़ात की थी. पार्टी में बग़ावत के बीज उसी दिन पड़ गए थे."

हालांकि बीजेपी के नेता इस बारे में इनकार करते रहे हैं.

प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, "यह तृणमूल कांग्रेस का अंदरूनी मामला है. इससे बीजेपी का कोई लेना-देना नहीं है."

तृणमूल कांग्रेस मौजूदा परिस्थिति के लिए बीजेपी के बंगाल मॉडल को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. इंडिया गठबंधन की उसकी सहयोगी कांग्रेस भी इस मुद्दे पर उससे सहमत है.

इन दोनों दलों का कहना है कि बीजेपी भले औपचारिक तौर पर इस विभाजन को तृणमूल कांग्रेस का अंदरूनी मामला बताती रहे, लेकिन परदे के पीछे उसका समर्थन नहीं होने पर ऋतब्रत को न तो बग़ावत का साहस होता और न ही उनको इतने विधायकों का समर्थन मिलता.

ममता न विधानसभा में, न लोकसभा में

तृणमूल कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि वर्ष 1984 के बाद बीच के दो साल छोड़ दिए जाएं तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि ममता सांसद या विधायक न रही हों.

लेकिन फ़िलहाल उनके लोकसभा या विधानसभा में पहुंचने का कोई मौक़ा नज़र नहीं आ रहा है.

फ़िलहाल बशीरहाट लोकसभा सीट सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के निधन की वजह से ख़ाली है और वहां उपचुनाव होने हैं.

लेकिन पार्टी उस सीट पर ममता को उतारने का ख़तरा नहीं मोल ले सकती. वहां हार की स्थिति में उनकी और पार्टी की और ज़्यादा किरकिरी होगी.

विपक्षी राजनीतिक दलों ने तृणमूल की इस बग़ावत के लिए ममता बनर्जी को ही दोषी ठहराया है.

सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं, "ममता बनर्जी ने ही बंगाल में वाममोर्चा से मुक़ाबले के लिए बीजेपी को पांव जमाने में मदद की थी. अब उनको इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है. पार्टी की इस स्थिति के लिए वही ज़िम्मेदार हैं."

ममता के कट्टर आलोचक और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, "ये ममता बनर्जी ही थीं, जिन्होंने किसी दौर में कांग्रेस को तोड़कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. अब इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा है और ममता बनर्जी को वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ रहा है."

आगे की राह कितनी कठिन?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता अपने लंबे राजनीतिक करियर में पहले भी कई प्रतिकूल हालात से गुज़री हैं, और कामयाबी हासिल की है. लेकिन इस बार उनके लिए हालात बेहद मुश्किल हैं.

वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष कहते हैं, "ममता की कामयाबी का राज़ यह रहा है कि उनके पास नेताओं और कार्यकर्ताओं की फ़ौज तो थी ही, आम लोगों का भी भारी समर्थन हासिल था."

"लेकिन चुनावी नतीजों से साफ़ है कि अब न तो उनके पास वैसा समर्थन रहा है और न ही वैसे ज़्यादा नेता ही रहे हैं. ऐसे में इस बग़ावत से उपजी चुनौती से पार पाना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है."

वह कहते हैं कि फ़िलहाल ममता की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के सांसदों को एकजुट रखना है ताकि वहां भी विधानसभा का मॉडल नहीं लागू हो.

छात्र राजनीति के दौर से ही ममता के राजनीतिक उतार-चढ़ाव को क़रीब से देखने वाली वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मोनिदीपा बनर्जी कहती हैं, "ममता बनर्जी को अब यही सवाल परेशान कर रहा होगा कि विधायकों की बग़ावत के बाद क्या सांसद भी इसी राह पर चलेंगे?"

"संभवतः यह ममता के जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर है. उनका राजनीतिक भविष्य अंधकारमय दिख रहा है. अतीत में उन्हें फायर ब्रैंड नेता कहा जाता रहा है. अब उन्हें यह साबित करना होगा कि उनमें अभी भी चिंगारी बाक़ी है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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