टीएमसी पार्षदों के इस्तीफ़े और गिरफ़्तारी का सिलसिला, आख़िर नेताओं को किसका है डर?

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

क्या सत्ता हाथ से निकलने के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब पश्चिम बंगाल में तेज़ी से राजनीतिक हाशिए पर पहुंच रही है?

क्या उसका भी वही हाल होगा जो वर्ष 2011 में सत्ता से हटने के बाद वाम मोर्चा का हुआ था?

पंद्रह साल बाद बीते महीने सत्ता गंवाने वाली तृणमूल कांग्रेस में पहले करीब दो-तिहाई विधायकों की बग़ावत और उसके बाद दर्जन भर से ज़्यादा नगर निगम और नगरपालिकाओं के सौ से ज़्यादा पार्षदों के इस्तीफ़ों और गिरफ़्तारियों के बाद राजनीतिक हलके में यही सवाल उठ रहे हैं.

राज्य में विधानसभा के बाद सत्ता का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र समझे जाने वाले कोलकाता नगर निगम के मेयर और पूर्व मंत्री फ़िरहाद हकीम के इस्तीफे़ के बाद अब इस निगम के पार्टी के हाथों से निकलने का ख़तरा पैदा हो गया है.

राज्य सरकार ने उसे नोटिस भेजकर पूछा है कि मौजूदा परिस्थिति में निगम के बोर्ड को भंग क्यों नहीं कर दिया जाए. इसका जवाब तीन दिनों के भीतर मांगा गया है.

मेयर के इस्तीफे़ के बाद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने न तो कोई टिप्पणी की है और न ही अगले मेयर के लिए किसी का नाम तय किया है.

रविवार को उन्होंने निगम में पार्टी के 136 पार्षदों की बैठक बुलाई थी. इसमें भावी रणनीति तय होनी थी.

लेकिन इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने के लिए ममता बनर्जी के दिल्ली जाने का हवाला देते हुए रविवार को कुछ घंटे पहले अचानक उस बैठक को रद्द कर दिया गया.

इससे राजनीतिक हलकों में कयास लग रहे हैं कि शायद इस बैठक में भी ज़्यादातर पार्षदों के ग़ैर-हाज़िर रहने की आशंका के कारण ही इसे रद्द करने का फ़ैसला किया गया है.

इससे पहले ममता बनर्जी ने बीते सप्ताह अपने आवास पर विधायकों की बैठक बुलाई थी.

लेकिन उसमें 60 विधायक ग़ैर-हाज़िर रहे थे. ममता बनर्जी ने कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके़ में जो धरना दिया था उसमें भी आठ विधायक ही पहुंचे.

ज़्यादातर सांसद और पार्षद वहां नज़र नहीं आए. इससे बंगाल की राजनीति में पार्टी के भविष्य पर अटकलों का सिलसिला तेज़ हो गया है.

इस्तीफ़ों का सिलसिला

बीते महीने विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद से ही पार्षदों के इस्तीफे़ का दौर तेज़ हो गया था.

पश्चिम बंगाल में कुल सात नगर निगम और 117 नगरपालिकाएं हैं.

बीते महीने चुनावी नतीजों तक इनमें सातों निगमों के अलावा 108 नगरपालिकाओं पर तृणमूल कांग्रेस का ही क़ब्ज़ा था.

लेकिन अब सौ से ज़्यादा पार्षदों की गिरफ़्तारी के बाद पार्टी के हाथों से निकलने वाले शहरी निकायों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है.

कुछ हालिया आंकड़े अपनी कहानी ख़ुद बताते हैं. कोलकाता नगर निगम के मेयर फ़िरहाद हकीम के बाद महानगर से सटे विधाननगर नगर निगम की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने भी इस्तीफ़ा दे दिया.

अब सरकार ने वहां प्रशासक की नियुक्ति कर दी है. कृष्णा वर्ष 2019 से मेयर पद पर थीं.

उत्तर 24-परगना ज़िले के बैरकपुर नगरपालिका में अध्यक्ष समेत पार्टी के तमाम 15 पार्षदों ने इस्तीफ़ा दे दिया है.

इसी तरह भाटपाड़ा नगरपालिका में अध्यक्ष समेत पार्टी के 30, गारुलिया में 21 में से 10, हालीशहर में एक साथ 16, कांथी में 17 में से 12, डायमंड हार्बर में 16 में आठ पार्षदों ने इस्तीफे़ दे दिए हैं.

अब तक कुल 115 पार्षदों ने अपने इस्तीफे़ दिए हैं. इनमें कई निगमों के मेयर और नगरपालिका अध्यक्ष भी शामिल हैं.

यह सूची लगातार बढ़ रही है. इसके साथ ही कटमनी, घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोप में पार्षदों की गिरफ़्तारी का सिलसिला भी लगातार तेज़ हो रहा है.

इस सूची में ताज़ा नाम है कोलकाता के जोड़सांको के पार्षद मोहम्मद जसीमुद्दीन का.

उनको रविवार की सुबह गिरफ़्तार किया गया. उनके ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं के तहत कई मामले दर्ज हैं.

इसके अलावा कई इलाकों में पार्टी के पार्षद विपक्षी दलों का दामन भी थाम रहे हैं.

कूचबिहार ज़िले के मेखलीगंज नगरपालिका के चेयरमैन प्रभात पाटनी पार्टी के छह पार्षदों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. इसके बाद उस नगरपालिका पर अब कांग्रेस का क़ब्ज़ा हो गया है.

'तृणमूल के पार्षद असमंजस में'

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि ज़्यादातर निगमों और नगरपालिकाओं को चुनाव से पहले ही भंग करने और वहां प्रशासक नियुक्त करने की नौबत आ गई है.

सरकारी सूत्रों ने बताया कि कई नगरपालिकाओं में तृणमूल कांग्रेस के पार्षदों ने दफ़्तर आना बंद कर दिया है.

ऐसे कई नेता गिरफ़्तारी के डर से भूमिगत हो गए हैं. शहरी विकास और नगरपालिका मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पाल ने पत्रकारों को बताया, "सरकार ऐसी नगरपालिकाओं में प्रशासकों की नियुक्ति कर रही है ताकि उनका कामकाज ठप नहीं हो."

उत्तर 24-परगना ज़िले की भाटपाड़ा नगरपालिका में तृणमूल कांग्रेस के 35 में से 30 पार्षदों ने इस्तीफ़ा दे चुके हैं.

इसके पूर्व वाइस-चेयरमैन देबज्योति घोष कहते हैं, "हमारे पास इस्तीफे़ के अलावा कोई विकल्प नहीं था. कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा था और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई समर्थन या दिशानिर्देश नहीं मिल रहा था."

तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, सत्ता हाथ से निकलने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई है.

पार्टी की ओर से कोई स्पष्ट संदेश नहीं दिया जा रहा है. इससे तमाम पार्षद असमंजस में हैं.

विधानसभा चुनाव में हार से ज़्यादातर पार्षदों को मनोबल टूट गया है. भ्रष्टाचार में शामिल नेता सरकार की क़ानूनी कार्रवाई के डर से इस्तीफ़े दे रहे हैं.

'बंगाल की राजनीति में ऐसा दौरा नहीं आया था'

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार बदलने के बाद पार्टी के बिखराव और ज्यादातर मामलों में गिरफ्तारी के डर से ही पार्षदों के इस्तीफे़ का सिलसिला तेज़ हो गया है.

कई नेताओं पर नगरपालिकाओं में कर्मचारियों की नियुक्ति में हुए कथित घोटाले में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं. ऐसी पुरानी फ़ाइलें अब निकाली जा रही हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक तापस मुखर्जी कहते हैं, "इन पार्षदों को पता है कि अब सरकार अपनी नहीं है. ऐसे में गिरफ़्तारी की स्थिति में उनको पार्टी से कोई मदद नहीं मिलेगी. उनकी सोच है कि शायद इस्तीफ़ा देने से वो बच जाएं."

उनका कहना था, "सरकार तो बदलती ही रहती है. लेकिन शहरी निकायों में इतने बड़े पैमाने पर इस्तीफ़ों का दौर बंगाल की राजनीति में हाल के वर्षों में देखने में नहीं आया था."

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार राज कुमार गांगुली कहते हैं, "पंद्रह साल से सत्ता में रहते हुए ज्यादातर पार्षद के नाम किसी न किसी घोटाले में शामिल थे. कोई कटमनी लेने में शामिल था तो किसी के दामन पर भर्ती घोटाले के छींटे थे. इसी वजह से सरकार बदलते ही पलायन और इस्तीफ़ों का सिलसिला तेज़ हो गया है."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता हाथ से निकलने के फौरन बाद इतनी दुर्गति तो वाममोर्चा और उसके प्रमुख घटक दल सीपीएम की भी नहीं हुई थी.

चार मई से पहले तक अजेय नज़र आने वाली ममता बनर्जी की पार्टी अब ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है.

ऐसे में राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता यह बिखराव रोक सकेंगी?

लेकिन इस सवाल का जवाब फिलहाल न तो राजनीतिक पंडितों के पास है और न ही तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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